<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786</id><updated>2012-02-07T06:26:02.947-08:00</updated><title type='text'>S H A R D A</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>84</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8302263421875463795</id><published>2011-07-21T22:17:00.000-07:00</published><updated>2011-07-21T22:19:43.059-07:00</updated><title type='text'>सबसे पहले और सिर्फ "हम "</title><content type='html'>एक छोटे से ब्रेक के बाद हम पुन हाजिर होते है कही भी मत जाइयेगा । इस  ब्रेक के बाद हम बतलायेंगे आपको एक ऐसे कुआ के बारे में जिसका पानी पीते ही  आदमी हिंसक हो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    केवल हम ही बतला रहे है पहलीबार आपको। जी हां यह कुआ है मध्यप्रदेश के  चंम्बल संभाग में । इस कुये ने पैदा किये है अनगिनत डाकू। इस कुये का पानी  पीते ही आदमी का खून खौलने लगता है , उसमें बदले की भावना जाग्रत होजाती है  और उसके साथ किये गये लोगों के दुर्व्यवहार इस जन्म के और पूर्व जन्म के  सभी   उसे याद आने लगते है । कुये का पानी पीते ही सबसे पहले उसका ध्यान  जाता है बन्दूक की ओर ,और फिर अपने दुश्मन से बदला लेकर कूद जाता है चम्बल  के बेहडों में । वह या तो किसी गिरोह में शामिल हो जाता है या फिर अपना  स्वयं का गिरोह बनालेता है। जबकि इस कुये का पानी पीने के पहले ऐसी कोई  भावना नहीं होती । आदमी सज्जन होता है व्यवहार कुशल होता है , सबसे हिलमिल  कर रहता है किन्तु पानी पीते ही उसे क्या हो जाता है यह जांच का विषय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    पानी जो जीवन है पानी जो नदी में जाता है तो गंगाजल बन जाता है ,पानी  जो समुद्र में जाकर खारा हो जाता है कोई चमत्कार हो जाये तो मीठा भी  हो  जाता है , पानी जो प्रकृति  की अनुपम देन है और  15 रुपये में एक बोतल  मिलता है , वही पानी इस कुये में पहुंच कर कितना घातक रासायन बन जाता है ,  अफसोस इस पानी का अभीतक वैज्ञानिक परीक्षण व विश्लेषण नहीं किया गया । इस  कुये के पानी का यदि चिकित्सा वैज्ञानिको व्दारा अनुसंधान किया जाता तो  इससे डिप्रेशन और फोविया जैसी बीमारियों की दबायें तैयार की जासकतीं थी।  मगर हम इस ओर जागृत नहीं है । जी हां यह वही कुआ है जिसका पानी पीते ही  आदमी की नसों मे रक्त तेजी से दौडने लगता है । कई आदमी प्यास लगने पर कुआ  खोदते है मगर यह पहले से ही खुदा हुआ है कितना प्राचीन है इस पर भी शोध  होना जरुरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    इस कुये का पानी पीते ही डकैत बनकर उसका ध्यान जाता है अमीरों की ओर  उन्हे लूटने का , गरीबों की ओर उन्हे कुछ मदद करने का ताकि बदले में वे  उसकी मदद करते रहे । उसकी नजर में आजाते है ऐसे अमीर लोग जिनसे फिरौती बसूल  की जा सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    जीं हां ये जो आप देख रहे है यही है वह कुआ । चम्बल के खतरनाक पानी का  कुआ । इस कुये ने कई मानसिंह पैदा किये, कई लाखन पैदा किये , कई लहना पैदा  किये , कई पुतली बाई पैदा की और निश्चित ही  इसी कुये के पानी की नहर गई  होगी फूलन के गांव में ।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;    आइये हम अब इस कुये के पास निवासी लोगों से आपको मिलवाते है कि क्या  कारण है कि लोग इस कुये का पानी पीने से कतराते है, क्यों नहीं चाहते कि   वे स्वम और उनके बच्चे इस कुये का पानी पियें । इसी गांव के निवासी हैं ये   बुजुर्ग  , इनसे पूछते हैं -&lt;br /&gt;   आप इसी गांव में रहते है - जी हां&lt;br /&gt;    क्या उम्र होगी आपकी -- यही कोई 50-60 वर्ष&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      क्या आप बतलायेंगे कि आखिर क्या बात है ऐसा कौनसा कारण है कि आप इस कुये का पानी पीने से परहेज करते है।&lt;br /&gt;    बुजुर्ग  - जी  कुये में पानी ही नहीं है वर्षो से सूखा  पडा हुआ है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8302263421875463795?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8302263421875463795/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8302263421875463795' title='39 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8302263421875463795'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8302263421875463795'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/07/blog-post_21.html' title='सबसे पहले और सिर्फ &quot;हम &quot;'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>39</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1744926469368343846</id><published>2011-07-14T08:07:00.000-07:00</published><updated>2011-07-14T08:08:34.406-07:00</updated><title type='text'>हाई अलर्ट और बरसात</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt; बरसात का पानी कालोनी में घुटने घुटने भर गया और वह फिल्मी  गाना "बरसात में हमसे मिले तुम सजन तुमसे मिले हम" व्यर्थ हो गया तो  नगरनिगम जाकर निवेदन किया कि वे अलर्ट घोषित करदें ताकि नगर के कर्मचारी  अलर्ट हो जायें और पानी के निकास की व्यवस्था करदें। वे नाराज होकर बोले  पिछली साल ही तो आपकी कालोनी के लिये अलर्ट घोषित किया गया था । आपको कुछ  काम तो है नहीं चले आते हो मुंह उठाये ,और आपको पानी से दिक्कत क्या होरही  है। हमने निवेदन किया कि सर सडक दिखाई नहीं देती है । बोले -क्यों देखना  चाहते हो सडक ? निवेदन किया कि सडक मे जगह जगह गडढे होरहे है जब वे दिखाई  नहीं देंगे तो उनसे बच कर कैसे चलेंगे। बोले -गडढे दिखने लगेंगे तो फिर  आजाना कि अलर्ट घोषित करके गडढे भरवा दो।हमें और भी कोई काम है या नहीं या  फिर आपका ही काम करते रहे। और आप तो  बहुत अच्छी स्थिति में हो , दूसरी  कालोनियों में तो कमर कमर पानी भरा हुआ है वे तो नहीं आये शिकायत करने आप  बडे जागरुक नागरिक बने हुये है।&lt;br /&gt;    खैर साहब किसी तरह पानी के निकास की व्यवस्था तो हो गई परन्तु पुन पानी  बरसने तक कालोनी की सडक की "आज रपट जायें तो हमे न उठइयो " वाली स्थिति  बनी रहीं ।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;प्यारी अंग्रेजी भाषा में एक बहुत प्यारा सा ,दुलारा सा शब्द है ’अलर्ट ’  जो हम होश सम्हाला है तब से(:यदि वास्तव में सम्हाला हो तो:) सुनते आरहे  है, जिसके हिन्दी शब्दकोष में भी बहुत प्यारे प्यारे दुलारे दुलारे  पर्यायवाची शब्द हमें मिल सकते है मसलन फुर्तीला ,चौकन्ना, तेज,  प्रसन्नवदन, जागरुक, सतर्क, आदि इत्यादि।&lt;br /&gt;    शब्दकोष में हाइअलर्ट शब्द उपलब्ध नही हो सका । परन्तु प्यारे शब्दों  के साथ 'कुछ' लगाने की आवश्यकता हमेशा महसूस की गई जिसे हम  विशेषण भी कह  सकते हैं  की प्रथा बहुत प्राचीन होने से,यथा महान आत्मा, महान पुरुष तो इस  अलर्ट के साथ भी एक विशेषण लगाया गया, महान चौकन्ना ,महान जागरुक । चूंकि  अलर्ट अंग्रेज़ी  का शब्द है तो इसके साथ महान के बदले में हाई का प्रयोग  किया गया ।&lt;br /&gt;    हाइ अलर्ट होता नहीं है इसे घोषित किया जाता है। इस महान अलर्ट को  कब  घोषित किया जाना है यह महापुरुष ही तय करते है। जब कोई घटना घटित होजाती है  तो इसे घोषित कर दिया जाता है। फिर यह हाइ अलर्ट घीरे धीरे या एकदम कब लो-  अलर्ट में परिवर्तित हो जाता है इसका पता ही नहीं चलता ।  जब पुन हाई  अलर्ट घोषित होता है तब पता चलता है कि यह हाइ अलर्ट ,लो अलर्ट हो चुका था ।  स्वभाविक ही है यदि हाइ अलर्ट चल ही रहा होता तो फिर मोस्ट हाई अलर्ट होना  चाहिये था । और चूंकि जब पुन हाई अलर्ट घोषित किया गया है तो इसका अर्थ  यही है कि हाइ अलर्ट लो अलर्ट में परिवर्तित हो चुका था ।&lt;br /&gt;    यदि अलर्ट का अर्थ जागरुक या सावधान से लगाया जाये तो स्वाभाविक है कि  हमेशा कोई भी सावधान नहीं रह सकता उसे विश्राम की आवश्यकता होती है।&lt;br /&gt;अति सर्वत्र वर्जयेत का सिध्दान्त भी लागू होता है जो अति करता है उसकी जगह या तो अस्पताल है या फिर तिहाड।&lt;br /&gt;    बचपन मे बच्चे शैतानी करते है दिनभर उधम किया करते है मां चिल्लाती  रहती है परन्तु जैसे ही बाप घर में आता है हाइ अलर्ट घोषित हो जाता है। इसी  तरह की कुछ कार्यालयों की भी स्थिति होती है।अत कुछ हद तक अलर्ट के लिये  बाप बॉस ,बाढ और बरसात  का आना जरुरी है। लेकिन अलर्ट होता है इन सब आने के  बाद ही। यदि बाढ आने के पहले ही बाढ का इन्तजाम कर लिया तो ?, अब्बल तो   बाढ आयेगी ही नहीं और अगर आ भी गई  तो कर क्या लेगी । फिर अलर्ट और हाइ  अलर्ट का मलतब ही क्या रह जायेगा । अत  इस शब्द की सार्थकता बनाये रखने के  लिये आवश्यक है कि  बाढ , बाप और बॉस और बरसात के आने का इन्तजार किया  जाये।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1744926469368343846?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1744926469368343846/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1744926469368343846' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1744926469368343846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1744926469368343846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='हाई अलर्ट और बरसात'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-6199432223353772965</id><published>2011-06-26T21:29:00.000-07:00</published><updated>2011-06-26T21:32:46.106-07:00</updated><title type='text'>कवि की कविता शायर के शेर</title><content type='html'>'नाना भाति राम अवतारा रामायण सत कोटि अपारा'  की भाति नाना प्रकार की  कवितायें और नाना प्रकार के कवि । दौनो आकृति में, प्रकृति में भिन्न आकार  प्रकार में भी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कोई श्रंगार रस में तो कोई हास्य रस मे ही डूबे रहते है। कुछ कवि चुटकुलों  को कविता के सांचे में ढाल देते है । कुछ कवि आशु कवि होते है इधर कोई बात  सुनी उधर कविता तैयार ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कुछ कवि फुल टाइम और कुछ पार्ट टाइम कवि होते है। सर्विस करने वाले  इतवार को कविताऐं करते है वह उनका छुटटी का दिन होता है कविता लिखने का दिन  होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    एक कविवर के पिताजी का देहान्त हुआ था तो शोक पत्र उन्हौने अपनी स्वरचित कविता में ही छपवाया था।&lt;br /&gt;कुछ कवि बहुत  ज्यादा   भावुक होते है कवि के सफेद बाल देख कर चंद्रवदनि   मृगलोचनी ने बाबा का सम्बोधन कर दिया ,दिल में टीस लगी और कविता प्रारम्भ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कुछ कवियों की कवितायें समझने मे थोडी देर लगती है । कवि कह रहा था कि'  जब भी वह आती है एक रौनक आजाती है और जब भी वह जाती है मायूसी छा जाती  है'  ये बात वे लाइट के वारे में कह रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कुछ लोग कहते है कवि पैदा होता है बनता नहीं है लेकिन यह भी देखा गया  है कि बनते  भी है और बन भी  सकते है" मै कही कवि न बन जाउ तेरी याद में ओ  कविता" । और" मै शायर तो नहीं जबसे देखा मैने तुझको मुझको शायरी आगई।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कुछ कवि पैसे के लिये लिखते है तो कुछ नाम के लिये। कविता के साथ  पत्रिका में नाम ओ फोटो भी  छप जाना चाहिये । कुछ का कहना है कि नाम से पेट  नहीं भरता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    पुराने जमाने में कई कवियों का कविता पर ही गुजारा होता था। वे  आश्रयदाता की तारीफे करते रहते थे जैसे  भूषण  आदि वे राजकवि कहलाते थे ।  एक कवि प्रथ्वीराज चौहान के पास थे शायद चंद वरदायी या ऐसे ही कुछ उन्हौने  प्रथ्वीराज रासो लिखा  बिल्कुल आल्हखण्ड की तरह और 11 साल की उम्र होते  होते प्रथ्वीराज की 14 शादियां करादी। कवि कविता पढ कर सुना कर जाने लगता  था तो राजे महाराजे उसे विदा स्वरुप राशि दिया करते थे यदि किसी को नही  देना होता तो वह कवि से कहता महाराज इस कविता का अर्थ बताओ और केशवदास की  कविता दे देता था ।" कवि को देन न चहे विदाई पूछो केशव की कविताई "।  केशवदास को कठिन काव्य का प्रेत कहा गया है इतनी क्लिष्ठ कि क्या बतायें  आपको। उस जमाने की कवितायें राजनीति को भी प्रभावित करती थीं ।कवि ने जब  देखा राज्य की व्यवस्था बिगड रही है और राजा रासरंग में डूवा है तो एक दोहा  लिख कर राजा तक पहुंचाया ""......अली कली हीं सों लग्यों आगे कौन हवाल""  राजा होश में आगया और राज्य का विधिवत संचालन करने लगा । आज आप कविता क्या  एक खण्ड काव्य लिखदो महा काव्य लिखदो कोई फर्क नहीं । हां उसका विमोचन करने  आजायेंगे मगर पढेंगे नहीं,  फुरसत ही नहीं है&lt;br /&gt;""तुमने क्या काम किया ऐसे अभागों के लिये जिनके वोटों से तुम्हे ताज मिला तख्त मिला&lt;br /&gt;    उनके सपनों के जनाजे में तो शामिल होते तुमको शतरंज की चालों से नहीं वख्त  मिला ।""&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    पुराने कवि बडे रसिक भी होते थे । उनकी नायिका झूला झूल रही है । कैसे ?  वह  वियोग में इतनी क्षीण हो गई है सांस लेती है तो 7 कदम पीछे और सांस  छोडती है तो 7 कदम आगे उसका शरीर आजा रहा  है। डर है बेचारी अनुलोम विलोम न  करने लगे ,बहुत प्रचार प्रसार है इसका।&lt;br /&gt;    एक तो बेचारे दूध पीने को तरस गये&lt;br /&gt;'प्रिया के वियोग में प्रियतम बेहाल थे&lt;br /&gt;अन्दर से सांस बहुत ठंडी सी आती थी&lt;br /&gt;दूध का भरा गिलास कई बार उठाया पर&lt;br /&gt;सांसों के लगते ही कुलफी जमजाती थी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदि काल से जितने कवि,शायर  ,गीतकार हुये सभी ने बरसात  के मौसम पर कुछ  ज्यादा ही लिखा है। बादलों पर , रिमझिम फुहारों पर,मोर ,पपीहा सब पर -&lt;br /&gt;यही मौसम क्यों रास आया कवियों को? क्या इस मौसम में बच्चों व्दारा  कापी  किताब,एडमीशन डोनेशन फीस की मांग नहीं की जाती थी।क्या पत्नियों  की ओर से  अचार के लिये कच्चे आम और तेल की फरमाइश नहीं की जाती थी? क्या इस मौसम में  उनके मकान में सीलन नहीं आती होगी,छत न टपकती होगी? क्या कमरे में पंखे की  हवा में कपडे सुखाने ,डोरी बांधने मकान मालिक कील ठोंकने देता होगा ? आखिर  इस मौसम पर और इस मौसम में कवितायें ज्यादा रची जाने का कुछ तो कारण होता  ही होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     हाँ इस मौसम में कवित्व भाव जागृत करने उन्हे वातावरण भी मिलता होगा  क्योंकि इन्ही दिनों कीट पतंगे रौशनी की ओर चक्कर लगाते है कवि सोचता होगा  एकाध पोस्ट निकलने पर शिक्षित बेरोजगार अपने अपने प्रमाणपत्रों का बंडल  लिये हुये चक्कर लगा रहे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    जगह जगह गडढों में ऐकत्रित हुये पानी को देख कवि सोचता है ऐसे ही  कर्मचारी के टेबिल पर फाइले इकटठा होती रहती है। बिजली की चमक ऐसे दिखती  होगी जैसे किसी सभा में नेताजी उदधाटन चाटन उपरांत दांत दिखा रहे है या कोई  अभिनेत्री किसी टूथपेस्ट का विज्ञापन दे रही हो। बादल की गरज एसी  जैसे  कोई क्रोधी व्यक्ति पाठ कर रहा है । बडी बडी बूंदे बॉस के गुस्से की तरह और  धूप का अभाव जैसे आउट डोर में डाक्टर। कपडे सुखाने तरसते लोग ऐसे दिखते  होगे जैसे महगाई भत्ते को कर्मचारी तरसते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कवि की तबीयत भी बरसाती हो जाती है वह बूंदों के साथ ऐसे नाचने लगता है  जैसे  पडौसी के नुक्सान पर पडौसी नाच रहा हो वह मस्त होकर ऐसे गाने लगता  है जैसे परीक्षा के दिनों में माइक लगाकर किसी मोहल्ले में हारमोनियम तबला  के साथ रात भर अखंड पाठ हो रहा हो। बादलों के साथ उडने लगता है जैसे चुनाव  जीत कर लोग हवाईजहाज में उडते है। मोरो के साथ वह ऐसे झूमने लगता है जैसे  अपराधी लोगों का कोई बॉस जेल से रिहा हो गया हो। कभी बादल इतने नीचे आजाते  है कि आने लगे ' एसी कार से उतर कर मोहल्ले में कोई वोट मांग रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    बरसात पर सारे गाने लिखे जा चुके और कुछ न बचा तो ""छतरी के नीचे  आजा""। आपको तो अनुभव होगा तब का जब आपके पास कार नहीं होती होगी ,छाते  खोते बहुत हैं । पानी बरसते में छाता लेकर गये दोपहर बाद पानी बन्द होगया ।  रोजाना की तरह छै बजते ही दफतर छोड कर भागे छाता भूल गये । दूसरे दिन आकर  तलाश करते है। फिर मिलता है क्या ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मेरे मित्र छाते पर नाम लिखवा रहे थे बोले खोयेगा नहीं । मैने कहा जब  कोई इसे ले जायेगा तो यह तेरा लिखा हुआ नाम क्या चिल्ला कर कहेगा कि यह  मुझे ले जारहा है। मगर नहीं माने लिखवा  ही लिया नाम ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-6199432223353772965?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/6199432223353772965/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=6199432223353772965' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6199432223353772965'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6199432223353772965'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/06/blog-post_26.html' title='कवि की कविता शायर के शेर'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-671360172535382430</id><published>2011-06-10T10:29:00.000-07:00</published><updated>2011-06-10T10:32:56.932-07:00</updated><title type='text'>कवि और कविता</title><content type='html'>कभीss कभीsss मेरे दिन मेंeeeee खsयाsल आताs है। कभीनहींभीआता है। एसा खयाल  क्यों आता है कि पहले की अपेक्षा अब कवितायें ज्यादा लिखी जारही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;    शायद पहले कविता लिखना कठिन था बिल्कुल गणित के सवालों की तरह।  कविता एक लेकिन उसे  कितने भागों मे विभक्त कर रखा था  दोहा, चौपाई, सोरठा,  छंद, सवैया, कुण्डलियां और उस पर भी तुर्रा ये कि उनकी मात्राऐं गिनो। अब  कैलकुलेटर  थे नहीं  तो अंगुलियों के पोरों पर मात्राओं की गिनती किया करते  थे।  दोहा एक दो लाइन का, लेकिन उसके चार भाग । दो भाग मे 11 और दो  में  13 मात्राऐं होना आवश्यक । कितनी परेशानी । आधी जिन्दगी तो मात्राऐं गिनने  में ही निकल जाये। आपको तो पता नहीं होगा पहले एक रुपया भी कई भागों में  विभक्त था । रुपया,अठन्नी,चवन्नी, दुअन्नी, इकन्नी, पैसा, धेला और पाई ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    दूसरी बात पहले शिक्षा का भी अभाव था। कोई बी ए पास हो जाता था तो उसे  हाथी पर बिठा कर जलूस निकाला जाता था और वह अपने नाम के साथ बीए लिखता था।  आज देखिये एम ऐ पी एच डी शिक्षाकर्मी है और उनको 3500/रुपये तनखा तब मिलती  है जब अंगूठा लगा प्रमाणपत्र  हैड आफिस पहुंच जाता है कि हां इसने महीना भर  डयूटी दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;    किसी कवि से अपने  समय की वातावरण की अवहेलना तो होती नहीं  है ऐसा  वातारण भी  होना चाहिये कि कवित्व भाव जाग्रत हो। उस जमाने में  इतनी हत्याऐं, डकैती, इतने बलात्कार ,शोषण न थे । अपने समय की धार्मिक ,  राजनैतिक,सामाजिक , सांस्कृतिक बातों का प्रभाव रचना पर होता ही है इसलिये   पहले कवित्व भाव कम था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;"जहां तक मेरा सवाल है मुझे न तो पहले की कविता---&lt;br /&gt;केसव चोंकति सी चितवे छिति पाँ धरके  तरके तकि छाहीं&lt;br /&gt;बूझिये और कहे मुख और सु और की और भई छीन माहीं"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ आती थी और न आज की कविता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;""मै सुनता था नूपुर धुनि&lt;br /&gt;प्रिय&lt;br /&gt;यध्यपि बजती थी चप्पल""&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समझ आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    तय शुदा बात है कि कार्यक्षमता की भी बृध्दि हुई है।पहले बुध्दि बर्धक  टानिक यंत्र तंत्र न थे । आज तो पढाई मत करो यंत्र पहिन लो परीक्षा में  सफलता सुनिश्चित है।  पहले कोई कहानी लिखता रहता ,तो कोई कविता ही लिखता  रहता था । आज  विविधता है लेखक ने आज कहानी लिखी ,कल कविता और परसों गजल ।  कभी कभी तो एक ही दिन में एक कविता और एक गजल दौनो लिख लेते है। पहले कविता  लिख कर गुरु को बताई जाती थी और वे यहां का शब्द वहां और यहां की लाइन  वहां करवा दिया करते थे जिससे  एक नई ही कविता तैयार हो जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    एक टेलर मास्टर अपनी खटारा सिलाई मशीन से सिलाई कर रहा था । खड खड की  आवाज हो रही थी वहीं एक बन्दर वाला खेल दिखाने  आगया  डुम डुम बजाने लगा ।  टेलर ने उसे वहां से भगाना चाहा तो उसने अपने पेट का वास्ता दिया ।  टेलर  का कहना था कि वह खड खड और डुम डुम के बीच असुविधा महसूस कर रहा है और काम  नहीं कर पारहा है। बन्दर वाले ने उसे आपस में ताल मिलाने को कहा । कुछ मिनट  में खड खड डुम  डुम की ताल मिल गई दौनो अपना अपना व्यवसाय करते रहे। खेल  खत्म करके बन्दर वाला जाने लगा तो बोला क्यों उस्ताद ताल मिल गई थी ?  टेलर  ने कहा ताल तो मिल गई- मगर  शेरवानी की जगह सलवार सिल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    उस समय विदेशी साहित्य से भी कम परिचय था  तो उनका अनुवाद कर अपनी  कविता भी नहीं कह सकते थे। फिर बहुराष्ट्रीय कंपनियां इनसे भी साहित्य सृजन  की प्रेरणा मिली । आइ ए एस नौकरी छोड कर इन कम्पनियों में जाने लगे   तो  कवि हृदय में कवित्व भाव जाग्रत होता कि    उफ कितनी योग्यता ,'कितनी  क्रीम  देश से बाहर चली जारही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    मेरे नगर मे नदी नहीं है नाला है तो बरसात में जब नाला  चढता है तो लोग  उसे ही देखने जाते है ऐसे ही नाला उफान पर था और दर्शक एकत्रित थे एक  सज्जन बार बार कह रहे थे उफ कितना पानी व्यर्थ चला जारहा है उफ कितना पानी  व्यर्थ चला जारहा है । वे न तो कोई इन्जीनियर थे न जल संरक्षण समिति के  सदस्य थे। असल में उनका दूध का व्यवसाय था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्टरनेट में एसी साइड भी है जिनके खुलते ही दर्शक मंत्र मुग्ध हो जाता है  और उसमें  ऐसा कवित्व भाव जागृत होता है कि कवितायें फूल जैसी झरने लगती है  लेख तैयार होने लगते है। अब सम्पादक तो इन्हे पत्रिकाओं मे छापने से रहे  और ब्लाग पर मोडरेशन सक्षम है तो फिर इनको कोयला हाथ में लेकर बस स्टेन्ड  के बाथरुम और रेलवे के व्दितीय श्रेणी के डब्बे के शौचालयों में जाकर अपनी  विव्दता का प्रदर्शन करना पडता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    कुछ लोगों का यह मानना है कि आजकल साहित्य और सिनेमा में अश्लीलता  प्रवेश कर गई है । लेकिन इसके विपरीत तर्क यह दिया जाता है कि अश्लीलता न  तो शब्दों में होती है और न दृश्यों में । वह तो श्रोता और दर्शक की  मानसिकता में रहती है  , इसलिये श्रोता दर्शक और पाठक   अनचाहे अर्थ निकाला  करते है। ठीक है । जैसा भी है अरे भाई  लिखा तो जारहा है  यह क्या के है  --बैटर दैन नथिंग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो पुरानी सहेलियां मिलती हैं&lt;br /&gt;कहो बहिन कैसी हो&lt;br /&gt;अच्छी हूं&lt;br /&gt;और बच्चे कैसे है&lt;br /&gt;वे भी अच्छे है&lt;br /&gt;और पतिदेव कैसे है&lt;br /&gt;न होने से अच्छे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;    पहले ,अलंकारों का प्रयोग होता   था फिर व्याकरण -बापरे- "कनक कनक ते  सौ गुनी " "सारंग ले सारंग चली" , आज  व्याकरण और अलंकारों का भी झंझट नहीं  । हिन्दी हो या अंग्रेजी आप ""हू आर यू"" को ""आर यू हू"" बे-धडक लिख सकते  है। कोई टोकने वाला ही नहीं है । पहले तो किसी ने दोहा सुनाया और जरा सी  त्रुटि पर सुनने वाला बाल खीचने लगता था जैसे कोई गायक किसी गुरु के सामने  हारनोमियम पर कोई राग निकाल रहा हो और गलती से एक भी अंगुली शुध्द स्वर की  जगह कोमल स्वर को टच कर जाय तो सुनने वाला वहीं अपना सिर ठोकने लगता है।  ऐसे ही कविताओं का हाल था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर लोग कहते है कि आजकल कैसा ?? लिखा जारहा है। अरे लिखा तो जारहा है -- कुछ तो लिखा जारहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले बेटी पूछती थी मां मे जीन्स पहिनलूं&lt;br /&gt;मत पहिन बेटी लोग क्या कहेंगे&lt;br /&gt;आज बेटी पूछती है मां मै स्विम सूट पहिनलू&lt;br /&gt;पहन ले बेटी कुछ तो पहन ले&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-671360172535382430?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/671360172535382430/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=671360172535382430' title='40 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/671360172535382430'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/671360172535382430'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='कवि और कविता'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>40</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-4201738921261470533</id><published>2011-05-20T06:17:00.000-07:00</published><updated>2011-05-20T06:20:11.985-07:00</updated><title type='text'>पत्राचार</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 28px; font-size: medium; "&gt;&lt;div&gt;आज आदमी की सुविधा के लिये कितने साधन उपलब्ध है, एस. एम. एस, ई -मेल, फेसबुक और भी न जाने क्या क्या। पुराने लोगों ने इस खतोकिताबत के लिये  कितने कष्ट झेले है इस सम्बंध में जब सोचता हूं तो आखों में आसूं आजाते है, दिल बैठने लगता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;बैठ जाता है साहब दिल बैठ जाता है आदमी खडा रहता है और उसका दिल बैठ जाता है, आदमी लेटा रहता है और  उसका दिल बल्लियों उछलने लगता है, आदमी चुपचाप बैठा रहता है और उसके कान खडे होजाते हैं, बिना कैंची आदमी, आदमी के कान कतरता रहता है, आदमी ऊंचा  रहता है और उसकी मूछ नीची हो जाती है, बिना चाकू छुरी की आदमी की नाक कट जाती है। सूर्पनखा की नाक थोडे ही न कटी थी, काटने वाले चाकू छुरी तलबार आदि कुछ लेकर ही नहीं गये थे  वाण थे उनके पास । वाण से भी कहीं नाक कटती है । वो तो क्या हुआ उस रुपसी का- उस षोडसी का ,उस मृगनयनी, चन्द्रबदनी, सुमुखि सुलोचनि का प्रणय निवेदन दौनो भ्राताओं ने ठुकरा दिया तो उसकी घोर इन्सल्ट हुई गोया उसकी नाक कट गई । वो तो आइ.पी.सी. प्रभावशील नहीं थी वरना दफा 500 का दावा ठोंक देती। हां तो  आदमी तना रहता है और उसकी गर्दन शर्म से झुक जाती है, महीनों से जो व्यक्ति बिस्तर से हिल नहीं सकता ....&lt;/div&gt;&lt;div&gt;""कल तलक सुनते थे वो बिस्तर से हिल सकते नहीं&lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज ये सुनने में आया है कि वो तो चल दिये ""&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;कितनी परेशानी- कितनी मुश्किलें.-नहर के एक किनारे पर शाहजादे सलीम बैठे है एक कमल के फूल में चिटठी रख कर नहर में डाल देते है दूसरे किनारे पर अनारकलीजी बैठीं हैं इन्तजार कर रहीं हैं और देखिये ," आपके पांव देखे इन्हे जमीन पर मत उतारियेगा मैले हो जायेंगे " और उस चिटठी को पाकीजाजी चांदी की डिबिया  मंगवाकर उसमें महफूज रखती हैं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;पहले पोस्ट आफिस का महा नगरों तक ही चलन था जिलों तक भी होगा ,और  एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले में चिटठी पहुंचाना, तो कोई पत्र बाहक थोडे बहुत पैसों की लालच में ऐसे काम के लिये तैयार होजाता था  जो कासिद कहलाता था। बहुत सोच समझ कर लिखना पडता था जनाब , आज कल की तरह नहीं कि इन्टरनेट पर कुछ भी अन्ट बंट शंट लिख दिया बहुत सोचना पडता था साहब ,कोई व्दिअर्थी शव्द न लिखा जाय, कोई गलत शब्द न लिखा जाये। अन्यथा-&lt;/div&gt;&lt;div&gt;"क्या जाने क्या लिख दिया उसे क्या इज्तिराब में&lt;/div&gt;&lt;div&gt;कासिद की लाश आई है खत के जवाब में"&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt; कुछ बच्चे भी इस काम को अन्जाम दे दिया करते थे।" नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुटठी में क्या है"  बोले चिटठी है फलां अंकिल ने भिजवाई है फलां दीदी को देने जारहा हूं। फिर शिक्षा का प्रचार प्रसार हुआ तो कापी और किताबों इस हेतु प्रयुक्त होने लगीं।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;आज की पीढी कुछ भी कहे मगर वह पीढी बहुत बुध्दिमान थी । इतने भविष्य का अन्दाज हमारे आज के बच्चे नहीं लगा सकते है। देखिये पत्र लिख दिया और भेजने के बाद पुन पत्र लिखने बैठ गये कान्फीडेन्स देखिये ,एक विश्वास ,आत्मबल -&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;"कासिद के आते आते खत इक और लिख रखूं&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;मै जानता हूं जो वो लिखेगे जवाब में "&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;और  संतोष देखिये आज की पीढी को बहुत जल्दी तो गुस्सा आता है, जरा में होशो हवास खो देता है । देखिये पत्र भेजा ,उसने पढा और गुस्से में टुकडे टुकडे करके ऐसे फैक दिया जैसे फिल्म सत्ता पे सत्ता में हेमाजी ने तरबूज फैका था । मगर देखिये सेकेन्ड स्टोरी से फैके गये खत के पुरजे बीन रहे है और कह रहे है&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;"पुर्जे उडा के खते के ये इक पुर्जा लिख दिया &lt;/div&gt;&lt;div&gt;       लो अपने एक खत के ये सौ खत जवाब में "&lt;/div&gt;&lt;div&gt;चेहरे पर संतोष है कि कइयों के तो सौ पत्रों का एक भी जवाब नहीं आता और एक हम हैं जिसको एक खत के सौ जवाब आये है और पुरजे इकटठा किये जारहे है। है आजकल किसी में ऐसी गम्भीरता ?&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;         इसके और बहुत पहले ( लॉन्ग लॉन्ग एगो ) कही बादलों के साथ समाचार भेज रहे है, कहीं कबूतरों के साथ ,कितना कष्टदायक समय था फिर कबूतरों ने ये व्यर्थ के काम बन्द कर दिये तो खत में लिखने लगे "चला जा रे लैटर कबूतर की चाल" । कितनी भावुकता सज्जनता कितनी विनम्रता ,दया लिखी रहती थी पत्रों में ""खत लिख रही हूं खून से श्याही न समझना ""और मजा ये कि पत्र नीली श्याही से लिखा जारहा है। आजकल तो ऐसा कोई नहीं लिखता हाय हलो के जमाने में_ लेकिन पहले पत्र की शुरुआत इस शब्द  से होती थी "" मेरे प्राणनाथ"" और पत्र का अन्त होता था"" आपके चरणों की दासी ""। मजाल क्या जो इसके विपरीत किसी ने प्रारम्भ"" मेरे चरणदास"" से किया हो  और समापन ""आपके प्राणों की प्यासी" से किया गया हो।&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-4201738921261470533?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/4201738921261470533/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=4201738921261470533' title='44 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4201738921261470533'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4201738921261470533'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/05/blog-post_20.html' title='पत्राचार'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>44</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-5742126285863258285</id><published>2011-05-07T09:42:00.000-07:00</published><updated>2011-05-07T09:44:20.837-07:00</updated><title type='text'>शार्ट कट</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial, Helvetica, sans-serif; line-height: 28px; font-size: medium; "&gt;&lt;div&gt;शार्ट कट से भी शार्टकट, प्रारंभ से आदमी तलाश करता रहा है ,चलने में -बोलने में, लिखने में , और जिन खोजा तिन्ह पाइया ,उन्हे रास्ता मिला भी । जब आर से काम चलता है तो ए आर इ क्या मतलब। जब यू से काम चल सकता है तो वाय ओ यू का क्या मतलब । और इसी तरह पिताजी पापा होते हुये डैडी से डैड हो गये । शार्टकट रास्ते में कोई टेडा मेडा रास्ता नहीं देखता और शार्टकट भाषा में कोई शुध्दता अशुध्दता नहीं देखता। और वैसे भी शुध्द अंग्रेजी कोई बोल नहीं सकता और शुध्द हिन्दी कोई समझ नहीं सकता तो रोमन ही सही ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;अभी शासकीय कार्यालयों में शार्टकट का प्रयोग शुरु नहीं हुआ है। इ मेल से भी डाक नहीं भेजी जाती फैक्स से भेज कर फिर कन्फर्मेशन कापी डाक से भेजी जाती है, वाकायदा ड्राफट तैयार होता है वह एप्रूव होता है, उंची कुर्सी वाला नीची कुर्सी वाले का ड्राफट  एप्रूव  करता है, वैसा का वैसा ही एप्रूव  कर दिया तो मतलब  ही नहीं,  कुछ न कुछ गलती तो निकालना आवश्यक है ही। अच्छा एक मजेदार बात शासकीय शब्द  कुल 100-150 है उन्ही से हजारों पत्र, परिपत्र, अर्धशासकीय पत्र, तैयार होते रहते है ।  एक भी विजातीय शब्द  इसमें आजाये तो बात अखरनेवाली हो जाती है। ब्लाग पढता रहता हूं तो कुछ शब्द  सामर्थ्य बढ गया है,मैने एक दिन एक शब्द   का पर्याय बाची  शब्द लिख दिया तो मेरी पेशी हो गई  देखिये मिस्टर यह कार्यालय है कोई साहित्यिक संगठन या सभा नहीं है, शब्द  वही प्रयोग करो जो शासकीय हो। और पता भी चलना चाहिये कि पत्र सरकारी है। अच्छा देखिये मुझे व्  और ब का  फर्क आज भी समझ नहीं आता लेकिन हजारों ड्राफ्ट ,एप्रूव किये &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;भैया हम तो गांव के है वही बोली वही लहजा , यध्यपि बच्चों को पसंद नहीं है  । मेरी खडी बोली इन्हें  रास नहीं आती । हालांकि कुछ कहते नहीं मगर समझ में आही जाता है, इशारों को अगर समझो । और तो और ये  भी  बच्चों से कहती ही है बेटा तेरे पापा तो शुरु से ही गवांरों जैसा बोलते है भले आदमियों के बीच बिठादो तो नाक कट जाती है। वाह  एक न शुद दो शुद .&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;एक दिन पुत्र रत्न ने कह ही दिया आपकी बोली और लहजे पर मेरे मित्र हंसते है उसी दिन मैने तय किया कि बोलूंगा तो शुध्द हिन्दी ही बोलूँगा  नहीं तो नहीं बोलूँगा । की प्रतिज्ञा । पुराने जमाने में लोग प्रतिज्ञा करते ही रहते थे उस समय जब हाथ उठा प्रतिज्ञा कर करते थे तब वादल गरजने लगते थे ,हवा की रफतार तेज हो जाती थी ,विजलियां कडकने लगती थी ,मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;एक दिन घर में मित्र मंडली जमी थी ,मैने पुत्र से जाकर कहा भैया मेरे व्दिचक्र बाहन के पृष्ठचंक्र से पवन प्रसारित होगया है शीघ्रतिशीध्र वायु प्रविष्ठ करवा ला ताकि मुझे कार्यालय प्रस्थान में अत्यधिक विलम्ब न हो। मै तो कह कमरे से चला आया किन्तु मैने सुनली- पुत्र का एक मित्र कह रहा था क्यों रे तेरे पापा का एकाध पेंच ढीला तो नहीं होगया ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-tab-span" style="white-space: pre; "&gt; &lt;/span&gt;मेरे पडौस में एक बहिनजी रहती है ठेठ देहाती ,प्रायमरी स्कूल में बहिनजी की नौकरी लग गई तो परिवार यहां आगया। एक दिन बहिन जी के स्कूल की   अध्यापिकाऐं उनके घर आई तो तो बहिन जी बोलने का लहजा, शब्द सब बदले , बोली बिल्कुल शहरी हो गई, बहिन जी के छोटे भाई बहिन भोचक्के होकर दीदी को देखने  लगे । आखिर सबसे छोटी से न रहा गया तो बोल ही उठी  काये री जीजी आज तोय का हो गओ आज तू कैसे बोल रई है &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मजा तो अब  है रोमन भी और शार्टकट भी &lt;/div&gt;&lt;div&gt;लिखा_ चाचा जी अजमेर गया है&lt;/div&gt;&lt;div&gt;पढा _ चाचाजी आज मर गया है&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-5742126285863258285?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/5742126285863258285/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=5742126285863258285' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5742126285863258285'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5742126285863258285'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='शार्ट कट'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-4040260591921364105</id><published>2011-04-13T05:16:00.000-07:00</published><updated>2011-04-16T07:17:29.076-07:00</updated><title type='text'>आयोजक की खैर नहीं</title><content type='html'>उस दिन मै बात तो कर रहा था कवि गोष्ठी की मगर न जाने कहां से शेर शायरी और पुराने फिल्मी गानों में उलझ गया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मुझे जबरन कवि गोष्ठी का &lt;b&gt;श्रोता&lt;/b&gt; बनाकर ले जाया जा रहा था तब मै उनसे यह भी न पूछ पाया कि आज की गोष्ठी किस संस्था या संगठन की ओर से है । बात यह है कि मेरे नगर में राजनैतिक दलों से ज्यादा साहित्यिक संस्थायें, संघ, संगठन , मंच इत्यादि है । हर संस्था में  एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष , सचिव, कोष नहीं है फिर भी एक कोषाध्यक्ष तो होता ही है और  यदि उस संस्था या संघ में चार से ज्यादा कवि हुये तो फिर एक सह सचिव एंक कोई बुजुर्ग हुआ तो संरक्षक इत्यादि इत्यादि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; जबरन पकड कर लाये गये श्रोताओं के अला&lt;/b&gt;वा अन्य श्रोताओं के  अभाव में ऐसा प्रतीत होता है जैसे कवि गोष्ठीयों में दिलचस्पी रखने वाला साहित्य प्रेमी आज अनुपलव्ध है  क्योंकि श्रोता स्वयं कवि हो चुका है और उसे फिर एक अदद श्रोता की आवश्यकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महत्त्व पूर्ण कवि साथी लगातार ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं क्योंकि वे  अपनी बात कहना चाहते है वे उत्सुक है अपनी सुनाने को ,अपनी छपाने को साथ ही उसकी यह शिकायत भी है कि उनकी रूचि अनुकूल श्रोता नहीं मिल पाते हैं कवियों के पास विपुल सामग्री है नगर में साहित्यकारों की कमी नहीं फिर भी कवि गोष्ठियों में श्रोता दिखाई नहीं देते&lt;br /&gt;साहित्य सृजन कर कवि उसे अभिव्यक्त करना चाहे और उसे उपयुक्त पात्र न मिले या मिलने पर उसके सराहना न करे तो साहित्यकार को मृत्यु तुल्य पीड़ा ( वह जैसी भी होती हो ) होना स्वाभाविक है -यही पीड़ा सम्पादकीय अनुकूलता न मिलने पर  हुआ करती थी तो &lt;span class="Apple-style-span" &gt;&lt;b&gt;फिर  कवियों या लेखकों को  स्वांत सुखाय  लिखने को विवश होना पडा &lt;/b&gt;&lt;/span&gt;मैं भी पहले लेख लिख कर भेजता था और खेद सहित वापस आजाता था तो उसे स्वांत सुखाय के पैड में बाँध दिया करता था १५ साल पुराने स्वांत सुखाय वाले लेख जब आज पढता हूँ तो लगता है कि सम्पादक सही थे वे लेख पाठक दुखाय ही थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर कवि कि इच्छा होती है कि वह अपने यहाँ गोष्ठी आयोजित करे मगर या तो वह किराये के मकान में रहता है या पुराने पुश्तैनी मकान में - जिनमें बड़े हाल का अभाव रहता है  हालाँकि वह  चाय पानी फूल माला सब की व्यवस्था अपनी आर्थिक तंगी के वावजूद करता  है मगर उसके बच्चे बच्चियां इसे व्यर्थ का हुल्लड़ कहकर उसकी इच्छा को दवा देते हैं।पत्नियाँ तो खैर पतियों से नाराज़ रहती ही हैं क्योंकि वे गोष्ठियों से देर रात घर लौटते हैं और उनके दुर्भाग्य से और कवि पति के भाग्य से कोई श्रोता घर पर ही आजाय तो चाय बना बना कर परेशान हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि गोष्ठियों में आयोजक समय देता है 8 बजे कवि एकत्रित होते हैं दस बजे तक । कुछ कवि तो इतनी देर से पहुँचते हैं के तब तक आधे से ज़्यादा कवि पढ़ चुके होते हैं ।इसमे एक फायदा भी है कि उन्हें ज्यादा देर इंतज़ार नहीं करना पड़ता और जाते ही सुनाने का नंबर लग जाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोष्ठियों में अब जो अपनी सुना चुके है वे  वहाँ से &lt;b&gt;खिसकने&lt;/b&gt; के मूड में होते है अध्यक्ष बेचारा फंस जाता है भाग भी नही सकता और उसे सब से अंत में पढ़वाया जाता है जब तक चार -पाँच लोग ही रह जाते है । मैंने देखा है अखंड रामायण का पाठ -१२ बजे रात तक ढोलक मंजीरे हारमोनियम ,,दो बजे तक तीन चार लोग रह जाते है  अब एक जो व्यक्ति तीन बजे फंस गया सो फंस गया सुनसान सब सो गए इधर इधर देखता रहता है और पढता रहता है काश कोई दिख जाए तो उससे पांच मिनट बैठने का कहकर खिसक जाऊँ -मगर कोई नहीं =न बीडी पी सकता है न तम्बाखू खा सकता है ,तीन से पाँच का वक्त बडा कष्ट दाई होता है /&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;b&gt;सच है भगवान् जिससे प्रेम करते है उसी को कष्ट देते हैं इससे सिद्ध हो जाता है की तीन बजे से पाँच बजे तक पाठ करने हेतु अखंड रामायण में फसने वाले और गोष्ठियों के अध्यक्ष से ही भगवान् प्रेम करते हैं ।&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवि की कविता पूर्ण होने पर दूसरे कवि तालियाँ बजाते है और बीच बीच में वाह वाह  करते रहते है वास्तव में तालिया इस बात का द्योतक होती है कि &lt;b&gt;प्रभु माइक छोड़ अपनी सिंहासन पर विराजमान होजाइये &lt;/b&gt;मगर जब वह वहीं बैठ कर डायरी के पन्ने पलट कर सुनाने हेतु और कविताये ढूढने लगता है तो शेष कवियों के दिल की धड़कन बढ़ जाती है, उधर कवि भी तो कहता है कि एक छोटी सी रचना सुनाता हूँ और फ़िर शुरू होजाता है और उसकी छोटी सी रचना खत्म होने का नाम नहीं लेती।-शेष कवियों की  भी कोई गलती नही वर्दाश्त की  भी हद होती है ,क्योंकि कवि का जब तक नम्बर नही आता सुनाने का तब तक उसे बहुत उत्सुकता रहती है और ज्यों ही उसने अपनी सुनाई बोर होने लगता है दूसरे दिन समाचार पत्र में प्रकाशित होता है। कवि सबसे पहले उसमें अपना नाम देखता है इत्तेफाकन किसी कवि का नाम छूट जाए या उसके व्दारा पढी गई लाइन पेपर में न दी जाये तो &lt;b&gt;आयोजक की खैर नहीं ।&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-4040260591921364105?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/4040260591921364105/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=4040260591921364105' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4040260591921364105'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4040260591921364105'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='आयोजक की खैर नहीं'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7629986187375112762</id><published>2011-03-31T01:03:00.000-07:00</published><updated>2011-03-31T01:05:56.118-07:00</updated><title type='text'>औरु करै अपराध कोऊ</title><content type='html'>एक दिन घर पहुंचने में &lt;strong&gt;जरा&lt;/strong&gt; देर होगई ,लगभग एक बज गया होगा रात का । दरवाजा खुलवाया तो यू समझ लीजिये साहब  कि बिल्कुल आग, और हमें गुनगुनाते हुये , मुस्कराते हुये देख लिया तो बिल्कुल ज्वाला । । टेन्शन में तो थीं ही , बिना बताये धर के बाहर चला जाना और रात एक बजे तक न लौटना गुस्सा स्वभाविक है। तो किसी को मुस्कराते गुनगुनाते देख कर चिढ जाना या और क्रोधित होजाना ,ये  तो होना ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गये थे तो खाना खाकर पान खाने मगर कुछ कवित्त रसिक मिल गये मालूम हुआ कवि गोष्ठी रखी है हमसे ही पान खाये और हमे ही पकड लेगये भला इतना अच्छा श्रोता फिर कहां मिलेगा। मगर जैसा कि हर कवि सोचता है ‘&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘झूंठी वाह वाह ही सही दिल तो वहल जाता है,,&lt;br /&gt;वरना हम आपकी वाह वाह को नहीं जानते क्या&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मगर उन्हे तो वाह वाह सुनना था ।घर पर फोन से सूचना भी नहीं देने दी भले आदमियों ने ।सोचा होगा सुनने को तो बुलाया ही है इसे भी चांस देदो तो और भी मन लगाकर सुनेगा । हमसे भी कहा कुछ सुनाओ । सुनाया ,तो और लोगों ने तालियां भी बजाई । लोगो ने वाह वाह भी की एसा लगा  कि हम बडे कवि होगये इतने लोग हमे सराह रहे है जम कर तालियां बजा रहे है। चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान थी और थोडा थोडा गुव्वारे जैसा भी, तालियों की गडगडाहट से , फूल भी गये थे सो गुनगुनाते हुये घर पहुंचे थे यह जानते हुये भी कि &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच है मेरी बात का क्या एतबार &lt;br /&gt;सच कहूंगा झू्रंठ मानी जायेगी &lt;br /&gt;फिर भी हमने मतलब मैने स्पष्टीकरण देना शुरु कर दिया । कवि गोष्ठी थी हमने रचना सुनाई तो लोगों ने जम कर तालियां बजाई वजाते ही रहे बजाते ही रहे। पूछा कहां थी कवि गोष्ठी , हमने कहा बापू पार्क में । बोली वहां तो मच्छर बहुत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक है भैया ऐसा ही सही वे मेरी कविता नही सराह रहे थे बस खुश और करे अपराध कोउ और पाव फल कोउ । गलती तो उन लोगों की है न जो कह गए  &lt;br /&gt;।ओ फूलों की रानी बहारों की मलिका तेरा मुस्कराना गजब हो गया। क्या जरुरत थी साहब । चौहदवीं का चाद हो या आफताव हो वाह साहब, अरे जब आफताब कह ही दिया था तो और स्पष्ट भी कर देते कि आफताब मई जून का, नौतपे का बिल्कुल रोहणी नक्षत्र का , मगर नहीं और  इससे भी सब्र न हुआ तो कल चौहदवीं की रात थी शव भर रहा चर्चा तेरा ।इनको ऐसी चर्चाओं से ही फुरसत नहीं मिलती थी  किसी से कोई मतलव ही नहीं था वस वालों को नागिन कह दिया घटा कह दिया  सिमटी तो नागिन फैली तो घटा,और तो और एक शायर साहब पधारे वोले &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जुनू को जुल्फ के साये से दूर रख &lt;br /&gt;रास्ते मे छांव पाके मुसाफिर ठहर न जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या है ये ।  भैया  जुल्फ हैं या बरगद का दरख्त । तसल्ली फिर भी न हुई तो कहा गया हंस गये आप तो बिजली चमकी कहने वाले यह भूल गये कि इसके बाद एसा डरावना गरजता है कि क्या बताये।घन घमंड नभ गरजत घोरा ...डरपत मन मोरा । गलतियां तो पुरानों ने बहुत की है उसका खामियाजा आज की पीढी भुगत रही है या उस को भुगताया  जा रहा है अब उन्हौने गलती की या वह जमाना ही एसा था यह बात जुदागाना है मगर गलती की है तो मानी भी जारही है  और फोरफादर्स के कर्मों की सजा अब दी भी,जारही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7629986187375112762?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7629986187375112762/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7629986187375112762' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7629986187375112762'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7629986187375112762'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='औरु करै अपराध कोऊ'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8420967139368673</id><published>2011-02-27T17:46:00.000-08:00</published><updated>2011-03-18T02:05:26.250-07:00</updated><title type='text'>बुडढा मिल गया</title><content type='html'>संगम में एक गाना था ,हरिव्दार में नहीं बल्कि फिल्म संगम में &lt;blockquote&gt; मै का करूं राम मुझे बुडढा मिल गया&lt;/blockquote&gt;।उस गाने को बार बार दुहराती है जब भी किसी बात पर इनका विरोध करो मै का करूं राम  बहुत समझाया हंसी में मजाक में व्यंग्य में ताने के रुप में उलाहने के रुप में बार बार इस गाने को नहीं गाना चाहिये इससे पुरुष का मनोबल गिरता है वह मानसिक दुर्वलता का शिकार हो सकता है मगर नहीं साहब। एक बात तो है एक उमर के बाद आदमी  सठिया तो जाता है।आश्चर्य तो होगा यह जानकर कि बुडठा बुडढो की बुराई कर रहा है ।तो मेरा कहना यह है कि &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   यूं .........कि जब धन्नो घोडी होकर तांगा खीच सकती है , वसंती लडकी होकर टांगा चला सकती है  तो मै बुडढा होकर बुडढों की बुराई क्यों नहीं कर सकता । वैसे हकीकत वयान करना बुंराई करना थोड़े  ही होता है ।&lt;br /&gt; असल में होता क्या है कि ये लोग एक उम्र के वाद सठिया जाते है । सठ को शठ भी सुविधा और संतुलन की दृष्टि से प्रयोग किया जासकता है ।  शठ सुधर नहीं सकते एसी बात भी नहीं है।&lt;br /&gt;शठ सुधरहि सत संगति पाई  कैसे   वो ऐसे कि &lt;br /&gt;पारस परस कुधात सुहाई । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मगर इन बुडढो का आलम  यह है कि &lt;br /&gt;तुलसी पारस के छुये कंचन भई तलवार &lt;br /&gt;पर ये तीनो न गये धार मार आकार ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और उसका भी कारण है ये हमेशा अकडे ही रहे झुके तो केवल बास के  सामने वाकी बीबी और बच्चों के लिये तो अकडे ही रहे कमर झुक गई  मगर अकड जाती नहीं । रस्सी जल गई पर बल न गया।&lt;br /&gt;वैसे सतसंगति के लिये यहां पारस की कमी भी नहीं है।सतसंगत के लिये टीवी चैनल है ,विगबास है, उसमें विदेश से पधारी हुई बाला एडरसन,बेचारी यहां आई अपना घर परिवार छोड कर सतसंगति देने और उनको  मिला क्या मात्र सात करोड। सुना है उनका स्वागत करने एक झलक पाने बहुत तादाद में लोग हवाई अडडे पर गये थें ।फिर अपने यहां क्या कम पारस है अपने यहां भी इन्साफ वाली बाई,और भी अनेक हैं  जिनकी विचारधारा यह है कि पुरुष जब कपडे उतार सकता है एक अभिनेता है वे इसी तलाश में रहते है कि कब बनियान फैक कर गाना गाने को मिले आखिर मसल्स बनाये किस लिये है जिम जा जा कर  तो फिर लडके और लडकी यह भेद भाव क्यों यहां समानता क्यों नहीं । मगर बुडढों को ये बात समझ में नहीं आती क्योंकि उन्हौने वह जमाना देखा होता है जब बेटी पूछती थी मां जीन्स पहिन लूं क्या तो मां कहती थी मत पहिन बेटी लोग क्या कहेंगे । आज जब बेटी कुछ पहिनने को पूछती है तो मां कहती पहिन ले बेटी कुछ तो पहिन ले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      हां तो मै इन बुडढों की बात कर रहा था ये अकडूचंन्द सौने के होकर भी तलवार बने रहते है । इनकी बातें सुनो कुन्दनलाल और नलिनीजयवन्त की बाते करेंगे साथ ही हमारे जमाने में एक रुपये का सोलह सेर गेहूं आता था । अरे आता होगा हमे क्या लेना देना ।अर्ली टू बैड वाली बात करेंगे अरे इनको कौन समझाये जल्दी सोना जल्दी उठना उस जमाने की बाते हैं आज तो असल चैनल तो रात 12 बजे के बाद ही शुरु होते है।  उस पर तुर्रा ये कि घर वाले हमको नजरअंदाज करते है हमारी उपेक्षा करते है और तो और वो भी सात फेरों वाली बच्चों की ही तरफ बोलती है । अरे भइया  पहले वह डर के कारण तुम्हारी तरफ बोलती थी अब डर खत्म । बच्चे हो गये कमाने वाले  और जमाने का कायदा है आपने भी देखा होगा गमले में पौधे लगाते  है पानी डालने का ध्यान रखा जाता है मैने तो नहीं देखा किसी को कि किसी ढूंढ मे पानी डाल रहा हो तो ये समझते ही नहीं कि हम ठूंठ हो चुके है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और इनकी बाते देखों जैसे सारे संसार काअनुभव इन्हे ही हो और  डाई करके कहेंगे ये कि ये वाल घूप में सफेद नहीं हुये कमाल है।  जहां तक मै समझता हूं पुराने लोगो को न तो बात को समझने की क्षमता   होती थी न बोलने का तरीका आता था । &lt;br /&gt; एक ही लेख में ज्यादा बुराई भी नहीं करना चाहिये शेष बुराई आगे के लिये छोडते है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8420967139368673?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8420967139368673/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8420967139368673' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8420967139368673'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8420967139368673'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/02/blog-post_27.html' title='बुडढा मिल गया'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-471666007751160234</id><published>2011-02-19T21:55:00.000-08:00</published><updated>2011-02-19T22:00:51.061-08:00</updated><title type='text'>गैर हाजिरी मुआफ</title><content type='html'>जब मेरा स्वास्थ्य खराब हुआ था तभी मै समझ गया था कि  न जाने कितने हाथों से गुजरुगा रेल में खरीदे हुये अखबार की तरह  और सच ही जो भी तबीयत देखने आया अपने अनुभव और दवाओं की जानकारी साथ लाया । बात मात्र इतनी थी कि पीठ में दर्द हुआ था लेकिन दुष्यंत कुमार जी की मानें तो ** पक्ष औ प्रतिपक्ष संसद में  मुखर हैं  बात इतनी है कि कोई पुल बना है"। पैथियां इतनी प्रचलित है कि मरीज़ दुबिधा में ही रहता है  मैं इधर जाउं या उधर जाउं ।और फिर सलाहकार । कहते है संसार में सबसे ज्यादा दी जाने वाली कोई चीज है तो वह है सलाह और सबसे कम ली जाने वाली कोई चीज है तो वह है सलाह &lt;br /&gt; ।&lt;br /&gt;       वैसे तो दर्द सभी खराब होते है मगर पीठ का बापरे  न उठ सकते न बैठ सकते चीख निकलजाये जरासी हरकत पर । उनका कहना था कि जल्दी से किसी डाक्टर को बतलादो एक्सरे करवालो । मगर तबीयत पूछने आये एक ने कहा भाभी जी  इन डाक्टरों के चक्कर में पड मत जाना ।हमारे चाचाजी को ऐसे ही पीठ में दर्द हुआ था  न जाने कैसा इन्जेक्शन लगाया कि लकवा हो गया आज तक घिसट रहे है और एलोपैथी में इसका इलाज है भी नहीं कहदेंगे स्लिप डिस्क है आराम करो दबायें खाओ।एक और ने समर्थन किया कि कि सही बात है एक को डाक्टर ने बतादिया वरट्रीब्रा कलेप्स हो गया है और आपरेशन कर दिया बेचारे ने पूरी जिन्दगी व्हील चेयर पर बिताई।मेरी मानो तो होमियोपैथ को दिखालो।&lt;br /&gt;       सही भी है होमियोपैथी एक पध्दति है जिसकी दवायें निरापद होती है  केवल दवा का नाम मालूम होना चाहिये लाते रहो खाते रहो। इसीलिये होमियोपैथी का डाक्टर कभी मरीज को पर्चा बना कर नहीं देता है न दवा का नाम ही बताता है नाम लिख दिया तो मरीज को जानकारी हो जायेगी और दस रुपये की दवा के पचास बसूल करने में दिक्कत  होगी ।&lt;br /&gt;होमियोपैथी है बडी विचित्र इसके नाम जितने अटपटे  है उतने आश्चर्यजनक इनके तत्व होते हैं जैसे एक प्रकार का सर्प  चेचक का बीज स्पेन का मकडा धतूरा आदि । घतूरा पर से याद आया एक मरीज के लक्षण मानसिक रोगी जैसे नजर आने पर चिकित्सक ने किताबों  के अध्ययन से पाया कि इसे  स्ट्रेमोनियम दी जाना चाहिये । चूंकि दवा उसके पास खत्म हो गई थी उस दबाई का कन्टेन्ट था धतूरा तो पास में लगे धतूरे के पत्ते निचोड कर मरीज को पिला दिये । इससे मरीज.......&lt;span style="font-style:italic;"&gt;।कुछ बाते इशारे में कही जाती है जैसे कि एक युवक ने टंकी में यह देखने के लिये कि इसमें पैट्रोल है या नहीं । माचिस जलाई । पेट्रोल था। आयु 35 व&lt;/span&gt;र्ष। धतूरे को कनक कहते है कहते है इसके खाने से आदमी पागल हो जाता है। स्वर्ण को भी कनक कहते है कहा है ‘‘कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय । ये खाये बौरात है वो पाये बौरात । खैर उस चिकित्सक का मुकदमा तो सुप्रिम कोर्ट तक गया &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;       एक सलाहकार और आये बोले बाबूजी कुछ नहीं तुमने कोई बजन उठा लिया होगा तो चोडरा कुसका चला गया है हमारे  &lt;span style="font-style:italic;"&gt;ग्रामीण क्षेत्र में पीठ के नीचे हिस्से यानी लम्बर रीजन में अचानक दर्द होने लगने को चोडरा चला जाना या कुस्का चला जाना कहा  जाता है&lt;/span&gt; । मै तलाश करता हूं अगर कोई व्यक्ति उल्टा पैदा हुआ होगा तो उससे आपकी कमर में लात लगवा देंगे दो दिन में आराम हो जायेगा । मुझे याद आया एक थानेदारसाहब का चोडरा चला गया था &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;तो शहर के जितने गुन्डे बदमाश थे सब पहुंच गये हुजूर हम उल्टे पेदा हुये है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;       गरज यह कि जितने मुह उतनी दबायें।कहीं की मिटटी लपेटी न जाने कहां कहां के पानी से नहाये।जन्तर मन्तर जादू टोना । उसी बीच मालूम हुआ एक स्थान पर मेला लगा है मरीज इधर से खटिया पर लेटा हुआ जाता है और उधर से दौडता हुआ आता है वहां भी गये हालांकि वहां तो कुछ भेंट  नहीं ली जाती थी परन्तु ठहरने की जगह व महगाई महानगर से भी ज्यादा ।&lt;br /&gt;कृपया गैर हाजिरी को  माफ़ करें&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-471666007751160234?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/471666007751160234/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=471666007751160234' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/471666007751160234'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/471666007751160234'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='गैर हाजिरी मुआफ'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1871987646950227825</id><published>2010-12-04T22:49:00.000-08:00</published><updated>2010-12-04T22:50:58.298-08:00</updated><title type='text'>सुन साहेबा सुन</title><content type='html'>यदि अवकाश के दिन सबेरे सबेरे कोई किसी के घर चाय पीने आजाये और अपनी कवितायें ,गजल,लेख सुनाने लगे या फिर कोई सुबह सुबह अपने घर पर चाय के लिये आमंत्रित करे और उनका बेटा गाने लगे  ’’उन्हे अपनी रचनायें सुनाना है इसी लिये डैडी ने मेरे तुम्हे चाय पे बुलाया है ’’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सुनना  कई प्रकार का होता है जिसमें ’’मन से सुनना’’ और ’’ बेमन से सुनना ’’ लोक में प्रचलित हैं । बेमन से सुनने वाला वर्षो तक याद रहता है और बेमन से सुनने वाले की क्या क्या गतिविधियां थी यह भी याद रहता है ’’बेरुखी के साथ सुनना दर्दे दिल की दास्तां और तेरा हाथों  में वो कंगन घुमाना गुलाम अली साहब को आज तक याद है। सुनने वाला बार बार घडी देखने लगे जम्हाई लेने लगे तो सुनाने वाले को इस बात की परवाह नहीं होती है।वैसे यह सत्य है कि कभी अकारण सी वेचैनी होने लगे, जी घबराने लगे, किसी काम में मन न लगे, कुछ भी अच्छा न लगे, अनर्इजी  फीलिंग होने लगे तो किसी को पकड कर अपनी रचनाये सुनाना एक ट्रेक्युलाइजर का काम करता है फिर चाहे सुनने वाले को चाय पिलाना पडे या जलेवियां खिलाना पडे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने सुना है एक सज्जन बीमार हुये, वैसे सज्जन लोग कम ही बीमार होते है,मगर हो गये क्या करे। डाक्टर ने आठ घन्टे खतरनाक बताये कहा आज की रात निकल जाये तो मरीज खतरे से बाहर हो जायेगा । रात कैसे निकले ।उन सज्जन का एक सज्जन बेटा भी था वैसे बेटे आज कल सज्जन होते नहीं है मगर होगया इत्तेफाक है तो उसने पापा के पुराने दोस्त को बुलाकर कहा अंकल किसी तरह रात निकलजाये । अंकल ने कहा यह कौनसी बडी बात है , मानवमस्तिष्क से परिचित वे जानते थे कि मरीज का ध्यान डायवर्ट करदो आधी बीमारी उसकी दूर हो जाती है । मित्र अंकल कमरे में गये और जाकर अपने मरीज मित्र से कहा यार वो भी क्या दिन थे जब तुम स्कूल में गजले लिखते थे फिर कालेज पहुंचते पहुंचते तो उनमें बहुत बजन आ गया था अव रिटायरमेन्ट के बाद उनका कुछ उपयोग करे । बीमार को करार आया बेबजह आया या बाबजह आया मगर आया।इशारे से उन्हौने अपनी पुरानी डायरियां निकलवाई । पहले मंद्र फिर मध्यम और फिर तारसप्तक में शुरु हो गये ।बेटे बेटी कमरे से बाहर बैठे आवाज सुनते रहे घडी देखते रहे वक्त गुजरता गया खतरे की अवधि समाप्त । कमरे में गये पिताजी जोर जोर से रचना पाठ कर रहे थे और वगल में मित्र अंकल मरे डले थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ये सुनने सुनाने का सिलसिला ’सुनो सजना पपीहे ने कहा सबसे पुकार के’ के पूर्व से चला आरहा है और सुन सुना आती क्या खण्डाला के बाद भी निरंतर जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे नगर में पैसेन्जर गाडी रात 12 वजे आकर रात्रि विश्राम करती है सुवह आठ बजे जाती है। जिस दिन स्टेशन पहुचने में जरा देरी हो जाये उस दिन बिल्कुल राइट टाइम चली जाती है, मगर देर नहीं हुई थी तो गाडी का लेट होना स्वाभाविक था । साडे आठ बज गये ,पौने नौ बज गये आज क्या बात होगई कही कोई क्रासिंग तो नहीं है। ये क्रोसिंग भी मजेदार चीज होती है इंशाअल्लाह कभी मौका लगा तो इस पर भी अर्ज करुंगा ।यात्री परेशान शीटी रेल की बज रही है एनाउन्स हो रहा है गाडी स्टेशन छोडने वाली है मगर हरी झंडी दिखाने वाले गार्ड साहब गायब है। तलाश की तो बडी देर बाद मिले  गाडी के पीछे खडे हुये शेर सुना रहे हैं और कुली दाद  दे रहे हैं  ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अदालत सुनी सुनाई बात पर विश्वास नहीं करती है। गुलाम अली साहब ने कहा सुना है गैर की महफिल में तुम न जाओगे किसी ने गाया सुना है तेरी महफिल में रतजगा है किसी वकील से पूछो यह हियर से की श्रेणी मे आता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सुनना ठीक है कहते है जीभ एक और कान दो इसी लिये होते है मगर सुनना वाध्यकारी नहीं होना चाहिये सुन साहिबा सुन मैने तुझे चुन लिया तू भी मुझे चुन । मतलव यह तो दादागिरी होगई । तूने चुना तेरी मरजी मगर किसी पर यह क्यों थोपना कि तू भी मुझे चुन ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1871987646950227825?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1871987646950227825/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1871987646950227825' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1871987646950227825'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1871987646950227825'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='सुन साहेबा सुन'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-397595762194583979</id><published>2010-11-13T06:34:00.000-08:00</published><updated>2010-11-13T06:40:06.099-08:00</updated><title type='text'>एडजस्टमेंट</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मात्र काल्पनिक, किसी जीवित या मृत व्यक्ति का इससे कोई लेना देना नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आफिस से आने में जरा देर क्या होगई देखा दरवाजे पर खडी खडी रो रहीं है ,देखते ही चेहरे पर एक सुकून आया ,एक तसल्ली हुई,, आज न जाने कौन से पुण्य उदय हुये कहकर और ,जाकर सीधे भगवानजी के चित्र के सामने साष्टांग  दण्डवत , प्रभू तेरा लाख लाख शुक्र है ,बेटे को आवाज दी जा जल्दी से 21 रुपये की मिठाई ले आ भगवान को प्रसाद बोला था । मगर हुआ क्या ? एक तो आफिस से आने में देर करदी और फिर पूछते हो हुआ क्या । लेकिन इतनी घबराई हुई क्यों हो, रो क्यों रही थी ? अभी सामने वाले हैन्डपम्प पर कुछ औरते बातें कर रही थी कि एक बेवकूफ किस्म का पागल सा  दिखने वाला आदमी बस से कुचल गया ऐसे में ही तुमने देर करदी अब तुम्ही  बताओ ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            दौनों को तसल्ली थी एक को सोहाग बच जाने की और दूसरे को खुद के बच जाने की ,दौनो डबडबाई आंखों से एक दूसरे को देर तक देखते रहे तब तक बच्चा पूरी मिठाई खा गया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            एडजस्टमेंट उसे कहते हैं कि&lt;br /&gt;तू हंस रहा है मुझपे  मिरा हाल देख कर-और फिर भी मै शरीक तेरे  कहकहों में हूं&lt;br /&gt;एडजस्टमेंट किया जाता रहना चाहिये ।कलम उठाई कुछ कविता लिखने के लिये लिखा जिये तो जियें केसे संग आपके इतने में ही वह चाय लेकर कमरे में आई फौरन "" संग"" शव्द काट कर "" बिन"" कर दिया । कौन क्या कहना चाह रहा था कौन क्या लिखना चाह रहा था और उसे क्या कहना पडा और क्या लिखना पडा यह हर कोई तो समझ नहीं पाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत&lt;br /&gt;            हर किसी के पास तो ऐसी नजर होती नही&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी एडजस्टमेन्ट मुश्किल भी होजाता है। शिवचालीसा का पाठ कर रहा था। हर देवी देवता के चालीसा मौजूद है और कुछ भक्तों ने तो कुछ मुख्यमंत्रियों के चालीसा भी तैयार किये थे फिर पता नही कि बच्चों के कोर्स में वे रखे गये या नहीं। खैर  तो शिव चालीसा में एक लाइन आती है ले त्रिशूल शत्रु को मारो इस लाइन पर आवाज जरा उंची होगई कि " ले त्रिशूल शत्रु को मारो"  तो किचिन में से आवाज आई कुछ भी करलो मेरा कुछ नहीं विगड सकता हैं । कहा ये तुम्हारे वारे में नहीं है इसका तात्पर्य ये है कि तुम्हारे शत्रु को मारे फिर किचिन में से आवाज आई मतलब को एक ही हुआ , मै कहां फेमली पेन्शन के लिये दर दर भटकती फिरुंगी ।एसी ही आपवादिक परिस्थियों के लिये रहीम ने कहा होगा कह रहीम कैसे निभे केर बेर को संग होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी ऐसी परिस्थियां हो जाया करती है कि कहा भी न जाये चुप रहा भी न जाये' तब बडी दिक्कत हो जाती है क्योंकि डाक्टर बशीर बद्र साहेब का शेर है मै चुप रहा तो और गलत फहमियां बढीं,// वो भी सुना है उसने जो मैने कहा नहीं&lt;br /&gt;l वैसे आमतौर पर एडजस्टमेंन्ट किया जाता है और क्या किया जाना चाहिये , अब यदि आफिस का बॉस कहे कि सुनो श्रीवास्तव जी मैने एक शेर लिखा है तो सुन कर यह तो नहीं कहा जासकता कि वाह हुजूर क्या लीद की है बल्कि यही कहा जायेगा वाह साहव क्या बात है एक बार फिर सुनाया जाय ।मुशायरे की भाषा में इसे मुकर्रर कहते है। एक शायर माइक पर आया और कहा हाजरीन अपनी गजल के चंद शेर पेशे खिदमत है तबज्जो चाहूंगा  एक श्रोता ने पहले ही कह दिया मुकर्रर अपना सिर पकड कर शायर अपनी जगह पर जा बैठा।&lt;br /&gt;l&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-397595762194583979?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/397595762194583979/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=397595762194583979' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/397595762194583979'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/397595762194583979'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/11/blog-post_13.html' title='एडजस्टमेंट'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7178814643420401982</id><published>2010-11-08T04:19:00.000-08:00</published><updated>2010-11-08T04:23:45.258-08:00</updated><title type='text'>चमत्कार</title><content type='html'>चमत्कारों से अपरिचित लोग उन्हे कई नामों से  से सम्बोधित करते है  तथा कई दफे बहुत वारीकी से देखने के वाद भी कोई चीज समझ में नहीं आती तो उसे  हाथ की सफाई, जादू, कालाजादू, मेस्मेरेजम, नजर बांधना, ट्रिक  फोटोग्राफी कैमिकल्स का सम्मिश्रण आदि इत्यादि कह दिया जाता है - लेकिन चमत्कार वह होता है जिसे सभी प्रकार के लोग देखे भी और माने भी । मंत्र की शक्ति का तो पता नहीं मगर मंत्री में राजा को रंक और रंक को राजा बनाने की शक्ति जरुर होती है। मैने देखा है मंदिरों में ज्यादातर भगवान की मूर्तिया खडी निर्मित की जाती है ।मैने एक पुजारी से पूछा यार तुम्हारे भगवान हमेशा खडे क्यों रहते है उसने बडी सादगी से कहा वो क्या है साहब  इधर मंत्री वगैरह आते रहते है '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;।मुझे पता नहीं कि   मंत्र में इतनी शक्ति होती है या नही कि वह किसी चलती हुई मशीनरी को रोकदे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         ट्रेन  जब स्टेशन से रवाना होने को हुई तो एक लंगोट धारी ??-उसमें प्रविष्ठ हुये । रेल में सफर करने वाले जानते है कि यात्रियों के  टिकिट की चैकिंग कभी स्टेशन पर खडी गाडी में नहीं होती है -चलती गाडी में होती है क्योंकि एक तो लोग चढ उतर रहे होते है दूसरे कोई स्टेशन पर उतर कर सह सकता है कि मै बैठा ही न था। चलती गाडी में  बिना टिकिट यात्री चैकर के पूर्णरुपेण वश में हो जाता है चलती ट्रेन  में से उतर न सकने के कारण उसे चेकर की मन की मुराद पूरी करना पडती है। मगर उस दिन जो नहीं होता वह  हुआ चेकिंग स्टेशन पर खडी गाडी में हुआ  । चेकर को आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास था कि ??के पास टिकिट नहीं है और वास्तव में होता भी नहीं है। दो तीन मिनट रहगये थे गाडी रवाना होने में कि चैकर और ??में झगडा होगया ।चैकर अपनी जिद पर अडा था कि टिकिट लेना होगा और वे एक विशेष प्रकार की गाली जो आम तौर पर ये लोग उच्चारित करते हैं उच्चारित करते हुये कह रहे थे हमसे टिकिट मांगता है। बात में दम हो या न हो मगर आवाज में दम थी ।बात वढना थी सो बढ गई। ??रेल से स्टेशन पर उतर आये और जोरदार आवाज में कहा अब तू गाडी लेजाकर बतलादे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अब देखिये जनाब कि गार्ड हरी झंडी दिखा रहा है ट्रेन  जोरदार शीटी की आवाज निकालती है स्टार्ट होती है और थोडा हिल डुल कर फिर रुक जाती है। उस  में विभिन्न जाति, सम्प्रदाय के लोग थे -परम आस्तिक और घोर नास्तिक भी थे। मन्त्र शक्ति में विश्वास करने वाले और उनके विरोधी वैज्ञानिक भी उस गाडी में सवार थे । ट्रेन  की आधी सवारी स्टेशन पर उतर आई थी । लोग आग्रह कर रहे थे कि चैकर माफी मांगले । मगर वह भी पक्का गवर्नमेन्ट सरवेन्ट था माफी क्यों मांगू मैं अपनी डयूटी देरहा हूं  उसे तनखा इसी बात की मिलती है डयूटी न करुं तो सरकार तनखा देती है और करुं तो  मजबूर यात्री  और शौकिया यात्री सरकार से भी ज्यादा देते है। ड्राईवर  ने हाथ जोडे भैया मांगले माफी क्या विगडता है गाडी लेट होरही है गार्ड ने हाथ जोडे  मगर जिद यह कि इसने टिकिट मांगा तो क्यों मांगा । भीड व्दारा अनुनय विनय करने के बाद बमुश्किल-तमाम चैकर ने चरणों में गिर कर माफी मांगी ।और देखते देखते गाडी थोडी हिलडुल कर स्टार्ट होगई । ?? की जयकारे की आवाज गूंजने लगीं ।&lt;br /&gt;        स्टेशन के पास ही शासकीय रिक्त पडी भूमि पर पहले कुटिया बनी फिर विशालकाय भवन, धर्मशालायें  बनी ।लोगों  की श्रध्दा धन के रुप में प्रकट हुई जो जितना श्रध्दावान था उसने उतना ही चढावा चढाया और सिलसिला सतत जारी रहा।  अब  ?? करोडों में खेल रहे है और बेचारे  रेल के ड्राईवर  गार्ड और चैकर को मात्र एक-एक लाख रुपये में ही संतुष्ट कर दिया गया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7178814643420401982?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7178814643420401982/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7178814643420401982' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7178814643420401982'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7178814643420401982'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='चमत्कार'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-6795986757840907662</id><published>2010-10-15T07:39:00.000-07:00</published><updated>2010-10-15T07:46:21.844-07:00</updated><title type='text'>समाचार</title><content type='html'>हम समाचारों को चार वर्ग में विभक्त कर सकते हैं । अन्तर्राष्ट्रीय  राष्ट्रीय  प्रादेशिक और क्षेत्रीय ।क्षेत्रीय समाचार कुछ ऐसे होते है जिन्हे न समाचार कहा जा सकता है  न अफवाह मगर इनमें से ही कुछ होती/होते है।ये अफवाह या समाचार न टीवी पर दिखाये जाते है न पेपर में छपते है लेकिन आदमी औरत बूढा बालक सबको मालूम रहता है । मै एसे ही दो क्षेत्रीय समाचारों से आपको अवगत कराना चाहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक वार सुनने में आया कि एक गिलकी सब्जीः से भरा हुआ ट्रक जारहा था । रात का वक्त था  सडक पर नाग नागिन का एक जोडा था । ट्रक ने उन्हे कुचल दिया । तो साहब उस जोडे ने श्राप दिया कि गिलकी के पत्तों पर नाग नागिन की छवि उतर आयेगी । लोगों ने गिलकी के पत्ते देखे वाकई सफेद रंग की सर्प जैसी आकृति थी । मैने भी देखी ।यह समझ में नहीं आया कि उस जोडे ने मरने के वाद श्राप दिया या कि मरते मरते ।फिर गलती ड्रायवर की थी दण्ड उसको मिलना चाहिये था अब्बल तो आप रात में सडक पर गये ही क्यों मगर श्राप तो दे चुके तो दे चुके । अब साहब हालत ये कि सव्जी बेचने बाला कहे कि साहब एक रुपये की एक किलो ले लो तो भी कोई तैयार नहीं यहां तक कि कोई गिलकी मुफत में लेने को भी तैयार नहीं । जब तक कृषि विभाग यह तय करता कि यह कुछ नहीं एक कीडे का लार वा है इससे न तो फसल को कोई नुक्सान होता है न सब्जी खाने वाले को कोई नुक्सान है तब तक तो आलू  का स्टाकिस्ट जिसके दो साल से आलू कोल्ड स्टोर में पडे थे और कोई खरीददार नहीं मिल रहा था उसके पास एक किलो आलू भी न बचे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक वार जब मै अपने नगर  गया तो क्या देखा कि सभी के मकानों पर दरवाजे के दौनो तरफ हल्दी के हाथ के निशान बने थे । पूछा भैया ये क्या है तो मालूम हुआ कि एक चुडैल याने भूतनी भिखारन बन कर आयेगी ,वह प्याज और रोटी मांगेगी । जिसके दरबाजे के दौनो ओर ऐसे हल्दी के हाथ बने होंगे उस घर नहीं जायेगी। मै अपने मित्र के घर गया तो वहां भी । मै जानता था वे एसी बातों में विश्वास नहीं करते तो मैने पूछा भाई ये क्या बोले मै इन बातों में विश्वास नहीं करता । मैने पूछा फिर ये हल्दी के हाथ दरवाजे पर \बोले उसमें हर्ज ही क्या है ।कुछ दिन रह कर मै तो वापस आगया फिर पता नहीं चुडैल आई या नही हो सकता है आई हो तो हाथ के निशान देख कर वापस लौट गई हो परन्तु इतना अवश्य पता है कि एक माह वाद होने वाले चुनाव में कांग्रेस उस क्षेत्र से भारी बहुमत से विजयी हुइ थी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          चलते चलते एक बात और वता दूं कि कुछ लोग भूतों पर विश्वास नहीं करते कहते है यह वहम है लेकिन हुजूर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          एक दिन भूत के बच्चे ने भूत से कहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           पापा आज मुझे आदमी दिखा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          भूत ने कहा बेटा आदमी वगैरा कुछ नहीं होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          यंे अपन लोगों का वहम होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          मै तो दिन में रात में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          हाट में बाजार में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          राज में दरवार में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           गली और मैदान में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          खेत और  खलिहान में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          संसद और विधान में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          हर तरफ रहता हूं फिरता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          मुझको तो कभी कोई आदमी नहीं दिखता&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-6795986757840907662?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/6795986757840907662/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=6795986757840907662' title='29 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6795986757840907662'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6795986757840907662'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='समाचार'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>29</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7617140351408359268</id><published>2010-09-23T10:58:00.000-07:00</published><updated>2010-09-23T11:10:52.014-07:00</updated><title type='text'>यक बंगला बने न्यारा</title><content type='html'>ब्लॉग बना लेना जितना सरल है ब्लॉग पर निरंतरता बनाये रखना उतना ही कठिन है और भी सांसारिक परेशानियाँ है  मै इतनी लम्बी अवधि तक अनुपस्थित रहा उसकी वजह और परेशानियाँ आप से शेयर   करना चाहूंगा यह/  जानते हुए भी कि आजकल कौन किसके गम शेयर करता है| मैंने बहुत पहले हाऊसिंग बोर्ड में एक मकान बुक किया था कुछ नगद वाकी सब फाइनेंस , आजकल फाइनेंस इतना सरल हो गया है कि कुछ न पूछो यद्यपि जितना स्वीकार होता है उससे कम मिलता है मगर यह क्या कम है कि वगैर महनत के मिल जाता है, और भुगतान करेंगे तब देखा जायेगा|रीणम कृत्वा घृतं पिवेत तो  साहब मुझे सूचना मिली कि आकर मकान का आधिपत्य प्राप्त करें |  उस दिन पूरा घर चहक रहा था आपने मकान की लालसा हर किसी को रहती है  कुंदन लाल सहगल ने गाया  करते  थे " यक बंगला बने न्यारा" ग़ालिब साहेब के पास तो पैसों की ही तंगी रहती थी मगर इच्छा तो उनकी भी थी तो उन्होंने यूं किया " बे दरो दीवार का इक घर बनाया चाहिए"  काहे का कारीगर काहे का सीमेंट  एक तो गाता ही रह गया " इक घर बनाऊंगा तेरे घर के सामने" क्या पता बेचारा बना भी पाया या नहीं  तो साहब उस खुशी के माहोल में मैंने " पिय तन चितहि भोंह कर वांकी" वाले अंदाज में बेटे से कहा भैया अपन नए घर में चल रहे हैं पुरानी चीजें यहीं छोड़ चलेंगे |  मै मुस्करा भी नहीं पाया था कि " हाँ छोड़ तो जाओगे तुम भी तो पुराने हो गए हो तुम भी मत जाओ" |&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; सब  सदस्य सामान को नए घर में व्यबस्थित करने लगे थे मुझे फुर्सत थी सो मैंने टीवी खोल लिया एक चेनल रत्नों की जानकारी दे रहा था, चैनल बदला तो दूसरा ग्रहों की शांति के उपाय बतला रहा था, तीसरा चैनल खोला तो उसने बताया कि आपका मकान दक्षिण मुखी नहीं होना चाहिए सुनते  ही मैं घबरा गया| बेटे को आवाज़ लगाईं  भैया उत्तर किधर है ? वह बोला प्रश्न किधर है?  मैंने कहा नहीं रे उत्तर दिशा किधर है उसने कहा आपकी पीठ तरफ | अरे ये तो बड़ा अनर्थ हो गया दक्षिण मुखी मकान ले लिया उत्तर दिशा में तो दरवाजा निकलवा भी नहीं सकते थे क्योंकि वहां तो मात्र तीन फिट की गली थी|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मै  दरवाजे पर बैठा सोच में डूबा था और सोच रहा था कि मोहल्ले वाले मेरे सोचने के वारे में क्या सोच रहे होंगे तभी एक लड़का आया उसके पास पांच हरी मिर्च नीचे  बीच में नीबू और पांच हरी मिर्च ऊपर ऐसे कई यंत्र थे उसने एक यंत्र मेरे दरवाजे पर टांग कर दस रूपये मांगे मै कुछ कहूं इससे पहले ही बोला आपकी लाइन में सबके यहाँ लगाता हूँ इससे दक्षिण मुखी का दोष मिट जाताहै  पूछा ये यंत्र कितने दिन चलेगा बोला  चोवीस घंटे मैंने कहा मतलब तीन सौ रुपया माह्बार तू लेगा| बोला नहीं, अगर आप एक माह का एडवांस देंगे तो ढाई सौ ही लगेंगे| मैंने अपने एक मित्र को फोन लगाया कहा यार यहाँ तो तीन सौ रूपये का अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है, तो उसने कहा कहीं से काले घोड़े की नाल लाकर टांग दो हमेशा के लिए दोष दूर |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यहाँ तक तो ठीक मगर इस मकान में तो सारा ही काम उल्टा था|  चेनल ने बताया फलां साइड में किचिन होना चाहिए वहां बाथरूम था था | नल की फिटिंग वरुण देव के बिलकुल विपरीत दिशा में थी| एक मित्र बोले चलो रसोई घर की समस्या मै मिटा देता हूँ| हम किचिन में पहुंचे तो  मित्र एकदम उदास हो गए पूछा क्या हुआ ? बोले यार क्या बताएं चूल्हा होता तो उसके मुह की दिशा बदल देते मगर यहाँ तो गैस है| मुझे अपनी का  वक्त याद आगया खांसी ज्यादा थी तो डाक्टर बोला एक्सरे निकलवा लो  रिपोर्ट जब मिली तो सबसे पहले एक्सरे उलट पुलट कर मेने देखा उसमे कुछ धब्बे से दिखे | मरीज ही क्या जो डाक्टर ko  बताने से पहले खुद एक्सरे न देखे| डाक्टर  ने एक्सरे प्लेट देखी और एक दम गंभीर हो गया मेरा दिल धडकने लगा| डाक्टर ने गंभीरता पूर्वक पूछा सिगरेट पीते हो? मैंने कहा नहीं डाक्टर गम्भीर से गंभीरतम हो गया | मैंने पूछा क्या बात है साब? तो डाक्टर बोला अगर तुम सिगरेट पीते  होते, तो, सिगरेट छोड़ने से तुम को बहुत फायदा हो सकता था|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; खैर मेरी समस्या ज्यों की त्यों बनी है ""और करे अपराध कोऊ और पाव फल कोऊ"" की तर्ज पर हाऊसिंग बोर्ड वालों ने की गलती और फल मुझे भुगतना pad  रहा है| थोड़ी इतनी भी खुली जगह  न दी कि एक नीबू का पेड़ लगा सकूं   मिर्च बो सकूं  मेरा तीन सौ रुपया मासिक बच तो सकता है मगर घोड़े की नाल नहीं मिल पा रही है|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7617140351408359268?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7617140351408359268/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7617140351408359268' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7617140351408359268'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7617140351408359268'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='यक बंगला बने न्यारा'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8609669636703857828</id><published>2010-04-24T18:56:00.000-07:00</published><updated>2010-04-24T18:58:48.855-07:00</updated><title type='text'>मां का नाम</title><content type='html'>मैंने  अपनी आँखों से देखा है और अपने कानो से सुना है कि .......(पहले मैं अपना वाक्य ठीक करलूं )अपनी आँखों से देखा है क्या मतलब ?आदमी अपनी ही आँखों से  ही  देखता है यहाँ अपनी शब्द महत्वहीन है तो आँखों का भी क्या मतलब ?आँखों से नहीं तो और काहे से देखता है   ? ऐसे ही कानो से सुना है क्या मतलब ? तो अपन ऐसा करते है ""  मैंने देखा और सुना है"" &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदियों से देखता,सुनता चला आ रहा हूँ ( पुनर्जन्म में विश्वास होने के कारण ) कि हर जमाने में पुत्र की पहिचान पिता के नाम से ही होती  चली आ रही है |विश्वामित्र ने जनक को राम लक्ष्मण का परिचय दिया ""रघुकुल मनि दशरथ के जाए ""| परशुराम आये तो भयभीत राजा लोग "पितु समेत कहि निज निज नामा "" उधर कवि केशवदास ने अंगद को रावण के पास पहुचाया तो रावण से कहलवाया ""कौन के सुत ? अंगद से जवाब दिलवाया ""बालि के "" तारा का नाम नहीं  | अदालतों, तहसीलों में आवाजें लगती है फलां बल्द फलां हाजिर हो ,पक्षकार को माँ के नाम से नहीं बाप के नाम से पुकार लगती है  ऐसे एक नहीं सैकड़ों ,हजारों ,लाखों ,करोड़ों (इससे आगे कहाँ तक लिखूंगा ) उदाहरण है | वैसे कुछ अपवाद भी है जैसे यशोदा नंदन ,देवकी सुत ,कौन्तेय , सुमित्रा नंदन , लेकिन ये अपवाद अँगुलियों पर गिने जाने लायक है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ का दर्ज़ा पिता से ज़्यादा है सब जानते हैं | पिता की अपेक्षा  शिशु की देखभाल लालन पालन बेहतर तरीके से माँ ही   कर सकती है क़ानूनविद  मानते है |महिला पुरुष सामान है संविधान विशेषज्ञ मानते है |क्वचिदपि कुमाता न भवति कहने वालों ने पिता के बदले माँ का नाम लिखने की न तो  परंपरा डाली और न ही बदलते परिवेश में किसी ने ऐसी पहल की | पुराने समय पर दोषारोपण अलबत्ता किया जाता रहा है कि भाई पहले स्त्री को संपत्ति  समझा जाता  था उसका क्रय विक्रय किया जाता था ,इसलिये उसका नाम लिखना उचित नही समझा गया । तो,भैया  पहले तो आदमियों का भी क्रय विक्रय होता था |शैव्या अकेली नहीं विकी ,रोहिताश्व  बिका ,हरिश्चंद्र भी बिके ,यूसुफ़ बिके और जमीदारी प्रथा की समाप्ति तक खेतिहर मजदूर बिकते थे रहन रखे  जाते थे | (बिक तो वैसे आज भी रहे है पहले गरीब विकता था अब छत्रप,हमारे आका ,देश के कर्णधार बिक रहे है ।&lt;br /&gt;|&lt;br /&gt;अच्छा दूसरी बात ,पिता के देहावसान के बाद बचपन से लेकर युवावस्था तक माँ ने नाना प्रकार के त्याग करके ,मेहनत मजदूरी करके ,दूसरों के कपडे सिल कर ,अपने पुत्र को पढ़ाया लिखाया वही पुत्र जब नौकरी के लिए  आवेदन देता है तो लिखता है 'पुत्र स्वर्गीय श्री या सन आफ लेट श्री सो एंड सो’ क्या उस माँ का सारा त्याग तपस्या  ,उसकी साधना इस बात की भी हकदार नहीं कि पुत्र माँ का नाम लिख कर उसे गौरवान्वित कर सके और खुद भी गौरव का अनुभव कर सके | माँ की मेहनत मजदूरी पर पढ़ लिख कर कोई प्रसिद्धि प्राप्त कराले या उच्च पद पर पहुँच जाए तो तो कहा जाता है पिता का नाम रौशन कर दिया | माँ भी खुश कि बेटा पिता का नाम रौशन कर रहा है {अरे भैया कछू बेटा तौ का करत हैं कै ट्यूब लाईट  पै  बाप कौ नाम लिखा देथें कैन लगे के  बाप को नाम रौशन कर रये हैंगे |}&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा एक बात और, पिता ने पिता होने का कर्तव्य नहीं निभाया हो |जुआ और शराब की लत के कारण बेटे सहित उसकी माँ को गालियाँ और मारपीट के अलावा कुछ भी न दिया हो ,अपनी पुश्तेनी जायदाद बेच कर जुआ शराब के हवाले कर दी हो , और इतने पर भी संतोष न हुआ हो तो स्वर्ग सिधार गया हो |( इसीलिये मेरा मानना यही रहता है कि लड़की की उम्र कितनी ही क्यों न हो जाए ,जब तक वह अपने पैरों पर खड़ी न हो जाए या आर्थिक रूप से समर्थ  न हो जाये उसकी शादी नहीं की जाना चाहिए) | पुरुष प्रधान समाज से इनकार तो नहीं किया जा सकता ,प्राचीन काल में भी और वर्तमान समय में भी | आपको याद होगा  झांसी की रानी लक्ष्मी बाई , क्रांति के अग्रिम पंक्ति की नायिका ,जब कालपी पहुंची  तब वहां तात्या टोपे (रामचंद्र पांडुरंग राव )बांदा के नवाब ,शाहगढ़ ,बानपुर के राजा लोग और दमोह के क्रांतिकारी मौजूद थे उन सब में लक्ष्मी बाई सबसे योग्य थी  लेकिन तांत्या टोपे को छोड़ कर सबने  महिला के नेतृत्व तले काम करने से इनकार कर दिया था |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी यदि लड़की डिप्टी कलेक्टर है और लड़का तहसीलदार है ,तो अव्बल तो सम्बन्ध होगा ही नहीं लड़का लड़की दोनो ही मना कर देंगे और किसी कारण बश ( मसलन मंगल ,शनी ,या छत्तीस गुण  मिले वगैरा वगैरा,, वैसे मेरा मानना है की लड़के लड़की के गुण नहीं  अवगुण मिलाये जाना चाहिए मसलन लड़का पीता हो लडकी न पीती हो ,लड़का जुआ खेलता हो लड़की न खेलती हो लड़के की गर्ल फ्रेंड हो लड़की के बॉय फ्रेंड न हो तो कुण्डली कैसे मिलेगी और जहा तक मै समझता हूँ मेरी नजर में ये अवगुण है तो मिलान अवगुणों का होना चाहिए ) रिश्ता हो जाए तो उम्र भर लड़का हीन भावना से ग्रस्त रहेगा |होता है पत्नी पति की तरक्की देख कर खुश होती है और पति पत्नी की तरक्की पर हीन भावना से ग्रस्त हो जाता है ,फिल्म अभिमान के द्वारा आप सब लोग इस मानसिकता से परिचित हैं ही = तो ऐसे माहौल में पुरुष यह कैसे वर्दाश्त कर पायेगा कि उसका बेटा या बेटी उसके बदले  माँ का नाम लिखें | यह तो उसके खिलाफ खुली बगावत हुई उसका पौरुष उसे यह सहन करने ही नहीं देगा जबकि जनाब हकीकत तो यह है (माफ़ करना ) कि मातृत्व स्वयम सिद्ध है और पितृत्व अनुमान है "| माँ के साथ तो बच्चे की जन्मत: अनिवार्य पहिचान स्थापित है ही, यदि उसका पिता अपने को प्रकट न भी करे तो समाज में उस बच्चे की पहिचान का संकट खडा नहीं होना चाहिए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही आशय दर्शाता एक लेख मैंने पहले भी लिखा था सन १९९३ में | इंदौर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र "" नई दुनियां ""में दिनांक २१ फरवरी को कुछ जगह बच रही होगी तो मेरा लेख प्रकाशित कर दिया और पाठकों को शायद फुर्सत रही होगी तो उन्होंने पढ़  लिया ,बात ख़त्म |""बात तो आज की भी ख़त्म हो ही जायेगी गुड बैटर ,वेस्ट ,नाइस आदि लिख कर ।एकाध सदी बाद फ़िर कोई ऐसा ही लेख लिख जायेगा ,लोग पढ कर लिखेगे बहुत बढिया लिखा है लिखते रहिये ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8609669636703857828?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8609669636703857828/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8609669636703857828' title='32 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8609669636703857828'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8609669636703857828'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/04/blog-post_24.html' title='मां का नाम'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>32</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-2315205748284621898</id><published>2010-04-06T02:07:00.000-07:00</published><updated>2010-04-06T02:10:11.405-07:00</updated><title type='text'>हाथ से गया</title><content type='html'>एक दिन कड़ाही मांजते हुए ,अचानक आकर मेरे लेखन कार्य में व्यवधान करती हुई बोलीं -सुनोजी मैंने एक गजल लिखी है । मैं हतप्रभ ! कहा- देखो पहले उच्चारण सही करो | गाफ़ का 'ग' और जीम का 'ज' नहीं चलेगा | नाराज हो गईं।  क्या आप भी बाबा आदम के ज़माने की बातें करते है और गाने लगी "मैं का करूं राम मुझे बुड्ढा मिल गया "" फिर स्वत: बोलीं सुनिए जनाब वह ज़माना कभी का लद गया जब दोहे और चौपाइयों की मात्रा गिना करते थे जब छंद के गति ,विराम ,तुक हुआ करते थे और गजल में काफिया ,मक्ता ,मतला आदि हुआ करते थे, इससे कवि के मन में जो प्राकृतिक विचार उठा करते थे उनमे बनावटी पन आ जाता था |तुम्हारे पुरानो की आधी जिन्दगी तो मात्राएं गिनने मे ही चली जाती थी तभी चार छ दिन मे एकाध दोहा या शेर लिख पाते थे ।आज देखो एक एक दिन में चार चार कवितायें ,चार चार गज़लें।एक एक कवि के हिस्से मे एक एक खण्डकाव्य और महाकाव्य आजाये ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुस्सा तो मुझे भी आया किन्तु सांड को लाल कपड़ा न दिखाने के मद्देनज़र मैंने कह दिया’" इरशाद" |वो बोलीं =&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो देर रात घर आने लगे &lt;br /&gt;रचनाओं में सर अपना खपाने लगे &lt;br /&gt;पत्र रिश्तेदारों के बदले सम्पादक को लिखने लगे &lt;br /&gt;दाडी बढ़ाके कवि जैसा दिखने लगे &lt;br /&gt;कभी गीत लिखने लगे कभी शेर लिखने लगे &lt;br /&gt;कभी कभी तो व्यंग्य भी लिखने लगे &lt;br /&gt;नाम का पति हर काम से गया &lt;br /&gt;समझ लो वो आपके हाथ से गया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे मुंह से आह ,वाह कुछ निकले इससे पूर्व हे उन्होंने आदाब-अर्ज़ करने की स्टाइल में अपने सीधे हाथ से सर को दो बार छुआ |मेरी इतनी हिम्मत भी न हुई कि पूछूं यह ग़ज़ल है या कविता ? फिर एक दिन रोटी बेलते बेलते, बेलन हाथ में लिए हुए, अचानक भये प्रकट कृपाला की मानिंद प्रकट हुई और बोलीं अभी हाल ही हाल एक ताज़ा तरीन तैयार हुई है | दूध का  जला छाछ को फूँक फूँक कर पीता है तथा कारे की पूंछ पर पांव नही धरना चाहिये  के द्रष्टिगत मैंने मुक़र्रर इरशाद कह दिया |क्योंकि मैने एक श्रोता को कवि के हाथों पिटते देखा है जो कविता नही सुनना चाह रहा था ,और मैने एक कवि को भी श्रोता के हाथ से पिटते देखा है जो पूरी रचना सुन चुका था ।बोलीं=&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुले आम रिश्वत और भ्रष्टाचार &lt;br /&gt;एक स्वामी यौनाचार में गिरफ्तार &lt;br /&gt;अखबार अस्पतालों की खोलते रहे पोल    &lt;br /&gt;नहीं जूँ तक रेंगी बहुत बजाये ढोल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब सब्र की इन्तहा हो चुकी तो मुझे कहना पड़ा यह कविता है या आप किसी समाचार पत्र की हेड लाइन पढ़ रही है |बोली यह कविता ही है और आधुनिक काल में इसे ही कविता कहते है ,कहकर मेरी तरफ हिकारत की नजर से देखते हुए ग़ालिब सा'ब का शेर पढने लगी "ग़ालिब वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात / दे उनको न दिल और ,तो दे ,मुझको जबां और ""एक पति और एक दफ्तर का मातहत दोनो मजबूर होते है कविता पर वाह वाह करने के लिए |यदि बॉस कहे सुनो श्रीवास्तव मैंने एक शेर लिखा है तो सुन कर बहुत जी चाहता है की कहें वाह हुज़ूर क्या लीद की है मगर कहना पडता है वाह साहब क्या बात है क्या तसब्बुर है क्या जज्वात है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन अचानक पूछ बैठीं क्यों जी नेताओं का गावों से कितना ताल्लुक रहता है ?  मैंने कहा जैसा चन्द्र का चकोर से , जल का मछली से, तो बोलीं, लेकिन वे तो वहाँ तब ही जातें है जब कोइ घटना घटित हो जाती है | मैंने कहा जाना ही चाहिए वह उनका कार्य क्षेत्र है ,बोलीं यदि वहां कुछ न होगा तो नहीं जायेंगे ?मैंने कहा क्यों जायेगे , तो बोली समझलो वह गाँव उनके हाथ से गया | मैं झुंझला गया =यार ! ये हाथ से गया ,हाथ से गया तुम्हारा तकियाकलाम है क्या ? कवियों को  दूसरों की बात सुनने में कम दिलचस्पी होती है अत: वगैर मेरी बात का कोइ उत्तर दिए कहना शुरू कर दिया =&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो गावं ओलों की बर्बादी से बचा &lt;br /&gt;जो गावं सूखा भुखमरी या बाढ़ से बचा &lt;br /&gt;जिस गावं में कभी न कोइ हादसा हुआ &lt;br /&gt;समझो वो गावं नेता के हाथ से गया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धोखे से मेरे मुंह से निकल ही क्या वाह क्या बात है तो वे हाय मैं शर्म से लाल हुई वाले अंदाज में गुलाबी होती हुई बोलीं इसे कहीं अखबार में छपने भेज दीजिये न | मैंने कहा अब साहित्य अखबारों में नहीं छपता वहाँ अभिनेत्रियों के बड़े बड़े फोटो और विज्ञापन  छ्पते  है और  साहित्यिक पत्रिका के  पेज भरने के लिए लम्बी रचना की जरूरत होती है और आपकी कविता छोटी है |बोली और बड़ी कर दूंगी |चार  लाइन वकील के लिए लिख दूंगी =&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक़ल कहाँ पे मिलती है ,तलवाने कौन लेता है &lt;br /&gt;मन चाही पेशियों के पैसे कौन लेता है &lt;br /&gt;तामील कहाँ पे दबती है ,फ़ाइल कहाँ पे रुकती है &lt;br /&gt;गर आपका फरीक बातें ये सब जान गया &lt;br /&gt;समझो फरीक आप के हाथ से गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने चुनावी वादा किया ,अच्छा भेज देते हैं साथ ही शराबी फिल्म की अमिताभी स्टाइल में कहा "" या तो प्रसिद्ध लेखक छपे या सम्पादक जिसको चांस दे / वरना इन पत्रिकाओ मे छ्प  भला सकता है कौन ""और साथ में समझाइश भी दी कि ये पत्रिकाओं में छापने वाले &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नए में नहीं प्रसिद्ध में विश्वास रखते है   &lt;br /&gt;सादा मे नही बोल्ड  में विश्वास रखते है   &lt;br /&gt;छापने में कम, फ़ाड  फैकने में विश्वास रखते है  &lt;br /&gt;खाने में कम लुढकाने में विश्वास रखते है   &lt;br /&gt;अगर यह बात  सच है तो समझ लो मैडम &lt;br /&gt;यह लिखा हुआ भी आपके हाथ से गया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-2315205748284621898?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/2315205748284621898/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=2315205748284621898' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2315205748284621898'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2315205748284621898'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='हाथ से गया'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-4168307695092316292</id><published>2010-03-26T08:38:00.000-07:00</published><updated>2010-03-26T08:41:18.245-07:00</updated><title type='text'>सर दर्द</title><content type='html'>दुनिया में वैसे तो बहुत तरह के दर्द हैं ,मगर एक प्रमुख दर्द है सरदर्द | वैध्य तो यही कहेगा "अंत भारी तो माथ भारी "" मगर आजकल तो सरदर्द की गोलियां सरल , सुगम व् सस्ता इलाज़ है , एक दिन उन्होंने कहा गोलियां रिएक्शन करती है तो मैंने कहा चन्दन घिस कर लगाइए |बोले हमें मालूम है मगर "" दर्दे सर के वास्ते है अर्क संदल का मुफीद ,पर ,उसका घिसना ,घिस के मलना यह भी इक सरदर्द है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी कभी कोइ पड़ौसी भी पड़ौसी के लिए सरदर्द हो जाता है |एक दिन से वे एक पेंचकस लेकर आये बोले इसे आप रखलें ,पूछा क्यों ? तो बोले मै अपने सारे औजार एक ही जगह रखना पसंद करता हूँ |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो एक दिल का दर्द भी होता है ,बहुत शेर पढ़े गए बहुत कवितायें लिखी गई बहुत फ़िल्मी गाने बने |पुराने जमाने में दिल पर लिखे गए गानों का बड़ा क्रेज़ था यकीन मानिए ऐसे ऐसे गाने कि इस दिल के टुकड़े हज़ार हुए कोई यहाँ गिरा कोइ वहां गिरा ।  गोया दिल दिल न हुआ कार में लगा ग्लास हो जो एक्सीडेंट से बिखर गया हो |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हकीकत यह भी है जिन्हें दिल में दर्द होता है वह तो कोइ एसीडिटी ,गैस वगैरा का होता है और जिन्हें वास्तव में दर्द होता है वे तो बतला ही कहाँ पाते है । सिर और दिल के अलावा भी कई दर्द होते है कोई कहाँ तक गिनाये |""वो मुझसे पूछते है दर्द कहाँ होता है ? अरे एक जगह हो तो बतादूँ कि यहाँ होता है ""दर्द का विवरण आयुर्वेदिक ग्रंथों में ज्यादा पाया जाता है ।उस जमाने में आलपरपज पेन किलर नहीं होते थे |हर दर्द की अलग दबा हुआ करती थी । उन ग्रंथों में लिखा है दर्द चौरासी प्रकार के होते है | पुराने ग्रंथों में चौरासी का बड़ा महत्त्व है ,चौरासी प्रकार की बात व्याधियां ,चौरासी आसन ,चौरासी प्रकार के चक्षु रोग | फिर भी चौरासी से काम न चला तो चौरासी लाख योनियाँ |भाई कमाल है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराना मरीज डाक्टर के लिये सर दर्द है ।जितनी दवाएं एक नया डाक्टर जानता है उससे ज्यादा तो पुराना मरीज सेवन कर चुका होता है सारी दबाओं के कंटेंट्स उसे याद होते है |इधर डाक्टर ने दबा  लिखी उधर मरीज की प्रतिक्रया -सर इसमें तो डायजेपाम है या अल्प्राजोलम है दिन भर उदासी रहेगी ,सर इनमे तो आइब्रूफेन है जी मिचलायेगा |गजब है ,अभी गोली खाई नहीं है केवल पर्चा ही लिखा है और इनका जी मिचलाने लगा | होता है ,कुछ लोग ज्यादा सम्बेदनशील होते है वे पुस्तक या पेपर वगैरा में सब्जी आदि बनाने की रेसिपी पढ़ते है और उसमे पढ़ते है प्याज के बारीक टुकड़े करें  ,तो उनकी आँखों  में जलन होकर आंसू आने लगते है ।मैंने देखा है एक्स-रे डाक्टर को दिखाने के पहले मरीज सबसे पहले खुद एक्स-रे देख कर उसमे टूटी हड्डी तलाश करने की कोशिश करता है |वो तो यह अच्छा है कि एक्स-रे प्लेट पर नाम लिखा होता है मरीज का ,इसलिए वह प्लेट सीधी ही देखता है |मोडर्न आर्ट में चित्रकार का नाम लिखा होता है उससे ही तो समझ में आता है कि चित्र किधर से सीधा है |&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक और अजीब सरदर्द होता है बाबूजी आफिस से तो गुनगुनाते हुए चले आयेंगे और घर में प्रवेश करते ही ऐसी शकल बना लेंगे जैसे पहाड़ खोद कर आरहे हों ,सर पकड़ लेंगे ,धम्म से कुर्सी पर बैठ जायेंगे बेचारी बीवियां चाय बनाने चल देती है तो कहीं कहीं पर मैडम का सुबह सुबह भयंकर सरदर्द होता है पतिदेव चाय बना कर लाते हैं तब उन्हें दर्द से आराम मिलता है |पुराने ज़माने में तो चाय प्रयुक्त नहीं होती थी इसलिए बुजुर्ग कह गए "प्रभाते कर दर्शनम ""वरना वे भी यही कह जाते प्रभाते कप दर्शनम |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़ानून का जानकार फरीक वकील के लिए सर दर्द होता है |जिन कामों को आमतौर पर वकील के मुंशी करते है वह काम यह स्वम फरीक ही निबटाना चाहता है मसलन नक़ल की दरखास्त लगाना ,रिकार्ड रूम से फाइल निकलवाना ,तारीख पेशी बढ़वाना और ये होशियारचंद समझते है कि मुंशी के पैसे बचा लिए ,जबकि तीन गुना राशि खर्च कर चुके होते है | मुकदमा और मकान बनबाना इनसे जिन लोगों का वास्ता पढ़ा है उनके सरदर्द का तो कुछ पूछो ही मत | चौबीस घंटे मकान का नक्षा ही दिमाग में घूमता रहता है |और कारीगर इतना कम एस्टीमेट बतलायेंगे कि आदमी झट व्यवस्था करले | और ऐसे मुकाम पर लाकर छोड़ते है कि फिर रकम बेचना पढ़े ,कर्ज लेना पड़े मकान तो पूरा करवाना ही है वरना बरसात आगई सब किया कराया बेकार हो जाएगा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराना बाबू नए अधिकारी के लिए सर दर्द होता है ,ऐसे लोगों के खिलाफ कार्यबाही करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसा है इसलिए वह दर्द निवारक गोली खाना ज्यादा उचित समझता है |,एक अधिकारी ड्रायवर से नाराज रहते थे ,टूर पर जाते समय घने जंगल में जीप विगाड दी ।इसीलिये कहा गया है कि जब तक पार न लग जाओ नाव वाले से झगड़ा नहीं करना चाहिए |गिरधर की कुंडलियों में हमें मिलता है किन किन से आपको बैर नहीं करना चाहिए |""बामन ,बनियां, वैध्य, आपको तपे रसोई आदि चौदह लोंगों से "" मै कहता हूँ भैया किसी से तो मत करो बैर ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-4168307695092316292?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/4168307695092316292/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=4168307695092316292' title='19 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4168307695092316292'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4168307695092316292'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html' title='सर दर्द'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-4269468854354357534</id><published>2010-03-10T22:20:00.000-08:00</published><updated>2010-03-10T22:22:31.021-08:00</updated><title type='text'>दीवार के उस पार</title><content type='html'>आज सुबह मै मध्यप्रदेश का  समाचार दैनिक भास्कर पढ़ रहा था कि एक समाचार पर मेरी नजर गई  ""दीवारों के आर पार देख  सकेगा मोबाइल ""दीवार के उस पार कौन है और क्या हो रहा है यह मोबाईल के द्वारा देखा जा सकेगा  इस तकनीक के उपयोग के लिए नोकिया कंपनी से समझौता किया गया है |&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पहले तो दीवारों के कान होने से ही लोग परेशान थे  और अब  'एक न शुद दो शुद ' | वैसे आपको ध्यान होगा दीवार के उस पार देखे जाने वाला  यंत्र हम हज़ारों लाखो  वर्ष पूर्व तैयार कर चुके और उसका नाम "खिड़की " रख चुके है | इतना तो विश्वास है कि जिनके पास ऐसे मोबाइल होंगे वे दूसरों के घरों में तांका झांकी नहीं करेंगे क्योंकि कहा गया है कि जिनके खुद के घर कांच के होते है वे दूसरों के घर पत्थर नहीं फैकते ,कहा तो यह भी गया है कि जिनके घर कांच के होते है वे लाईट बंद करके कपड़े बालते है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य दीवार से बहुत प्रभावित रहा है मसलन 'भाई मेरे हिस्से का आँगन भी तू ले ले मगर बीच की दीवार गिरादे ' किसी ने गाया 'दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है ' किसी  ने ठंडी सांस लेकर आपबीती सुनाई 'दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की ,लोगों ने आने जाने के रस्ते बना लिए 'किसी ने तरस खा कर कहा 'वो धूप से बच कर चला आया तो है लिकिन ,गिरती हुई दीवार के साए में खडा है |ग़ालिब साहब कहा करते थे 'वे दरो दीवार का इक घर बनाया चाहिए ' उधर कोइ गाने लगा 'इस अंजुमन में आप को बार बार आना है ,दीवारों दर को गौर से पहिचान लीजिये 'किसी ने "दीवार "नाम के फिल्म ही बना दी तो कोई प्रेम में असफल दुखी हो गया 'चांदी की दीवार न तोडी प्यार भरा दिल तोड़ दिया '|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य ही नहीं देख का प्रमुख स्तम्भ न्याय पालिका भी इससे प्रभावित है |पचास फी सदी दीवानी मुकदमो की बजह दीवारें है |रात दिन लेख ,समाचार,  पत्र प्रकाशित होते  है- अदालतों में इतने मुकदमे लंबित है यह भी कहा जाता है कि जस्टिस डिलेड -जस्टिस डिनाइड " हालांकि दीवारों के साथ न्यायाधीश गण की कमी भी इसका कारण हो सकता है आपको सं १९७१ का सेन्सस याद होगा जिसके अनुसार प्रतिमिलियन जनसंख्या पर जजेज का रेशो अपने यहाँ १०.५ था जबकि यह रेशो आस्ट्रेलिया में ४२.६,इंग्लेंड में ५०.९ .केनेडा में ७५.२ तथा यूनाइटेड स्टेट में १०७ था और वर्तमान में भी कोइ विशेष बढ़ोतरी इस क्षेत्र में नहीं हुई है |खैर यह अपना न तो सब्जेक्ट है न क्षेत्र |लेकिन इतना अवश्य है दीवारों को गिरा दीजिये मुकदमों की संख्या आधी रहा जायेगी ,इन दीवारों में पार्टीशन वाल .नफ़रत की दीवार चांदी की दीवार ,कुरीतियों की दीवार सब शामिल है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक नफ़रत की दीवार का ताल्लुक है - मैंने बचपन में एक एक कविता पढ़ी थी ""बीबी से शौहर ,शौहर से बीबी है बदगुमाँ, है बाप का बना हुआ बेटा उदूंजां , हिन्दोस्ताँ के घर हुए खाली सुकून से , हैं दीवारें रंगी हुई पड़ौसी के खों से " यह बचपन में पढ़ी थी आज मै रिटायर्ड हूँ कमोवेश वही हालात आज भी है | वैसे हम दुःख को रोकने अपने चारों ओर दीवार खडी कर लेते है वे दीवारें सुख को भी बाहर ही रोक देती है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीवार गिराते ही व्यक्ति पूर्णता  शान्ति ,स्थिरता प्राप्त कर लेता है | जो आता है उसे आने दो जो जाता है उसे जाने दो .जो हो रहा है उसे देखते रहो गवाह बन कर | पुराने जमाने में लोगों को दीवारों में चुनवाया जाता था यह काम बड़े जोरशोर से होता था और दीवारों में धन गाढ़ने का काम चोरी छुपे होता था |कई जगह पुराणी इमारतों की दीवारे गिरतीं है तो धन निकलता है ,इसे दफीना कहा जाता है ,कई लोग पुराने मकान ,खंडहर महल में दफीना खोदने तैयार रहते है , त्तान्त्रिकों के चक्कर में दिन रात लगे रहते है ,इन्हें हर जगह दफीना ही नजर आता है ,सपने भी उसी के देखते है ,अगर इन्हें सपना आजाये कि दीवार में दफीना है तो यह माकन मालिक की चार इंची पार्टीशन की दीवार तोड़ डालें |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों ने गढ़ा धन देखने के काजल बना लिए है - अभी ये लोग काजल के वारे में कम ही जानते है |एक गाना है ""छुप गए तारे .........तूने काजल लगाया दिन में रात हो गई ""गोया काजल लगाते ही दिखना बंद . जब कुछ दिखाई नहीं देगा तो रात ही तो कहलायेगी |किसी सूरदास से पूछो भैया दिन है कि  रात ?बोले -भैया हमें तो रात दिन एक से ही हैं |  अत: ऐसा काजल न लगा लेना कि दिन में ही रात हो जाए |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे जब क़ानून बनाता है तो उसको तोड़ने के दस तरीके भी ईजाद हो जाते हैं , हो सकता है ऐसा सीमेंट ,बार्निश ,पालिश तैयार हो जाए जो इस तकनीक को विफल करदे |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-4269468854354357534?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/4269468854354357534/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=4269468854354357534' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4269468854354357534'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4269468854354357534'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='दीवार के उस पार'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8241353235441514083</id><published>2010-02-13T20:58:00.000-08:00</published><updated>2010-02-13T21:00:49.189-08:00</updated><title type='text'>भाषा और संस्क्रति</title><content type='html'>बोली संस्क्रति का एक महत्वपूर्ण भाग है,संस्क्रति जानने के लिये भाषा और बोली के महत्व से इन्कार भी नही किया जा सकता है अर्थात प्रुरातात्विक मानवशास्त्री खुदाई से प्राप्त बस्तुओं से जीवन शैली का अन्दाजा भले ही लगालें मगर उस वक्त बोली कैसी रही होगी यह तो कठिन ही होगा ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना तो निश्चित है कि ,भाषा और बोली का प्रभाव आम जन पर साहित्य की अपेक्षा सिनेमा का ज्यादा रहता है भाषा के साथ हमारे ही घर मे हमारे ही द्वारा क्या हो रहा है ?भाषा के उपयोग, और उसके प्रचार के लिये सिनेमा से सशक्त माध्यम दूसरा नही है ,इसमे उपयुक्त डायलाग और भाषा तुरन्त ग्रहण कर ली जाती है ।लगे रहो मुन्नाभाई फ़िल्म बनी ।गांधीगिरी शब्द पर आपत्तियां हुई , जबकि इससे बहुत बहुत सालो पूर्व 1968 में श्रीलाल जी शुक्ल ,रागदरबारी मे गांधीगिरी शब्द प्रयोग कर चुके है उस जमाने मे इस शब्द पर आपत्ति क्यों नही हुई , मतलब साफ़ है उपन्यास या साहित्यिक पत्र पत्रिका ,कहानी आदि से ज्यादा प्रभावकारी यह माध्यम है सिनेमा ।यह बात जुदागाना है कि उपन्यासों पर फ़िल्म बनाई जाती है ।बात सिनेमा मे प्रयुक्त भाषा के सम्बन्ध मे है ।इस माध्यम के माध्यम से हमारे नौनिहाल भी ऐसी भाषा से परिचित हो रहे है जिसका अर्थ वे स्वं नही समझते है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह किसी अभिनेत्री से पूछा जाये कि आपके वस्त्रों का बजन कम क्यो हुआ -बोली ,वह सीन की मांग थी , कमाल है सीन भी माग करता है । मुझे ऐसा कुछ लिखना पड रहा है जिसकी वजह से मैं शर्मिंदा हूं और दुखी भी मगर लेख की माग है मै अत्यंत क्षमा प्रार्थी हूं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़िल्म आन मे परेश रावल के मुंह से कहलवाया गया जब इनकी (शत्रुघ्नसिन्हा की ) ’ इनकी मोटर सायकल जिधर से निकल जाती थी लोगों की फ़ट जाती थी’ । खोसला का घोसला फ़िल्म मे नवीन निश्चल से कहलवाया गया ’मेरी फट रही है यार’, फ़िल्म अपहरण मे अजय देवगन से कहलवाया गया ’हमारा आवाज ऊंचा होगया तो लोगों का फट जायेगा’ ।मुन्नाभाई एम।बी.बी.एस मे संजयद्त्त कहते है ’इतने लोग एक बाडी को घेर कर खडॆ है क्या घंटा दिखाई देगा’ ।लगे रहो मुन्नाभाई मे जब देश की तरक्की की बात चलती है तो संजयदत्त कहते है ’’अरे क्या घंटा तरक्की हो रही है ’ । फ़िल्म ओंकारा ,गंगाजल मे तो खैर गालियो की भरमार है ही ,कुछ डायलाग भी अभद्र । एक और फ़िल्म बनाने वाले आये थे उन्होने एक फ़िल्म बनाई अन्धेरी रात मे दिया तेरे हाथ मे -द्विअर्थी संवादों के परिपूर्ण । लेखक ने यदि लिख दिया है तो अभिनेता बोलने से मना नही कर सकता वहां पैसे का सबाल है ,असलियत दर्शाने की बात है , और उस पर तुर्रा यह कि जनता जो देखना चाहती है वह दिखाते है जो सुनना चाहती है वो सुनाते है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वर्गीय राजकपूर की फ़िल्म सत्यं शिवम सुन्दरम को लेकर उन पर जब मुकदमा चला तब उन्होने यही प्ली ली कि इसे तो सेंसर बोर्ड पास कर चुका है उस वक्त न्यायाधिपति श्रीयुत क्रष्णा अइयर ने यह कहने के साथ कि A view of the film may tell more than volumes ot evidence यह भी कहा था कि सेंसर वोर्ड विधि-विधान से ऊपर नही होता । क्या ऐसा नही लगता कि फ़ूहड और अश्लील भाषा संस्कार मे नही आरही है ,शोले फ़िल्म - हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर है , हमारा नाम सूरमा भोपाली ऐसे ही नही है , अरे ओ साम्भा आज भी प्रयोग मे लाये जा रहे है तो क्या यह संभव नही कि ५-६ साल का बच्चा अपने घर,मम्मी पापा की मौजूदगी मे वगैर उसका अर्थ जाने उपर्युक्त भाषा प्रयोग करे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;।और यदि कुछ टिप्पणीकार यह मानते है कि मेरे लेख के पद क्रमांक चार मे कुछ भी अभद्र या असभ्य नही है तो मै निवेदन करूंगा कि यदि उनका छै या सात साल का बच्चा यह कहता है ,कि पापा, मम्मी के मारे आपकी फ़टती क्यों है या यह कि आपने तो मुझे मात्र पांच रुपये दिये है इनसे मे क्या घंटा नाश्ता करूंगा तो बतलाइये आपको कैसा लगेगा ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8241353235441514083?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8241353235441514083/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8241353235441514083' title='23 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8241353235441514083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8241353235441514083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='भाषा और संस्क्रति'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7889426012713968709</id><published>2010-01-23T05:55:00.000-08:00</published><updated>2010-01-23T05:58:18.500-08:00</updated><title type='text'>तिलक समारोह</title><content type='html'>तो साब लडकी पसंद आगई कुंडली मिल गई - अब आप शादी किस स्तर की चाहते है ?&lt;br /&gt;अरे स्तर काहे का साहब -हम अपनी बहू थोड़े ही ,बेटी ले जा रहे है ।&lt;br /&gt;मगर फिर भी&lt;br /&gt;आपने भी तो कुछ संकल्प किया होगा&lt;br /&gt;हमारा तो पाँच तक का इरादा है&lt;br /&gt;अरे सा’ब पाँच में तो क्लर्क -पटबारी तक नहीं मिलते -&lt;br /&gt;पाँच के साथ पूरा सामान भी तो दे रहे है ।&lt;br /&gt;सामान तो अलग रहता ही है ।कौन सा नया काम कर रहे हो ।सामान दे रहे हो तो अपनी लड़्की को दे रहे हो । आप ऐसा करो, दस और सब सामान करदो&lt;br /&gt;ज्यादा हो जायेगा साहब, इसके बाद मेरी दो बेटियां और है सर पर&lt;br /&gt;ये आपकी समस्या है आप जाने&lt;br /&gt;ठीक है साहब जैसी आपकी मर्जी&lt;br /&gt;हां एक बात और हम बरात लेकर आयेंगे बस का ,ट्रेन का किराया स्वागत ,बरात ठहराना आपको मेह्गा पडेगा,आप एक काम करो लडकी को लेकर यही आजाओ अपन मैरिज हाल बुक बुक कर लेंगे एक डेड के आस पास खर्च आएगा वह आप वहन कर लेना और रिसेप्शन देंगे उसका आधा आधा अपन कर लेंगे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर सा’ब आपके तो हजार पांच सौ आदमी होंगे हमारे तो दस बारह लोग ही इतनी दूर आपायेंगे&lt;br /&gt;सो तो है मगर यही तो हो रहा है आज कल&lt;br /&gt;ठीक साहब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां एक बात और कैश हमे एक मुश्त टीका मे चाहिये हमे भी तो कुछ बन्दोबस्त करना है&lt;br /&gt;आपकी मर्जी ,हमको तो देना ही है कभी लेलो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीका बिभिन्न स्थानो में अलग अलग नाम से जाना जाता है कही तिलक समारोह, कही रिंग सेरेमनी,कहीं इंगेजमेन्ट , कही सगाई उद्देश्य सबका एक ही है कि शादी के पहले लडकी वालो से पैसे लेना ताकि रकम खरीदना और भी बहुत इन्तजाम करना । टीका में लड़के के पूरे परिवार को कपडे मगाये जाते है । मिठाई ,फल लड्की वाला स्वेच्छा से लाता है । टीका होते ही लडका दूल्हाराजा हो जाता है ।हर मां की इच्छा होती है कि उसका बेटा बड़ा अफ़सर बने ,अमीर घराने में उसका रिश्ता तय हो ,कैकैई ने भी तो हर मां की तरह अपने बेटे भरत को टीका ही मांगा था ।मगर देखिये आज लड़की का नाम सुमित्रा ,कौशल्या, जानकी मिल जायेगा मगर कैकैई नाम कोई नही रखता -ऐसा कौनसा गुनाह किया उसने ,बेटे का हित ही चाहा ,यह बात कही जा सकती है कि उसने दूसरे बेटे को बनबास मांगा ,जो आवाश्यक भी था राजा को हस्तक्षेप रहित राज्य करना चाहिये , उसने हमेशा के लिये नही केवल एक निश्चित अवधि के लिये मागा था क्योंकि १२ साल तक कोई, किसी स्थान पर ,स्थान के मालिक की जानकारी मे, कब्ज़ा रखता है तो विरोधी आधिपत्य ( एडवर्स पजैशन ) का अधिकारी हो जाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै कहां की बात कहां ले जाता हूं ,हां तो टीका मे सारे परिवार के कपड़े ,मिठाई,फल ,ड्राय फ्रूट ,के अलावा, लडके वालों के रिश्तेदारों से, लडकी के पिता की मिलनी करबाई जाती है ,गले मिलो और हाथ मे लिफ़ाफ़ा देते जाओ ,बेचारा डरता डरता लिफ़ाफ़ो की तरफ़ देखता रहता है कम न पड़ जाये ,पैसे तो है मगर लिफ़ाफ़ा खरीदने तो बाजार जाना पडेगा और लड़्के वाला ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलनी कराना चाहता है।हर पास या दूर के रिश्तेदार ,पहिचान वाले को बुला बुला कर मिलनी कराता है ।&lt;br /&gt;मैने सुना है मिलनी पहले भी होती थी मगर पहले लडके के मामा से लडकी के मामा की , फूफा से फूफ़ा की ,चाचा से चाचा की , ,जीजा से जीजा की मिलनी कराई जाती थी । ऐसे ही एक आयोजन मे एक लडका नशे में बिल्कुल टुन्न हो रहा था मिलनी वाले स्थान पर पहुंचा और बोला में दूल्हे का यार ,दुलहन के यार को बुलाओ मै भी मिलनी करूंगा ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7889426012713968709?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7889426012713968709/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7889426012713968709' title='28 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7889426012713968709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7889426012713968709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/01/blog-post_23.html' title='तिलक समारोह'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>28</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8389038721505868585</id><published>2010-01-12T07:38:00.000-08:00</published><updated>2010-01-12T07:45:00.391-08:00</updated><title type='text'>सरप्राइज इन्स्पेक्शन</title><content type='html'>मै अज्ञातबास पर ,मध्यप्रदेश के गुना नगर मे, बोहरा बागीचा स्थित अपने घर मकान नम्बर १२१ में पन्द्रह दिन के लिये गया था ।कोई कह सकता है बल्कि कहना ही चाहिये कि यह कैसा अज्ञातबास ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह उसी तरह का अज्ञात बास है जिस तरह आज-कल सरकारी कार्यालयों मे सरप्राइज इन्सपेक्शन होते है । पीए साहब का ( पिये हुये साहब का नही बल्कि उनका एक असिस्टेंट होता है उसका ) अर्ध-शासकीय पत्र आता है ( ईमेल की सुविधा होते हुए भी )कि सरकिट हाउस ( या डाक बंगला जो भी वहां पर उपलब्ध हो )मे दो कक्ष आरक्षित करा दिये जायें, बड़े साहब परिवार सहित सरप्राइज इन्स्पेक्शन को पधार रहे है ।लंच मे क्या क्या होना चाहिये यह या तो अर्ध-शासकीय पत्र मे ही लिख दिया जाता है अथवा फ़ोन पर सूचित कर दिया जाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चूंकि चपरासी से लेकर छोटे साहब तक सभी को यह पता रहता है कि दिनाक इतने को आकस्मिक निरीक्षण होना है तो उसकी तैयारियां शुरू हो जाती है ।उस दिन चपरासी प्रोपर ड्रेस पहन कर आते है ,फ़ाइलों की धूल झाड़ी जाने लगती है ।बाबू साहेबान को एक टेबिल और टेबिलक्लाथ उपलब्ध होता है तो अक्सर गंदा रहता है उसे धुलवालिया जाता है और उसका फ़टा हुआ भाग अपनी तरफ़ कर बिछा दिया जाता है और बेतरतीब फ़ाइले ठीक से जमा दी जाती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबू साहबान को जो टेबिल उपलब्ध होती है उसमे दराज होती है जिसमे शामलाती पेपर भरे रहते है जिन्हे फ़ुरसत मिलने पर संबन्धित फ़ाइलों मे लगा देने का विचार रहता है और चूंकि फ़ुरसत कभी मिलती नही इसलिये इनकी संख्या बढ़्ती रहती है तो कागज दराजों मे रखे नही जाते बल्कि ठूंसे जाने लगते है । ,इन्स्पेक्शन की जानकारी मिलने पर सबसे पहले इन कागजों को एक पोटली मे बांध कर अदर्शनीय स्थल पर रख दिया जाता है क्योंकि ऐसा सुना गया है कि किसी जमाने में बड़े साहब ने दराज खुलवा कर पेंडिंग कागजात की लिस्ट बनवा ली थी और उन कागजात मे कुछ पांच पांच और दस दस के नोट भी मिले थे - जिसके वाबत उनका स्पष्टीकरण यह था कि यह रुपये उनकी तनखा के है जो वे अपनी पत्नी से छुपा कर दफ़तर में दराज मे रखते है ।भुक्तभोगी बडे साहब ने उनका स्पष्टीकरण मान्य किया था ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरप्राइज इन्सपेक्शन कराना और पी एस सी की परीक्षा मे समानता इस मामले मे है कि कब क्या जानकारी मांगबैठें या कौनसा प्रश्न पूछ लें ।मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा मे रामायण और महाभारत सीरियल के निर्माताओं के नाम पूछे गये वहां तक तो ठीक था ,फ़िल्म शोले मे गब्बरसिंह के पिता का नाम पूछा गया, ऐसे ही इन्सपेक्शन मे हर जानकारी तत्काल उपलब्ध कराने के लिये तैयार रहना होता है ।बडे साहब आते है ,सर्किट हाउस मे विश्राम करते है लंच लेते है और जो भी दर्शनीय स्थल उस क्षेत्र मे हो ,के दर्शन कर सपरिवार वापस लौट जाते है और बाबूसाहबान उनके दर्शन लाभ से बंचित रह जाते है क्योंकि छोटे साहब डाक बंगले पर ही सारी जानकारी दे चुके होते है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो यह तो हुआ सरप्राइज ।इसकी हिन्दी होती है आकस्मिक ,औचक , अचानक । अचानक क्या क्या हो सकता है किसी को पता नही रहता है । अचानक पर से मुझे याद आरहा है कि एक खेल हुआ करता था आंख मिचौनी ।उसमे अचनक कोई पीछे से आकर आंखें अपने हाथो से बन्द कर लेता था ,और जिसकी आंखें बन्द की गई है उसके द्वारा आंखें बन्द करने वाले का सही नाम बतलाने पर ही वह आंख पर से हाथ हटाता था ।पति पत्नी के बीच हर प्रकार का हास परिहास हो सकता है लेकिन यह आंख मिचौनी का खेल पति पत्नी के मध्य वर्जित है ।क्यों है ? यह तो पता नही मगर हो सकता है कि ,इसलिये वर्जित किया गया हो कि मानलो पति ने आकर पीछे से आंखें बन्द की और पत्नी के मुह से कोई और नाम निकल गया तो ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8389038721505868585?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8389038721505868585/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8389038721505868585' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8389038721505868585'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8389038721505868585'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='सरप्राइज इन्स्पेक्शन'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7814309706486529611</id><published>2009-12-17T04:56:00.000-08:00</published><updated>2009-12-17T05:06:30.919-08:00</updated><title type='text'>साहित्यिक चोरी</title><content type='html'>किसी साहित्यिक पत्रिका मे लेख या कहानी भेजना और ब्लाग पर लिखने मे अन्तर सिर्फ़ यह है कि वहां संपादक का दखल रहता है और यहां परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ , न कोई दुरुस्ती करने वाला, न गलतियां निकालने वाला ,न रिजेक्ट कर खेद सहित वापस करने वाला ।अब तो खैर पत्रिका वाले भी रचना वापस नही भेजते है वे या तो छापते है या फाड़ फैंकते है ।रचनाये खेद सहित वापस की जातीं थी तब की बात है एक सम्पादक ने 'एक साहित्यकार की कहानी ,इस टीप के साथ वापस कर दी कि "चूँकि ऐसी रचना पूर्व में मुंशी प्रेमचंद लिख चुके हैं इसलिए वे इसे प्रकाशित नहीं कर सकेंगे -इस बात का उन्हें खेद है ।- वे साहित्यकार अभी तक यह नहीं समझ पाये की सम्पादक के खेद की वजह ==नहीं छाप सकना था =या ==मुंशी जी द्वारा लिखा जाना था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;।चोरियाँ नाना प्रकार की होती है और चोरी के तरीके भी भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं -रुपया पैसा जेवर आदि की चोरी के नए नए तरीके सिनेमा विभिन्न चेनल और सत्यकथाओं ने प्रचारित व प्रसारित कर दिए हैं -चैन चुराना दिल चुराना आदि पर जबसे फिल्मी दुनिया का एकाधिकार हुआ है -आम आदमी इस प्रकार की चोरियों से महरूम हो गया हैएक कवि ने एक कविता लिखी -उन्होंने प्रकाशनार्थ भेजने के पूर्व अपने मित्र को बतलाया -मित्र ने पूछा छप तो जायेगी -कवि बोले =यदि संपादक ने मेघदूत न पढा होगा तो छप जायेगी और अगर मेरे दुर्भाग्य से उन्होंने पढा होगा तो संपादक को बहुत खेद होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;।एक दिन एक मित्र मुझसे पूछने लगे -यार इन संपादकों को कैसे मालूम हो जाता है की रचना चोरी की हुई है क्या जरूरी है की सम्पादक ने कालिदास -कीट्स- शेक्सपीयर प्रेमचन्द- शरत आदि सभी को पढा हो। मैने कहा =जरूरी तो नही है मगर वे लेख देख कर ताड़ जरूर जाते हैं । रचना का लिखा कोई वाक्यांश चतुरसेन के सोना और खून से है या नहीं यह भलेही संपादक न बता पाएं मगर यह जरूर बतला देंगे की यह वाक्यांश इस लेखक का नही हो सकता ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोरी के मुकदमे में चोर के वकील अक्सर यह प्रश्न पूछा करते हैं की इस प्रकार के जेवरात ग्रामीण अंचलों में पहने जाते है इससे यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है की जेवर फरियादी के नहीं वल्कि चोर के है -जेवरात की तरह साहित्यिक विचार एक दूसरे से मेल खा सकते है -बात वही रहती है और अंदाजे बयाँ बदल जाता है -दूसरों के साथ बुरा व्यबहार न करने की बात हजारों साल पहले विदुर जी ने कही अत्म्प्रतिकूलानी ......समाचरेत । फ़िर वही बात अंग्रेज़ी में डू नोट डू ..... अदर्स ।कही गयी । बात वही थी भाषा बदल गयी अंदाजे बयाँ बदल गया । क्या मुज़्तर खैराबादी और बहादुरशाह जफर के खयालात मिलते जुलते नहीं थे ? दोनों के कहे हुए शेर पढ़ कर देख लीजिये। क्या फैज़ अहमद फैज़ और मजरूह सुल्तानपुरी की रचनाओं में समानता नहीं है ? आदमी कन्फ्यूज्ड हो जाता है की ये लिखा किसने है ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आम तौर पर चोर चोर मौसेरे भाई होते है और दिल के चोर आपस में रकीब होते है क्योंकी दिल एक चुराने वाले दो तो दुश्मनी स्वाभाबिक है -ऐसी बात साहित्य के मामले में नहीं है वे न तो आपस में मौसेरे भाई होते है न दुश्मन होते है वे तो आपस में प्रतिद्वंदी होते है -तूने हजार साल पहले की में से चुराया तो में ईसा पूर्व की में से चुराउगा ।और वैसे भी किसी एक किताब की नकल करदी तो वह चोर ग्रन्थ कहलाता है और अगर २५ किताबों मे से दो दो पेज लिये तो वह शोध ग्रन्थ कहलाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अत: जो ग्रन्थ लुप्त हुए जा रहे है तो उनमे से कुछ लेकर हम अपने नाम से लिख कर पाठको पर उपकार ही तो करेंगे क्योकि साहित्य के अथाह भंडार से पाठक प्राय अनजान है और सबसे बड़ी बात कोई रोकने टोकने वाला नही है ।यह किसी पर व्यंग्य नही है ।न मेरा यह उद्देश्य है कि कोई ऐसा लिखता होगा ।लेकिन कभी कभी किसी किसी को बुरा लग जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटैलों के एक सम्मेलन मे एक व्यक्ति ने कह दिया कि पटेल चोर है ।रामपुरा का पटैल उठा और उस व्यक्ति की पिटाई करने लगा _उसने कहा मैने किसी का नाम नही लिया किसी गांव का नाम नही लिया मैने तो केवल यही कहा था कि पटैल चोर है । पटैल ने कहा अच्छा बेटा जैसे कोई जानता ही नही है कि किस गांव का पटैल चोर है ।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इसीलिए कहा गया है ==यदि नहीं कहा गया हो तो अब में कह देता हूँ ==साहित्यिक चोरी चोरी न भवति&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7814309706486529611?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7814309706486529611/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7814309706486529611' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7814309706486529611'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7814309706486529611'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html' title='साहित्यिक चोरी'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-470084317092313199</id><published>2009-12-04T05:13:00.000-08:00</published><updated>2009-12-04T05:16:43.159-08:00</updated><title type='text'>अन्ध विश्वास</title><content type='html'>एक बिटिया मे मुझसे अन्ध-विश्वास पर लिखने को कहा । अपनी बात शुरु करने के पूर्व, मै इस विषय से असमबद्ध, दो बातें कहना चाहूंगा । बात है कब्रिस्तान/श्मशान की, । एक सज्जन की पत्नी का निधन (स्वर्गबास) हो जाने पर उसे दफ़नाया/जलाया जा रहा था ।पति फ़ूट्फ़ूट कर रो रहा था । उसकी हालत देखी नही जा रही थी । किसी ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर कहा -हमे न मालूम था तुम इतना प्रेम करते थे कितना रो रहे हो -रोता हुआ पति चुप हो गया बोला -अजी यह तो कुछ भी नही है आप मुझे उस वक्त देखते जब घर से मैयत उठाई जा रही थी, उसके मुकाबले मे तो, ये कुछ भी नही है ,उस वक्त देखते मुझे, ये तो कुछ भी नही है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात ,एक बाप अपनी म्रत नन्ही बालिका के लिये रोया करता था ।एक दिन बच्ची उसके सपने मे आई बोली हम सब सहेलियों के साथ खेलते हैं वहां परियां भी होती है रात को हम केंडिल लाइट मे स्वादिष्ट खाना खाते है किन्तु आप रोते हो वे आंसू मेरी मोमबत्ती बुझा देते है ,मुझे अंधेरे मे खाना पडता है और सब सहेलियां मुझ पर हंसती है ,मुझे बहुत कष्ट होता है । बाप ने उस दिन से रोना बन्द कर दिया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य कोई विभाजन रेखा खीचना मुश्किल है ,एक का अन्धविश्वास दूसरे का विश्वास हो सकता है क्योंकि यह दुनिया बडी विचित्र है ""किसी की आखिरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी ""की मानिन्द ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मै एक कव्वाली सुन रहा था ""तुम्हे दानिश्ता महफ़िल मे जो देखा हो तो मुजरिम हूं/नजर, आखिर नजर है ,बे इरादा फ़िर गई होगी।""कव्वाल के लिये बे-इरादा सही मगर जिसने उन्हे देखते हुये देखा होगा , उनकी नजर मे तो कव्वाल की नजर बा-इरादा हो सकती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और एक बात, मै लेख लिखूं , कुल मिला कर दस विद्वान पढेंगे और निश्चित ही वे सब अन्धविश्वासी नही होंगे ।मगर ये जो व्यापार बडे पैमाने पर जारी है ,बीमारियां मिटाने , बुरी नजर से बचाने , रोजगार मे सफ़लता दिलाने ,धन सम्पत्ति को घर मे स्थिर करने और भी न जाने क्या क्या करोडों का व्यवसाय, लाखों लोग प्रतिदिन देख, सुन व समझ रहे है और (तथा कथित ) लाभ भी ले रहे है । उसमे मेरा लेख "नक्कार खाने मे तूती की आवाज " नही हो जायेगा ? ये नक्कारखाना क्या ?तबला तो आप सब ने देखा है उसी का बडा भाई होता होगा नगाडा, उसे ही नक्कार कहते होगे और तूती बिल्कुल छोटी सी बांसुरी से भी छोटी होती होगी । खैर ।मै एक बार पहले भी निवेदन कर चुका हूं कि धन वर्षा करने वाले यंत्र ,मैने बहुत अध्ययन किया है , असर कारक होते है ,हन्ड्रेड परसेन्ट ये आपके घर धन की वर्षा कर सकते है बशर्ते कि आप इन्हे बना कर बेचें ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओशो से किसी ने पूछा बिल्ली रास्ता काटे तो क्या समझना चाहिये । बोले-यही समझना चाहिये कि बिल्ली कहीं जा रही है ।बात खत्म ।अन्धविश्वास कोई नया नही है बहुत गहरी जडे हैं इसकी । बिल्ली, सर्प, नेवला, अंग का फ़रकना , छिपकली का ऊपर गिरना, कौआ का सिर पर बैठ जाना ,घोडे की नाल की अंगूठी ,नीबू मिर्च घर के दरवाजे पर टांगना (बोले इसमे अपना नुक्सान क्या है ),और भी न जाने क्या क्या । जिसमे सर्प को लेकर तो खूब दोहन किया फ़िल्मों ने । नाग एक जाति होती है ,उस जाति मे राजा भी हुए है "नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ।सर्प को नाग भी कहा जाता है तो इस सर्प को उस नाग जाति से जोड दिया ।जैसे नामो के आगे "सिंह " लगता है सिंह शेर को भी कहते है ।पुराने लोगों को मालूम होगा आजकल तौल का माप किलो होता है वैसे ही पहले सेर होता था , पहले क्विंटल नही मन होता था तो लोग कहा करते थे चालीस सेर का एक मन होता है , मन बडा चंचल है,चंचल मधुवाला की बहिन है, मधुवाला को दिल का दौरा पडा था ,दिल एक मंदिर है ,मंदिर हरिद्वार मे बहुत हैं ,हरिद्वार मे संगम है ,संगम मे राजकपूर है ,राज हिन्दी मे शपथ लेने मना करते है आदि इत्यादि । देखो कहां से कहां पहुंच गये ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां तो अन्धविश्वास- जो बीमारियों को दैवीय प्रकोप समझते थे अब धीरे धीरे दूर होता जारहा है ,सर्प के बारे मे भी भ्रांतियां नही के बराबर है ,बिल्ली वगैरा को आजकल कोई मानता नही । कुछ दिन पहले मैने पढा एक पुराने नीम के पेड मे से दूध गिररहा है ,लोग इकट्ठा हो गये मेला लग गया किसी जन्मांध की आंख अच्छी हो गई ,किसी ने गले पर लगा लिया तो उसका केंसर अच्छा हो गया,कमाल है ।एक दिन वे कहने लगे साह्ब बडा चमत्कार है इधर से मरीज को खटिया पर डाल कर ले गये थे उन्होंने जल छिड्का ,उधर से मरीज दौडता हुआ आया ,मेला लग रहा है चमत्कार हो रहा है तुम भी चलो । अब मै उनसे कैसे कहूं कि मैने तो ऐसे-ऐसे चमत्कार सुने है कि "" कल तलक सुनते थे वो विस्तर पे हिल सकते नही/आज ये सुनने मे आया है कि वो तो चल दिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक व्यक्ति श्रद्धा और विश्व्वास से एक ग्रंथ पढता है दूसरे के लिये वही अंध विश्वास हो सकता है ।स्वर्ग नर्क को अन्ध विश्वास कहने वालो के बुजुर्ग आज भी स्वर्गबासी या स्वर्गीय हैं ।किसने देखा, किसकी मानें, किसकी नही ""उतते कोउ न आवही जासे पूछूं धाय /इतते सबही जात हैं भार लदाय लदाय ""&lt;br /&gt;अदालत मे गवाह पेश होते है वे तीन तरह के होते है एक पूर्ण विश्वसनीय , दूसरे पूर्ण अविश्वसनीय और तीसरे वे जो न पूरी तरह से विश्वसनीय है न अविश्वसनीय है ,ये बडे तकलीफ़देह होते है इनकी बातो से सच निकालना वैसा ही है जैसे भूसे के ढेर से दाने चुनना ।विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य भी कुछ ऐसी ही स्थिति है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-470084317092313199?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/470084317092313199/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=470084317092313199' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/470084317092313199'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/470084317092313199'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='अन्ध विश्वास'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-184624936654610743</id><published>2009-11-21T21:54:00.000-08:00</published><updated>2009-11-21T21:56:32.070-08:00</updated><title type='text'>मेरा तो हो ही जाये -पुनर्जन्म</title><content type='html'>किसी का होता हो या न होता हो मेरा तो हो ही जाये पुनर्जन्म । मजा आता है ।कभी ऊंट बने किसी पहाड के नीचे खडे है ,कभी बैल बने फिर रहे हैं न लाज न शर्म ।बीच सडक पर बैठे है कार वाला हार्न बजा रहा है नहीं हट रहे ।कभी गधा बन गये बीच चौराहे पर पंचम स्वर मे ढेचू ढेचू कर रहे है और कभी कुत्ता ,+ वैसे भी कर तो यही सब कुछ रहे हैं मगर फ़िर और आजादी रहेगी । इसलिये मेरा तो हो ही जाये ।&lt;br /&gt;ऊंट का तो ये है कि इसके द्वारा पेडों को ठूंठ करना निश्चित है और इसका किसी करवट बैठ्ना अनिश्चित है ।&lt;br /&gt;बैलों का हमारे इधर हाट भरता है लोग उसे मेला भी कहते है ,मोटर सायकल और जीप (जनरल परपज व्हीकल, जीपीव्ही से अब केवल जीप रह गया है ) के प्रचलन से पूर्व घोडों का बाजार लगता था ,शाम को व्यापारी हिसाब लगाते थे किसको कितना प्रोफ़िट हुआ ।एक व्यक्ति घोडा बेचने लाया ऊंचा पूरा ,हवा से बातें करने वाला (यह मुहावरा है ,हमारे यहां मुहावरे बहुत होते हैं ,सभी भाषा में होते होंगे ) सबके घोडे बिकगये उसके पास कोई ग्राहक न आया यह सोच कर कि ,बहुत महगा होगा न जाने क्या कीमत मांगेगा? शाम को एक ग्राहक आया ,कीमत पूछी ,बोला ट्रायल ले लूं -ले लो ,उसने घोडा इधर उधर घुमाया ,एड लगाई और नौ दो ग्यारह ।(यह एक गणितीय मुहावरा है ,गणित मे मुहावरे बहुत है , तीन पांच करना,निन्यानवे का फ़ेर , चौरासी की चक्कर ,छ्त्तीस का आंकडा ,वैसे तो गाने भी बने है एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन , एक दो तीन चार भैया बनो होशियार ,एक ने गिनती शुरु की तो वह तो गिनती ही चली गई वो तो बीच मे "तेरा करुं दिन गिन गिन के इन्तजार आजा ..शब्द आगया नही तो चार पांच सौ पर जा कर रुकती ) खैर ,बेचारा घोडे का व्यापारी देखता रह गया ।रात को सब हिसाब लगाने लगे किसको कितना मुनाफ़ा हुआ । इससे पूछा तो ये बोला भैया मैने तो नो प्रोफ़िट नो लौस में दे दिया ।&lt;br /&gt;गधा केवल इस लिये गधा होता है क्योंकि वह गलत धारणा (ग....धा....) रखता है सब रखते हैं मै भी रखता हूं । एक दिन शाम को हमें(बहुबचन) बाजार जाना था ,मैने कहा तुम आगे चलो मैं ताला लगा कर आता हूं ,बोलीं नही मै तो तुम्हारे पीछे ही चलूंगी और गाने लगी "तुम्हारे सग मै भी चलूंगी पिया जैसे पतंग पीछे डोर""मैने कहा तुम लोग आगे बढ्ना क्यों नही चाह्ते ,कहा देखिये गधा कितनी ही लातें मारे धोबी उसके पीछे ही चलता है ।यह बात भी सही है कि मेरे यहां कपडे धोने वाला पांच छै दिन से नही आरहा था ।&lt;br /&gt;कुत्ते के वाबत सुना है इसे स्वर्ग मे प्रवेश नही करने देते ,कही कही हवाईजहाज और कही होटल मे भी मुमानियत है ।एक कुत्ते को हवाई जहाज मे एड्मीशन नही दिया तो सुना है उसकी मालिकिन अभिनेत्री ने भी यात्रा निरस्त करदी ठीक उसी तरह जैसे धर्म्रराज युधिष्टिर ने स्वर्ग जाने से इन्कार कर दिया था ।मगर मैनेजर के मना करने के बाद भी एक अभिनेत्री नही मानी और कुत्ते को होटल मे ले ही गई ।क्या नाम था उस अभिनेत्री का ,शायद जीनत अमान या कोई और ,खैर लावारिस फ़िल्म की बात है अब कुत्ता, हरीमिर्च और अमिताभ बच्चन ।क्या उत्पात मचाया है कुत्ते ने कि कुछ न पूछों ।वैसे भी आप कहां कुछ पूछ रहे है ।पूरे होट्ल को तहस नहस कर डाला ।साखाम्रग की यह अधिकाई, साखा ते साखा पर जाई की तरह इस टेविल से उस पर और उससे इस पर ।यूं की.....मजा आ गया जिन्दगी का । इसलिये मेरा तो हो ही जाये ।&lt;br /&gt;बहुत पहले मैने टीवी पर देखा ,एक लड्की अपने आप को पिछले जन्म की नागिन बतला रही थी और एक युवक के वाबत कह रही थी कि यह मेरा नाग है हम नाग नागिन का जोडा रहता था तो एक नेवले ने हमको मार दिया था मजेदार बात ये कि वह नागिन लडकी ,उस युवक की पत्नी को नेवला बतला रही थी ,भाइ कमाल है और एक बात -&lt;br /&gt;यह भी टीवी पर ही देखा ,एक लड्की के वाबत (यह दूसरा किस्सा है ) बतलाया जा रहा था कि यह पिछले जन्म मे नागिन थी क्योकि इसके आगे बीन बजाओ तो वह मारने दौड्ती है ।यार आप आफ़िस जाने घर से निकलें और कोई आपके आगे बीन बजाने लगे कैमरा मैन फ़ोटो खीचने लगे और अगर आप उसे मारने हाथ उठाओ तो वे कहें देखिये, गौर से देखिये, नाग फ़न फ़ैला रहा है ,अच्छा भला आदमी पागल हो जाये दस दस बीन बाले ,दस दस कैमरा मेन,बच्चों की भीड ,वो बच्ची मारने नही दौडेगी तो क्या लड्डू बांटेगी ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-184624936654610743?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/184624936654610743/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=184624936654610743' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/184624936654610743'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/184624936654610743'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='मेरा तो हो ही जाये -पुनर्जन्म'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7132955654037177711</id><published>2009-10-30T04:34:00.000-07:00</published><updated>2009-10-30T04:37:28.413-07:00</updated><title type='text'>डाक्टर न बने तो क्या हुआ</title><content type='html'>प्रेम-पत्र के पश्चात मैने कुछ लिखा नही ,लिखना सम्भव भी नही होता - इसके पश्चात तो सुनना और भुगतना ही होता है ,मगर मेरी तो तबीयत खराब हो गई थी ।मैने अपने एक परिचित से पूछा यार कोई अच्छा सा चिकित्सक तुम्हारी नजर मे हो तो बताओ -वे तपाक से बोले फलां डाक्टर को बताओ ,फिर अपने हाथ का अंगूठा और तर्जनी के पोरों को मिलाते हुये बोले ,ए-वन ! मेरा तो उन्ही का इलाज चल रहा है , तीन साल से , जुकाम का ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डाक्टर बनना बहुत ही कठिन है ,प्री फिर पांच साल - फिर प्री -फिर पीजी और डाक्टर बनना बहुत ही सरल है फीस भेजो ,पत्राचार से घर बैठे डाक्टर बन जाओ ।मेरा न जाने कहां से इन्हे पोस्टल पता मालूम हो गया ।दोसाल तक लगातार पत्र व फार्म आते रहे कि घर बैठे काहे के डाक्टर बनना चाह्ते हो तमाम तरह की पैथी के नाम लिखे थे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एलोपैथी मे परेशानी ये कि गेल्युसल कहूं या जेल्युसल ,जेरीफोर्ट कहूं या गेरीफोर्ट ,आयुर्वेदिक दबाओं के वारे में तो शरद जोशी जी ने कहा ही था कि इनके नाम ऐसे है जैसे कोई कन्या स्कूल का हाजिरी रजिस्टर हो -बसन्तकुसमाकर ,स्वर्णमालिनी,अश्वकंचुकी और यूनानी के नाम बाप रे ""खमीरागावजवांअम्बरीजबाहिरवालाखास" एक दबा का नाम लिखो तब तक सरकारी डाक्टर तीन मरीज निबटा चुके ( निबटा चुके ,मतलब तीन पेशेन्ट के प्रिस्क्रिप्शन लिख चुके ,क्या करें, एक एक वाक्य के कई कई तो अर्थ होते है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो गरज ये कि दो साल तक मेरे पास पत्र आते रहे, अन्त में उन्होने सोचा कि किस बेवकूफ से पाला पड गया ।&lt;br /&gt;अकबर बीरबल के किस्से मशहूर है ,मेरे पास एक किताब है ""अकबर बीरबल विनोद "" लगता है इन्हे कोई काम ही नहीं था अकबर बेतुके सवाल करते और बीरबल बातुके जवाब देते।एक मर्तवा बीरबल के पिता आये ,बीरबल उन्हे महल ले गये ,अकबर के बेतुके सवाल शुरु हो गये -तुम्हारे गावं मे कितने कौए हैं,आसमान मे कितने तारे हैं ,प्रथ्वी का बीचोंबीच कहां है , पिताजी चुप ,बार-बार प्रश्न, मगर कोई रिस्पांस नही,’अकबर झुंझला गये ,किस मूर्ख से पाला पड गया ।बीरबल को बुलाया पूछा क्यों बीरबल किसी मूर्ख से पाला पड जाये तो क्या करना चाहिये बीरबल ने कहा हुजूर वो ही करना चाहिये जो मेरे पिताजी कर रहे हैं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो उन्होने ने भी सोचा किस मूर्ख से पाला पड गया यह लाइफ मे कभी डाक्टर नही बन सकता और वही हुआ भी मै फिर कभी डाक्टर नही बन पाया और आज भी बेडाक्टर हूं&lt;br /&gt;वो तो मैं बन जाता अगर पैसे होते ।उन्होने तो कहा था कि १० हजार मे सिनाप्सिस और ५० हजार मे थीसिस लिखूंगा ,वाकी किसके घर नियमित सब्जी पहुंचा कर हाजिरी देना है व किसको थ्रीस्टार में ठ्हराकर एक बार पार्टी व गिफ्ट देना है यह तुम जानो ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानद उपाधि तो मुझे मिलने ही क्यों लगी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गरज ये कि मैं डाक्टर नही बन पाया मगर इतना जरूर है मैं अपने गले मे स्टैथ्स्कोप लट्का सकता हूं क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं है जो मुझे मना कर सके । मोटर सायकल पर सवार हो कर कोई हैलमेट न पहने तो उसका चालान हो सकता है किन्तु कोई सायकल पर सवार हो कर हैलमेट पहने तो उसका चालान कैसे होगा ! कानून की भी बडी विचित्र माया है । अपनी भारतीय दण्ड संहिता को ही लो ,एक अपराध ,यदि उसको करने की कोशिश की ,प्रयास किया तो गिरफ़्तार ,चालान भी और सजा भी , किन्तु यदि उस अपराध को घटित कर दिया तो पुलिस का आई जी भी गिरफ़तार नहीं कर सकता सजा का तो प्रश्न ही नहीं । मतलब अपराध के प्रयास _कोशिश मे सजा और अपराध करदो तो कोई सजा नही ।कुल मिलाकर नतीजा यह कि मैं स्टेथस्कोप पहन सकता हूं ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7132955654037177711?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7132955654037177711/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7132955654037177711' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7132955654037177711'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7132955654037177711'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='डाक्टर न बने तो क्या हुआ'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7299906355833404737</id><published>2009-09-27T02:04:00.000-07:00</published><updated>2009-09-27T02:07:32.432-07:00</updated><title type='text'>प्रेम-पत्र</title><content type='html'>एस एम् एस और ई मेल युग के पूर्व का समय प्रेम-पत्र का स्वर्णकाल कहलाता है बड़ा क्रेज़ था प्रेम-पत्र का ,बड़े चाव से लिखे-पढ़े जाते थे सिनेमा ने भी इनका खूब उपयोग व उपभोग किया है  फूल तुम्हे भेजा है ख़त में,, तो मुगले आज़म में सलीम ने फूल में ही पत्र रख कर नेहर के माध्यम से भेजा  राजकुमार ने तो पाकीजा में केवल इतना भर लिखा था,, की आपके पाँव देखे ......जमीन पर मत उतारियेगा ,,मगर पाकीजा जी ने तो उस पत्र को चांदी की डिबिया में ही रख लिया । रखते हैं साहब बड़े सम्हाल कर रखते हैं ,जीवन पर्यन्त रखते हैं ,तभी तो मरने की बाद ""चन्द फोटो और चन्द हसीनों के खतूत " निकलते हैं  देखिये =ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर कि तुम नाराज़ न होना , क्यों भैयाजी क्यों नहीं होंगे नाराज़ जब तू अनर्गल कुछ तो भी लिखेगा लड़किया -लड़के पत्र लिखते थे तो ,,लिखते थे, चला जा रे लेटर कबूतर की चाल ,क्यों भैया कबूतर से ज्यादा तेज़ चाल वाला और कोई पक्षी नज़र नहीं आया ,उस पर तुर्रा ये की पत्र के अंत में लिखा जाता था ""खत लिख रहा हूँ या लिख रही हूँ जो भी स्थिति रही हो खैर , तो खत लिख रही हूँ खून से स्याही न समझना अरे तू जब नीले पेन से लिख रही है तो कैसे न समझना ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात और उस ज़माने में प्रेम-पत्र कैसे लिखें नामक किताब भी उपलब्ध थी , ठीक हारमोनियम शिक्षा ,तबला गाईड ।बांसुरी शिक्षा ,सावरी मन्त्र ,सेवडे का जादू की तरह  एक श्रीमानजी के पास वह किताब थी । उसमे से छांट कर एक प्रेम पत्र लिख कर भेजा गया ,बड़ी उम्मीद थी उत्तर की उत्तर तो आया मगर छोटी सी स्लिप के रूप में, लिखा था "उत्तर के लिए कृपया पेज ९८ के पत्र क्रमांक १२२ का अवलोकन करने का कष्ट करें" ।शिक्षा का भी अभाव था तो प्रेमिकाएं या पत्नियाँ पोस्ट मेन से ही पत्र लिखवा लिया करती थी ""ख़त लिखदे संवरिया के नाम बाबू कोरे कागद पे लिखदे सलाम आदि इत्यादि॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे छोटे बच्चे ,प्यारे प्यारे बच्चे, दुलारे बच्चे, कापियों और किताबों में पत्र रख कर आपस में आदान प्रदान किया करते थे "" नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?"" बोले चिट्ठी है फलां ने दी है फलां के पास पहुँचाना है ।ऐसी बात भी नहीं कि ख़त चोरी छिपे ही भेजे जाते हों ,कुछ बच्चियां ख़त ऐलानियाँ भेज कर गाती भी थी ""हमने सनम को ख़त लिखा ,ख़त में लिखा ......." और खत मे क्या लिखा है वे न भी बतलाना चाहे तो भी "खत का मन्जमू भाप लेते है लिफ़ाफ़ा देख कर "" फिर इन्क्वारी भी होती है "" तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था ?"" जवाब देना मुश्किल हो जाता है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस ज़माने मे एक बात जरूर मह्सूस की गयी कि यदि किसी से प्रेम हो जाये तो उसे अनेतिक सम्बन्ध या नाज़ायज सम्बन्ध कहा जाता था किन्तु प्रेम पत्र को किसी ने अनैतिक प्रेम पत्र या नाज़ायज प्रेम् पत्र कहा हो ऐसा मुझे ध्यान नही है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सुना है&lt;br /&gt;एक बिलकुल सत्य घटना ,कल्पना नहीं ,फ़साना नहीं ,हकीकत उस स्वर्णकाल की बात है ,श्रीमानजी को मोहल्ले की किसी से इकतरफा इश्क हो गया  हो जाता है साहिब, एकतरफा डिक्री की तरह ,मालूम तब होता है जब कोर्ट से कुर्की वारंट आजाता है ,तो श्रीमान जी ने प्रेम पत्र लिखे ,कागज़ नहीं मिला तो बच्चों की पुरानी कापी किताबे रखी थी उनमे ही लिख डाला ,भेजने की हिम्मत हुई नहीं --अब क्या हुआ कि बच्चों ने रद्दी मोहल्ले के हलबाई को बेचदीं ,अब इत्तेफाक देखिये उन महिला ने समोसे मंगवाए तो वह कागज़ समोसे में लिपटा उनके पास पहुँच गया ।कुछ लोगों की आदत होती है कि मिठाई या नमकीन जिस कागज़ में या अखवार में आया है उसको पढने लगते हैं ऐसे आदत क्यों होती है यह तो पता नहीं मगर होती है ,किसी फिल्म में नसरुद्दीनशाह को भी ऐसे ही पढ़ते दिखलाया गया है शायद उस फिल्म का नाम है जाने भी दो यारो  खैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिये जनाब क्या हंगामा वरपा है ,जितना कि उस वक्त भी न बरपा होगा जब थोड़ी सी पी ली है ,उससे भी ज्यादा 'कि सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं "" और ’हंगामा’ फिल्म से भी ज्यादा &lt;br /&gt;अब जो श्रीमान जी की ठुकाई पिटाई उस महिला और श्रीमान जी की श्रीमती जी द्वारा की गई तो यूं समझो के मज़ा आगया जिंदगी का  तब मैंने नेक सलाह लोगों को दी थी कि अव्वल तो शादी शुदा होते हुए किसी से प्रेम न करे और अगर करे भी तो मोहल्ले की किसी महिला से न करे और अगर करे तो उसे पत्र न लिखे और अगर पत्र भी लिखे तो बच्चो की कापियो मे न लिखे और अगर लिखे भी तो उसे रद्दी वाले को न बेचे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7299906355833404737?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7299906355833404737/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7299906355833404737' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7299906355833404737'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7299906355833404737'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/09/blog-post_27.html' title='प्रेम-पत्र'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-4733968614645133544</id><published>2009-09-22T09:40:00.000-07:00</published><updated>2009-09-22T09:42:47.990-07:00</updated><title type='text'>क्या  मैंने  गलत  कहा ?</title><content type='html'>कभी कभी सोचता हूँ मुझे नहीं कहना चाहिए था , फिर विचार आता है कि कह दिया तो कह दिया , उस वक्त परिस्थिति ही कुछ ऐसी थी ,आगया कहने में , फिर सोचता हूँ , ऐसा न हो कि उनकी भविष्य की जिन्दगी बर्वाद होजाय , फिर सोचता हूँ , हो जाये तो हो जाये वैसे कौनसी आबाद है यद्यपि कह कर मैंने अपनी मानसिक उलझनें बढा ली हैं =दर-असल बात यह थी कि =&lt;br /&gt;एक युवती ( पत्नी ) आयु लगभग ३५ -३६ ,जमीन पर अधलेटी अवस्था में , पति के क्रोधी स्वाभाव से परिचित , रो - रो कर कह रही थी आज मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगी तुम मुझे मार डालोगे  स्थान पत्नी का मायका , पति एक हाथ से पत्नी के बाल पकडे हुए दूसरे , हाथ से कभी गला दबाता ,कभी चेहरा दबाता और कभी थप्पड़ मारता ,पत्नी गिडगिडा रही थी , तुम रोज़ मुझे कमरे में बंद करके मारते हो ,मैंने मायके में अभी तक नहीं बताया, आज तुम मुझे यही मार रहे हो ,एक दो दिन बाद चली चलूंगी ,आज तुम बहुत गुस्से में हो , चली तो तुम रस्ते में ही मार कर फैंक दोगे&lt;br /&gt;लोकलाज भी क्या चीज है ,बुढिया माँ और बूढा बाप चुप-चाप हैं ,यह और कोशिश कर रहे हैं कि बाहर मोहल्ले का कोई सुन न ले  खैर&lt;br /&gt;तो मैंने उससे कहा&lt;br /&gt;तुझे मार डालेगा !अरे तू जिन्दा ही कब है जो तुझे मार डालेगा मुर्दों को नहीं मारा जाता मगर तू तो फिल्म क्रांतिबीर के नाना पाटेकर की डायलोग बनी हुई है ""भगवान् ने हाथ दिए लगे फैलाने ,मुह दिया लगे गिडगिडाने "" क्या तुम्हे तंदूर में फिकने ,मार खाने , रसोई गेस दुर्घटना में मरने हेतु हाथ ,पाँव ,नाखून ,दांत देकर भेजा गया है&lt;br /&gt;तू कहती है तुझे कमरे में दरवाज़ा बंद करके मारता है  दीवार फिल्म नहीं देखी क्या ? एक बार तू बनजा अमिताभ ,दरवाज़ा बंद कर ,सांकल चडा , ताला लगा और चाभी फैंक कर कह ""पीटर ले ये चाभी , तेरी जेब में रखले ,अब मैं तेरी जेब से चाभी निकाल कर ही ताला खोलूंगी &lt;br /&gt;अरी शोषित उपेक्षित ,, तुझसे तो ’चालबाज ’' की श्रीदेवी अच्छी  ,मालूम है उसने अनुपमखैर से क्या कहा था " ले त्रिभुवन ये चूडी पहनले ,कल तक तेरे हाथ में चाबुक था और मेरे हाथ में चूडियाँ  आज मेरे हाथ में चाबुक है , ले पहिन चूडियाँ&lt;br /&gt;फिर ये तो देख तुझे मार कौन रहा है ? तुझ पर हाथ कौन उठा रहा है ? मालूम है ‘आन ‘ में शत्रुघ्नसिन्हा ने जैकी श्राफ से क्या कहा था ?" सुन बालिया औरत पर हाथ उठाना नामर्द की पहली निशानी है" देखले जीना है तो जी , वरना रोज रोज मरने से एक दिन मर ही जा  मगर ऐसे मरना की कम से कम चार महिलाओं को जीने का मार्ग बतला जाना&lt;br /&gt;मैंने सुना है&lt;br /&gt;श्रीमानजी की शादी हुई पहले ही दिन यानी पहली ही रात जैसे ही नवबधु ने घूंघट उठाया ,गाल पर एक जोरदार थप्पड़ ,बधू रुआंसी होकर बोली ""कईं अन्नदाता की भयो ,म्हार से कुणसी गलती हो गई ""बोले -यह तो बिना कोई गलती किये का है ,गलती की तो फिर समझ लेना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात मेरी समझ में नहीं आती कि कहते है चींटी भी दब जाने पर काट लेती है ,लेकिन ये विशिष्ठ ऐतिहासिक परंपरा न जाने कब से चली आ रही है अब इस ऐतिहासिक बर्बरता और हिंसा के लिए किसे दोष दिया जाय वैसे तो हम कहते फिरते हैं दूसरों के साथ वह व्यबहार न करो जो अपने लिए पसंद न हो बिदुर जी ने भी कहा ""आत्म प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत "" बाइबिल में कहा गया ""डू नोट डू अन्टू अदर्स ""सिकंदर ने पुरु से राजाओ जैसा व्यव्हार किया  आज भी एक मंत्री पूर्व मंत्री से राजाओ जैसा व्यव्हार करता है किन्तु स्त्री ! वह तो अपनी है , दूसरों के साथ अच्छा व्यव्हार करने की बात कही गई है&lt;br /&gt;ये माना की कई लोग ऐसे भी होते है वे किसी से ही सद्व्यवहार नहीं करते है  पत्नी बेटा पडौसी कोई भी हो&lt;br /&gt;मैंने सुना है&lt;br /&gt;एक श्रीमानजी एक दिन प्रात :काल बरामदे में बैठे किसी किताब में तल्लीन थे ,उनके परिचित निकले पूछा कहिये किव्ला क्या हो रहा है ?तल्लीनता में व्यवधान !क्रोध आगया आजाता है ,शंकरजी को भी कामदेव के ऊपर आगया था ,राम ने भी "अस कही रघुपति चाप चडावा "" तो इनको भी आगया , बोले तेरा सर हो रहा है, दिखाई नहीं देता किताब पढ़ रहा हूँ कौन सी किताब पढ़ रहे हो ? एक तो व्यवधान ऊपर से जिरह यानी कूट परीक्षण यानी क्रोस एक्जामिनेशन बोले तू नहीं समझेगा यार तू जा  फिर भी हुज़ूर ? क्रोध की सीमा पार ""व्यवहार शास्त्र " पढ़ रहा हूँ तेरे बाप ने भी इस किताब का नाम सुना है ?&lt;br /&gt;मेरा आशय केवल मात्र इतना है की कभी कभी मुंह लगने पर भी आदमी का क्रोध बढ़ जाता है और वह अपना आपा खो देता है  लेकिन हमेशा ही तनाव में या क्रोधित रहना कि पत्नी घर में अशांति और बैचेनी महसूस करे ,एक अज्ञात भय और असुरक्षा की भावना उसमे रहे ऐसा तो नहीं होना चाहिए इसीलिये मैंने उपरोक्त बात कह दी थी ,वरना मेरा आशय घरों में अशांति फैलाने का नहीं था&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-4733968614645133544?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/4733968614645133544/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=4733968614645133544' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4733968614645133544'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4733968614645133544'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/09/blog-post_22.html' title='क्या  मैंने  गलत  कहा ?'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7298406152793097397</id><published>2009-09-20T09:30:00.000-07:00</published><updated>2009-09-20T09:35:26.326-07:00</updated><title type='text'>कृपया मार्गदर्शन करें</title><content type='html'>मेरे साथ बड़ी दिक्कत होगई ,मैं कम्प्यूटर में कुछ जानता नहीं और इन्टरनेट की साइड खुलना बंद हो गई ,कम्प्यूटर इन्टरनेट कनेक्ट बतलाता था - मैं जहाँ इस वक्त हूँ वहां कोई जानकार भी नहीं है झालावाड राजस्थान जिले की छोटी सी तहसील पिरावा , केवल एक दुकान ,तो मैंने उन्हें जाकर प्रॉब्लम बतलाई ,बोले ठीक कर दूंगा ,वे आये और डब्बा (सी पी यूं ) उठाकर ले गए ,दूसरे दिन वापस  इन्टरनेट भी कनेक्ट और साइड भी खुलने लगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे चतुर सुजान बोले ,मैंने फोर्मेट कर दिया है ,मुझे क्या पता ये क्या होता है  मैंने सोचा अब कोई लेख लिख डालें पहले मैंने गुलाम अली साहिब की ग़ज़ल सुनना चाही जो मेरे कंप्यूटर में थी ,जैसे ही ग़ज़ल सुनना चाही मीडिया प्लेयर पर सन्देश आया……not be a sound device installed or it may not bhee  functioning properly मैंने सोचा मत सुनो ,कुछ लिखें , गूगल का ट्रांसलेशन खोल कर कुछ लिखा और जैसे ही मैं अपने डाक्यूमेंट पर लेगया तो वहां हर शब्द की जगह  चोकोर डब्बे जैसे कुछ बन गए कुछ इस तरह के ()()()()()()( गोल नहीं बल्कि चौकोर )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब इतनी क्षमता तो है नहीं कि डायरेक्ट ब्लॉग पर लिखदूं ,पहले तो डाक्यूमेंट पर सेव कर दुरुस्ती करता था  फिर सोचा लेख न सही टिप्पणी ही सही ,कुछ ब्लॉग खोले तो ब्लॉग तो खुले लेकिन लेख या रचना की जगह वही ०००००००००० अब क्या तो पढू और क्या टिप्पणी करूं ,भाई मेरे कंप्यूटर का फॉण्ट उन चतुर सुजान ने फोर्मेट करके गायब कर दिया तो ,तो क्या हुआ दूसरे के कंप्यूटर में तो होगा ,डायरेक्ट टिप्पणी लिख दूंगा मगर नहीं  तो मुझे एक किस्सा याद आगया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पटेल थे अंधे ,पास के गाव में समधी के यहाँ गए ,बातें करते खाना खाते अँधेरा हो गया , पटेल ने कहा अब चलें , समधी ने कहा लालटेन ले जाओ पटेल  पटेल ने कहा क्यों मजाक उडाते हो ,हमें लालटेन से क्या मतलब है ,समधी ने कहा ये बात नहीं अँधेरे में तुमसे कोई टकरा न जाये इसलिए  खैर पटेल लालटेन लेकर चल पड़े ,लेकिन वही हुआ ,"रास्ते में उनसे मुलाकात हुई , जिससे डरते थे वही बात हुई "" एक सज्जन रस्ते में पटेल से टकरा गए  पटेल ने कहा भैया हम तो जानमान अंधे हैं पर तुमऊ का अंधे हौ जो हमनते टकरा रहे हौ - बोले दादा माफ़ करियो अँधेरे में कछू सूझो नाय  पटेल ने कहा जई वास्ते तो हम लालटेन लै कै आए हते , सज्जन ने कहा तौ दादा लालटेन जला तो लेते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर सा'ब, वे चतुर सुजान तो एक दिन एक सी डी लेकर आये और ७०-८० फॉण्ट डाल गए मगर मेरी समस्या बरक़रार है  मैं साहित्य पढने से वंचित हो रहा हूँ साथ ही टिप्पणी करने से भी ,कृपया कोई सरल सी तरकीब बतलादें ,ताकि में ब्लॉग पढ़ सकूं  एक बात और किसी किसी ब्लॉग में यह दिक्कत नहीं भी आरही किन्तु ज्यादातर ब्लॉग पढने में आरही है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7298406152793097397?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7298406152793097397/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7298406152793097397' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7298406152793097397'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7298406152793097397'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/09/blog-post_20.html' title='कृपया मार्गदर्शन करें'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1352924951098935785</id><published>2009-09-13T04:52:00.000-07:00</published><updated>2009-09-13T05:17:25.409-07:00</updated><title type='text'>पापा कहते हैं</title><content type='html'>&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;पापा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;कहते&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;हैं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;बड़ा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;नाम&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;करेगा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;एक&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;ने&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;गाया&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;तो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;दूसरा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;गाने&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;लगा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;डैडी&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;मेरा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;बड़ा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;परेशान&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;बेटा&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;बड़ा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;होकर&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;नाम&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;करे&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;कहीं&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal"&gt;इसीलिये&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;  पिता  की सम्बेदना  या भावना  ,इच्छा  ,विचार  ,चिंता  इस मायने  में कि- चाहे  वह  स्वम  बाबू  या मास्टर  हो  लेकिन लड़के  को कलेक्टर  बनाने  की सोचता  है ,चपरासी  है मगर लडकी  के लिए इंजिनियर  बर  ढूंढ़ना  चाहता है , लड़के  द्वारा की गई  बदतमीजियों  पर दूसरों  से माफी  मांगता  रहता  है  और लडकी  के ससुर  और लडकी  के पति  के चरणों  में झुक  कर बार बार गलतियों  की क्षमा  प्रार्थना  करता रहता  है लडकी  की शादी  में अपनी सारी  जमा  पूंजी  निकाल  लेता  है और लड़के  की अच्छी  नौकरी  के लिए अपना मकान  बेच  कर किराये के मकान  में रहने  लगता है {{यहाँ अच्छी  नौकरी  के लिए मकान  बेचना  इससे  मेरा तात्पर्य  यह कदापि  नहीं है कि रिश्वत  देना  होती  है वो  तो क्या है, की कुछ लोग ऐसा धंधा  ही करते है ,बेवकूफ  बना  कर पैसे  लेलेते  है इस शर्त  पर की सेलेक्ट  नहीं हुआ तो पैसे  वापस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि  सिलेक्शन  म्हणत  ,योग्यता  अथवा  इत्तेफाकन  हो जाता है तो उसके पैसे  रख  लेते  है वाकी  न होने वालों  के पैसे ईमानदारी  से वापस  कर देते है ,हां  कुछ म्हणताना  जरूर  खा  लेते  है और वापस  पाने  वाले को थोडा नुक्सान   अखरता  भी नहीं है क्योंकि कहावत  है " सब धन  जातो  देख के आधो  लीजे  बाँट " और भागते भूत की ........."  और फिर ये पैसे  बहुत अवधि  बाद किश्तों  में पटाते  है क्योंकि अलग अलग फिक्स  डिपॉजिट  कर देते है व्याज  ये खा जाते हैं ,मूल  में से कुछ काट  कर पक्षकार   को वापस  कर देते है पक्षकार  कोई कोर्ट कचहरी  में ही नहीं होते ,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो आने वाली  भोर  से डर कर रातें  जाग  जाग  कर काटे वह पिता , ,,,,,,,,,पापा , से डेड  हुआ  डैडी धरती पर परेशान होने के लिए ही अवातारित&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt"&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;होता है  बच्चों  की सम्बेदन-शीलता  इस मायने  में कि उपलब्ध कम मालूम पड़ता हो तो उसकी वजह है डैडी ,दूसरों के पास हम से अधिक सुख सुविधाएँ हैं तो उसका कारण हैं पापा , बेटा कहा रहा था पापा यदि आपने जिन्दगी में किसी नेता की चमचागिरी ही की होती तो आज हमें यूं बेरोजगारी का मुहं नहीं देखना पड़ता   आपने हमें महंगे स्कूल में नहीं पढाया , अरे अपने सस्ते ज़माने में दो चार प्लाट ही नगर में लेकर पटक दिए होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे कहा तो यह जाता है कि There is a woman  behind  every successful man मगर आज यह कहना विल्कुल सही है कि हर सफल व्यक्ति के पीछे उसका पापा होता है फिर चाहे वह फिल्म नीती हो या राजनीती   कुछ डैडी अपने बेटे को कठिन परिश्रम की सलाह देते हैं तो कुछ कहते हैं कि = माना कि कठिन परिश्रम से आज तक कोई नहीं मरा   फिर भी रिस्क क्यों ली जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी नज़र में ""डैडी या पापा वह ,जो सबकी चिंता करे मगर उनकी चिंता कोई न करे""मैं एक विचार -धारा  से परिचित  हुआ आज की पीढी   के विचार  ""हम भी कुछ पुण्य  करके आये हैं जो हम आज सफल हैं ,तुम  न  पालते  तो कोई   दूसरा  पालता  क्योंकि जो जन्म  देता है वह उसके जीवन की रक्षा, भोजन  पानी  सबकी व्यवस्था  कर देता है  पाला  पोषा , पढाया  लिखाया , तो सब माँ बाप  पढाते   लिखाते  हैं यह विचार  धारा  जब बुजुर्ग  माता  पिता  के समक्ष  क्रोध  या आवेश  में प्रकट  की जाती  होगी  तब उस पापा पर क्या गुजरती  होगी  ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुनि  श्री तरुण  सागर  जी ने एक प्रवचन  में कहा था कि एक, इकलौता  डाक्टर  बेटा  अपनी माँ का स्वम  उपचार  कर रहा था जब माँ स्वस्थ  हो गई तो बेटे ने दबाओं   का बिल  माँ को पकडा  दिया आज की पीढी को दोष  देना  भी व्यर्थ  है / क्योंकि हो सकता है यह विचार  धारा  पुरानी  रही  हो क्योंकि जो शेर  मैंने पढा  वह भी पुराना  ही है ""हम उन किताबों  को काबिले  जप्ती  समझते  हैं /कि जिनको  पढ़के  बेटे बाप  को खब्ती  समझते  हैं ""&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt"&gt;&lt;span style="font-family:Times New Roman;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt"&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1352924951098935785?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1352924951098935785/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1352924951098935785' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1352924951098935785'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1352924951098935785'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='पापा कहते हैं'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7679951841986536333</id><published>2009-08-31T00:54:00.000-07:00</published><updated>2009-08-31T00:57:12.031-07:00</updated><title type='text'>रहिये अब ऐसी जगह चलकर</title><content type='html'>रहिये अब ऐसी जगह चल कर जहाँ मच्छर न हों -पत्नी का यह शायराना अंदाज़ भलेही मुझे अच्छा लगा, किंतु मेरा कहना यह था की जायें तो जायें कहाँ ? उनका कहना यह था की अपने यहाँ जैसे और जितने मच्छर कहीं भी नहीं होंगे, इसलिए मकान या मोहल्ला बदलना ही होगा| मेरा सोच यह है कि शेर -सांप -बिच्छू –मच्छर, आदि  से डर कर नहीं वल्कि इंसान -इंसान से डर कर मोहल्लों का परित्याग किया करते हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी परेशानी अस्वाभाविक नही थी -औसत मच्छर से बडे और मक्खी के आकार से कुछ छोटे, आम मच्छर से हट कर यानी ख़ास मच्छर, गोया बहुत ही खतरनाक मच्छर -अगरबत्ती व टीकियों की खुशबू व बदबू को नज़रंदाज़ कर देते है -प्याज काट कर बल्ब के पास लटका दो तो उसके इर्द-गिर्द ऐसे मंडराने लगते हैं जैसे प्याज प्याज न होकर कोई फूल हो और वे स्वयम भँवरे हों - घर में धुआं कर दो तो, वे यथास्थित रहे और आदमी घर से भागने लगे -किसी की आँख में जलन -किसी को आंसू -किसी को छींक -किसी को खांसी | मेरे द्वारा एक दिन धुआं कर देने पर मेरे बीबी बच्चों का मुझ पर नाराज़ हो जाना तो स्वाभाविक था क्यों कि वे मेरे अपने थे , किंतु आश्चर्य बिल्डिंग के अन्य लोग भी नाराज़ नजर आए | दीवालें काली हो रही हैं -कमरों में बैठना मुश्किल है -अजीब किरायेदार आया है -धुआं कितना घातक होता है जानता ही नहीं है -आक्सीजन की कमी हो गयी आदि इत्यादि|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;|मच्छरदानी कोई अज़नवी चीज़ नहीं मगर उसके बाबद मेरा सोचना है कि  मच्छरदानी -खरीद तो ली मगर इसे बंधोगे कहाँ -अव्वल तो बांस के चार डंडे मिलना मुश्किल , लोहे की रोड लगवाने लायक पलंग नहीं ,दूसरे  मकान मालिक दीबारों में कील ठोकने नहीं देगा ,अथवा तो कीलें स्वयम नहीं ठुकेंगी थोडा सा पलस्तर उखाड़ कर टेडी हो जायेंगी और उचट कर ऐसी जगह गिरेंगी की ढूंढते रह जाओगे | और ठोकने वाले का अंगूठा !मरहम पटटी का इंतजाम पहले कर लेना चाहिए |वैसे कायदा तो यह है कि, दीवार में  कील ठोको तो कील पत्नी को पकडाओ |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मच्छरदानी बाँध कर सर्ब प्रथम उसके अंदर उपस्थित मच्छरों की समुचित व्यवस्था करने में सब बुद्धिमता विसर्जित हो जाती है | ऐसा मालूम पड़ता है जैसे मच्छर दानी में कोई ताली बजा बजा कर कीर्तन कर रहा हो |इधर ज़ोर की ताली से अपने हाथ लाल, और मच्छर गायब -वह ऊपर मछर दानी के कोने में -और कोने वाले को मारने की कोशिश की तो मच्छर दानी की डोरी टूटी या कील उखडी|चारों तरफ मच्छर दानी गद्दे के नीचे दबाने के बाद समस्या यह की लाईट आफ कैसे करें -लाईट बंद करने गए यानी दो बार मच्छर दानी हटाई और इधर द्रुत वेग से उनकी प्रविष्ठि हुई, फिर रात भर गाते रहिये "जानू जानू री छुपके कौन आया तेरे अंगना " जाली में फंसा वह प्राणी कितना दुर्दांत -खूंखार और आक्रामक हो जाता है -भुक्तभोगी ही जानता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्नी का यह यह कहना (वह भी गाकर ) कि "नाली बनाने वाले जाने चले जाते हैं कहाँ " और यह भी की " नाली बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई -काहे को नाली बनाई ""और अगर बनवाई तो इसे ढकवाते क्यों नहीं | मैं समझाना चाहता हूँ "तुम सुनहु ग्रह मंत्री स्वरूपा, नाली बनहि बजट अनुरूपा "" और बजट आजायेगा तो ढकवा देंगे| और बजट के अंदर व समय सीमा में कभी काम पूरा होता नहीं है क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो चलो 'फिर दूसरी जगह चलो | मैंने कहा अरे वाह, कल को तुम कहोगी की ऐसी जगह चलो जहाँ हत्या, बलात्कार, चोरी, डकेती, अपहरण, न होते हों |दूसरे नालियों में कचरा सब्जी छिलके तुम डालो ऊपर से शिकायत| इसीलिये तो किसी ने कहा है “”इस आग को कैसे कहें ये घर है हमारा -जिस आग को हम सब ने मिलकर हवा दी है””&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7679951841986536333?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7679951841986536333/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7679951841986536333' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7679951841986536333'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7679951841986536333'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html' title='रहिये अब ऐसी जगह चलकर'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-5437271923435375807</id><published>2009-08-17T08:01:00.000-07:00</published><updated>2009-08-17T08:14:23.534-07:00</updated><title type='text'>भूंख से मरने की नौबत आ ही जाये तो</title><content type='html'>जब भूंख से मरने की नौबत आ ही जाये तो क्रियाओं और पदार्थों को त्याग कर,  बन में चले जाना या निष्क्रिय हो कर समाधिष्ठ योगी बन जाना विकल्प नहीं है क्लेश युक्त जीवन व्यतीत न कर कर्त्तव्य पथ पर चलना आवश्यक है मनुष्य जीवन का लक्ष्य सुख प्राप्त करना है और उसके लिए कर्म आवश्यक है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक कहावत है ""जब तक धरती पर एक भी मूर्ख मौजूद है अक्ल्मंन्द भूखों नहीं मर  सकता| - ५-५ रुपयों में लकडी के एक एक बालिश्त के टुकड़े बिक जाते हैं, जिनको मात्र घर में रखने से खटमल व मच्छर भाग जाते है, जिनको पुस्तकों की अलमारी में रखने से पुस्तकों को दीमक नहीं लगती है | बाद में मालूम चला उस लकडी को ही दीमक खा गई &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आप एक काल्पनिक कम्पनी बनाइये और अखवार में विज्ञापन दीजिये, कि ऐसी कोई चार संख्याएं लिखो जिसका योग २५ हो| कम्पनी का कोई कर्मचारी या संबन्धी इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकेगा प्रथम पुरस्कार पाने वाले को १० हजार रूपये का टीवी सेट  दिया जायेगा |आपका उद्देश्य प्रविष्ठी भेजने वाले का नाम और पता जानने भर का होना चाहिए अब जो नाम आपके पास आये हैं उन सभी को पत्र  भेजिए कि आपने प्रथम पुरस्कार जीता है | सभी लोग ऐसी संख्याएं लिखेंगे जिनका योग २५ आता है ,किन्तु यदि किसी का योग २३ या २० आता है तो उसे भी सूचना भेजिए कि आपने प्रथम पुरुस्कार जीता है| आप दो हज़ार रूपये भेजिए ताकि आपका मॉल पार्सल से भेजा जा सके अब आपका नैतिक कर्तव्य है कि आप पोस्ट बॉक्स नम्बर पोस्ट बेग नम्बर का मोह त्याग कर मोहल्ला बदल लें राशिः ज्यादा हो तो शहर बदल ले देश में शहर बहुत हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; किन्ही वकील साहिब के पास जाइये उनसे कोई कानूनी पुस्तक लीजिये (जमीदारी उन्मूलन अधिनियम ही सही ) और उसे सस्ती सी प्रेस पर हलके से कागज़ पर किताब नुमा आकार दीजिये तथा तांगे या सायकल रिक्शा में बैठ कर भोंपू से प्रचार कीजिए कि सरकार ने कानून बनाया है -जिससे किसानों को लाभ होगा किसानों कि वह जमीने, जिनको वे जोत रहे है, और सरकारी कागजात में उन्ही का नाम दर्ज है, और जो उनकी पुस्तैनी है, अब उन्ही की हो जायेगी |उनकी फसल वे काट व बेच सकेंगे| आपके प्रचार से तारीख पेशी करने आये हाट बाज़ार करने आये किसान दो दो रुपयों में वह किताबें खरीद कर ले जायेंगे और अपने गावं में शिक्षाकर्मियों से पेडों तले शिक्षा ग्रहण करने वाले, होनहारों से पढ़वा कर, फूले नहीं समायेंगे | आप गलत भी नहीं है आप तो कह रहे है सरकार ने कानून बनाया है कब बनाया है यह आप कह ही नहीं रहे हैं &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;अखवार में विज्ञापन दीजिये कि अत्यंत उपयोगी घरेलू उपकरण के विक्रय हेतु विक्रय प्रतिनिधि नियुक्त करना है बेरोजगार स्मार्ट और वाक्पटु को प्रार्थमिकता दी जायेगी| आजकल अधिकांश युवक बेरोजगार है और जो रोजगार से लगे हुए हैं वे पार्ट टाइम जाव की तलाश में रहते हैं क्योंकि चाय, पान, सिगरेट, गुठका ,सिनेमा ,क्रीम, डियोड्रेंट, महंगे हो जाने से घर का खर्च चलता नहीं है| वैसे भी आज का हर युवक अपने को स्मार्ट समझता है करेला और नीम चडा एक तो बेरोजगार ऊपर से स्मार्ट वाक्पटु तो होगा ही ज्यादा से ज्यादा किसी बुक स्टाल  से एक दो रुपया रोज पर उपन्यास या फिल्मी पत्रिका लाकर अपना दिन गुजार देता होगा |&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; जब आप दस हज़ार रूपये मासिक व कमीशन का लालच देंगे, तो वह आवेदन करेगा फिर उसे आपका जवाब मिलेगा कि हमारी समिति के सदस्यों ने आपकी योग्यता और डिग्री आदि देखते हुए सर्वसम्मति से आपको आपके क्षेत्र का विक्रय प्रतिनिधि चुना है आपका मासिक वेतन दस हज़ार होगा और मॉल विक्रय पर १० प्रतिशत कमीशन मिलेगा|विक्रय ५० हज़ार रूपये मासिक तक बढ़ने पर आप कमीशन २५ प्रतिशत हो जायेगा |फिलहाल २० उपकरण आपके शोरूम को भेजेंगे कम्पनी के नियमानुसार आप १५ हज़ार की नगद जमानत भिजवा दीजिये यह राशिः आपकी अमानत रहेगी और जब आप चाहेगे बापस मांग सकते हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हर गरीब मित्र का एक अमीर मित्र जरूर होता है ,यह परिपाटी कृष्ण सुदामा युग से चली आरही है ,तो ऐसे में आपके भाग्य से और उस युवक के दुर्भाग्य से वह अमीर मित्र उस युवक की जरूर आर्थिक सहायता करेगा इसके बाद आपको क्या करना है ,आप स्वम समझदार हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक स्कीम निकालिए १०० रूपये का मॉल ७५ रूपये में मिलेगा पैसे जमा करवाइए ड्रा निकालिए और १०० का मॉल ७५ में बेच दीजिये |देखिये हर  धंधे में थोड़ी रिस्क तो उठानी ही पड़ती है अब आप पर लोगों का विश्वास जमेगा बड़े आयटम निकालिए सोफासेट डबलबेड वाशिंग मशीन इत्यादि इत्यादि ,अब आपकी कम्पनी पर लोगों का इतना विश्वास जमेगा कि शायद भगवन पर भी नहीं | अब आप मोटर सायकल ,कार, हेलीकोप्टर .हवाईजहाज.लेपटोप के पैसे जमा करवाइए और अंतर्ध्यान हो जाइये  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पत्राचार का कोर्स कर डाक्टर की डिग्री प्राप्त कीजिये |आपने चाहे प्रदेश का नक्षा तक न देखा हो मगर आपको अमेरिका रिटर्न डाक्टर की डिक्री मिल जायेगी |होमोपैथी, नेचुरोपथी, मेग्नेट, एलेक्ट्रोमेग्नेट,यूनानी, ऐलोपथी ,आयुर्वेदिक,  प्राकृतिक जिसकी चाहें उसकी |अब आप जीवन से हताश और निराश लोगों का इलाज कीजिये ऐसे रोगी मौत से पहले मरते नहीं और शादी से पहले आत्महत्या करते नहीं, तो आप पर कोई मुकदमा चले इसकी सम्भावना तो है नहीं खाली केप्सूल में पिसी शकर भरिये, शुद्ध दूध से खाने की सलाह दीजिये शुद्ध दूध मिलेगा नहीं और लाभ न होने का इल्जाम आप पर आएगा नहीं ,और जिसके यहाँ शुद्ध दूध होगा वह तो आपसे केप्सूल खरीदेगा ही क्यों वो जीवन से हताश और निराश होगा ही क्यों |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यदि इनसे भी आप भूंख से न बच सकें तो "" लोगों को मूर्ख बनाकर धन कमाने के सौ तरीके ""नामक” &lt;strong&gt;मेरी &lt;/strong&gt;पुस्तक के विक्रय प्रतिनिधि बन जाइये&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-5437271923435375807?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/5437271923435375807/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=5437271923435375807' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5437271923435375807'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5437271923435375807'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/08/blog-post_17.html' title='भूंख से मरने की नौबत आ ही जाये तो'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8902797157628928362</id><published>2009-08-12T08:15:00.000-07:00</published><updated>2009-08-12T08:20:59.888-07:00</updated><title type='text'>योग से बढकर है योगा</title><content type='html'>योग तो पुरानी बात है अत उन्होंने योगा करने की ठानी -वैसे भी कुछ लोगों के लिए योगा लाभ की बजाय फेशन की बस्तु ज़्यादा है उनके आधे मोहल्ले और जान पहचान वालों को विदित हो चुका है की श्री मान जी योगा करते हैं फिर भी उनके बच्चों की यही इच्छा रह्ती है की दोराने योगा कोई आए उनसे पापा के वारे में पूछे और वे फक्र से बताएं की पापा इस वक्त योगा कर रहे हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए उन्होंने २५ मिनट का समय चुना घर के सब सदस्यों को निर्देश था की इस अवधि में सब चुप रहें - पापाजी डिस्टर्ब न हों इसलिए बडी लडकी कमरे के किवाड़ बंद करके अंदर से सांकल चढा देती और बाहर से छोटी लडकी किवाड़ ठोकती रहती रोटी चिल्लाती रहती पत्नी झुंझलाती रहती और लड़का आवाज़ बंद करके किरकेट मैच देखता रहता - जब वे योगा करने बैठते तो घड़ी सामने रख लेते -शांती से बैठने में इन पच्चीस मिनट में वे ३५ बार आसन बदलते और ७५ मरतबा घड़ी देखले की कब पच्चीस मिनट पूरे हों और वे शबासन में लेटें|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे साल में दो बार नौ दिन तक पारायण करने वाले पहले से ही विश्राम पर निशान लगा देते हैं और आधे घंटे बाद ही शेष बचे प्रष्ठ गिनने लगते हैं फिर बचे हुए दोहे गिनने लगते हैं और जैसे जैसे विश्राम नजदीक आने लगता है उन्हें विश्राम मिलने लगता है -ठीक वैसे ही जैसे जैसे सुई पच्चीस मिनट की और बढ़ती इनकी प्रसन्नता बढ़ने लगती -इनके चेहरे की प्रसन्नता देख कर बच्चे समझते की पापाजी को योगा से ब्लेसनेस प्राप्त हो रही है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;` शबासन उन्हें अत्यन्त प्रिय लगा जैसे अजगर से कह दिया जाए की तुम १५ मिनट चुपचाप पडे रहो या उन शंकर जी से जो "शंकर सहज सुरूप तुम्हारा -लगी समधी अखंड अपारा और =बीते संबत सहस सतासी -तजी समधी संभु अविनासी से कहा जाए तुम दस मिनट का मेडी टेशन 'क्या फर्क पढेगा वैसे ही तो वे यूँ ही दिनरात पलंग पर डले रहते है अब तो शब आसन है -पहले तो पत्नी की टोकाटाकी थी सब्जी ले आते -चक्की पर चले जाते -एकाध बाल्टी पानी भरवा देते आदि इत्त्यादी -अब तो योगा है कोई रोक टोक ही नहीं|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किताबी निर्देशों के मुताबिक वे कमर सीधी करके बैठते मगर आदत के मुताबिक आधा मिनट में ही कमर झुकजाती -ध्यान के क्षेत्र में इसे सुबह लक्ष्ण माना जाता है - बशर्ते कमर ध्यान में डूबने पर झुके मगर यहाँ तो आदतन झुक रही है -शायद दुश्यन्त्जी ने ऐसे ही मोकों के लिए कहा होगा =ये जिस्म बोझ से दबकर दुहरा हुआ होगा -में सजदे में नहीं था आपको धोका हुआ होगा =|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज उनके पास योगा का सचित्र और विचित्र -प्राचीन और नवीन हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा में बहुत सा साहित्य एकत्रित हो गया है -पतंजली जी ने जितने आसन बताए होंगे उनसे ज़्यादा ये जानने लगे हैं -योगी वशिष्ठ ने योग से जितने लाभ बताए होंगे उनसे ज़्यादा योगा से होने वाले लाभ इन्हेंयाद हैं|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन मैंने उनसे पूछा की तुम मेरे अज़ीज़ हो -ये किताबी ज्ञान मुझे मत बतलाना -ये तो सब मैंने भी पढ़ सुन रखे हैं -तुम तो यह बतलाओ की तुम्हे हासिल क्या हुआ -क्या उपलब्धी हुई =तो उन्होंने शेर के गले में फंसी हड्डी का किस्सा सुना दिया की अगर शेर के गले में फंसी हड्डी लम्बी चोंच वाला सारस निकाल दे और शेर से पारिश्रमिक या ईनाम मांगे -तो भइया सबसे बडा ईनाम तो यही है की चोंच साबुत बाहर निकल आई इसी प्रकार सबसे बडी उपलब्धी तो यही है की वर्तमान शोर प्रदूषण के युग में हमारा परिवार आधा घंटा चुप रहकर विश्व की सेवा कर रहा है|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोर से होने वाली हानी के बारे में आम लोगों को जानकार नहीं है -जिनको जानकारी है वे खामोश है -हवाई जहाज -मोटर -ट्रक -रेल फेक्टरी आतिश्वाज़ी पठाके लाउड इस्पीकर फुल आवाज़ में अपने घर में रेडियो या टी वी चलाना इनसे दिल के रोगी को -नवजात शिशु को -अशक्त ब्रद्धों को -गर्भवती महिला को क्या क्या नुकसान होते है हम नहीं जानते =रेलवे लाइन के निकट वाशिंदों को क्या क्या रोग घेर लेते है यह भी हमको पता नहीं है =दीवाली पर पठाके चलाने वाबत सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश दिए थे हमने उन्हें कितना माना =बोलने से कितना नुकसान होता है हमें पता नहीं =गंभीर रोगी को डाक्टर बोलने से क्यों मना करता है सोचा नहीं|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी बात मुझे सटीक लगी काश हम भी थोड़ा थोड़ा चुप रहकर वातावरण में फैल रहे शोर प्रदूषण को कम करने में सहायक बनें&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8902797157628928362?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8902797157628928362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8902797157628928362' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8902797157628928362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8902797157628928362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/08/blog-post_12.html' title='योग से बढकर है योगा'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1691920308907332313</id><published>2009-08-01T08:30:00.000-07:00</published><updated>2009-08-01T08:34:14.391-07:00</updated><title type='text'>सलाह</title><content type='html'>अक्लमंद को सलाह की ज़रुरत नहीं और मूर्ख सलाह मानते नहीं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे सलाह दी गई ,स्वाभाविक है मैं भी  नहीं मानूंगा, मगर मैंने उसे निर्देश के तौर पर लिया |निर्देश कुछ इस प्रकार है कि जो अपनी नजरों में खुद को बे-इज्जत करता है, 'वक्त'एक रोज उसकी यही कुत्ता फजीहत करता है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बात बिलकुल सही है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब दूसरे मौजूद हैं तो खुद को अपनी नज़रों से क्यों बे-इज्ज़त करना?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुत्ता फजीहत क्या होती है अनुभव नहीं है ,कभी हुई ही नहीं, लिखा है धोबी का कुत्ता! तो वह तो मैं हूँ ही |मेरा न घर है न घाट |जफ़रजी के शब्दों में कहूं तो मैं न किसी के दिल का करार हूँ, न किसी की आँख का नूर हूँ , मेरा रंग रूप (जो थोडा बहुत पहले कभी रहा होगा) बिगड़ गया है ,मेरा यार मुझसे बिछड़ गया है, मेरा चमन उजड़ गया है (चमन उजड़ गया है ,मतलब , मैं गंजा नहीं हुआ हूँ, वो क्या है ,किसी फिल्म में नाना पाटेकर द्वारा  एक गंजे को 'उजड़ा चमन 'शब्द प्रयुक्त किया गया है |,माशाअल्लाह मेरे बाल अभी बचे भी हैं .और मेरे बाल बच्चे भी हैं )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या खुद की कमजोरियां बताना ,अपने दुर्गुणों का सार्वजानिक प्रदर्शन , खुद को नज़रों से गिराना है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीमानजी कह रहे थे जब मैं अपने जवानी के दिन याद करता हूँ तो मुझे अपने आप से बड़ी नफरत होने लगती है |&lt;br /&gt;क्यों ऐसा क्या किया जवानी के दिनों में ?&lt;br /&gt;बोले -कुछ भी नहीं किया |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टिप्पणी कार भाग ३ को बेहूदगी भरी कहा गया |बेहूदगी कहाँ नहीं है तलाशने वाला चाहिए |इंटरनेट खोल कर देखिये बेहूदगी का अम्बार मिलेगा -इंटरनेट ही क्यों ? आजकल जो टीवी पर सत्य बोलकर इनाम पाने की प्रथा चल रही है जिसमे  लड़कियां स्वीकार कर रहीं हैं ,जब वे नाबालिग़ थी तभी .........|शादी शुदा औरत कह रही है की वह पैसों के लिए ........|और उनके पति दर्शकों से मुंह छुपा रहे है |पुरुष यह स्वीकार कर रहे हैं उन्हें वह सब नाम याद हैं जिनके साथ .........| यदि यह बेहूदगी नहीं सभ्यता और संस्कृति है तो मैं अपने लिखे हुए को बेहूदा मानने में कोई लज्जा या संकोच महसूस नहीं करता  |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;,अपने को दीनहीन दयनीय बताना क्या, खुद को बेईज्ज़त करना है ?|कबीर ने तो कहा जब में बुरा देखने चला तो पाया मुझसे बुरा कोई है ही नहीं |तुलसी दास जी ने कहा यदि मैं अपने सब अवगुण कहने लगूंगा तो कथा बढ़ जायेगी, ग़ालिब साहिब ने कहा यदि मैं शराबी न होता तो लोग मुझे बली समझते , किसी ने कहा 'रोड़ा ह्वे रहु बाट का ताज पाखंड अभिमान |बंगले में साहब के साथ कुत्ता नाश्ता कर रहा हो और बंगले के बाहर कोई लड़का कचरे में से खाने को कुछ ढूंढ रहा हो और अगर वह कहदे कि मुझसे तो यह कुत्ता अच्छा है तो क्या उसने अपने आप को अपनी नज़रों से बेईज्ज़त कर लिया|&lt;br /&gt;ईश्वर के सामने गुनाह कबूल करना क्या अपने को बेइज्जत करना है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीमानजी ईश्वर के दरबार में गुनाह कुबूल कर रहे थे "मैं पापी हूँ मैंने ये किया ,वो किया आदि |सहसा अहसास हुआ कि पीछे कोई है, देखा एक व्यक्ति खडा था ,पूछा तूने कुछ सुना तो नहीं ,बोला मैंने सब सुना |श्रीमानजी उसे एक तरफ ले गए बोले 'देख किसी को या बात बतला मत देना नहीं तो ठीक न होगा 'फिर उन्होने अपनी एक जेब से नोटों से भरा पर्स निकला और दूसरी से पिस्टल निकाली और 'लगे रहो मुन्ना  भाई 'फिल्म के लक्की  सिंह की स्टाइल  में कहा 'ये वेलेट  है ये बुलेट  है तू  चूज  कर|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई तय कर ही ले कि बेहूदगी खोजना ही है तो असंभव नहीं है |वैसे सुना है नेपोलियन कहा करता था कि उसकी डिक्शनरी में असंभव शब्द है ही नहीं (अल्ला जाने किस प्रकाशक की डिक्शनरी थी उनके पास ) तलाशने वाले ग्रन्थ ,साहित्यिक लेख ,कविता किसी में से भी बेहूदगी तलाश कर सकते हैं|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक मैडम के मकान के पास तालाव था ,बच्चे उसमे स्नान करते थे निर्वस्त्र |पुलिस को सूचना दी मुझे क्षोभ होता है |पुलिस ने बच्चों के समझा दिया कि यहाँ के वजाय दो किलोमीटर दूर तलाव है उसमें नहा लिया करो |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; पुलिस के पास फिर सूचना आई मुझे क्षोभ होता है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर मैडम वो तो दो किलोमीटर दूर तालाव है वहां नहाने लगे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो क्या हुआ मैंने दूरबीन खरीद ली है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1691920308907332313?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1691920308907332313/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1691920308907332313' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1691920308907332313'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1691920308907332313'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='सलाह'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1180730376866119539</id><published>2009-07-24T07:23:00.000-07:00</published><updated>2009-07-24T07:26:05.561-07:00</updated><title type='text'>नानी एक वरदान</title><content type='html'>मेरे नानाजी का स्वर्गवास हो जाने पर नानी ने स्वम नौकरी न करते हुए मेरी मौसी को अनुकम्पा नियुक्ति के नियमों के अंतर्गत नौकरी दिलवादी और नानी मौसी के साथ रहने लगी |नानी के बीमार होने पर पेंशन की राशिः दबाओं पर खर्च होने लगी तो मौसी ने नानी को अपने साथ रखने से इंकार कर दिया नानी को मेरी माँ अपने यहाँ ले आई |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी माँ ने नानी से कहा कि "अम्मा तूने छोटी को तो नौकरी दिलवादी हमें क्या मिला "" नानी ने कहा मेरे पास तो एक मकान ही है तू ले ले _और मौसी के विरोध करने पर भी माँ ने नानी का मकान बेच कर हमें नया मकान बनवादिया |मकान का निर्माण हो रहा था तब माँ ने नानी से कहा था कि अम्मा मकान पर तेरा ही नाम लिखा जायेगा और ठेकेदार से कह दिया था कि मकान के फ्रंट पर लिख देना ""मातृ छाया "" गलती से कारीगर ने लिख दिया "मात्र छाया ""&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसी और माँ में झगडा होने लगा |माँ कहती थी तुझे रखना पड़ेगा क्योंकि तुझे नौकरी दिलवाई है ,मौसी कहती थी तूने मकान हड़प लिया है इसलिए तू रख |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विवाद ज्यादा बढ़ ही नहीं पाया था कि छटा पे कमीशन लागू हो गया और नानी की पेंशन बढ़ गई _इधर पापा ने नानी का पेंशन कार्ड बनवा दिया मुफ्त दबायें मिलने लगी |नानी का खर्च भी कम हो गया एक प्याली चाय सुबह, दो रोटी दिन में दो, रोटी रात को | पेंशन का दसवां हिस्सा भी नानी पर खर्च नहीं होता था तो मौसी के यहाँ भेजने का प्रश्न ही खत्म|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;|नानी अंगूठा लगा देती है और पापा पेंशन निकाल लाते हैं |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम चाहते है ईश्वर नानी को शतायु करे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1180730376866119539?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1180730376866119539/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1180730376866119539' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1180730376866119539'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1180730376866119539'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/07/blog-post_24.html' title='नानी एक वरदान'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8355347658902458037</id><published>2009-07-14T21:21:00.000-07:00</published><updated>2009-07-14T21:23:48.994-07:00</updated><title type='text'>दुविधा या द्विविधा</title><content type='html'>हमारी श्रीमती जी कुछ ज्यादा ही ........(पहले मैं अपना वाक्य, लाइन जरा ठीक करलूं ) &lt;br /&gt;""हमारी  श्रीमती जी"" मतलब आप श्रीमान जी हैं, वह मेडम हैं तो आप मिस्टर हैं और वे बेगम हैं तो आप बादशाह हैं  | यार कितना चीप लगता है अपने आप को श्रीमान कहना ,कोई पूछे आपकी तारीफ और मै कहूं मैं श्रीमान बृजमोहन श्रीवास्तव या माई सेल्फ मिस्टर बृजमोहन,, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहाँ तो अपने आप को नाचीज़ कहना, छोटा बतलाना  ,और सामने वाले को जनाब कहना यही तरीका रहा है |पूछते  भी हैं, जनाब की तारीफ, और अपने वारे में कहते हैं नाचीज़ को, खाकसार को फलां   कहते हैं |और कई लोग तो और भी ,कहते हैं ख़ाक-दर-ख़ाक, आपके क़दमों की ख़ाक, नाचीज़ को फलां कहते हैं |दूसरे के मकान को दौलतखाना और अपने मकान को गरीबखाना कहा जाता है |दूसरे द्वारा कही बात को फरमाना और अपनी कही बात को अर्ज़ करना कहा जाता है |सुप्रसिद्ध शायर भी साधारण श्रोता से यही कहते हैं "" अर्ज़ किया है  की (ये ट्रांसलेटर छोटी की बना ही नहीं रहा है), सूर कहते रहे 'मो सम कौन कुटिल खल कामी " 'तुलसी कहते रहे धींग धरमध्वज धंधक धोरी 'कबीर ने कहा 'मुझसे बुरा न कोय ' रहीम ने कहा 'जेतो नीचो ह्वे चले तेतो ऊँचो होय ' और आप अपने आप को श्रीमान कह रहे हैं बड़े शर्म  की बात है |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई अपनी तारीफ करे तो इतराना नहीं चाहिए, घमंड में चूर नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि विनम्रता पूर्वक कहना चाहिए की  "ये तो हुज़ूर की ज़र्रा नवाजी है वरना मैं किस काविल हूँ ""एक शायर ग़ज़ल  पढ़ रहे थे, बोले--. अपनी ग़ज़ल  का ये शेर मुझे खास तौर पर पसंद है | एक श्रोता बोला  “ ये तो हुज़ूर की ज़र्रा नवाजी है वरना शेर  किस काविल है |”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हमारी श्रीमतीजी” -मैंने सुना है एक वचन के लिए ‘मैं’ और बहु वचन के लिए ‘हम’ का प्रयोग होता है |यह बात जुदागाना है की कहीं की बोली ही ऐसी हो की "" हम बनूँगा प्रधान मंत्री ""| हम शब्द बहु वचन का द्योतक है जैसे कोई कहे हमारा फलां बेंक में खाता है ,मतलब ज्वाइंट अकाउंट होगा |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिर क्या ?” मेरी धरम पत्नी” -ये हम पति पत्नी के बीच में धरम जी कहाँ से आगये क्या फिल्में मिलना बंद हो गई | धरम-पत्नी, धरम-शाला क्या है ये ? अरे पत्नी तो धर्म पत्नी होती ही है उसके बिना कोई धार्मिक कार्य संपन्न हो ही नहीं सकता | करुणा अहिंसा ,प्रेम शील ,दया क्षमा का पालन आम तौर पर पत्नियों द्वारा ही किया जाता है और वे पति को धर्म मार्ग पर लगाये रखती है तो धर्म पत्नी तो वे है ही|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;""मेरी पत्नी ""पहली बात राम ने लक्ष्मण से कहा ""मैं अरु मोर तोर तैं माया "" और माया का तो पता ही है आपको ""माया महां ठगनी हम जानी "" दूसरी बात अगर मैं कहूं की फलां जगह मैं “मेरा कोट” पहन कर गया था |कोट पहन कर गया था ही पर्याप्त है | "मेरा कोट " क्या मतलब है ?,मतलब दूसरों का भी पहिनते होगे | मेरी पत्नी ने मुझसे कहा - क्या मतलब है ? मतलब .......|&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी दुबिधा है मेरी कहता हूँ तो माया ,धरम पत्नी कहता हूँ तो धरम प्राजी, श्रीमती, मेडम, बेगम कहता हूँ तो श्रीमानजी ,मिस्टर और बादशाह, हमारी कहता हूँ तो बहु वचन |अब पहली लाइन ही ठीक हो तो आगे बढूँ देखिये करता हूँ कोशिश |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कृपया यही कह देना की यह बकवास किस उल्लू ने लिखी है "किस उल्लू के पट्ठे ने लिखी है" यह मत कहना |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8355347658902458037?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8355347658902458037/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8355347658902458037' title='23 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8355347658902458037'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8355347658902458037'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='दुविधा या द्विविधा'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-6645180115061226729</id><published>2009-06-24T07:10:00.000-07:00</published><updated>2009-06-24T07:16:29.689-07:00</updated><title type='text'>टिप्पणीकार (३)</title><content type='html'>(सोचा होगा बुड्ढा सरक तो नहीं लिया ,अच्छा हुआ, बहुत टायं टायं करता था /असल में कुछ भाग्यशाली बुड्ढे दुनिया में ऐसे भी होते हैं जिनका कोई ठिकाना नहीं होता कुत्ते की तरह एक ने डंडा मार कर भगा दिया , दूसरे  ने रोटी दिखा कर बुला लिया वैसे कुछ कुत्तों से घर की रखवाली भी करवाई जाती है कम से कम उनका कोई निश्चित ठिकाना तो होता है /खैर लीजिये &lt;br /&gt;बहुत दिन बाद सही तीसरी किश्त खिदमत में पेश है )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;| (जब में यह लिख रहा था तब ये मुझसे कह रहीं थीं ,मानो मेरी बात मत लिखो; कोई ब्लोगर या टिप्पणीकार आकर ठोक जायेगा | मैंने पूछा क्या मेरी पीठ ? नहीं तुम्हारा सर; जूतों और चप्पलों से )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ  त्वरित टिप्पणी करते हैं वे रचना पढ़ते जाते हैं और उनका मस्तिष्क स्वचालित यंत्र की तरह साहित्य सृजन करने लगता है | &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ टिप्पणी कार सोच कर टिप्पणी देते हैं | वे रचना पढ़ते हैं फिर सोचते हैं ,इतना सोचते हैं कि ,उनको सोचते देखकर ऐसा लगता है जैसे 'सोच ' स्वम् शरीर धारण कर सोच रहा हो |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ चौबीसों घंटे टिप्पणी ही करते रहते है उनके ब्लॉग पर जाओ तो कुछ न मिले और कुछ सिर्फ ब्लॉग ही लिखते रहते है |चार पांच दिन बाद जीरो कमेन्ट ,फिर एक लेख लिख दिया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मास्साब थे | हर किसी से ,तूने ताजमहल देखा है /नहीं / कभी घर से बाहर भी निकला करो /हर किसी से /तूने ये देखा है ,वो देखा है कभी घर से बाहर भी निकला करो /बड़ी परेशानी | एक दिन एक युवक ने उन्हें आवाज दी =&lt;br /&gt;मास्साब &lt;br /&gt;क्या है ?&lt;br /&gt;रामलाल को जानते हैं ?&lt;br /&gt;कौन रामलाल ?&lt;br /&gt;कभी घर पर भी रहा कीजिये  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एक विद्वान साहित्यकार का ब्लॉग पढ़ रहा था /सैकडों उत्कृष्ठ रचनाये उनके ब्लॉग पर | नियमित लेखक | सहसा एक बहुत ही छोटी सी टिप्पणी पर मेरी नजर गई "" अच्छा लिखा है ,लिखते रहिये आप ""मैंने जानना चाहा ये टिप्पणीकार कौन हैं ,तो मैं उनके घर गया (मतलब ब्लॉग पर ) दो माह पहले ही इन्होने ब्लॉग बनाया है | सच मानिए मुझे उनकी टिप्पणी ऐसे लगी जैसे कोई बच्चा बाबा रामदेव से कह रहा हो ""अच्छा अनुलोम विलोम करते हैं आप 'करते रहिये ' ""&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मैं  विभिन्न ब्लॉग पर बहुत टिप्पणियाँ देख रहा था तो मुझे सहसा एक नवाब साहिब का किस्सा याद आ गया |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक थे नवाब /दिनभर शेर शायरी लिखते /कमी की कोई चिंता न थी /रईस जादे  थे /अपार पुश्तेनी संपत्ति के एकमात्र बारिस / बारिस माने बरसात नहीं ,स्वामी / वो क्या है न कि कुछ लोग ' स " को 'श 'उच्चारित करते हैं  &lt;br /&gt;उन्होंने  कहा- 'हैप्पी न्यू इयर '&lt;br /&gt;इन्होने  कहा -' शेम टू यू '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो उनकी हवेली की बैठक (दरीखाने ) में रात्रि ८ बजे से ही महफ़िल शुरू हो जाती /एकमात्र शायर नवाब साहिब वाकी १५-२० श्रोता ,साहित्यकार ,गज़लों और शायरी के शौकीन ""वाह वाह /क्या बात है "" की आवाज़ से हवेली गूंजने लगती | रसिक श्रोता ,भावःबिभोर ,भावभीने | इधर बेगम अंदर से पकौडियां तलवाकर भिजवातीं ,समोसे ,मिठाई ,चाय ,काफी ,पान की गिलोरियां |&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन नवाब साहिब सो कार उठे तो पेट में भयंकर दर्द /दोपहर तक और बड़ गया शाम होते होते दर्द से बैचैन होने लगे |इधर दरीखाना लोगों से भरने लगा /बेगम ने कहा नौकर से मना करवा देते है | नहीं बेअदवी होगी ,बदसलूकी होगी ,मुझे ही जाकर इत्तला देना होगा /खैर साहिब -कुरते के अंदर एक हाथ से पेट दवाये नवाब साहिब पहुंचे मनसद पर बैठे और कहा -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह से मेरे पेट में बहुत ज्यादा दर्द है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वाह वाह / क्या बात है / क्या तसब्बुर है /क्या जज्वात है /हुज़ूर ने तो कमाल कर दिया / (हवेली गूंजने लगी )वाह हुज़ूर क्या बात कही है / हुज़ूर ने गजल के लिए क्या जमीन चुनी है / जनाब मुक़र्रर / साहिब मुक़र्रर -इरशाद /&lt;br /&gt;क्या मुखडा है / हुज़ूर तरन्नुम में हो जाये ...........|&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-6645180115061226729?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/6645180115061226729/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=6645180115061226729' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6645180115061226729'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6645180115061226729'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='टिप्पणीकार (३)'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-2360504282440452912</id><published>2009-05-10T00:34:00.000-07:00</published><updated>2009-05-10T00:39:43.225-07:00</updated><title type='text'>टिप्पणीकार (२)</title><content type='html'>(एक मई को टिप्पणीकार का पहले भाग लिखा था / पेश-ए-खिदमत है दूसरा भाग /जब गलियां ही खाना है तो यह क्रम तो निरंतर चलेगा ही )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टिप्पणीकार को टिप्पणियाँ देकर, साहित्यकार का, उत्साहवर्धन करना ही चाहिए /जब हम क्रिकेट खिलाड़ियों का  हौसला बढाने  हजारों मील दूर जा सकते हैं , और यह जानते हुए भी कि , मैच-फिक्सिंग में, हमारा कोई शेयर नहीं है , खिलाडियों का उत्साह बढाते हैं ,वहां न जा सके तो घर में ही टीवी के सामने बैठ कर उत्साह बढाते है /वाह  यार क्या (चौका छक्का जो भी हो ) मारा है ,तुझसे यही उम्मीद थी / उनका तो बस नहीं चलता वरना टीवी में घुस कर खिलाडियों की पीठ ठोंक आयें /  और वही बैठ कर चाय की फरमाइश करेंगे ,सोफा पर बैठ कर ही रोटी खायेंगे ,टीवी के सामने से नजर नहीं हटायेंगे /बीबियाँ झल्लाएं नहीं तो क्या करें ?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;          &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब पीडा से बाल्मीकि और प्रेरणा से तुलसी बना जा सकता है तो प्रोत्साहन से साहित्यकार क्यों नहीं बना जा सकता ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   और छोटे छोटे बच्चे बच्चियां २२-२२-२४-२४ साल के अपनी पढाई छोड़ कर या  पढाई से ध्यान हटा क़र ,कैरियर की परवाह न करते हुए ,या उधर रूचि कर दिखलाते हुए ,यहाँ आकर चाँद -तारों ,हुस्नो-इश्क ,गुलाब जैसा चेहरा गोभी के फूल जैसा  चेहरा ,वगैरा  वगैरा लिख रहे हैं, बेचारे  कितने परेशान हैं दिन-दिन भर कम्प्यूटर पर बैठना पड़ता है और इस वजह से नल, बिजली का बिल जमा करने ,चक्की पर गेहूं पिसवाने, बूढे बाप को भेजना पड़ता है , क्या प्रोत्साहन के हकदार नहीं है ? इन्हें रात दो दो बजे तक इंटरनेट पर बैठना पड़ता है और सुबह नौ बजे तक सोना पड़ता है /बार बार ब्लॉग खोल कर देखना पड़ता है कि कोई टिप्पणी आई क्या और खास तौर पर ........की आई क्या ? होबी अच्छी बात है मगर जीवन पर ,नौकरी पर ,विद्यार्जन पर हावी नहीं होना चाहिए /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जानते हुए भी कि सौ ब्लॉग की रचनाएँ पढने पर भी संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग का एक  भी प्रश्न हल नहीं कर पायेंगे /अरे, आई-ए-एस और आई-पी-एस की परीक्षा में भारतीय संबिधान के ४२ वे संशोधन ,नौवीं अनुसूची वाबत  पूछा जायेगा या यह पूछा जायेगा कि मेडम क्युरी ने कितनी शादियाँ कीं थी /मगर पढ़ते हैं बेचारे कमेन्ट देते हैं कि  कोई आकर हमारी कविता को सराह जाये ,क्या सराहना के हकदार नहीं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी कविता सबको प्यारी लगती है ,तारीफ़  चाही जाती है =&lt;br /&gt;निज कवित्त केहि लाग न नीका &lt;br /&gt;सरस होइ अथवा अति फीका&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे कहते भी हैं अपनी अकल और दूसरों का पैसा ज्यादा दिखता है /कहते तो यह भी है अपना बच्चा और दूसरे की बीबी अच्छी लगती है(मैं नहीं कहता )मैंने तो सुना है पड़ोस के दो छोटे छोटे बच्चे झगड़ रहे थे =&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहला --मेरा डॉगी (कुत्ता ) तेरे डॉगी से सुंदर है /&lt;br /&gt;दूसरा--  नहीं है /मेरा ज्यादा सुंदर है /&lt;br /&gt;पहला - मेरी डॉल तेरी डॉल से सुंदर है /&lt;br /&gt;दूसरा-   नहीं है ,मेरी डॉल ज्यादा सुंदर है /&lt;br /&gt;पहला - मेरी मम्मी तेरी मम्मी से सुंदर है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा - हाँ  यह  हो  सकता है ,पापा भी यही कहते रहते हैं /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            तो अपनी कविता सबको प्यारी लगती है और सराहना की हकदार है  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           वैसे यदि देखा जाय तो कमेन्ट करना सुबोध भी है और सरल भी क्योंकि इसमें जो भाषा ज्यादातर प्रयोग में लाई जाती  है वह न तो हिंदी है, न इंग्लिश है न हिंगलिश है =रोमन लिपि कहा जाता है इसे  / दादाजी से पूछना (अगर हों तो ? अगर हों तो ईश्वर उन्हें शतायु करे ) वे बतलायेंगे पुराने  ज़माने में टेलीग्राम (तार ) इसी लिपि में भेजे जाते थे /अब तो यह टिप्पणी आदि के साथ मोबाईल में एस एम् एस के काम में आती है ,मगर है लिपि भ्रम उत्पादक /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         &lt;br /&gt;उन्होंने लिखा ==चाचाजी अजमेर गया है &lt;br /&gt;इन्होने  पढ़ा ==  चाचाजी आज मर गया है &lt;br /&gt;रोना धोना कोहराम (कोहराम फिल्म नहीं ) शुरू हो गया /&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-2360504282440452912?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/2360504282440452912/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=2360504282440452912' title='23 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2360504282440452912'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2360504282440452912'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/05/blog-post_10.html' title='टिप्पणीकार (२)'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8432619578449023283</id><published>2009-05-01T04:48:00.000-07:00</published><updated>2009-05-01T04:55:58.103-07:00</updated><title type='text'>टिप्पणी कार</title><content type='html'>एक दिन मैंने ,अपने एक टिप्पणीकार मित्र से पूछा कि कल तुमने जिस कविता पर टिप्पणी दी  थी कि ""अति सुंदर भावः प्रधान रचना ""उसमे क्या खासियत थी ? बोले -ध्यान नहीं आ रहा है /मैंने कहा भैया कल ही तो तुमने टिप्पणी की है / बोले - की होगी यार ,भैया रोजाना पचासों कविताओं पर टिप्पणी करना पड़ता है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे टिप्पणीकार का काम कठिन तो होता है /उसे रचना दो तीन मर्तवा ध्यान से पढना होता है ,उसमे गलतियाँ निकलना ,आक्षेप करना ,कटाक्ष ,आलोचना समालोचना ,करना होती है /उससे मिलते शेर ,शायरी ,कविता ,लेख का हवाला देना होता है और स्वम का मत देना होता है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह भी सही है कि आलोचना से साहित्यकार घबराता भी है और डरता भी है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक शायर ने कहा है "" हुस्नवाले ( माफ़ करना शायर ने यही शब्द प्रयोग किया है किन्तु किसी को नागवार गुजरे इस लिए शेर में उस शब्द का स्थान में रिक्त छोड़ रहा हूँ ) हां तो -&lt;br /&gt;...........,हर मोड़ पे ,रुक रुक के सम्हालते क्यों हैं &lt;br /&gt;इतना डरते है तो फिर,  घर से निकलते   क्यों हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्यिक पत्रिकाओं में तो टिप्पणी की कोई गुंजाईश ही नहीं होती /ज्यादा से ज्यादा संपादक के नाम पत्र भेजदो ,तो वह तीन माह बाद की पत्रिका में छपता  है ,वह भी संपादक की मर्जी छापे या न छापे /मगर यहाँ तो पूरी स्वतंत्रता है /लेखक भी तैयारी के साथ आता है और टिप्पणीकार भी तैयारी के साथ आता है / दौनों ही पक्ष आये हैं ,  तैयारियों के साथ &lt;br /&gt;हम गर्दनों के साथ हैं ,वो आरियों के साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ सज्जन केवल लेखक होते है और कुछ केवल टिप्पणी कार होते है ( वैसे टिप्पणी कार भी टिप्पणी करते करते अन्ततोगत्वा लेखक हो ही जाते है ) और कुछ दोनो ही होते है लेखक और टिप्पणी कार भी /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक उल्लू बेचने वाला उल्लू बेच रहा था /बडा उल्लू पचास का बच्चा उल्लू पॉँच सौ का / कारण ? उसने बताया कि साहब बडा तो केवल उल्लू ही है और छोटा तो उल्लू भी है और उल्लू का पट्ठा भी /(मै लिखता भी हूँ और टिप्पणी भी करता हूँ कोई अपने ऊपर न ले )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ विद्वानों का मानना है कि टिप्पणी से साहित्यकार का उत्साह वर्धन होता है /यदि किसी ने तारीफ (झूंठी ही सही ) करदी तो उत्साहित होकर लिखने लगा और किसी ने बुरी करदी तो हतोत्साहित हो गया / वह क्या साहित्यकार हुआ ? किसी ने मुझे गधा कह दिया और मैं फ़ौरन दुल्लती मरने लगा तो मैं क्या आदमी हुआ ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यद्यपि ,आमतौर पर साहित्यकार खुद्दार होता है और होना भी चाहिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो सर से लेकर पांव तक खुद्दार नहीं है &lt;br /&gt;हाथों में कलम लेने का हकदार  नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरानी बात है ,एक शायर महल (किला ,कोठी जो भी हो ) में जाया करते  थे ,बादशाह भी शायर थे ,खूब पटती थी /एक दिन बादशाह सलामत ने शायर से पूछा " किवला ,कितने दिन में शेर कह लेते हो ? ( कह लेते हो मतलब लिख लेते हो ,यह शायरों की भाषा है ) शायर बोले ,हुजूर ,जब तबीयत लग जाती है तो एक दो माह में दो चार शेर कह लेता हूँ /बादशाह ने हंसकर  फरमाया -जनाब दो चार शेर तो मैं यूं , पैखाने में बैठ कर ही, रोज़ कह लिया करता हूँ /शायर ने तुंरत कहा कि हुज़ूर उनमे वैसी बू भी आती है / और शायर महल छोड़ कर आगये और फिर कभी नहीं गए /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवती चरण जी ने जब चित्रलेखा लिखा तो कहा गया कि यह तो एक अंग्रेजी उपन्यास की नक़ल है /अभी दो  तीन माह पूर्व एक विद्वान ने ""पाखी "" पत्रिका में लिखा कि मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'फूस की रात 'संसार की सबसे घटिया कहानी है /अब क्या कहें ,है तो है ,भैया अब तुम लिखदो संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानी /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर लेखक और टिप्पणी कार या आलोचक यह तो साहित्य जगत के दो पहिये हैं ,दो पहियों के बिना गाडी नहीं चल पाती है /पहिये शब्द पर से मुझे याद आरहा है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मेरी शादी हुई थी तब हमारे पंडित जी हमें उपदेश देने लगे -देखो बेटा ,यह गृहस्थी एक गाडी है ,इसमें स्त्री पुरुष दो पहिये हैं इनमे सामंजस्य होना चाहिए /मैंने पूछा पंडित जी यह बताओ कि गाडी में एक पहिया सायकल  का और दूसरा ट्रेक्टर का लगा हो तो ? मुझे याद है ,पंडितजी ने मेरी पत्नी की ओर देखा ,मुस्कराए ,और चुप हो गए /&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8432619578449023283?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8432619578449023283/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8432619578449023283' title='31 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8432619578449023283'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8432619578449023283'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='टिप्पणी कार'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>31</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7612399899358629385</id><published>2009-04-27T01:24:00.000-07:00</published><updated>2009-04-27T01:29:59.566-07:00</updated><title type='text'>भावार्थ (व्यंग्य )</title><content type='html'>( दीनहीन,पराधीन ,विचाराधीन ,जीर्णशीर्ण ,जराजीर्ण ,  जीर्णकाय, जो शब्द उपुयक्त हो वह अथवा गिरती दीवार हूँ ठोकर न लगाना मुझको की मानिंद )&lt;br /&gt;एक बुजुर्ग ==गर्मी का मौसम ==दोपहर का वक़्त =  हैण्डपम्प के पास ==एक निवेदन ==प्यास लगी है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ==देख तो बुढऊ,क्या कह रिया हैगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो =   मैंने तो देखते ही समझ लिया था बुड्ढा बदमाश है&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तीन = आँखे तो देखो इसकी /कैसी गिरगिट जैसी है&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;चार = साला हमसे प्यास बुझाने की बात करता है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक  =चल वे बुड्ढे माफी मांग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो =माफी से काम नहीं चलेगा  ऐसे नीचों को ;तो पुलिस के हवाले ही करना चाहिए&lt;br /&gt;       बुजुर्ग को ऐसे प्रतीत हुआ जैसे किसी कंजूस ने अपनी सारी संपत्ति गवां दी हो जैसे किसी योद्धा ने शूरबीर का बाना पहन युद्ध भूमि से पीठ दिखला दी हो जैसे किसी साधूसम्मत आचरण वाले ने धोखे से मदपान कर लिया हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"" नयन सूझ नहि सुनहि न काना / कही न सकहि कछु अति सकुचाना /""&lt;br /&gt;सही भी है&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;""संभावित कहुं अपजस लाहू / मरण कोटि सम दारुण दाहू /""   &lt;br /&gt;थाने में&lt;br /&gt;----------&lt;br /&gt;थानेदार =मगर बुड्ढा तो कह रहा है की उसने कहा था प्यास लगी है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फरियादी =दारोगा जी मतलब तो वही हुआ /जब प्यास लगेगी तभी तो प्यास बुझायेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फरियादी दो =दारोगाजी आप साहित्य नहीं समझते क्या ? साहित्य में एक अलंकार होगा है ""पर्यायोक्ति""तुलसी दास जी ने मानस में बहुत प्रयोग किया है / "" सहसबाहु भुज ----------दससीस अभागा ""तक में किसी का नाम नहीं लिया किन्तु चार वेद और छ: शास्त्र का ज्ञाता रावन समझ गया कि अंगद  परसुराम वाबत कह रहा है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फरियादी तीन = आशय और उद्देश्य (इंटेंशन एंड मोटिव )से सारा अपराध शास्त्र भरा पड़ा है  आप कानून के जानकर होकर कानून के आशय शब्द का आशय नहीं समझते है&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;फरियादी चार =दारोगा जी आपने इंटरप्रीटेशन आफ स्टेट्यूट नहीं पढ़ा क्या /इंटरप्रीटेशन का सामान्य सिद्धांत है कि शब्दों को प्रथमत : उसके स्वाभाविक ,साधारण या प्रचलित अर्थ में समझना चाहिए तथा अभिव्यक्तियों और वाक्यों का अर्थान्वयन उसके व्याकरणिक अर्थ में करना चाहिए&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;फरियादी एक =अरे जब तक ये कानून के रखवालों को कानून की भाषा और साहित्य का ज्ञान नहीं होगा तब तक ऐसे सामाजिक गंदगी को हमें ही साफ करना होगी&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;       और ==""हम सब एक हैं / जो हमसे टकराएगा ,मिट्टी में मिल जायेगा "" का नारा बुलंद हुआ और वहीं थाने में थानेदार के सामने बुड्ढे की ठुकाई पिटाई शुरू हो गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस वक्त मुझे शेर याद आरहा था कलीम अज़ीज़ साहेब का sher yaad araha thaa &lt;br /&gt; =&lt;br /&gt; "" अभी तेरा दौरे शबाब है ;अभी कहाँ हिसाबो किताब है /&lt;br /&gt;    अभी क्या न होगा जहान में ;अभी इस जहाँ में हुआ है क्या /""&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7612399899358629385?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7612399899358629385/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7612399899358629385' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7612399899358629385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7612399899358629385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='भावार्थ (व्यंग्य )'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-5272640652373823233</id><published>2009-03-23T06:53:00.000-07:00</published><updated>2009-03-23T06:59:10.033-07:00</updated><title type='text'>aur pahad toot gaya</title><content type='html'>मैं एक पारिवारिक पत्रिका पढ़ रहा था /उसमे विबिध  सामग्री रहती है /लायब्रेरी से घर ले आया /बड़ी उपयोगी बातें होती हैं -एक उपयोगी विधि थी ,रात के बचे चावलों का उपयोग /सुबह मैंने देखा एक किलो चावल पके हुए रखे हैं ,जो रेसिपी ;के मुताबिक उपयोग करने रात को पका कर फ्रीज़ में रख दिए गए थे /फ्रीज़ भी गज़ब की उपयोगी चीज़ है इसमें बस्तु तब तक रखी जा सकती है तब तक की वह फैकने लायक न हो जाये &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस पत्रिका में एक लेख था -उसमे क्या हरेक में होता है ,हर दूसरा लेख स्त्री विमर्श पर ,हर तीसरी कविता महिला उत्पीडन पर और हर चौथी कहानी पुरुष प्रधान समाज पर /लगता है जैसेसाहित्य ;में ,भक्तिकाल ,बीरगाथाकाल ,रीतिकाल हो चुके है वैसे ही शायद आज का साहित्य पुरुषप्रधानसमाज काल होगा /खैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो उसमे एक लेख था जो भावावेश में ,क्रोधित या दुखी होकर लिखा गया था लेख बड़ा था किन्तु उसका मंतव्य केवल मात्र इनता था कि -पत्नी द्वारा पति को साहब शब्द प्रयोग करना गुलामी मानसिकता का प्रतीक होता है ,इसमें साहब और नौकर के सम्बन्ध जैसी बू आती है ,ऐसे प्रयोग वर्जित होना चाहिए ,पति पत्नी का मित्र होता है साहब नहीं /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि किसी के अहम को चोट न लगे तो मेरा विनम्र निवेदन यह है कि =&lt;br /&gt;प्रात: नौ बजे से शाम छै:बजे तक ,फाइलों से माथापच्ची करने ,परिवार को ज़रूरियत मुहैया करने कि लिए पसीना वहाने बाले को यदि पत्नी ने साहब शब्द का प्रयोग कर दिया तो न तो वह दयनीय हुई ,न सोचनीय और न उसने कोई अहसान किया है /तांगे में जुतने वाले घोडे को भी खुर्रा किया जाता है सहलाया    जाता है पीठ थपथपाई जाती है तो पति नमक प्राणी भी इन्सान है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हम भी कह देते हैं कि मैडम घर पर नहीं है ,या श्रीमती जी बाज़ार गई हैं तो पत्नी ने अगर कह दिया कि साहब घर पर नहीं है तो वह कौनसे उत्पीडन का शिकार हो गई /पति को अगर स्वामी कह दिया तो वह शब्दार्थ की द्रष्टि से ,साहित्य की द्रष्टि से या मानसिकता के लिहाज़ से उपयुक्त ही है /जो है उसको वह कहना अपराध नहीं है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युद्धसिंहजी ने किसी नवाब को गधा कह दिया ,मान हानी का दावा ,युद्धसिंह पर जुर्माना /युद्ध सिंह का अदालत से निवेदन .हुकम आयन्दा किसी नवाब को गधा नहीं कहूंगा /पण म्हारो यो अरज  छै कि किसी गधे को तो नवाब साहिब कह सकूं /या में तो अपराध णी बणे /जज ने किताबें देखी दफा ५०० बगैरा, बोले नहीं /युद्धसिंह जी ने भरे इजलास में ,नवाब साहिब की ओर मुखातिब होकर ,मुस्करा कर कहा ;नवाब सा'ब=  न म स का र/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर मूल बात =पति शब्द का शाब्दिक अर्थ ही होता है स्वामी /यथा महीपति ,भूपति ,करोड़पति आदि ,/वास्तब में पति स्वामी होता है किन्तु वह पत्नी का नहीं बल्कि गृह का स्वामी होता है और पत्नी गृह स्वामिनी /स्वामी को स्वामी और स्वामिनी को स्वामिनी कह देने पर किसके सम्मान को कहाँ ठेस लग गई /आगंतुक गृह स्वामी को तलाश करने आया है और अगर पत्नी ने कह दिया कि साहब घर पर  नहीं तो कौनसा पहाड़ टूट गया /इसमें कहाँ तो पत्नी का आत्मसम्मान कम हो गया और कहाँ वह सोचनीय हो गई /क्या आगंतुक से यह कहा जाता कि बृजमोहन घर पर नहीं है या कि मेरा आदमी घर पर नहीं है =&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या कि मेरा मरद घर पर नहीं है और मानलो पत्नी गुस्से में है ,क्रोधित है ,परेशान है और जैसा  कि हम लोग गुस्से में नामुराद ,नामाकूल ,नालायक जैसे शब्दों का प्रयोग कर देते है वैसे ही क्या पत्नी अपने मरद के लिए कहदे कि .......घर में नहीं है /&lt;br /&gt;पति पत्नी एक दूसरे को आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करें -करना ही चाहिए /मगर विचारधारा तो यह चल रही है कि हज़ार साल पहले यदि सताया गया ,शोषण किया गया ,दवा कर रखा गया तो उसका बदला आज लिया जाए /&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-5272640652373823233?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/5272640652373823233/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=5272640652373823233' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5272640652373823233'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5272640652373823233'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/03/aur-pahad-toot-gaya.html' title='aur pahad toot gaya'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8959501794731101460</id><published>2009-03-15T02:42:00.000-07:00</published><updated>2009-03-15T02:47:12.344-07:00</updated><title type='text'>हम कुछ सोचें</title><content type='html'>एक दस वर्षीय वालिका मिनी स्कर्ट  और टॉप पहने नृत्य कर रही है -उसके माता पिता अपनी होनहार बालिका का नृत्य देख कर आनंद मग्न हो रहे हैं -डेक पर केसेट बज रहा है""कजरारे कजरारे तेरे नैना ""गाने के बोल के अनुसार ही बालिका का अंग संचालन हो रहा है - देश की इस भावी कर्णधार -समाज में नारी समुदाय का नेतृत्व करने वाली बालिका की भाव भंगिमा ने पिता का सर गर्व से ऊंचा उठा दिया है - और पिता की प्रसन्नता देख माताजी भी भाव विभोर हो रही हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सुना ही था की साहित्य समाज का दर्पण है आज प्रत्यक्ष देख भी लिया -वस्त्रों और अंगों पर लिखा जा रहा फिल्मी साहित्य अब गर्व की वस्तु होने लगी है -&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का बच्चा बेड बिस्तर समझ जाता है _शायद ""खटिया"" नहीं समझता ,ठंड कोल्ड समझता है मगर ""जाड़ा""नहीं समझ पाता है मगर बेचारे की विवशता है कि गाना सुनना पड़ रहा है उसे ,चाहे वह सरकालेओ का अर्थ समझता हो या न समझता हो / &lt;br /&gt;एक तर्कशास्त्र के प्रकांड पंडित कह रहे थे बच्चे ऐसे गाने सुनते ही क्यों है जब रिमोट उनके हाथ में है तो चेनल बदल क्यों नहीं लेते / माँ बाप देखने ही क्यों देते है ? साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों यह बात वे सुनने को तयार नहींएक गाना और चला था "" तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त ""किसी लडकी या नारी को देख कर चीज़ कहना कुत्सित मानसिकता का प्रतीक है -फूहड़ और अश्लील नाच पर सीटी बजा कर हुल्लड मचाने वालों की भाषा संस्कार में आरही है लडके आज उस धुन पर गा रहे हैं और लडकियां उस धुन पर झूम रही हैं -इससे ज़्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है&lt;br /&gt;नारी चाहे पत्नी हो -माँ हो बहिन हो पुत्री हो या कोई भी हो उसे तेजस्वनी दामिनी बनाया जासकता है उसे प्रतिभासंपन्न तेजपुंज युक्त और सामर्थ वान बन ने की प्रेरणा दी जा सकती है =अत्याचार और अन्याय -शोषण और उत्पीड़न के विरोध में खडा होना सिखाया जा सकता है -उसे मंत्री से लेकर सरपंच और पंच बन ने तक की प्रेरणा देना चाहिए मगर नारी के प्रति अशोभनीय वाक्यांशों का प्रतिकार होना &lt;br /&gt;चाहिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाक एवम लेखन की स्वंत्रता है -जब स्वतंत्रता निरपेक्ष और दायित्वहीन हो जाती है तो स्वेच्छाचारिता हो जाती है वहा यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है की यह स्वतंत्रता विधि सम्मत नहीं है और किसी दूसरे की स्वन्त्न्त्र्ता में बाधक तो नहीं है =ज्ञान और भावों का भण्डार ,समाज का दर्पण -ज्ञान राशी का संचित कोष यदि मानव कल्याणकारी नहीं है तो उसे में साहित्य कैसे कहा जा सकता है /फिल्मी गाने क्या साहित्य की श्रेणी में नहीं आते इस और भी साहित्य कारों का ध्यान आकर्षित होना चाहिए&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8959501794731101460?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8959501794731101460/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8959501794731101460' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8959501794731101460'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8959501794731101460'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='हम कुछ सोचें'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-6849037487813130427</id><published>2009-02-24T19:15:00.000-08:00</published><updated>2009-02-24T19:18:42.087-08:00</updated><title type='text'>ढूंढो ढूंढो रे साजना</title><content type='html'>इस संसार में चर, अचर, सचराचर जितने  प्राणी  हैं उनमें एक जीव ऐसा भी  है जिसे सजन कहा जाता है /यह सजन इस संसार में कुछ न कुछ ढूँढने के लिए ही अवतरित हुआ  है /अब से चालीस- पचास  साल पहले उससे कहा गया = ""ढूंढो ढूंढो रे साजना मेरे कान का बाला"" = अपनी इस खोज में वह सफल हो ही नहीं पाया था तब  तक दूसरा आदेश प्रसारित हो गया ="" कहाँ गिर गया ढूंढो सजन बटन मेरे कुरते का"" =सिद्ध बात है उसमें भी वह असफल रहा तभी तो लगभग सभी म्यूजिक चैनल  उनकी पुनाराब्रत्ति  कर रहे है, बिल्कुल पत्र -स्मरण पत्र -परिपत्र और अर्ध शासकीय पत्र की तरह /आप ही बताइए कान का बाला और बटन यदि सजन को मिल गया होता तो वह टी वी  पर क्यों बार बार, लगातार गाती =क्या पागल हुई है ? ऐसे  ही में एक औरत को देखता हूँ, चिल्लाती है =""हाय मेरी कमर"" -दबाई लगती है- मुस्कराती है, मगर एक घंटे बाद फिर =हाय मेरी कमर =आखिर ऐसी  कैसी दबाई है -दस साल से देख रहा हूँ =इलाज परमानेंट होना चाहिए&lt;br /&gt;ऐसी बात नहीं है कि वह कुछ ढूंढता ही न हो ,ढूँढता है /  आधुनिक संगीत में सुर-ताल, लय, गाना किस राग पर आधारित है तथा गाने के बोल के अर्थ ढूँढता है -हस्त रेखाओं में भविष्य और जन्मपत्री में भाग्य ढूँढता है -राजनीती में चरित्र और आधुनिक पीढ़ी में संस्कार ढूँढता है -वर्तमान समस्याओं का समाधान हजारों साल पुराने ग्रंथों में ढूँढता है /कुछ लोगों की आदत होती है की वे कुछ न कुछ ढूंढते ही रहते है -कहते है ढूँढने में हर्ज़ ही क्या है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग अपनी दैनिक दिनचर्या को त्याग कर, जीवन का उद्देश्य ढूंढते है / हम कौन हैं ?क्या हैं? कहाँ से आए है?कहाँ जायेंगे ? क्या लाये थे ?क्या ले जायेंगे  आदि-इत्यादि ,  और इस चक्कर में या तो वे कार्यालय देर से पहुँचते हैं ,या उनकी टेबिल पर फाइलों का अम्बार लग जाता है /उनकी पत्नियां सब्जी और आटे के पीपे का इंतज़ार करती रहती हैं / में कौन हूँ -कहाँ से आया हूँ क्यों आया हूँ ==अरे तू तू है घर से दफ्तर आया है काम करने आया है -बात ही ख़त्म /&lt;br /&gt;कुछ लेखक लेख लिखकर डाक में डालकर चौथे दिन से पेपर में अपना नाम ढूढने लगते हैं ,उधर संपादक महोदय उस लेख को पढ़ते हैं तो टेबिल की दराज़ में सरदर्द की गोली ढूँढने लगते हैं और अगर छाप दिया तो पाठक क्या ढूडेगा कुआ या खाई /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस धरती पर स्वर्ग और नरक ढूँढने वाले हजारों हैं जिनको यहाँ उपलब्ध नहीं हो पता है -वे ऊपर है इसी कल्पना करके जीवन जैसा जीना चाहिए वेसा जी नहीं पाते ,किसी ने कहा है =तू इसी धुन में रहा मर के मिलेगी जन्नत -तुझ को ऐ दोस्त न जीने का सलीका आया = इससे अच्छे तो कार्यालय के कर्मचारी होते हैं जिनका बॉस जब गुस्सा होता है और कहता है -गो टू हेल -तो वे सीधे अपने घर चले आते हैं /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग प्राप्त की उपेक्षा करके, अप्राप्त को प्राप्त कर  सुख ढूँढने की चाह रखते हैं, तो, कोई तनाव ग्रस्त -हताश -उदास -निराश -चिंतित व्यक्ति परिश्रम खेल व्यायाम मित्र- मंडली, हँसी- मजाक को नज़र अंदाज़ कर, नींद की गोलियां ढूंढते है /कुछ युवक खेलना बंद करके जवानी में बुढापा और कुछ बुजुर्ग मनोरंजन को अपना साधन बना कर  बुढापे में युवावस्था ढूंढते है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग मूड ठीक करने और गम ग़लत करने क्या ढूँढ़ते है आप सब को पता है =मधुशाला= गन्ने के रस वाली नहीं -हरिबंश जी की मधुशाला  भी नहीं बल्कि मधुशाला याने मयखाना =मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूँ गम भुलाने को =मगर होता इसके बिल्कुल विपरीत है ==आए थे हँसते खेलते मयखाने की तरफ़ -जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए /&lt;br /&gt;मजेदार बात देखिये ऐसी बात तक बताई जाती है कि ""कहते है उम्रे-रफ्ता कभी लौटती नहीं -जा मयकदे से मेरी जवानी उठा के ला ""अब जो मयखाने में जवानी ढूँढेगा उस का क्या होगा /एक जवानी और पडी  मिलेगी कहीं नाली में /&lt;br /&gt; सार बात यह कि सजन को जो ढूंढ़ना चाहिए वह न ढूंढ कर ,जो नहीं ढूँढना चाहिए वह ढूंढता है ,इसी लिए वह अभी तक सजन है नहीं तो कभी का सज्जन बन चुका होता /&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-6849037487813130427?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/6849037487813130427/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=6849037487813130427' title='25 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6849037487813130427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6849037487813130427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/02/blog-post_24.html' title='ढूंढो ढूंढो रे साजना'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>25</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-7768704111750622724</id><published>2009-02-07T07:16:00.000-08:00</published><updated>2009-02-07T07:19:36.885-08:00</updated><title type='text'>पुत्रदान क्यों नहीं</title><content type='html'>जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है विवाह और विवाह का एक महत्वपूर्ण अंग है कन्यादान / पाणिग्रहण ,सप्तपदी ,पांच और सात वचन तो समझ में आते हैं क्योंकि वह वर -वधु दोनों का मिला जुला कार्यक्रम है ,किंतु कन्यादान का रिवाज़ कब व कैसे प्रचलित हुआ ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या वेदों में कन्यादान का विधान है ? हो सकता है /पुराणों में दस महादान का वर्णन है उनमें से कन्यादान भी एक दान है /मानस में गोस्वामीजी ने दो विवाह करवाये हैं / एक तो शंकरजी का "" गहि गिरीश कुस कन्या पानी ,भवहि समरपी जानि भाबानी "" दूसरे विवाह में सीताजी का कन्यादान कराया है ""करि लोक वेद विधानु कन्यादान नृप भूषण कियो ""स्वाभाविक है गोस्वामीजी की स्वयं की जैसी शादी हुई होगी वैसा ही उन्होंने वर्णन किया होगा -पुराणों में दस महादानो का वर्णन है इनमें से एक तो हुआ कन्यादान वाकी नौ है --स्वर्ण ,अश्व ,तिल , हाथी ,दासी ,रथ ,भूमी ,ग्रह और कपिला गौ /ध्यान रहे यह सब सम्पत्ति है /स्त्री हमेंशा से संपत्ति मानी जाती रही थी / उसका क्रय विक्रय होता था , उसे गिरवी रखा जाता था , जुए में हारा जीता जाता था तो अन्य संपत्ति के दानो की तरह इस कन्या रूपी संपत्ति के दान की परिपाटी प्रचलित हुई होगी /दान के साथ दान की हुई संपत्ति की स्थिरता के लिए अतिरिक्त द्रव्य समर्पित करने का प्रावधान शास्त्रों में था ताकि दान में दी हुई संपत्ति का रख रखाव  आदि किया जाता रहे /इसने कन्यादान मे दहेज़ का रूप धारण कर लिया/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दहेज़ का दूसरा पहलू यह भी रहा होगा कि चूंकि कन्या संपत्ति होती थी पराया धन होती थी इसलिए पिता की जायदाद मे उसका हक नही होता था और चूंकि पुत्र जो कि संपत्ति नहीं होता था उसके हिस्से मे बाप की जायदाद आजाती थी / किंतु फिर भी पुत्री होती तो थी  माँ बाप के जिगर का टुकडा -इसलिए पिता अपनी जायदाद से प्राप्त आय मे से एक बडा हिस्सा पुत्रों की सहमति से पुत्री को दे दिया करता था और चूंकि बात भी वाजिव थी इसलिए पुत्र को भी क्यों आपत्ति होने लगी / फिर लडकी चली जाती थी पराये घर और जमीन जायदाद ,खेती बाड़ी-रहती थी पुत्रों के पास /इसलिए बहन को बिभिन्न त्योहारों पर ,भाई दूज , उसके पुत्र पुत्रियों की शादी मे मामा भात , पहरावनी, मंडप आदि के रूप मे संपत्ति की आय मे से कुछ हिस्सा लडकी को पहुंचता रहता था /अब उसका रूप लालची धन्लोलुपों ने विकृत कर दिया है / लडकी के पिता की स्वेच्छा अब लडके के पिता की आवश्यकता हो गई /एक सद्भाविक परम्परा कुरीति हो गई /यह कुरीति गरीब पिता के लिए अभिशाप हो गई /जो स्वम  किराए के मकानों मे रहकर ,मामूली -सी नौकरी करके ,अपना पेट काट कर बच्चों को पालता पढाता रहा हो जिसके बेटे बेरोजगार हों और बेटी सयानी उसकी क्या तो संपत्ति होगी और क्या लडकियां हिस्सा लेंगी/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सवाल उठता है पुत्र दान का -कल्पना कीजिए चलो किसी ने कर ही दिया पुत्र दान तो फिर क्या ? लडकी तो लडके के घर आजाती है =कई समाज मे तो यह भी है कि लडकी का बाप या बडा भाई -लडकी की ससुराल मे पानी भी नहीं पीता है - -दान कीहुई संपत्ति का थोडा से  भी  हिस्से का उपयोग वर्जित है -आपको तो पता है कि एक हजार गाय दान मे दी और धोके से एक गाय वापस आगई और उसका पुन दान हो गया तो नरक के दरवाजे खुल गए थे /खैर तो लडकी तो लडके के घर आजाती है अब मानलो लडके का भी दान हो गया तो वह कहाँ रहेगा अपनी ससुराल में यानी घर जवाई - और कन्या का दान कर दिया तो वह मायके में कैसे रहेगी -और यदि लड़का अपने ही घर में रहता है तो उसके माँ बाप उसकी कमाई कैसे खाएँगे -दान किए हुए पुत्र की कमाई घोर अनर्थ हो जाएगा =बडी दिक्कत हो जायेगी/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है यह दिक्कत उस वक्त पुत्र दान करने के समय पेश आई हो /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस लेख का अंत कैसे और किन शब्दों में हो ,इस का उपसंहार मेरी  समझ से बाहर हो रहा है /&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-7768704111750622724?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/7768704111750622724/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=7768704111750622724' title='27 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7768704111750622724'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/7768704111750622724'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='पुत्रदान क्यों नहीं'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>27</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-3499026647206118971</id><published>2009-01-21T04:05:00.000-08:00</published><updated>2009-01-21T04:09:45.595-08:00</updated><title type='text'>डाटर्स मेरिज फोबिया</title><content type='html'>मस्ती में झूमते बारातियों का शानदार स्वागत वी.आय.पी. कुर्सियाँ, टेंट-शामियाना, लाईट डेकोरेशन, मंच व्यवस्था - टीके में ; मांगी गई एक निश्चित धनराशि की प्रथम किश्त के साथ मोटर साइकिल व कर (जैसा अनुवंध हो ), वर के पूरे खानदान के लिए अच्छे व महंगे कपड़े, -द्वाराचार की रस्म पर दूसरी व अन्तिम किश्त, महंगा गर्म सूट रंगीन टी वी, पैर पूजने महंगा आइटम, लडकी को स्वर्ण के जेवर, गृहस्थी के समस्त बर्तन, डबल वेड, सोफा आदि इत्यादि/ - जब भी मेरे मित्र यह सब देखते हैं उनके ह्रदय से एक टीस मिश्रित आह निकलती है ""-इतना सब तो करना ही पडेगा -सभी कर रहे हैं सब जगह होने लगा है"" इतना सब कुछ मैं कैसे कर पाऊंगा/&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इतना सब मैं कैसे कर सकूंगा सोच सोच कर उनका जी घबराने लगता है दिल बैठने लगता है ,उनकी तबियत बिगड़ जाती है -डाक्टर आता है नींद का इंजेक्शन , एक दो दिन त्रास शामक औषधियां , और धीरे धीरे वे नार्मल होने लगते है - न तो उनके स्वजन और न ही परिवार जन , न ही चिकित्सक जान पाते हैं की उनकी घबराहट की वजह क्या है - शामक औषधियां  अब उनके लिए प्रतिदिन की खुराक हो चुकी है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उनकी बीमारी का नाम रखा है डाटर्स मैरिज फोबिया -किसी चिकित्सा शास्त्र या किसी पैथी में ऐसी बीमारी या ऐसे लक्षण नहीं लिखे है यह तो मेरा ही दिया हुआ नाम है -हाइड्रो फोबिया -अल्टो फोबिया - बाथोफोबिया आदि बीमारियों का , चिकित्सा शास्त्र में उल्लेख भी है और उपचार भी = डाटर्स मैरिज फोबिया देश व्यापी अन्य घातक बीमारियों की तरह जानलेवा तो नहीं है इससे मरीज़ मरता तो नहीं है किंतु वह जीता भी नहीं है अधवीच में लटका रहता है त्रिशंकु की तरह /उसके चेहरे पर दुःख शोक और निराशा के भाव साफ दिखाई देने लगते है -वह अन्यमनस्क, व्याकुल व चिडचिडा हो जाता है एकांत की तलाश में रहता है और शोर से घबराता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस प्रकार निर्धन का एक मात्र लक्ष होता है की किसी तरह अमीर हो जाय - जिस प्रकार निरक्षर का एक लक्ष्य होता है की कुछ पढ़ लिख जाय ,उसी तरह पुत्री के पिता का जीवन में एक ही लक्ष्य होता है की किसी तरह इसके हाथ पीले हो जायें ,हाथ पीले हो जायें तो हम गंगा नहा जायें सिर से बोझ उतर जाए, कुछ और लोगों ने कहावतें बना रखी हैं की लड़की की डोली और मुर्दा की अर्थी जितनी जल्दी उठ जाए उतना ही अच्छा होता है =अर्थी वाली बात तो समझ में आती है कि तबतक घर में भयंकर कुहराम मचा रहता है लेकिन लड़की की डोली? -और इन्हे शर्म भी नहीं आती/ लडकी के भावी जीवन से कोई लेनादेना नहीं है इनका - रोज़गार बेरोजगार कम पढ़ा लिखा कैसा भी हो लडकी का पेट तो भर ही देगा मतलब लडकियां मात्र पेट भरने के लिए ही पैदा होती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ विबाह योग्य वर दिखता है या उसके वारे में पढा सुना जाता है तो कन्यायों के पिता उस पर मुग्ध होकर दौड़ने लगते हैं जिस तरह पतंगे अग्नि की ओर दौड़ते हैं फिर वर की आर्थिक मांगें पूरी न कर सकने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता है ,जब वर अन्यत्र बिक जाता है तो दुःख से अत्यन्त व्याकुल रहते हैं जैसे संसार के सबसे बडे लाभ से उन्हें बंचित कर दिया गया हो -जिस तरह सारी नदियाँ द्रुत गति व प्रवाह  से समुद्र की ओर दौड़ती हैं उसी तरह चारों तरफ से कन्यायों के पिता वर की ओर दौड़ते हैं --पूर्ती कम और मांग ज़्यादा तो मूल्य ब्रद्धि स्वाभाविक है अर्थ शास्त्र का यही नियम है&lt;br /&gt;        जहाँ बिना दहेज के शादी हो रही हो -जहाँ लड़का कार और लडके की माँ नकदी व जेवर न मांग रही हो - बिध्युत सज्जा से दूर दिन के उजाले में सादगी पूर्ण तरीके से विवाह सम्पन्न हो रहा हो क्या ऐसा माहोल आज सम्भव नहीं हो सकता&lt;br /&gt;       जहाँ लडकी की शादी के लिए मकान व जेवर रहन नहीं रखे जा रहे हों -जहाँ पुश्तेनी खेती की जमीन विक्रय न की जारही हो -जहाँ लडकी के बाप पर दबाव न डाला जा रहा हो की =बरात के स्वागत में कोई कमी रही तो हमसे बुरा कोई न होगा =अमुक राशी या सामान देने पर ही लडकी को ले जाया जायेगा अथवा लडके लो फेरों पर भेजा जाएगा ,क्या युवा पीढी इस ओर ध्यान दे सकती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ लडके के बाप के सर पर इतना लोभ सवार न हो रहा हो की प्रसूतिकाल में खिलाये गए हरीला और पिलाए गए दशमूल काड़े से लेकर उच्च शिक्षा पर मय डोनेशन व केपीटेशन फीस पर हुआ व्यय मय व्याज के लडके के बाप से वसूल करना चाहता हो ,विचारधारा में कुछ परिवर्तन सम्भव है/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि आज की शिक्षित और युवा पीढी जरा भी इस ओर ध्यान दे तो बहुत से बाप अपने जीवन की बची सांसे चेन से ले सकते हैं/&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-3499026647206118971?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/3499026647206118971/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=3499026647206118971' title='29 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/3499026647206118971'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/3499026647206118971'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/01/blog-post_21.html' title='डाटर्स मेरिज फोबिया'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>29</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-4891718848326299093</id><published>2009-01-15T00:05:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T04:56:27.952-08:00</updated><title type='text'>कोशिश -ऐ हाइकू</title><content type='html'>&lt;strong&gt;       (१)&lt;br /&gt;एक दिन कहने लगीं मै ही मिलती हूँ तुमसे लड़ने दफ्तर का गुस्सा उतरने &lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेम तुमसे &lt;br /&gt;लडूं किसी और से &lt;br /&gt;कहाँ की तुक&lt;br /&gt;                     (२)&lt;br /&gt; &lt;strong&gt;जब कविता समझ में न आई तो लिख दिया बहुत सुंदर  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमेंट लिखा &lt;br /&gt;बहुत ही सुंदर &lt;br /&gt;कविता या मैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  (३)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मै तो बिचारा दफ्तर गया था अटाला खरीदने वाला गली में मेरे मकान के आगे अटाला ,कबाडा ,व्यर्थ ,बेकार ,अनुपयोगी आउट डेटेड ,पुरानी .जीर्णशीर्ण ,जराजीर्ण ,फालतू चीज़ें खरीदने  आवाज़ लगा रहा था&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबाडे वाला &lt;br /&gt;दफतर गये हैं &lt;br /&gt;कल आजाना&lt;br /&gt;               (4)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दुर्बल काया के कारण हमेशा हीन भावना से ग्रस्त रहा इसलिए &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो खिचाओ&lt;br /&gt;हाथी पे शीर्षासन &lt;br /&gt;उल्टा दिखाओ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(५)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मेरे पूर्वज गरीब दयनीय रहे अब मैं सम्रद्ध हूँ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फोटो बनवा &lt;br /&gt;किसी महाराज का &lt;br /&gt;दादाजी बता &lt;br /&gt;(६) &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शिक्षा के महत्त्व से भला किसको इनकार है &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पी एच डी को &lt;br /&gt;ससपेंड करते &lt;br /&gt;लगा अंगूठा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-4891718848326299093?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/4891718848326299093/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=4891718848326299093' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4891718848326299093'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/4891718848326299093'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2009/01/blog-post_15.html' title='कोशिश -ऐ हाइकू'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-687608485976853115</id><published>2009-01-01T23:39:00.000-08:00</published><updated>2009-01-01T23:43:02.201-08:00</updated><title type='text'>ह्रदय कपाट</title><content type='html'>शादी की बात &lt;br /&gt;पहली ही रात &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रामीण दुल्हन &lt;br /&gt;आधुनिक दूल्हा &lt;br /&gt;प्रेम का पिटारा खोल उठा &lt;br /&gt;फिल्मी डायलोग बोल उठा&lt;br /&gt;तुमने किया है किसी से कभी प्यार &lt;br /&gt;कभी हुई हैं किसी से आँखे चार&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;साड़ी में लिपटी &lt;br /&gt;घूंघट में सिमटी &lt;br /&gt;जमीन कुरेदती रही &lt;br /&gt;तिरछी नजर स्वामी को देखती रही&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पति उतावला &lt;br /&gt;सुनने को बावला &lt;br /&gt;एक क्षद्म परीक्षा &lt;br /&gt;नकारात्मक उत्तर की अपेक्षा &lt;br /&gt;चुप्पी असहनीय थी &lt;br /&gt;स्थिति दयनीय थी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुन इसरार हुआ &lt;br /&gt;जिया बेकरार हुआ &lt;br /&gt;प्रश्न बार बार हुआ &lt;br /&gt;ह्रदय कपाट खोल उठी &lt;br /&gt;धीरे से बोल उठी&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बताती हूँ &lt;br /&gt;जल्दी मत कीजिये &lt;br /&gt;पहले मुझे &lt;br /&gt;गिन तो लेने दीजिये&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-687608485976853115?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/687608485976853115/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=687608485976853115' title='25 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/687608485976853115'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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साफ़ कर रही है /एक की हैसियत और दूसरे का स्तर प्रकट हो रहा है /यह तो होता ही आया है और होता ही रहेगा /चलो अपन एक वरमाला कार्यक्रम देखे / &lt;br /&gt;अपनी आर्थिक स्थिति से अधिक खर्च करके बनवाये गए विशाल मंच पर दो सिंहासन नुमा कुर्सियों के सामने सजा दूल्हा और ब्यूटी पार्लर से सुसज्जित करा कर लाई गई दुल्हन अत्यन्त सुंदर बडे बडे हार लिए खड़े हैं =वर  अपने निजी और ख़ास मित्रों की सलाह पर हार डलवाने , झुकने को तैयार नहीं =दोस्त कहते है बेटा आज झुक गया तो जिंदगी भर झुकना पडेगा = भला पत्नी के सामने कौन जिन्दगी भर झुका रहना चाहेगा =तो वह और भी तन कर खडा हो जाता है - बधू की परेशानी स्वभाबिक है =मालायें ड्लती हैं तालियाँ बजती हैं कैमरा मेन ठीक वक्त पर तस्वीर नहीं ले पाता =कैमरा मैन के यह बतलाने पर की वह चित्र नहीं ले पाया है पुन मालायें उतारी जाती हैं पहनाई जाती हैं कैमरा का फ्लश चमकता है -अबकी बार तालियाँ नहीं बजती हैं =&lt;br /&gt;= &lt;br /&gt;दूल्हा दुल्हन कुर्सियों पर बैठ जाते हैं एक महिला आकर कहती है गलत बैठ गए लडकी को बायीं और बिठाओ -पोजीशन बदल जाती है =लडकी का चाचा आजाता है कहता है ठीक बैठे थे बायीं तरफ लडकी फेरों के बाद बैठती है - कुर्सियों पर दूल्हा दुल्हन फिर बदल जाती हैं - मैं अपने आप से कहता हूँ ठीक है कैसे भी बैठ जाओ क्या फर्क पड़ता है क्यों फिजूल में नाटक कर रहे हो =&lt;br /&gt;मंच पर वर माला का कार्यक्रम समाप्त हो गया में जिज्ञासा प्रकट करता हूँ मंच पर वर माला का कार्यक्रम समाप्त हो गया में जिज्ञासा प्रकट करता हूँ इस कार्यक्रम का नाम वरमाला क्यों है बधू माला क्यों नहीं है दोनों ही तो एक दूसरे को माला पहनाते हैं तो वरमाला ही क्यों दहते कहते हैं हमारे जमाने में तो यह कार्यक्रम नहीं होता था - पास की कुर्सी पर एक ब्रद्ध सज्जन पान की जुगाली करते हुए बोले =अजी जनाब यह दस्तूर बहुत पुराना है राजा रामचंद्र के जमाने से वरमाला का कार्यक्रम होता चला आरहा है सीता जी ने राम को वरमाला डाली थी =हमने कहा श्रीमान वह वरमाला नही थी वो तो जय माला थी = इस माला का पाँच वार जिक्र आया है और कहीं भी बाबाजी ने वरमाला शब्द का प्रयोग नहीं किया है सुनिए ==कर सरोज जैमाल सुहाई =फिर =पहिरावाहू जयमाल सुहाई == और ==सिय जयमाल राम उर मेली = तथा रघुवर उर जयमाल =तथा ससिहि सभीत देत जयमाला = बताइये इसमें वरमाला शब्द कहाँ है =&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे पान चवाने में मशगूल थे में चालू रहता हूँ =राम ने तो वीरता का काम किया था =बल शोर्य और पराक्रम की पूजा होती आयी है जयमाला ऐसे ही लोगों के हिस्से में आती है विवेकानंद कहते थे जिस युवक में लडकी को गोद में उठा कर एक मील दौड़ लगाने की क्षमता हो उसी को शादी करना चाहिए =इन दूल्हा दुल्हन को देखो -कपडों से पहिचाने जा रहे हैं =एक से कपडे पहिना दिए जायें तो पता ही न चले की कौन दूल्हा कौन दुल्हन =और यह लड़का जरा हालत देखो इसकी शादी के तीन साल बाद खिलौना फ़िल्म का गाना गायेगा =की में चल भी नहीं सकता हूँ और तुम दोडे जाते हो = &lt;br /&gt;वे शायद बोर हो रहे थे सो लिफाफा निकाल दूल्हा दुल्हन को आशीर्वाद देने चले , में भी लिफाफा टटोलने लगा जिसमें बड़े अहत्यात से एक सो एक रुपे रखे थे बार बार दिमाग में यही विचार आ रहा था की इनसे पांच छे किलो गेहूं आजाता तो आठ दस दिन निकल जाते =पंडितों को पन्द्रह तारीख के बाद व्याह की लग्न निकालना ही नहीं चाहिए =क्या ही अच्छा होता की चार माह तक लगातार सोने की वजाय देव हर माह की पन्द्रह से तीस तारीख तक सोते तो उन्हें भी दो माह का अतिरिक्त विश्राम मिल जाता और हमें लिफाफा रूपी आशीर्वाद देने के लिए अपने मित्रों से आजीवन रिनी रहने के लिए कर्ज़ न लेना पड़ता =यह नितांत सत्य है की पहली तारीख को शादी होगी तो दूल्हा दुल्हन को अधिक आशीर्वाद मिलेगा &lt;br /&gt;=&lt;br /&gt;जैसे देव याचक अग्नि की -योगी एकांत की -रोगी चिकित्सक की -जमाखोर भाव ब्रद्धि की -भयभीत रक्षक की खोज में निरंतर रहता है उसी प्रकार सयानी लडकी का बाप वर की तलाश में निरंतर रहता है =वर यानी दूल्हा उस शादी वाले दिन राजा होता है तभी उसे दूल्हा राजा कहा जाता है == पुराने जमाने में राजा दूसरे कमजोर राज्य पर आक्रमण करता था और राजकुमारी से विवाह करता था आज भी दूल्हा राजा है आक्रामक है बाराती उसके सैनिक है सब वोही रस्मो रिवाज़ वह हथियार रखता है कटार के रूप में -तोरन मारता है -आक्रमण और लूट का सीधा सम्बन्ध है वह दहेज़ लूटता है -लडकी का बाप दुर्वल राज्य का प्रतीक है -पहले रणभेरी तुरही शंख बजते थे आज डिस्को बजता है -पहले युद्ध जीतने के पश्तात सेनिक जश्न मनाते थे आज बाराती नाचते गाते पहले जश्न मनाते है क्योंकि यह तो तय है की युद्ध जीत लिया गया है लडकी के बाप ने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया है अपनी पगड़ी लडके के बाप के चरणों में रख दी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबतक पुरानी प्रथाएं रूप बदल बदल कर कायम रहेंगी बधू कितनी ही पढ़ लिख जाय आत्म निर्भर हो जाय -शराबी पती से शादी नकार दे -बरात लोटादे मगर वर माला वर माला ही कहलायेगी शायद वह बधू माला कभी नहीं कहला पाएगी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8864338080476523083?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8864338080476523083/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8864338080476523083' title='27 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8864338080476523083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8864338080476523083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/12/blog-post_25.html' title='वर माला बधू माला'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>27</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1681606439447731611</id><published>2008-12-23T00:52:00.000-08:00</published><updated>2008-12-23T00:58:12.827-08:00</updated><title type='text'>नानी</title><content type='html'>नानी &lt;br /&gt;नहीं सुनाती कहानी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन रात काम करती &lt;br /&gt;जली कटी बातें सुनती&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;कभी बुआ की कभी पापा की &lt;br /&gt;कभी दादी की कभी चाचा की &lt;br /&gt;शिवजी ने पिया एक बार &lt;br /&gt;नानी पीती है बार बार&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;है जर्जर पर काम बहुत करती है &lt;br /&gt;तभी तो नानी हमारे पास रहती है &lt;br /&gt; मजबूरी का नाम है नानी है  &lt;br /&gt;नानी   ख़ुद है एक कहानी &lt;br /&gt;इसीलिये नानी नहीं सुनाती कहानी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1681606439447731611?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1681606439447731611/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1681606439447731611' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1681606439447731611'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1681606439447731611'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/12/blog-post_23.html' title='नानी'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1495103404912026109</id><published>2008-12-15T23:22:00.000-08:00</published><updated>2008-12-15T23:24:40.682-08:00</updated><title type='text'>१२ दिसम्बर की पोस्ट का जवाब</title><content type='html'>ये क्या मुझको धक्का देंगे ,एक हाथ का जिगर चाहिए &lt;br /&gt;हाँ वैसे छोटे जीवन में कुछ मजाक कर लेना चाहिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आफिस में डांट खाते घर आकर झल्लाते &lt;br /&gt;काक्रोच दिख जाए तो पलंग पर चढ़ जाते &lt;br /&gt;चोर से डरते भूत से डरते &lt;br /&gt;मुझे जगा लाईट जलवाते &lt;br /&gt;बाथरूम तक तो अकेले जा नही पाते &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहेलियां मिलती हैं और पूछती हैं मुझसे &lt;br /&gt;कहो बहिन तुम कैसी हो &lt;br /&gt;मै कहती हूँ अच्छी हूँ &lt;br /&gt;फिर पूछती बच्चे कैसे ,मै कहती हूँ अच्छे हैं &lt;br /&gt;इनका पूछें तो कहती हूँ "न होने से अच्छे हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूंखे मगरमच्छ को देखा ,पूछो इनसे &lt;br /&gt;इनके कपड़े धोये किसने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन तो होना ही है &lt;br /&gt;उस दिन ही निर्णय हो जाता &lt;br /&gt;भूंखे मगरमच्छ के आगे &lt;br /&gt;एक मामला तय हो जाता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश   साथ  में  मै  होती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1495103404912026109?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1495103404912026109/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1495103404912026109' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1495103404912026109'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1495103404912026109'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html' title='१२ दिसम्बर की पोस्ट का जवाब'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-6007959045193346973</id><published>2008-12-12T23:11:00.000-08:00</published><updated>2008-12-12T23:15:04.710-08:00</updated><title type='text'>मज़ाक , नहीं , सीरियस</title><content type='html'>सुविधा संतुलन और वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर शीर्षक में के दो कोमा में से एक हटाने की सुविधा /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलकल करती  नदी&lt;br /&gt;किनारे, चट्टानें, बन, पेड़, पहाड़ &lt;br /&gt;शीतल छाँव घनेरी&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;काश -साथ में तुम होतीं&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पल्लव रंगविरंगे &lt;br /&gt;पक्षीदल की चहक सुहानी&lt;br /&gt;शीतल मंद समीर&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;काश -साथ में तुम होतीं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी में मगरमच्छ मुंहफाड़े &lt;br /&gt;तड़पते भूंखे  बेचारे &lt;br /&gt;द्रवित मन मेरा  &lt;br /&gt;किसको अब में धक्का मारूं &lt;br /&gt;कैसे उनकी भूंख मिटाऊँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश -साथ में तुम होती&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-6007959045193346973?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/6007959045193346973/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=6007959045193346973' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6007959045193346973'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/6007959045193346973'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/12/blog-post_12.html' title='मज़ाक , नहीं , सीरियस'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-2156739905216850949</id><published>2008-12-09T23:17:00.000-08:00</published><updated>2008-12-09T23:33:22.703-08:00</updated><title type='text'>हां इ कु (हाई इस्पीड कुतर्क )</title><content type='html'>(१)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पति स्वामी ,सुहाग ,मालिक ,आका ,धनी की दीर्घायु के लिए किया जाने वाला ब्रत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करवा चौथ &lt;br /&gt;साडी दिला वरना &lt;br /&gt;ब्रत तोडूंगी&lt;br /&gt;(2)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;life is a zoo in judgle &lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पति बहरा &lt;br /&gt;बीबी अंधी ,जीवन &lt;br /&gt;सुखी व शांत &lt;br /&gt;(3)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Do not be so open minded your brain fall out&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;माँ बीबी लड़ें&lt;br /&gt;किसको समझाऊँ &lt;br /&gt;असमंजस&lt;br /&gt;(4)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;May be this world is another planet's hell&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बॉस ने डांटा &lt;br /&gt;मूरख ,गो तू हैल&lt;br /&gt;मैं घर आया&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;(५)&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जीना है तो शेर की तरह जियो&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आटा न दाल &lt;br /&gt;ओढ़ने न बिछाने &lt;br /&gt;मूंछ पे ताव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-2156739905216850949?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/2156739905216850949/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=2156739905216850949' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2156739905216850949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2156739905216850949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/12/blog-post_09.html' title='हां इ कु (हाई इस्पीड कुतर्क )'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-456952789678050890</id><published>2008-12-03T23:14:00.000-08:00</published><updated>2008-12-03T23:43:50.400-08:00</updated><title type='text'>क्यों ?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;                    बृजमोहन -शारदा विद्यालय &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;प्रथम प्रश्न पत्र                                                      पूर्णांक १००&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट _कोई पाँच प्रश्न हल कीजिये सभी प्रश्नों के अंक सामान है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) सुरक्षा व्यवस्था को सुद्रढ़ करने जब सेना है तो (इनकी ) आज्ञा की जरूरत क्यों ? &lt;br /&gt;                       अथवा &lt;br /&gt;   सुरक्षा कर्मियों को मोर्चे पर तैनात करने या कहीं फोर्स भेजने का आदेश देने वाले (ये )कौन ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(२) (  इनके ) बंगलों में किले जैसी सुरक्षा और सिर्फ़ इन्हे ही बन्दूक धारी सुरक्षा क्यों ?देश का हर नागरिक व्ही आई पी क्यों नहीं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(३)  "" सुरक्षा नहीं तो टेक्स नहीं ""यह ग़लत विचारधारा और देश की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर करने का कुविचार किसके दिल में आया और क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(४) शहीद सैनिकों के परिवार को आर्थिक मदद की घोषणा कर वाहवाही लूटने वाले (ये )कौन सेना के पास ऐसा फंड नहीं क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(५) प्रदेश जिनके पिताश्री का है उन्होंने हमले में मोर्चा नहीं सम्हाला क्यों ? न इनमें से कोई हताहत हुआ न शहीद हुआ क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(६)पिस्टल तकिया के नीचे रख क़र सोने का यह संदेश  था और व्यंग्य भी कि अब हमें ही अपनी सुरक्षा करनी पड़ेगी सुरक्षा व्यवस्था से हमारा विश्वास उठ चुका है तो उस का ग़लत आर्थ लगा कर डरपोक बताया आलोचना की गई क्यों ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(७) ९/११ के बाद  अमेरिका की ओर कुद्रष्टि डालने की फिर किसी की हिम्मत  नहीं हुई क्यों ?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;(८) मानव के सारे अधिकार संबिधान  में है अध्याय ७ से १७ तक , तो इन अधिकारों की अधिकता प्रथक से क्यों ?आतंकवादी मानव क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(९) देश में तीन सेना अध्यक्ष है ,प्रतिरक्षा बलों का सर्वोच्च सेनापति है तो रक्षा मंत्री प्रथक से क्यों ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(१) खुफिया एजेंसी किसी दुर्घटना की आशंका की सूचना नेताजी (सरकार ) को देती है सेना अध्यक्ष को नहीं क्यों ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-456952789678050890?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/456952789678050890/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=456952789678050890' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/456952789678050890'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/456952789678050890'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/12/blog-post_03.html' title='क्यों ?'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-5215044799298617666</id><published>2008-12-01T22:55:00.000-08:00</published><updated>2008-12-01T22:57:10.907-08:00</updated><title type='text'>हाय कहूं</title><content type='html'>(१)&lt;br /&gt;चाय न खाना &lt;br /&gt;पति  भूंका उदास &lt;br /&gt;किटी पार्टी &lt;br /&gt;  (२)&lt;br /&gt;काचे मकान&lt;br /&gt;बन गी हवेलिया &lt;br /&gt;पाँच साल में &lt;br /&gt;  (३)                                                                                       भाग जायेगी &lt;br /&gt;जायदाद मांगेगी &lt;br /&gt;सती माँ की जै&lt;br /&gt;  (४)&lt;br /&gt;आइना देखा &lt;br /&gt;हीरोइन समझा &lt;br /&gt;आइना झूंठा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-5215044799298617666?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/5215044799298617666/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=5215044799298617666' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5215044799298617666'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/5215044799298617666'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='हाय कहूं'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-2430043062341685274</id><published>2008-11-25T19:08:00.000-08:00</published><updated>2008-11-25T19:11:28.972-08:00</updated><title type='text'>हाय क्यूं</title><content type='html'>हाइकू या हायकूं का नियम पता चला पहली और तीसरी लाइन में पांच और दूसरी में सात अक्षर होने चाहिए /हाइकू लिखा (५)जैसा निदेश मिला (७) पालन किया (५) /कोशिश की /&lt;br /&gt;                                            &lt;br /&gt;          (१)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         पोंछा लगाया &lt;br /&gt;          अदा की अदा हुई &lt;br /&gt;          काम का काम &lt;br /&gt;            (२)&lt;br /&gt;        तू तू न मैं मैं &lt;br /&gt;         कोई चार्म नहीं है &lt;br /&gt;         ऐसे जीने में &lt;br /&gt;           (३)&lt;br /&gt;       कविता सुनी&lt;br /&gt;        समझ में न आई &lt;br /&gt;        वीन बजाई &lt;br /&gt;         (४)&lt;br /&gt;      जमीन पैसा &lt;br /&gt;       मार दिया बूढी को &lt;br /&gt;       डायन जो थी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-2430043062341685274?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/2430043062341685274/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=2430043062341685274' title='21 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2430043062341685274'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2430043062341685274'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/11/blog-post_25.html' title='हाय क्यूं'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-2263735576131428604</id><published>2008-11-25T18:44:00.000-08:00</published><updated>2009-01-15T01:09:04.632-08:00</updated><title type='text'>हाय क्यूं </title><content type='html'>हाइकू या हायकूं का नियम पता चला पहली और तीसरी लाइन में पांच और दूसरी में सात अक्षर होने चाहिए /हाइकू लिखा (५)जैसा निदेश मिला (७) पालन किया (५) /कोशिश की /&lt;br /&gt;        (१)&lt;br /&gt;     पोंछा लगाया &lt;br /&gt;     अदा की अदा हुई &lt;br /&gt;     काम का काम &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                      &lt;br /&gt;       (२)&lt;br /&gt;     तू तू न मैं मैं &lt;br /&gt;     कोई चार्म नहीं है &lt;br /&gt;     ऐसे जीने में &lt;br /&gt;                  &lt;br /&gt;      (३)&lt;br /&gt;  कविता सुनी&lt;br /&gt; समझ &lt;br /&gt;में न आई &lt;br /&gt; वीन बजाई &lt;br /&gt;               (४)&lt;br /&gt;  जमीन पैसा &lt;br /&gt; मार दिया बूढी को &lt;br /&gt;  डायन जो थी     &lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-2263735576131428604?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/2263735576131428604/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=2263735576131428604' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2263735576131428604'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2263735576131428604'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/11/blog-post_1737.html' title='हाय क्यूं '/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-1007110875498130882</id><published>2008-11-22T04:01:00.000-08:00</published><updated>2008-11-22T04:02:52.288-08:00</updated><title type='text'>चलता रहा</title><content type='html'>चला चलता रहा &lt;br /&gt;कंटकपथ,पथरीली राहें,दलदल &lt;br /&gt;कटा, फटा, जुडा, सिला ,सहा भी&lt;br /&gt;पीड़ा, वेदना, ताप&lt;br /&gt;थका ,गिरा ,उठा ,गिरा &lt;br /&gt;अपना सुख विस्मृत कर ,निवाहा भी &lt;br /&gt;जन्म-सिद्ध कर्तव्य&lt;br /&gt;अब जर्जर ,चिर-पथझड़,परवशता भी &lt;br /&gt;निराश्रित ,उपेक्षित ,बेकार &lt;br /&gt;क्या हूँ ?&lt;br /&gt;रिटायर &lt;br /&gt; या &lt;br /&gt;रिजेक्टेड टायर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-1007110875498130882?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/1007110875498130882/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=1007110875498130882' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1007110875498130882'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/1007110875498130882'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html' title='चलता रहा'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-8811990115599200986</id><published>2008-11-15T22:36:00.000-08:00</published><updated>2008-11-15T22:42:07.127-08:00</updated><title type='text'>आराम</title><content type='html'>वाहन  रिपेयर की दुकान पर ,मिस्त्री को पेंचकस देता &lt;br /&gt;केन्टीन से दफ्तर और नर्सिगहोम के वार्ड में &lt;br /&gt;दौड़ दौड़ कर चाय पहुंचाता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पेपर बांटता ,पालिश करता ,डांट खाता  ,मार खाता &lt;br /&gt;शनिवार को स्कूल छोड़  स्टेशन पर &lt;br /&gt;शनि महाराज बन जाता&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अपनी फटी कमीज़ निकाल  रेल के डब्बे साफ़ करता &lt;br /&gt;हलबाई की दूकान पर ,आंखों से मिस्ठान्न का स्वाद ग्रहण करता &lt;br /&gt;कडाही मांजता&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फ़िल्म देखता ,जेब काटता ,गाली बकता &lt;br /&gt;आठ साल की उम्र में &lt;br /&gt;साठ साल का अनुभव पाता &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिवस मना कर ,भाषण देकर ,मीठा खाकर पान चबा कर &lt;br /&gt;कार में बैठते महोदय से पूछा &lt;br /&gt;सरकार -सुख शान्ति ,चैन ,आराम ,विश्राम &lt;br /&gt;हम कैसे पायेंगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोले चिंता मत करो &lt;br /&gt;तुम्हारे आराम को ,हम ,पैसा पानी की तरह बहायेंगे &lt;br /&gt;और आगामी वर्षों में &lt;br /&gt;करोड़ों बोरबेल ख़ुद जायेंगे&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-8811990115599200986?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/8811990115599200986/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=8811990115599200986' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8811990115599200986'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/8811990115599200986'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/11/blog-post_15.html' title='आराम'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-2939190864690331091</id><published>2008-11-13T01:10:00.000-08:00</published><updated>2008-11-13T01:13:14.184-08:00</updated><title type='text'>उस  पार चलो</title><content type='html'>हम तो जाते हैं दिलदार .'चाँद के पार &lt;br /&gt;यहाँ आपको क्या कष्ट है यार &lt;br /&gt;इस पार प्रिये तुम हो ,गम है , बम है &lt;br /&gt;उस पार तो कुछ अच्छा होगा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन अनिश्चित का धर्मशास्त्र &lt;br /&gt;अपराधी के अधिकार का विधिशास्त्र &lt;br /&gt;पुत्री ,दुल्हन ,रक्षाकर्मी की मौत का कर्म शास्त्र&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;केन्टीन में प्लेट धोने बच्चे मजबूर &lt;br /&gt;इज्जत और बैंक लुटने का यहाँ दस्तूर &lt;br /&gt;जनता के नौकर जनता के सेवक से पिटते हैं &lt;br /&gt;दूल्हा ,वोट और जनता के प्रश्न यहाँ बिकते हैं &lt;br /&gt;ये नियति शास्त्र है&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जिंदा रहेगी लुटेगी पिटेगी &lt;br /&gt;सर मुंडवा कर कोने में पड़ेगी &lt;br /&gt;हक की तो बात क्या दानों को  तरसेगी &lt;br /&gt;उपेक्षा ,निराशा ,उत्पीडन की आशंका से विधवा जल गई &lt;br /&gt;मन्दिर बन गया आरती उतर गई &lt;br /&gt;ये यहाँ का रीतिशास्त्र है&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;पाँच किलो वजनपर सातकिलो का बस्ता बुध्धिशास्त्र है&lt;br /&gt;और दवा मेह्गी कफ़न सस्ता ये यहाँ का अर्थशास्त्र  है&lt;br /&gt;उस पार शास्त्र तो कम होंगे &lt;br /&gt;उसपार तो कुछ अच्छा होगा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/344619722474742786-2939190864690331091?l=brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/feeds/2939190864690331091/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=344619722474742786&amp;postID=2939190864690331091' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2939190864690331091'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/344619722474742786/posts/default/2939190864690331091'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://brijmohanshrivastava-sharda.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='उस  पार चलो'/><author><name>BrijmohanShrivastava</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04869873931974295648</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/-TJsbCkKqsMA/TdUnNGpcNZI/AAAAAAAAABQ/whTC2TRehMI/s220/Picture%2B007.jpg'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-344619722474742786.post-5553683220771837001</id><published>2008-10-29T09:35:00.000-07:00</published><updated>2008-10-29T09:37:46.825-07:00</updated><title type='text'>आज की जरूरत ब्रद्धाश्रम</title><content type='html'>ब्रद्ध का परिवार और परिवार का ब्रद्धों के जीवन में ,आवश्यक -अनावश्यक, उचित -अनुचित जो भी हो उस हस्तक्षेप की प्राचीन मनोवृत्ति बदलते परिवेश के साथ पल्लवित व पुष्पित होती गई , स्वार्थपरता ने पारस्परिक संभाषण और परामर्श के मार्ग अवरुद्ध किए ,वार्तालाप होता भी है तो वह तत्क्षण पूर्णिमा के उद्वेलित सिन्धुबारि में परिवर्तित हो जाता है /&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;         मंदोदरी ने रावण से कहा था ""सुत   कहुं राज समर्पि बन जाई भजिय रघुनाथ "" राजा सत्यकेतु ने प्रतापभानु को जिम्मेदारी सौंपी "" जेठे सुतहि राज नृप दीन्हां,हरि हित आपु गवन बन कीन्हां "" तो राजा मनुने बरवस राज सुतहिं तब दीन्हां ,नारी समेत गवन बन कीन्हां "" और जिन्होंने नहीं किया इतिहास हमें समझाइश देता है कि बादशाहों को पुत्रों ने या तो कैद में डाल दिया या उनकी हत्या कर दी गई/&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;                 जिस ब्रद्ध के पैर कब्र में लटके हों [ये एक  मुहाबरा है ] जो पके आम के तुल्य कभी भी टपक जाय [ ये भी एक मुहाबरा है ] मरघट जिसकी बाट जोहता हो [ ये भी एक मुहाबरा है ][और मुहाबरे मुझे याद नहीं हैं  ] ऐसे मुहाबरों से सुसज्जित और सुशोभित  की मानसिकता और मानसिक रोगों में उर्बरक का कार्य करने वाली ब्रद्धावस्था  का व्यक्ति मानसिक 
