Thursday, October 9, 2008

बिन फेरे

हम आदम युग में जीते थे /शादी के बंधन में बंधने
अग्नि के फेरे लेते थे

कुछ आउट डेटेड लोगों ने ,फेरों के बंधन में कस कर
जंजीर हमें पहनाई थी ,
उन जंजीरों को तोडेंगे ,हम पंछी बन कर डोलेंगे
दो साल किसी के साथ रहे ,उसकी पत्नी हम हो लेंगे
क़ानून हमारे हक में है

पहले वाली घर हो तो हो , फेरों वाली घर हो तो हो
बेटों वाली भी होवे तो ,उसको रोना है रोये वो
हम पत्नी दर्जा पायेंगे और मेंटेनेंस भुनायेगे
क़ानून हमारे हक में है

शादी की भाषा बदल गई ,पत्नी परिभाषा बदल गई
वेदों वाली उस भाषा को ,कानून की भाषा निगल गई
परिवार का गौरब हमसे है ,माँ बाप का गौरब हमसे है
क़ानून हमारे हक में है

फेरों के बंधन में बाँधा , वेदों की भाषा में बाँधा
दुनिया भर के नाटक करके ,पति ,बेटों का बंधन बाँधा
अब कौन पति और तू कैसा ,बेटे से ज़्यादा है पैसा
चाहें जिसके घर जा बैठें ,पत्नी का दर्जा पा बैठे
क़ानून हमारे हक में है

9 comments:

DHAROHAR said...

Aadhunikta ke bhram ko todati achi lagi kavita aapki. Swagat mere blog par bhi.

रश्मि प्रभा said...

शादी की भाषा बदल गई ,पत्नी परिभाषा बदल गई
वेदों वाली उस भाषा को ,कानून की भाषा निगल गई
परिवार का गौरब हमसे है ,माँ बाप का गौरब हमसे है
क़ानून हमारे हक में है.......

ek-ek shabd me vyngyatmak vedna hai,
aadhunikta ke parivesh me sab kuch khatm ho gaya
bahut gahri drishti ke saath parivesh ki vyakhyaa ki hai,kaash !
samajh paye koi

मनुज मेहता said...

बहुत ही व्यंगातमक भाषा का प्रोयग, बहुत ही सटीक और काव्यात्मक. गहरी विहार्धर का निर्वाह किया है आपने ब्रिज जी, आपकी लेखनी पसंद आई.
बृजमोहन जी, आपका तहे दिल से शुक्रिया की आपने मेरी लिखी ग़ज़ल को सराहा और प्यार किया.
जैसा की आपने कहा की इस ग़ज़ल को गुनगुनाने में आपको दिक्कत पेश हो रही है, इसके लिए माफ़ी चाहूँगा पर मेरी कोम्पोजीशन के अनुसार यह शब्द सटीक हैं. और जैसा की आपका मशवरा है की जिंदगानी की जगह ज़िन्दगी कर दिया जाए, अगर ऐसा हो गया तो साड़ी ग़ज़ल का "काफिया" ही बदल जाएगा. यहाँ काफिया है आ और इ का. यानि "आनी" का. तो सिर्फ़ इ के काफिये से पूरी ग़ज़ल का हिसाब ख़राब हो जाएगा. मतला ही बदल गया तो पूरी ग़ज़ल में बचा क्या. निगेहबानी की जगह मैंने गलती से निगेह्बनी लिख दिया था, उसके लिए माफ़ी चाहूँगा. आप आए बहुत अच्छा लगा.

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah bandhuwar
achhi kavita ke liye sadhuwad

प्रदीप मानोरिया said...

अच्छी व्यंगात्मक कविता श्रीवास्तव जी आपकी लेखनी अब कविता खूब कहती है

श्यामल सुमन said...

ब्रजमोहन जी,

शादी की भाषा बदल गई ,पत्नी की परिभाषा बदल गई
बहुत अच्छा।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

सतीश सक्सेना said...

समय को बदलना है भाई साहब ! शायद हम ही अपने संस्कार नही भुला पाते !

makrand said...

शादी की भाषा बदल गई ,पत्नी परिभाषा बदल गई
वेदों वाली उस भाषा को ,कानून की भाषा निगल गई
sir aap ki kalam ka jawab nahi
naya pacemaker laya hu
gaur pharmaye
regards
thanks again u got tremandous scope of writing
makrand

रंजना said...

वाह वाह और सिर्फ़ वाह......जबरदस्त कमाल का एकदम सही लिखा है आपने.देखिये यह तरक्की जो जो न दिखाए.परिवार और शादी अब ढकोसला और आउट डेटेड माना जानने लगा है,तो जो होगा सो थोड़ा होगा..