तो साब लडकी पसंद आगई कुंडली मिल गई - अब आप शादी किस स्तर की चाहते है ?
अरे स्तर काहे का साहब -हम अपनी बहू थोड़े ही ,बेटी ले जा रहे है ।
मगर फिर भी
आपने भी तो कुछ संकल्प किया होगा
हमारा तो पाँच तक का इरादा है
अरे सा’ब पाँच में तो क्लर्क -पटबारी तक नहीं मिलते -
पाँच के साथ पूरा सामान भी तो दे रहे है ।
सामान तो अलग रहता ही है ।कौन सा नया काम कर रहे हो ।सामान दे रहे हो तो अपनी लड़्की को दे रहे हो । आप ऐसा करो, दस और सब सामान करदो
ज्यादा हो जायेगा साहब, इसके बाद मेरी दो बेटियां और है सर पर
ये आपकी समस्या है आप जाने
ठीक है साहब जैसी आपकी मर्जी
हां एक बात और हम बरात लेकर आयेंगे बस का ,ट्रेन का किराया स्वागत ,बरात ठहराना आपको मेह्गा पडेगा,आप एक काम करो लडकी को लेकर यही आजाओ अपन मैरिज हाल बुक बुक कर लेंगे एक डेड के आस पास खर्च आएगा वह आप वहन कर लेना और रिसेप्शन देंगे उसका आधा आधा अपन कर लेंगे ।
मगर सा’ब आपके तो हजार पांच सौ आदमी होंगे हमारे तो दस बारह लोग ही इतनी दूर आपायेंगे
सो तो है मगर यही तो हो रहा है आज कल
ठीक साहब
हां एक बात और कैश हमे एक मुश्त टीका मे चाहिये हमे भी तो कुछ बन्दोबस्त करना है
आपकी मर्जी ,हमको तो देना ही है कभी लेलो ।
टीका बिभिन्न स्थानो में अलग अलग नाम से जाना जाता है कही तिलक समारोह, कही रिंग सेरेमनी,कहीं इंगेजमेन्ट , कही सगाई उद्देश्य सबका एक ही है कि शादी के पहले लडकी वालो से पैसे लेना ताकि रकम खरीदना और भी बहुत इन्तजाम करना । टीका में लड़के के पूरे परिवार को कपडे मगाये जाते है । मिठाई ,फल लड्की वाला स्वेच्छा से लाता है । टीका होते ही लडका दूल्हाराजा हो जाता है ।हर मां की इच्छा होती है कि उसका बेटा बड़ा अफ़सर बने ,अमीर घराने में उसका रिश्ता तय हो ,कैकैई ने भी तो हर मां की तरह अपने बेटे भरत को टीका ही मांगा था ।मगर देखिये आज लड़की का नाम सुमित्रा ,कौशल्या, जानकी मिल जायेगा मगर कैकैई नाम कोई नही रखता -ऐसा कौनसा गुनाह किया उसने ,बेटे का हित ही चाहा ,यह बात कही जा सकती है कि उसने दूसरे बेटे को बनबास मांगा ,जो आवाश्यक भी था राजा को हस्तक्षेप रहित राज्य करना चाहिये , उसने हमेशा के लिये नही केवल एक निश्चित अवधि के लिये मागा था क्योंकि १२ साल तक कोई, किसी स्थान पर ,स्थान के मालिक की जानकारी मे, कब्ज़ा रखता है तो विरोधी आधिपत्य ( एडवर्स पजैशन ) का अधिकारी हो जाता है ।
मै कहां की बात कहां ले जाता हूं ,हां तो टीका मे सारे परिवार के कपड़े ,मिठाई,फल ,ड्राय फ्रूट ,के अलावा, लडके वालों के रिश्तेदारों से, लडकी के पिता की मिलनी करबाई जाती है ,गले मिलो और हाथ मे लिफ़ाफ़ा देते जाओ ,बेचारा डरता डरता लिफ़ाफ़ो की तरफ़ देखता रहता है कम न पड़ जाये ,पैसे तो है मगर लिफ़ाफ़ा खरीदने तो बाजार जाना पडेगा और लड़्के वाला ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलनी कराना चाहता है।हर पास या दूर के रिश्तेदार ,पहिचान वाले को बुला बुला कर मिलनी कराता है ।
मैने सुना है मिलनी पहले भी होती थी मगर पहले लडके के मामा से लडकी के मामा की , फूफा से फूफ़ा की ,चाचा से चाचा की , ,जीजा से जीजा की मिलनी कराई जाती थी । ऐसे ही एक आयोजन मे एक लडका नशे में बिल्कुल टुन्न हो रहा था मिलनी वाले स्थान पर पहुंचा और बोला में दूल्हे का यार ,दुलहन के यार को बुलाओ मै भी मिलनी करूंगा ।
Saturday, January 23, 2010
Tuesday, January 12, 2010
सरप्राइज इन्स्पेक्शन
मै अज्ञातबास पर ,मध्यप्रदेश के गुना नगर मे, बोहरा बागीचा स्थित अपने घर मकान नम्बर १२१ में पन्द्रह दिन के लिये गया था ।कोई कह सकता है बल्कि कहना ही चाहिये कि यह कैसा अज्ञातबास ।
यह उसी तरह का अज्ञात बास है जिस तरह आज-कल सरकारी कार्यालयों मे सरप्राइज इन्सपेक्शन होते है । पीए साहब का ( पिये हुये साहब का नही बल्कि उनका एक असिस्टेंट होता है उसका ) अर्ध-शासकीय पत्र आता है ( ईमेल की सुविधा होते हुए भी )कि सरकिट हाउस ( या डाक बंगला जो भी वहां पर उपलब्ध हो )मे दो कक्ष आरक्षित करा दिये जायें, बड़े साहब परिवार सहित सरप्राइज इन्स्पेक्शन को पधार रहे है ।लंच मे क्या क्या होना चाहिये यह या तो अर्ध-शासकीय पत्र मे ही लिख दिया जाता है अथवा फ़ोन पर सूचित कर दिया जाता है ।
चूंकि चपरासी से लेकर छोटे साहब तक सभी को यह पता रहता है कि दिनाक इतने को आकस्मिक निरीक्षण होना है तो उसकी तैयारियां शुरू हो जाती है ।उस दिन चपरासी प्रोपर ड्रेस पहन कर आते है ,फ़ाइलों की धूल झाड़ी जाने लगती है ।बाबू साहेबान को एक टेबिल और टेबिलक्लाथ उपलब्ध होता है तो अक्सर गंदा रहता है उसे धुलवालिया जाता है और उसका फ़टा हुआ भाग अपनी तरफ़ कर बिछा दिया जाता है और बेतरतीब फ़ाइले ठीक से जमा दी जाती है ।
बाबू साहबान को जो टेबिल उपलब्ध होती है उसमे दराज होती है जिसमे शामलाती पेपर भरे रहते है जिन्हे फ़ुरसत मिलने पर संबन्धित फ़ाइलों मे लगा देने का विचार रहता है और चूंकि फ़ुरसत कभी मिलती नही इसलिये इनकी संख्या बढ़्ती रहती है तो कागज दराजों मे रखे नही जाते बल्कि ठूंसे जाने लगते है । ,इन्स्पेक्शन की जानकारी मिलने पर सबसे पहले इन कागजों को एक पोटली मे बांध कर अदर्शनीय स्थल पर रख दिया जाता है क्योंकि ऐसा सुना गया है कि किसी जमाने में बड़े साहब ने दराज खुलवा कर पेंडिंग कागजात की लिस्ट बनवा ली थी और उन कागजात मे कुछ पांच पांच और दस दस के नोट भी मिले थे - जिसके वाबत उनका स्पष्टीकरण यह था कि यह रुपये उनकी तनखा के है जो वे अपनी पत्नी से छुपा कर दफ़तर में दराज मे रखते है ।भुक्तभोगी बडे साहब ने उनका स्पष्टीकरण मान्य किया था ।
सरप्राइज इन्सपेक्शन कराना और पी एस सी की परीक्षा मे समानता इस मामले मे है कि कब क्या जानकारी मांगबैठें या कौनसा प्रश्न पूछ लें ।मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा मे रामायण और महाभारत सीरियल के निर्माताओं के नाम पूछे गये वहां तक तो ठीक था ,फ़िल्म शोले मे गब्बरसिंह के पिता का नाम पूछा गया, ऐसे ही इन्सपेक्शन मे हर जानकारी तत्काल उपलब्ध कराने के लिये तैयार रहना होता है ।बडे साहब आते है ,सर्किट हाउस मे विश्राम करते है लंच लेते है और जो भी दर्शनीय स्थल उस क्षेत्र मे हो ,के दर्शन कर सपरिवार वापस लौट जाते है और बाबूसाहबान उनके दर्शन लाभ से बंचित रह जाते है क्योंकि छोटे साहब डाक बंगले पर ही सारी जानकारी दे चुके होते है ।
तो यह तो हुआ सरप्राइज ।इसकी हिन्दी होती है आकस्मिक ,औचक , अचानक । अचानक क्या क्या हो सकता है किसी को पता नही रहता है । अचानक पर से मुझे याद आरहा है कि एक खेल हुआ करता था आंख मिचौनी ।उसमे अचनक कोई पीछे से आकर आंखें अपने हाथो से बन्द कर लेता था ,और जिसकी आंखें बन्द की गई है उसके द्वारा आंखें बन्द करने वाले का सही नाम बतलाने पर ही वह आंख पर से हाथ हटाता था ।पति पत्नी के बीच हर प्रकार का हास परिहास हो सकता है लेकिन यह आंख मिचौनी का खेल पति पत्नी के मध्य वर्जित है ।क्यों है ? यह तो पता नही मगर हो सकता है कि ,इसलिये वर्जित किया गया हो कि मानलो पति ने आकर पीछे से आंखें बन्द की और पत्नी के मुह से कोई और नाम निकल गया तो ?
यह उसी तरह का अज्ञात बास है जिस तरह आज-कल सरकारी कार्यालयों मे सरप्राइज इन्सपेक्शन होते है । पीए साहब का ( पिये हुये साहब का नही बल्कि उनका एक असिस्टेंट होता है उसका ) अर्ध-शासकीय पत्र आता है ( ईमेल की सुविधा होते हुए भी )कि सरकिट हाउस ( या डाक बंगला जो भी वहां पर उपलब्ध हो )मे दो कक्ष आरक्षित करा दिये जायें, बड़े साहब परिवार सहित सरप्राइज इन्स्पेक्शन को पधार रहे है ।लंच मे क्या क्या होना चाहिये यह या तो अर्ध-शासकीय पत्र मे ही लिख दिया जाता है अथवा फ़ोन पर सूचित कर दिया जाता है ।
चूंकि चपरासी से लेकर छोटे साहब तक सभी को यह पता रहता है कि दिनाक इतने को आकस्मिक निरीक्षण होना है तो उसकी तैयारियां शुरू हो जाती है ।उस दिन चपरासी प्रोपर ड्रेस पहन कर आते है ,फ़ाइलों की धूल झाड़ी जाने लगती है ।बाबू साहेबान को एक टेबिल और टेबिलक्लाथ उपलब्ध होता है तो अक्सर गंदा रहता है उसे धुलवालिया जाता है और उसका फ़टा हुआ भाग अपनी तरफ़ कर बिछा दिया जाता है और बेतरतीब फ़ाइले ठीक से जमा दी जाती है ।
बाबू साहबान को जो टेबिल उपलब्ध होती है उसमे दराज होती है जिसमे शामलाती पेपर भरे रहते है जिन्हे फ़ुरसत मिलने पर संबन्धित फ़ाइलों मे लगा देने का विचार रहता है और चूंकि फ़ुरसत कभी मिलती नही इसलिये इनकी संख्या बढ़्ती रहती है तो कागज दराजों मे रखे नही जाते बल्कि ठूंसे जाने लगते है । ,इन्स्पेक्शन की जानकारी मिलने पर सबसे पहले इन कागजों को एक पोटली मे बांध कर अदर्शनीय स्थल पर रख दिया जाता है क्योंकि ऐसा सुना गया है कि किसी जमाने में बड़े साहब ने दराज खुलवा कर पेंडिंग कागजात की लिस्ट बनवा ली थी और उन कागजात मे कुछ पांच पांच और दस दस के नोट भी मिले थे - जिसके वाबत उनका स्पष्टीकरण यह था कि यह रुपये उनकी तनखा के है जो वे अपनी पत्नी से छुपा कर दफ़तर में दराज मे रखते है ।भुक्तभोगी बडे साहब ने उनका स्पष्टीकरण मान्य किया था ।
सरप्राइज इन्सपेक्शन कराना और पी एस सी की परीक्षा मे समानता इस मामले मे है कि कब क्या जानकारी मांगबैठें या कौनसा प्रश्न पूछ लें ।मध्यप्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा मे रामायण और महाभारत सीरियल के निर्माताओं के नाम पूछे गये वहां तक तो ठीक था ,फ़िल्म शोले मे गब्बरसिंह के पिता का नाम पूछा गया, ऐसे ही इन्सपेक्शन मे हर जानकारी तत्काल उपलब्ध कराने के लिये तैयार रहना होता है ।बडे साहब आते है ,सर्किट हाउस मे विश्राम करते है लंच लेते है और जो भी दर्शनीय स्थल उस क्षेत्र मे हो ,के दर्शन कर सपरिवार वापस लौट जाते है और बाबूसाहबान उनके दर्शन लाभ से बंचित रह जाते है क्योंकि छोटे साहब डाक बंगले पर ही सारी जानकारी दे चुके होते है ।
तो यह तो हुआ सरप्राइज ।इसकी हिन्दी होती है आकस्मिक ,औचक , अचानक । अचानक क्या क्या हो सकता है किसी को पता नही रहता है । अचानक पर से मुझे याद आरहा है कि एक खेल हुआ करता था आंख मिचौनी ।उसमे अचनक कोई पीछे से आकर आंखें अपने हाथो से बन्द कर लेता था ,और जिसकी आंखें बन्द की गई है उसके द्वारा आंखें बन्द करने वाले का सही नाम बतलाने पर ही वह आंख पर से हाथ हटाता था ।पति पत्नी के बीच हर प्रकार का हास परिहास हो सकता है लेकिन यह आंख मिचौनी का खेल पति पत्नी के मध्य वर्जित है ।क्यों है ? यह तो पता नही मगर हो सकता है कि ,इसलिये वर्जित किया गया हो कि मानलो पति ने आकर पीछे से आंखें बन्द की और पत्नी के मुह से कोई और नाम निकल गया तो ?
Thursday, December 17, 2009
साहित्यिक चोरी
किसी साहित्यिक पत्रिका मे लेख या कहानी भेजना और ब्लाग पर लिखने मे अन्तर सिर्फ़ यह है कि वहां संपादक का दखल रहता है और यहां परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ , न कोई दुरुस्ती करने वाला, न गलतियां निकालने वाला ,न रिजेक्ट कर खेद सहित वापस करने वाला ।अब तो खैर पत्रिका वाले भी रचना वापस नही भेजते है वे या तो छापते है या फाड़ फैंकते है ।रचनाये खेद सहित वापस की जातीं थी तब की बात है एक सम्पादक ने 'एक साहित्यकार की कहानी ,इस टीप के साथ वापस कर दी कि "चूँकि ऐसी रचना पूर्व में मुंशी प्रेमचंद लिख चुके हैं इसलिए वे इसे प्रकाशित नहीं कर सकेंगे -इस बात का उन्हें खेद है ।- वे साहित्यकार अभी तक यह नहीं समझ पाये की सम्पादक के खेद की वजह ==नहीं छाप सकना था =या ==मुंशी जी द्वारा लिखा जाना था
।चोरियाँ नाना प्रकार की होती है और चोरी के तरीके भी भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं -रुपया पैसा जेवर आदि की चोरी के नए नए तरीके सिनेमा विभिन्न चेनल और सत्यकथाओं ने प्रचारित व प्रसारित कर दिए हैं -चैन चुराना दिल चुराना आदि पर जबसे फिल्मी दुनिया का एकाधिकार हुआ है -आम आदमी इस प्रकार की चोरियों से महरूम हो गया हैएक कवि ने एक कविता लिखी -उन्होंने प्रकाशनार्थ भेजने के पूर्व अपने मित्र को बतलाया -मित्र ने पूछा छप तो जायेगी -कवि बोले =यदि संपादक ने मेघदूत न पढा होगा तो छप जायेगी और अगर मेरे दुर्भाग्य से उन्होंने पढा होगा तो संपादक को बहुत खेद होगा
।एक दिन एक मित्र मुझसे पूछने लगे -यार इन संपादकों को कैसे मालूम हो जाता है की रचना चोरी की हुई है क्या जरूरी है की सम्पादक ने कालिदास -कीट्स- शेक्सपीयर प्रेमचन्द- शरत आदि सभी को पढा हो। मैने कहा =जरूरी तो नही है मगर वे लेख देख कर ताड़ जरूर जाते हैं । रचना का लिखा कोई वाक्यांश चतुरसेन के सोना और खून से है या नहीं यह भलेही संपादक न बता पाएं मगर यह जरूर बतला देंगे की यह वाक्यांश इस लेखक का नही हो सकता ।
चोरी के मुकदमे में चोर के वकील अक्सर यह प्रश्न पूछा करते हैं की इस प्रकार के जेवरात ग्रामीण अंचलों में पहने जाते है इससे यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है की जेवर फरियादी के नहीं वल्कि चोर के है -जेवरात की तरह साहित्यिक विचार एक दूसरे से मेल खा सकते है -बात वही रहती है और अंदाजे बयाँ बदल जाता है -दूसरों के साथ बुरा व्यबहार न करने की बात हजारों साल पहले विदुर जी ने कही अत्म्प्रतिकूलानी ......समाचरेत । फ़िर वही बात अंग्रेज़ी में डू नोट डू ..... अदर्स ।कही गयी । बात वही थी भाषा बदल गयी अंदाजे बयाँ बदल गया । क्या मुज़्तर खैराबादी और बहादुरशाह जफर के खयालात मिलते जुलते नहीं थे ? दोनों के कहे हुए शेर पढ़ कर देख लीजिये। क्या फैज़ अहमद फैज़ और मजरूह सुल्तानपुरी की रचनाओं में समानता नहीं है ? आदमी कन्फ्यूज्ड हो जाता है की ये लिखा किसने है ।
आम तौर पर चोर चोर मौसेरे भाई होते है और दिल के चोर आपस में रकीब होते है क्योंकी दिल एक चुराने वाले दो तो दुश्मनी स्वाभाबिक है -ऐसी बात साहित्य के मामले में नहीं है वे न तो आपस में मौसेरे भाई होते है न दुश्मन होते है वे तो आपस में प्रतिद्वंदी होते है -तूने हजार साल पहले की में से चुराया तो में ईसा पूर्व की में से चुराउगा ।और वैसे भी किसी एक किताब की नकल करदी तो वह चोर ग्रन्थ कहलाता है और अगर २५ किताबों मे से दो दो पेज लिये तो वह शोध ग्रन्थ कहलाता है ।
अत: जो ग्रन्थ लुप्त हुए जा रहे है तो उनमे से कुछ लेकर हम अपने नाम से लिख कर पाठको पर उपकार ही तो करेंगे क्योकि साहित्य के अथाह भंडार से पाठक प्राय अनजान है और सबसे बड़ी बात कोई रोकने टोकने वाला नही है ।यह किसी पर व्यंग्य नही है ।न मेरा यह उद्देश्य है कि कोई ऐसा लिखता होगा ।लेकिन कभी कभी किसी किसी को बुरा लग जाता है
पटैलों के एक सम्मेलन मे एक व्यक्ति ने कह दिया कि पटेल चोर है ।रामपुरा का पटैल उठा और उस व्यक्ति की पिटाई करने लगा _उसने कहा मैने किसी का नाम नही लिया किसी गांव का नाम नही लिया मैने तो केवल यही कहा था कि पटैल चोर है । पटैल ने कहा अच्छा बेटा जैसे कोई जानता ही नही है कि किस गांव का पटैल चोर है ।
इसीलिए कहा गया है ==यदि नहीं कहा गया हो तो अब में कह देता हूँ ==साहित्यिक चोरी चोरी न भवति
।चोरियाँ नाना प्रकार की होती है और चोरी के तरीके भी भिन्न भिन्न प्रकार के होते हैं -रुपया पैसा जेवर आदि की चोरी के नए नए तरीके सिनेमा विभिन्न चेनल और सत्यकथाओं ने प्रचारित व प्रसारित कर दिए हैं -चैन चुराना दिल चुराना आदि पर जबसे फिल्मी दुनिया का एकाधिकार हुआ है -आम आदमी इस प्रकार की चोरियों से महरूम हो गया हैएक कवि ने एक कविता लिखी -उन्होंने प्रकाशनार्थ भेजने के पूर्व अपने मित्र को बतलाया -मित्र ने पूछा छप तो जायेगी -कवि बोले =यदि संपादक ने मेघदूत न पढा होगा तो छप जायेगी और अगर मेरे दुर्भाग्य से उन्होंने पढा होगा तो संपादक को बहुत खेद होगा
।एक दिन एक मित्र मुझसे पूछने लगे -यार इन संपादकों को कैसे मालूम हो जाता है की रचना चोरी की हुई है क्या जरूरी है की सम्पादक ने कालिदास -कीट्स- शेक्सपीयर प्रेमचन्द- शरत आदि सभी को पढा हो। मैने कहा =जरूरी तो नही है मगर वे लेख देख कर ताड़ जरूर जाते हैं । रचना का लिखा कोई वाक्यांश चतुरसेन के सोना और खून से है या नहीं यह भलेही संपादक न बता पाएं मगर यह जरूर बतला देंगे की यह वाक्यांश इस लेखक का नही हो सकता ।
चोरी के मुकदमे में चोर के वकील अक्सर यह प्रश्न पूछा करते हैं की इस प्रकार के जेवरात ग्रामीण अंचलों में पहने जाते है इससे यह सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है की जेवर फरियादी के नहीं वल्कि चोर के है -जेवरात की तरह साहित्यिक विचार एक दूसरे से मेल खा सकते है -बात वही रहती है और अंदाजे बयाँ बदल जाता है -दूसरों के साथ बुरा व्यबहार न करने की बात हजारों साल पहले विदुर जी ने कही अत्म्प्रतिकूलानी ......समाचरेत । फ़िर वही बात अंग्रेज़ी में डू नोट डू ..... अदर्स ।कही गयी । बात वही थी भाषा बदल गयी अंदाजे बयाँ बदल गया । क्या मुज़्तर खैराबादी और बहादुरशाह जफर के खयालात मिलते जुलते नहीं थे ? दोनों के कहे हुए शेर पढ़ कर देख लीजिये। क्या फैज़ अहमद फैज़ और मजरूह सुल्तानपुरी की रचनाओं में समानता नहीं है ? आदमी कन्फ्यूज्ड हो जाता है की ये लिखा किसने है ।
आम तौर पर चोर चोर मौसेरे भाई होते है और दिल के चोर आपस में रकीब होते है क्योंकी दिल एक चुराने वाले दो तो दुश्मनी स्वाभाबिक है -ऐसी बात साहित्य के मामले में नहीं है वे न तो आपस में मौसेरे भाई होते है न दुश्मन होते है वे तो आपस में प्रतिद्वंदी होते है -तूने हजार साल पहले की में से चुराया तो में ईसा पूर्व की में से चुराउगा ।और वैसे भी किसी एक किताब की नकल करदी तो वह चोर ग्रन्थ कहलाता है और अगर २५ किताबों मे से दो दो पेज लिये तो वह शोध ग्रन्थ कहलाता है ।
अत: जो ग्रन्थ लुप्त हुए जा रहे है तो उनमे से कुछ लेकर हम अपने नाम से लिख कर पाठको पर उपकार ही तो करेंगे क्योकि साहित्य के अथाह भंडार से पाठक प्राय अनजान है और सबसे बड़ी बात कोई रोकने टोकने वाला नही है ।यह किसी पर व्यंग्य नही है ।न मेरा यह उद्देश्य है कि कोई ऐसा लिखता होगा ।लेकिन कभी कभी किसी किसी को बुरा लग जाता है
पटैलों के एक सम्मेलन मे एक व्यक्ति ने कह दिया कि पटेल चोर है ।रामपुरा का पटैल उठा और उस व्यक्ति की पिटाई करने लगा _उसने कहा मैने किसी का नाम नही लिया किसी गांव का नाम नही लिया मैने तो केवल यही कहा था कि पटैल चोर है । पटैल ने कहा अच्छा बेटा जैसे कोई जानता ही नही है कि किस गांव का पटैल चोर है ।
इसीलिए कहा गया है ==यदि नहीं कहा गया हो तो अब में कह देता हूँ ==साहित्यिक चोरी चोरी न भवति
Friday, December 4, 2009
अन्ध विश्वास
एक बिटिया मे मुझसे अन्ध-विश्वास पर लिखने को कहा । अपनी बात शुरु करने के पूर्व, मै इस विषय से असमबद्ध, दो बातें कहना चाहूंगा । बात है कब्रिस्तान/श्मशान की, । एक सज्जन की पत्नी का निधन (स्वर्गबास) हो जाने पर उसे दफ़नाया/जलाया जा रहा था ।पति फ़ूट्फ़ूट कर रो रहा था । उसकी हालत देखी नही जा रही थी । किसी ने उसके कन्धे पर हाथ रख कर कहा -हमे न मालूम था तुम इतना प्रेम करते थे कितना रो रहे हो -रोता हुआ पति चुप हो गया बोला -अजी यह तो कुछ भी नही है आप मुझे उस वक्त देखते जब घर से मैयत उठाई जा रही थी, उसके मुकाबले मे तो, ये कुछ भी नही है ,उस वक्त देखते मुझे, ये तो कुछ भी नही है ।
दूसरी बात ,एक बाप अपनी म्रत नन्ही बालिका के लिये रोया करता था ।एक दिन बच्ची उसके सपने मे आई बोली हम सब सहेलियों के साथ खेलते हैं वहां परियां भी होती है रात को हम केंडिल लाइट मे स्वादिष्ट खाना खाते है किन्तु आप रोते हो वे आंसू मेरी मोमबत्ती बुझा देते है ,मुझे अंधेरे मे खाना पडता है और सब सहेलियां मुझ पर हंसती है ,मुझे बहुत कष्ट होता है । बाप ने उस दिन से रोना बन्द कर दिया ।
विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य कोई विभाजन रेखा खीचना मुश्किल है ,एक का अन्धविश्वास दूसरे का विश्वास हो सकता है क्योंकि यह दुनिया बडी विचित्र है ""किसी की आखिरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी ""की मानिन्द ।
मै एक कव्वाली सुन रहा था ""तुम्हे दानिश्ता महफ़िल मे जो देखा हो तो मुजरिम हूं/नजर, आखिर नजर है ,बे इरादा फ़िर गई होगी।""कव्वाल के लिये बे-इरादा सही मगर जिसने उन्हे देखते हुये देखा होगा , उनकी नजर मे तो कव्वाल की नजर बा-इरादा हो सकती है ।
और एक बात, मै लेख लिखूं , कुल मिला कर दस विद्वान पढेंगे और निश्चित ही वे सब अन्धविश्वासी नही होंगे ।मगर ये जो व्यापार बडे पैमाने पर जारी है ,बीमारियां मिटाने , बुरी नजर से बचाने , रोजगार मे सफ़लता दिलाने ,धन सम्पत्ति को घर मे स्थिर करने और भी न जाने क्या क्या करोडों का व्यवसाय, लाखों लोग प्रतिदिन देख, सुन व समझ रहे है और (तथा कथित ) लाभ भी ले रहे है । उसमे मेरा लेख "नक्कार खाने मे तूती की आवाज " नही हो जायेगा ? ये नक्कारखाना क्या ?तबला तो आप सब ने देखा है उसी का बडा भाई होता होगा नगाडा, उसे ही नक्कार कहते होगे और तूती बिल्कुल छोटी सी बांसुरी से भी छोटी होती होगी । खैर ।मै एक बार पहले भी निवेदन कर चुका हूं कि धन वर्षा करने वाले यंत्र ,मैने बहुत अध्ययन किया है , असर कारक होते है ,हन्ड्रेड परसेन्ट ये आपके घर धन की वर्षा कर सकते है बशर्ते कि आप इन्हे बना कर बेचें ।
ओशो से किसी ने पूछा बिल्ली रास्ता काटे तो क्या समझना चाहिये । बोले-यही समझना चाहिये कि बिल्ली कहीं जा रही है ।बात खत्म ।अन्धविश्वास कोई नया नही है बहुत गहरी जडे हैं इसकी । बिल्ली, सर्प, नेवला, अंग का फ़रकना , छिपकली का ऊपर गिरना, कौआ का सिर पर बैठ जाना ,घोडे की नाल की अंगूठी ,नीबू मिर्च घर के दरवाजे पर टांगना (बोले इसमे अपना नुक्सान क्या है ),और भी न जाने क्या क्या । जिसमे सर्प को लेकर तो खूब दोहन किया फ़िल्मों ने । नाग एक जाति होती है ,उस जाति मे राजा भी हुए है "नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ।सर्प को नाग भी कहा जाता है तो इस सर्प को उस नाग जाति से जोड दिया ।जैसे नामो के आगे "सिंह " लगता है सिंह शेर को भी कहते है ।पुराने लोगों को मालूम होगा आजकल तौल का माप किलो होता है वैसे ही पहले सेर होता था , पहले क्विंटल नही मन होता था तो लोग कहा करते थे चालीस सेर का एक मन होता है , मन बडा चंचल है,चंचल मधुवाला की बहिन है, मधुवाला को दिल का दौरा पडा था ,दिल एक मंदिर है ,मंदिर हरिद्वार मे बहुत हैं ,हरिद्वार मे संगम है ,संगम मे राजकपूर है ,राज हिन्दी मे शपथ लेने मना करते है आदि इत्यादि । देखो कहां से कहां पहुंच गये ।
हां तो अन्धविश्वास- जो बीमारियों को दैवीय प्रकोप समझते थे अब धीरे धीरे दूर होता जारहा है ,सर्प के बारे मे भी भ्रांतियां नही के बराबर है ,बिल्ली वगैरा को आजकल कोई मानता नही । कुछ दिन पहले मैने पढा एक पुराने नीम के पेड मे से दूध गिररहा है ,लोग इकट्ठा हो गये मेला लग गया किसी जन्मांध की आंख अच्छी हो गई ,किसी ने गले पर लगा लिया तो उसका केंसर अच्छा हो गया,कमाल है ।एक दिन वे कहने लगे साह्ब बडा चमत्कार है इधर से मरीज को खटिया पर डाल कर ले गये थे उन्होंने जल छिड्का ,उधर से मरीज दौडता हुआ आया ,मेला लग रहा है चमत्कार हो रहा है तुम भी चलो । अब मै उनसे कैसे कहूं कि मैने तो ऐसे-ऐसे चमत्कार सुने है कि "" कल तलक सुनते थे वो विस्तर पे हिल सकते नही/आज ये सुनने मे आया है कि वो तो चल दिये।
एक व्यक्ति श्रद्धा और विश्व्वास से एक ग्रंथ पढता है दूसरे के लिये वही अंध विश्वास हो सकता है ।स्वर्ग नर्क को अन्ध विश्वास कहने वालो के बुजुर्ग आज भी स्वर्गबासी या स्वर्गीय हैं ।किसने देखा, किसकी मानें, किसकी नही ""उतते कोउ न आवही जासे पूछूं धाय /इतते सबही जात हैं भार लदाय लदाय ""
अदालत मे गवाह पेश होते है वे तीन तरह के होते है एक पूर्ण विश्वसनीय , दूसरे पूर्ण अविश्वसनीय और तीसरे वे जो न पूरी तरह से विश्वसनीय है न अविश्वसनीय है ,ये बडे तकलीफ़देह होते है इनकी बातो से सच निकालना वैसा ही है जैसे भूसे के ढेर से दाने चुनना ।विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य भी कुछ ऐसी ही स्थिति है ।
दूसरी बात ,एक बाप अपनी म्रत नन्ही बालिका के लिये रोया करता था ।एक दिन बच्ची उसके सपने मे आई बोली हम सब सहेलियों के साथ खेलते हैं वहां परियां भी होती है रात को हम केंडिल लाइट मे स्वादिष्ट खाना खाते है किन्तु आप रोते हो वे आंसू मेरी मोमबत्ती बुझा देते है ,मुझे अंधेरे मे खाना पडता है और सब सहेलियां मुझ पर हंसती है ,मुझे बहुत कष्ट होता है । बाप ने उस दिन से रोना बन्द कर दिया ।
विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य कोई विभाजन रेखा खीचना मुश्किल है ,एक का अन्धविश्वास दूसरे का विश्वास हो सकता है क्योंकि यह दुनिया बडी विचित्र है ""किसी की आखिरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी ""की मानिन्द ।
मै एक कव्वाली सुन रहा था ""तुम्हे दानिश्ता महफ़िल मे जो देखा हो तो मुजरिम हूं/नजर, आखिर नजर है ,बे इरादा फ़िर गई होगी।""कव्वाल के लिये बे-इरादा सही मगर जिसने उन्हे देखते हुये देखा होगा , उनकी नजर मे तो कव्वाल की नजर बा-इरादा हो सकती है ।
और एक बात, मै लेख लिखूं , कुल मिला कर दस विद्वान पढेंगे और निश्चित ही वे सब अन्धविश्वासी नही होंगे ।मगर ये जो व्यापार बडे पैमाने पर जारी है ,बीमारियां मिटाने , बुरी नजर से बचाने , रोजगार मे सफ़लता दिलाने ,धन सम्पत्ति को घर मे स्थिर करने और भी न जाने क्या क्या करोडों का व्यवसाय, लाखों लोग प्रतिदिन देख, सुन व समझ रहे है और (तथा कथित ) लाभ भी ले रहे है । उसमे मेरा लेख "नक्कार खाने मे तूती की आवाज " नही हो जायेगा ? ये नक्कारखाना क्या ?तबला तो आप सब ने देखा है उसी का बडा भाई होता होगा नगाडा, उसे ही नक्कार कहते होगे और तूती बिल्कुल छोटी सी बांसुरी से भी छोटी होती होगी । खैर ।मै एक बार पहले भी निवेदन कर चुका हूं कि धन वर्षा करने वाले यंत्र ,मैने बहुत अध्ययन किया है , असर कारक होते है ,हन्ड्रेड परसेन्ट ये आपके घर धन की वर्षा कर सकते है बशर्ते कि आप इन्हे बना कर बेचें ।
ओशो से किसी ने पूछा बिल्ली रास्ता काटे तो क्या समझना चाहिये । बोले-यही समझना चाहिये कि बिल्ली कहीं जा रही है ।बात खत्म ।अन्धविश्वास कोई नया नही है बहुत गहरी जडे हैं इसकी । बिल्ली, सर्प, नेवला, अंग का फ़रकना , छिपकली का ऊपर गिरना, कौआ का सिर पर बैठ जाना ,घोडे की नाल की अंगूठी ,नीबू मिर्च घर के दरवाजे पर टांगना (बोले इसमे अपना नुक्सान क्या है ),और भी न जाने क्या क्या । जिसमे सर्प को लेकर तो खूब दोहन किया फ़िल्मों ने । नाग एक जाति होती है ,उस जाति मे राजा भी हुए है "नर नाग सुर गंधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ।सर्प को नाग भी कहा जाता है तो इस सर्प को उस नाग जाति से जोड दिया ।जैसे नामो के आगे "सिंह " लगता है सिंह शेर को भी कहते है ।पुराने लोगों को मालूम होगा आजकल तौल का माप किलो होता है वैसे ही पहले सेर होता था , पहले क्विंटल नही मन होता था तो लोग कहा करते थे चालीस सेर का एक मन होता है , मन बडा चंचल है,चंचल मधुवाला की बहिन है, मधुवाला को दिल का दौरा पडा था ,दिल एक मंदिर है ,मंदिर हरिद्वार मे बहुत हैं ,हरिद्वार मे संगम है ,संगम मे राजकपूर है ,राज हिन्दी मे शपथ लेने मना करते है आदि इत्यादि । देखो कहां से कहां पहुंच गये ।
हां तो अन्धविश्वास- जो बीमारियों को दैवीय प्रकोप समझते थे अब धीरे धीरे दूर होता जारहा है ,सर्प के बारे मे भी भ्रांतियां नही के बराबर है ,बिल्ली वगैरा को आजकल कोई मानता नही । कुछ दिन पहले मैने पढा एक पुराने नीम के पेड मे से दूध गिररहा है ,लोग इकट्ठा हो गये मेला लग गया किसी जन्मांध की आंख अच्छी हो गई ,किसी ने गले पर लगा लिया तो उसका केंसर अच्छा हो गया,कमाल है ।एक दिन वे कहने लगे साह्ब बडा चमत्कार है इधर से मरीज को खटिया पर डाल कर ले गये थे उन्होंने जल छिड्का ,उधर से मरीज दौडता हुआ आया ,मेला लग रहा है चमत्कार हो रहा है तुम भी चलो । अब मै उनसे कैसे कहूं कि मैने तो ऐसे-ऐसे चमत्कार सुने है कि "" कल तलक सुनते थे वो विस्तर पे हिल सकते नही/आज ये सुनने मे आया है कि वो तो चल दिये।
एक व्यक्ति श्रद्धा और विश्व्वास से एक ग्रंथ पढता है दूसरे के लिये वही अंध विश्वास हो सकता है ।स्वर्ग नर्क को अन्ध विश्वास कहने वालो के बुजुर्ग आज भी स्वर्गबासी या स्वर्गीय हैं ।किसने देखा, किसकी मानें, किसकी नही ""उतते कोउ न आवही जासे पूछूं धाय /इतते सबही जात हैं भार लदाय लदाय ""
अदालत मे गवाह पेश होते है वे तीन तरह के होते है एक पूर्ण विश्वसनीय , दूसरे पूर्ण अविश्वसनीय और तीसरे वे जो न पूरी तरह से विश्वसनीय है न अविश्वसनीय है ,ये बडे तकलीफ़देह होते है इनकी बातो से सच निकालना वैसा ही है जैसे भूसे के ढेर से दाने चुनना ।विश्वास और अन्धविश्वास के मध्य भी कुछ ऐसी ही स्थिति है ।
Saturday, November 21, 2009
मेरा तो हो ही जाये -पुनर्जन्म
किसी का होता हो या न होता हो मेरा तो हो ही जाये पुनर्जन्म । मजा आता है ।कभी ऊंट बने किसी पहाड के नीचे खडे है ,कभी बैल बने फिर रहे हैं न लाज न शर्म ।बीच सडक पर बैठे है कार वाला हार्न बजा रहा है नहीं हट रहे ।कभी गधा बन गये बीच चौराहे पर पंचम स्वर मे ढेचू ढेचू कर रहे है और कभी कुत्ता ,+ वैसे भी कर तो यही सब कुछ रहे हैं मगर फ़िर और आजादी रहेगी । इसलिये मेरा तो हो ही जाये ।
ऊंट का तो ये है कि इसके द्वारा पेडों को ठूंठ करना निश्चित है और इसका किसी करवट बैठ्ना अनिश्चित है ।
बैलों का हमारे इधर हाट भरता है लोग उसे मेला भी कहते है ,मोटर सायकल और जीप (जनरल परपज व्हीकल, जीपीव्ही से अब केवल जीप रह गया है ) के प्रचलन से पूर्व घोडों का बाजार लगता था ,शाम को व्यापारी हिसाब लगाते थे किसको कितना प्रोफ़िट हुआ ।एक व्यक्ति घोडा बेचने लाया ऊंचा पूरा ,हवा से बातें करने वाला (यह मुहावरा है ,हमारे यहां मुहावरे बहुत होते हैं ,सभी भाषा में होते होंगे ) सबके घोडे बिकगये उसके पास कोई ग्राहक न आया यह सोच कर कि ,बहुत महगा होगा न जाने क्या कीमत मांगेगा? शाम को एक ग्राहक आया ,कीमत पूछी ,बोला ट्रायल ले लूं -ले लो ,उसने घोडा इधर उधर घुमाया ,एड लगाई और नौ दो ग्यारह ।(यह एक गणितीय मुहावरा है ,गणित मे मुहावरे बहुत है , तीन पांच करना,निन्यानवे का फ़ेर , चौरासी की चक्कर ,छ्त्तीस का आंकडा ,वैसे तो गाने भी बने है एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन , एक दो तीन चार भैया बनो होशियार ,एक ने गिनती शुरु की तो वह तो गिनती ही चली गई वो तो बीच मे "तेरा करुं दिन गिन गिन के इन्तजार आजा ..शब्द आगया नही तो चार पांच सौ पर जा कर रुकती ) खैर ,बेचारा घोडे का व्यापारी देखता रह गया ।रात को सब हिसाब लगाने लगे किसको कितना मुनाफ़ा हुआ । इससे पूछा तो ये बोला भैया मैने तो नो प्रोफ़िट नो लौस में दे दिया ।
गधा केवल इस लिये गधा होता है क्योंकि वह गलत धारणा (ग....धा....) रखता है सब रखते हैं मै भी रखता हूं । एक दिन शाम को हमें(बहुबचन) बाजार जाना था ,मैने कहा तुम आगे चलो मैं ताला लगा कर आता हूं ,बोलीं नही मै तो तुम्हारे पीछे ही चलूंगी और गाने लगी "तुम्हारे सग मै भी चलूंगी पिया जैसे पतंग पीछे डोर""मैने कहा तुम लोग आगे बढ्ना क्यों नही चाह्ते ,कहा देखिये गधा कितनी ही लातें मारे धोबी उसके पीछे ही चलता है ।यह बात भी सही है कि मेरे यहां कपडे धोने वाला पांच छै दिन से नही आरहा था ।
कुत्ते के वाबत सुना है इसे स्वर्ग मे प्रवेश नही करने देते ,कही कही हवाईजहाज और कही होटल मे भी मुमानियत है ।एक कुत्ते को हवाई जहाज मे एड्मीशन नही दिया तो सुना है उसकी मालिकिन अभिनेत्री ने भी यात्रा निरस्त करदी ठीक उसी तरह जैसे धर्म्रराज युधिष्टिर ने स्वर्ग जाने से इन्कार कर दिया था ।मगर मैनेजर के मना करने के बाद भी एक अभिनेत्री नही मानी और कुत्ते को होटल मे ले ही गई ।क्या नाम था उस अभिनेत्री का ,शायद जीनत अमान या कोई और ,खैर लावारिस फ़िल्म की बात है अब कुत्ता, हरीमिर्च और अमिताभ बच्चन ।क्या उत्पात मचाया है कुत्ते ने कि कुछ न पूछों ।वैसे भी आप कहां कुछ पूछ रहे है ।पूरे होट्ल को तहस नहस कर डाला ।साखाम्रग की यह अधिकाई, साखा ते साखा पर जाई की तरह इस टेविल से उस पर और उससे इस पर ।यूं की.....मजा आ गया जिन्दगी का । इसलिये मेरा तो हो ही जाये ।
बहुत पहले मैने टीवी पर देखा ,एक लड्की अपने आप को पिछले जन्म की नागिन बतला रही थी और एक युवक के वाबत कह रही थी कि यह मेरा नाग है हम नाग नागिन का जोडा रहता था तो एक नेवले ने हमको मार दिया था मजेदार बात ये कि वह नागिन लडकी ,उस युवक की पत्नी को नेवला बतला रही थी ,भाइ कमाल है और एक बात -
यह भी टीवी पर ही देखा ,एक लड्की के वाबत (यह दूसरा किस्सा है ) बतलाया जा रहा था कि यह पिछले जन्म मे नागिन थी क्योकि इसके आगे बीन बजाओ तो वह मारने दौड्ती है ।यार आप आफ़िस जाने घर से निकलें और कोई आपके आगे बीन बजाने लगे कैमरा मैन फ़ोटो खीचने लगे और अगर आप उसे मारने हाथ उठाओ तो वे कहें देखिये, गौर से देखिये, नाग फ़न फ़ैला रहा है ,अच्छा भला आदमी पागल हो जाये दस दस बीन बाले ,दस दस कैमरा मेन,बच्चों की भीड ,वो बच्ची मारने नही दौडेगी तो क्या लड्डू बांटेगी ।
ऊंट का तो ये है कि इसके द्वारा पेडों को ठूंठ करना निश्चित है और इसका किसी करवट बैठ्ना अनिश्चित है ।
बैलों का हमारे इधर हाट भरता है लोग उसे मेला भी कहते है ,मोटर सायकल और जीप (जनरल परपज व्हीकल, जीपीव्ही से अब केवल जीप रह गया है ) के प्रचलन से पूर्व घोडों का बाजार लगता था ,शाम को व्यापारी हिसाब लगाते थे किसको कितना प्रोफ़िट हुआ ।एक व्यक्ति घोडा बेचने लाया ऊंचा पूरा ,हवा से बातें करने वाला (यह मुहावरा है ,हमारे यहां मुहावरे बहुत होते हैं ,सभी भाषा में होते होंगे ) सबके घोडे बिकगये उसके पास कोई ग्राहक न आया यह सोच कर कि ,बहुत महगा होगा न जाने क्या कीमत मांगेगा? शाम को एक ग्राहक आया ,कीमत पूछी ,बोला ट्रायल ले लूं -ले लो ,उसने घोडा इधर उधर घुमाया ,एड लगाई और नौ दो ग्यारह ।(यह एक गणितीय मुहावरा है ,गणित मे मुहावरे बहुत है , तीन पांच करना,निन्यानवे का फ़ेर , चौरासी की चक्कर ,छ्त्तीस का आंकडा ,वैसे तो गाने भी बने है एक दो तीन आजा मौसम है रंगीन , एक दो तीन चार भैया बनो होशियार ,एक ने गिनती शुरु की तो वह तो गिनती ही चली गई वो तो बीच मे "तेरा करुं दिन गिन गिन के इन्तजार आजा ..शब्द आगया नही तो चार पांच सौ पर जा कर रुकती ) खैर ,बेचारा घोडे का व्यापारी देखता रह गया ।रात को सब हिसाब लगाने लगे किसको कितना मुनाफ़ा हुआ । इससे पूछा तो ये बोला भैया मैने तो नो प्रोफ़िट नो लौस में दे दिया ।
गधा केवल इस लिये गधा होता है क्योंकि वह गलत धारणा (ग....धा....) रखता है सब रखते हैं मै भी रखता हूं । एक दिन शाम को हमें(बहुबचन) बाजार जाना था ,मैने कहा तुम आगे चलो मैं ताला लगा कर आता हूं ,बोलीं नही मै तो तुम्हारे पीछे ही चलूंगी और गाने लगी "तुम्हारे सग मै भी चलूंगी पिया जैसे पतंग पीछे डोर""मैने कहा तुम लोग आगे बढ्ना क्यों नही चाह्ते ,कहा देखिये गधा कितनी ही लातें मारे धोबी उसके पीछे ही चलता है ।यह बात भी सही है कि मेरे यहां कपडे धोने वाला पांच छै दिन से नही आरहा था ।
कुत्ते के वाबत सुना है इसे स्वर्ग मे प्रवेश नही करने देते ,कही कही हवाईजहाज और कही होटल मे भी मुमानियत है ।एक कुत्ते को हवाई जहाज मे एड्मीशन नही दिया तो सुना है उसकी मालिकिन अभिनेत्री ने भी यात्रा निरस्त करदी ठीक उसी तरह जैसे धर्म्रराज युधिष्टिर ने स्वर्ग जाने से इन्कार कर दिया था ।मगर मैनेजर के मना करने के बाद भी एक अभिनेत्री नही मानी और कुत्ते को होटल मे ले ही गई ।क्या नाम था उस अभिनेत्री का ,शायद जीनत अमान या कोई और ,खैर लावारिस फ़िल्म की बात है अब कुत्ता, हरीमिर्च और अमिताभ बच्चन ।क्या उत्पात मचाया है कुत्ते ने कि कुछ न पूछों ।वैसे भी आप कहां कुछ पूछ रहे है ।पूरे होट्ल को तहस नहस कर डाला ।साखाम्रग की यह अधिकाई, साखा ते साखा पर जाई की तरह इस टेविल से उस पर और उससे इस पर ।यूं की.....मजा आ गया जिन्दगी का । इसलिये मेरा तो हो ही जाये ।
बहुत पहले मैने टीवी पर देखा ,एक लड्की अपने आप को पिछले जन्म की नागिन बतला रही थी और एक युवक के वाबत कह रही थी कि यह मेरा नाग है हम नाग नागिन का जोडा रहता था तो एक नेवले ने हमको मार दिया था मजेदार बात ये कि वह नागिन लडकी ,उस युवक की पत्नी को नेवला बतला रही थी ,भाइ कमाल है और एक बात -
यह भी टीवी पर ही देखा ,एक लड्की के वाबत (यह दूसरा किस्सा है ) बतलाया जा रहा था कि यह पिछले जन्म मे नागिन थी क्योकि इसके आगे बीन बजाओ तो वह मारने दौड्ती है ।यार आप आफ़िस जाने घर से निकलें और कोई आपके आगे बीन बजाने लगे कैमरा मैन फ़ोटो खीचने लगे और अगर आप उसे मारने हाथ उठाओ तो वे कहें देखिये, गौर से देखिये, नाग फ़न फ़ैला रहा है ,अच्छा भला आदमी पागल हो जाये दस दस बीन बाले ,दस दस कैमरा मेन,बच्चों की भीड ,वो बच्ची मारने नही दौडेगी तो क्या लड्डू बांटेगी ।
Friday, October 30, 2009
डाक्टर न बने तो क्या हुआ
प्रेम-पत्र के पश्चात मैने कुछ लिखा नही ,लिखना सम्भव भी नही होता - इसके पश्चात तो सुनना और भुगतना ही होता है ,मगर मेरी तो तबीयत खराब हो गई थी ।मैने अपने एक परिचित से पूछा यार कोई अच्छा सा चिकित्सक तुम्हारी नजर मे हो तो बताओ -वे तपाक से बोले फलां डाक्टर को बताओ ,फिर अपने हाथ का अंगूठा और तर्जनी के पोरों को मिलाते हुये बोले ,ए-वन ! मेरा तो उन्ही का इलाज चल रहा है , तीन साल से , जुकाम का ।
डाक्टर बनना बहुत ही कठिन है ,प्री फिर पांच साल - फिर प्री -फिर पीजी और डाक्टर बनना बहुत ही सरल है फीस भेजो ,पत्राचार से घर बैठे डाक्टर बन जाओ ।मेरा न जाने कहां से इन्हे पोस्टल पता मालूम हो गया ।दोसाल तक लगातार पत्र व फार्म आते रहे कि घर बैठे काहे के डाक्टर बनना चाह्ते हो तमाम तरह की पैथी के नाम लिखे थे ।
एलोपैथी मे परेशानी ये कि गेल्युसल कहूं या जेल्युसल ,जेरीफोर्ट कहूं या गेरीफोर्ट ,आयुर्वेदिक दबाओं के वारे में तो शरद जोशी जी ने कहा ही था कि इनके नाम ऐसे है जैसे कोई कन्या स्कूल का हाजिरी रजिस्टर हो -बसन्तकुसमाकर ,स्वर्णमालिनी,अश्वकंचुकी और यूनानी के नाम बाप रे ""खमीरागावजवांअम्बरीजबाहिरवालाखास" एक दबा का नाम लिखो तब तक सरकारी डाक्टर तीन मरीज निबटा चुके ( निबटा चुके ,मतलब तीन पेशेन्ट के प्रिस्क्रिप्शन लिख चुके ,क्या करें, एक एक वाक्य के कई कई तो अर्थ होते है)
तो गरज ये कि दो साल तक मेरे पास पत्र आते रहे, अन्त में उन्होने सोचा कि किस बेवकूफ से पाला पड गया ।
अकबर बीरबल के किस्से मशहूर है ,मेरे पास एक किताब है ""अकबर बीरबल विनोद "" लगता है इन्हे कोई काम ही नहीं था अकबर बेतुके सवाल करते और बीरबल बातुके जवाब देते।एक मर्तवा बीरबल के पिता आये ,बीरबल उन्हे महल ले गये ,अकबर के बेतुके सवाल शुरु हो गये -तुम्हारे गावं मे कितने कौए हैं,आसमान मे कितने तारे हैं ,प्रथ्वी का बीचोंबीच कहां है , पिताजी चुप ,बार-बार प्रश्न, मगर कोई रिस्पांस नही,’अकबर झुंझला गये ,किस मूर्ख से पाला पड गया ।बीरबल को बुलाया पूछा क्यों बीरबल किसी मूर्ख से पाला पड जाये तो क्या करना चाहिये बीरबल ने कहा हुजूर वो ही करना चाहिये जो मेरे पिताजी कर रहे हैं ।
तो उन्होने ने भी सोचा किस मूर्ख से पाला पड गया यह लाइफ मे कभी डाक्टर नही बन सकता और वही हुआ भी मै फिर कभी डाक्टर नही बन पाया और आज भी बेडाक्टर हूं
वो तो मैं बन जाता अगर पैसे होते ।उन्होने तो कहा था कि १० हजार मे सिनाप्सिस और ५० हजार मे थीसिस लिखूंगा ,वाकी किसके घर नियमित सब्जी पहुंचा कर हाजिरी देना है व किसको थ्रीस्टार में ठ्हराकर एक बार पार्टी व गिफ्ट देना है यह तुम जानो ।
मानद उपाधि तो मुझे मिलने ही क्यों लगी ।
गरज ये कि मैं डाक्टर नही बन पाया मगर इतना जरूर है मैं अपने गले मे स्टैथ्स्कोप लट्का सकता हूं क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं है जो मुझे मना कर सके । मोटर सायकल पर सवार हो कर कोई हैलमेट न पहने तो उसका चालान हो सकता है किन्तु कोई सायकल पर सवार हो कर हैलमेट पहने तो उसका चालान कैसे होगा ! कानून की भी बडी विचित्र माया है । अपनी भारतीय दण्ड संहिता को ही लो ,एक अपराध ,यदि उसको करने की कोशिश की ,प्रयास किया तो गिरफ़्तार ,चालान भी और सजा भी , किन्तु यदि उस अपराध को घटित कर दिया तो पुलिस का आई जी भी गिरफ़तार नहीं कर सकता सजा का तो प्रश्न ही नहीं । मतलब अपराध के प्रयास _कोशिश मे सजा और अपराध करदो तो कोई सजा नही ।कुल मिलाकर नतीजा यह कि मैं स्टेथस्कोप पहन सकता हूं ।
डाक्टर बनना बहुत ही कठिन है ,प्री फिर पांच साल - फिर प्री -फिर पीजी और डाक्टर बनना बहुत ही सरल है फीस भेजो ,पत्राचार से घर बैठे डाक्टर बन जाओ ।मेरा न जाने कहां से इन्हे पोस्टल पता मालूम हो गया ।दोसाल तक लगातार पत्र व फार्म आते रहे कि घर बैठे काहे के डाक्टर बनना चाह्ते हो तमाम तरह की पैथी के नाम लिखे थे ।
एलोपैथी मे परेशानी ये कि गेल्युसल कहूं या जेल्युसल ,जेरीफोर्ट कहूं या गेरीफोर्ट ,आयुर्वेदिक दबाओं के वारे में तो शरद जोशी जी ने कहा ही था कि इनके नाम ऐसे है जैसे कोई कन्या स्कूल का हाजिरी रजिस्टर हो -बसन्तकुसमाकर ,स्वर्णमालिनी,अश्वकंचुकी और यूनानी के नाम बाप रे ""खमीरागावजवांअम्बरीजबाहिरवालाखास" एक दबा का नाम लिखो तब तक सरकारी डाक्टर तीन मरीज निबटा चुके ( निबटा चुके ,मतलब तीन पेशेन्ट के प्रिस्क्रिप्शन लिख चुके ,क्या करें, एक एक वाक्य के कई कई तो अर्थ होते है)
तो गरज ये कि दो साल तक मेरे पास पत्र आते रहे, अन्त में उन्होने सोचा कि किस बेवकूफ से पाला पड गया ।
अकबर बीरबल के किस्से मशहूर है ,मेरे पास एक किताब है ""अकबर बीरबल विनोद "" लगता है इन्हे कोई काम ही नहीं था अकबर बेतुके सवाल करते और बीरबल बातुके जवाब देते।एक मर्तवा बीरबल के पिता आये ,बीरबल उन्हे महल ले गये ,अकबर के बेतुके सवाल शुरु हो गये -तुम्हारे गावं मे कितने कौए हैं,आसमान मे कितने तारे हैं ,प्रथ्वी का बीचोंबीच कहां है , पिताजी चुप ,बार-बार प्रश्न, मगर कोई रिस्पांस नही,’अकबर झुंझला गये ,किस मूर्ख से पाला पड गया ।बीरबल को बुलाया पूछा क्यों बीरबल किसी मूर्ख से पाला पड जाये तो क्या करना चाहिये बीरबल ने कहा हुजूर वो ही करना चाहिये जो मेरे पिताजी कर रहे हैं ।
तो उन्होने ने भी सोचा किस मूर्ख से पाला पड गया यह लाइफ मे कभी डाक्टर नही बन सकता और वही हुआ भी मै फिर कभी डाक्टर नही बन पाया और आज भी बेडाक्टर हूं
वो तो मैं बन जाता अगर पैसे होते ।उन्होने तो कहा था कि १० हजार मे सिनाप्सिस और ५० हजार मे थीसिस लिखूंगा ,वाकी किसके घर नियमित सब्जी पहुंचा कर हाजिरी देना है व किसको थ्रीस्टार में ठ्हराकर एक बार पार्टी व गिफ्ट देना है यह तुम जानो ।
मानद उपाधि तो मुझे मिलने ही क्यों लगी ।
गरज ये कि मैं डाक्टर नही बन पाया मगर इतना जरूर है मैं अपने गले मे स्टैथ्स्कोप लट्का सकता हूं क्योंकि ऐसा कोई कानून नहीं है जो मुझे मना कर सके । मोटर सायकल पर सवार हो कर कोई हैलमेट न पहने तो उसका चालान हो सकता है किन्तु कोई सायकल पर सवार हो कर हैलमेट पहने तो उसका चालान कैसे होगा ! कानून की भी बडी विचित्र माया है । अपनी भारतीय दण्ड संहिता को ही लो ,एक अपराध ,यदि उसको करने की कोशिश की ,प्रयास किया तो गिरफ़्तार ,चालान भी और सजा भी , किन्तु यदि उस अपराध को घटित कर दिया तो पुलिस का आई जी भी गिरफ़तार नहीं कर सकता सजा का तो प्रश्न ही नहीं । मतलब अपराध के प्रयास _कोशिश मे सजा और अपराध करदो तो कोई सजा नही ।कुल मिलाकर नतीजा यह कि मैं स्टेथस्कोप पहन सकता हूं ।
Sunday, September 27, 2009
प्रेम-पत्र
एस एम् एस और ई मेल युग के पूर्व का समय प्रेम-पत्र का स्वर्णकाल कहलाता है बड़ा क्रेज़ था प्रेम-पत्र का ,बड़े चाव से लिखे-पढ़े जाते थे सिनेमा ने भी इनका खूब उपयोग व उपभोग किया है फूल तुम्हे भेजा है ख़त में,, तो मुगले आज़म में सलीम ने फूल में ही पत्र रख कर नेहर के माध्यम से भेजा राजकुमार ने तो पाकीजा में केवल इतना भर लिखा था,, की आपके पाँव देखे ......जमीन पर मत उतारियेगा ,,मगर पाकीजा जी ने तो उस पत्र को चांदी की डिबिया में ही रख लिया । रखते हैं साहब बड़े सम्हाल कर रखते हैं ,जीवन पर्यन्त रखते हैं ,तभी तो मरने की बाद ""चन्द फोटो और चन्द हसीनों के खतूत " निकलते हैं देखिये =ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर कि तुम नाराज़ न होना , क्यों भैयाजी क्यों नहीं होंगे नाराज़ जब तू अनर्गल कुछ तो भी लिखेगा लड़किया -लड़के पत्र लिखते थे तो ,,लिखते थे, चला जा रे लेटर कबूतर की चाल ,क्यों भैया कबूतर से ज्यादा तेज़ चाल वाला और कोई पक्षी नज़र नहीं आया ,उस पर तुर्रा ये की पत्र के अंत में लिखा जाता था ""खत लिख रहा हूँ या लिख रही हूँ जो भी स्थिति रही हो खैर , तो खत लिख रही हूँ खून से स्याही न समझना अरे तू जब नीले पेन से लिख रही है तो कैसे न समझना ?
एक बात और उस ज़माने में प्रेम-पत्र कैसे लिखें नामक किताब भी उपलब्ध थी , ठीक हारमोनियम शिक्षा ,तबला गाईड ।बांसुरी शिक्षा ,सावरी मन्त्र ,सेवडे का जादू की तरह एक श्रीमानजी के पास वह किताब थी । उसमे से छांट कर एक प्रेम पत्र लिख कर भेजा गया ,बड़ी उम्मीद थी उत्तर की उत्तर तो आया मगर छोटी सी स्लिप के रूप में, लिखा था "उत्तर के लिए कृपया पेज ९८ के पत्र क्रमांक १२२ का अवलोकन करने का कष्ट करें" ।शिक्षा का भी अभाव था तो प्रेमिकाएं या पत्नियाँ पोस्ट मेन से ही पत्र लिखवा लिया करती थी ""ख़त लिखदे संवरिया के नाम बाबू कोरे कागद पे लिखदे सलाम आदि इत्यादि॥
छोटे छोटे बच्चे ,प्यारे प्यारे बच्चे, दुलारे बच्चे, कापियों और किताबों में पत्र रख कर आपस में आदान प्रदान किया करते थे "" नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?"" बोले चिट्ठी है फलां ने दी है फलां के पास पहुँचाना है ।ऐसी बात भी नहीं कि ख़त चोरी छिपे ही भेजे जाते हों ,कुछ बच्चियां ख़त ऐलानियाँ भेज कर गाती भी थी ""हमने सनम को ख़त लिखा ,ख़त में लिखा ......." और खत मे क्या लिखा है वे न भी बतलाना चाहे तो भी "खत का मन्जमू भाप लेते है लिफ़ाफ़ा देख कर "" फिर इन्क्वारी भी होती है "" तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था ?"" जवाब देना मुश्किल हो जाता है ।
उस ज़माने मे एक बात जरूर मह्सूस की गयी कि यदि किसी से प्रेम हो जाये तो उसे अनेतिक सम्बन्ध या नाज़ायज सम्बन्ध कहा जाता था किन्तु प्रेम पत्र को किसी ने अनैतिक प्रेम पत्र या नाज़ायज प्रेम् पत्र कहा हो ऐसा मुझे ध्यान नही है ।
मैंने सुना है
एक बिलकुल सत्य घटना ,कल्पना नहीं ,फ़साना नहीं ,हकीकत उस स्वर्णकाल की बात है ,श्रीमानजी को मोहल्ले की किसी से इकतरफा इश्क हो गया हो जाता है साहिब, एकतरफा डिक्री की तरह ,मालूम तब होता है जब कोर्ट से कुर्की वारंट आजाता है ,तो श्रीमान जी ने प्रेम पत्र लिखे ,कागज़ नहीं मिला तो बच्चों की पुरानी कापी किताबे रखी थी उनमे ही लिख डाला ,भेजने की हिम्मत हुई नहीं --अब क्या हुआ कि बच्चों ने रद्दी मोहल्ले के हलबाई को बेचदीं ,अब इत्तेफाक देखिये उन महिला ने समोसे मंगवाए तो वह कागज़ समोसे में लिपटा उनके पास पहुँच गया ।कुछ लोगों की आदत होती है कि मिठाई या नमकीन जिस कागज़ में या अखवार में आया है उसको पढने लगते हैं ऐसे आदत क्यों होती है यह तो पता नहीं मगर होती है ,किसी फिल्म में नसरुद्दीनशाह को भी ऐसे ही पढ़ते दिखलाया गया है शायद उस फिल्म का नाम है जाने भी दो यारो खैर
अब देखिये जनाब क्या हंगामा वरपा है ,जितना कि उस वक्त भी न बरपा होगा जब थोड़ी सी पी ली है ,उससे भी ज्यादा 'कि सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं "" और ’हंगामा’ फिल्म से भी ज्यादा
अब जो श्रीमान जी की ठुकाई पिटाई उस महिला और श्रीमान जी की श्रीमती जी द्वारा की गई तो यूं समझो के मज़ा आगया जिंदगी का तब मैंने नेक सलाह लोगों को दी थी कि अव्वल तो शादी शुदा होते हुए किसी से प्रेम न करे और अगर करे भी तो मोहल्ले की किसी महिला से न करे और अगर करे तो उसे पत्र न लिखे और अगर पत्र भी लिखे तो बच्चो की कापियो मे न लिखे और अगर लिखे भी तो उसे रद्दी वाले को न बेचे
एक बात और उस ज़माने में प्रेम-पत्र कैसे लिखें नामक किताब भी उपलब्ध थी , ठीक हारमोनियम शिक्षा ,तबला गाईड ।बांसुरी शिक्षा ,सावरी मन्त्र ,सेवडे का जादू की तरह एक श्रीमानजी के पास वह किताब थी । उसमे से छांट कर एक प्रेम पत्र लिख कर भेजा गया ,बड़ी उम्मीद थी उत्तर की उत्तर तो आया मगर छोटी सी स्लिप के रूप में, लिखा था "उत्तर के लिए कृपया पेज ९८ के पत्र क्रमांक १२२ का अवलोकन करने का कष्ट करें" ।शिक्षा का भी अभाव था तो प्रेमिकाएं या पत्नियाँ पोस्ट मेन से ही पत्र लिखवा लिया करती थी ""ख़त लिखदे संवरिया के नाम बाबू कोरे कागद पे लिखदे सलाम आदि इत्यादि॥
छोटे छोटे बच्चे ,प्यारे प्यारे बच्चे, दुलारे बच्चे, कापियों और किताबों में पत्र रख कर आपस में आदान प्रदान किया करते थे "" नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है ?"" बोले चिट्ठी है फलां ने दी है फलां के पास पहुँचाना है ।ऐसी बात भी नहीं कि ख़त चोरी छिपे ही भेजे जाते हों ,कुछ बच्चियां ख़त ऐलानियाँ भेज कर गाती भी थी ""हमने सनम को ख़त लिखा ,ख़त में लिखा ......." और खत मे क्या लिखा है वे न भी बतलाना चाहे तो भी "खत का मन्जमू भाप लेते है लिफ़ाफ़ा देख कर "" फिर इन्क्वारी भी होती है "" तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था न था रकीब तो आखिर वो नाम किसका था ?"" जवाब देना मुश्किल हो जाता है ।
उस ज़माने मे एक बात जरूर मह्सूस की गयी कि यदि किसी से प्रेम हो जाये तो उसे अनेतिक सम्बन्ध या नाज़ायज सम्बन्ध कहा जाता था किन्तु प्रेम पत्र को किसी ने अनैतिक प्रेम पत्र या नाज़ायज प्रेम् पत्र कहा हो ऐसा मुझे ध्यान नही है ।
मैंने सुना है
एक बिलकुल सत्य घटना ,कल्पना नहीं ,फ़साना नहीं ,हकीकत उस स्वर्णकाल की बात है ,श्रीमानजी को मोहल्ले की किसी से इकतरफा इश्क हो गया हो जाता है साहिब, एकतरफा डिक्री की तरह ,मालूम तब होता है जब कोर्ट से कुर्की वारंट आजाता है ,तो श्रीमान जी ने प्रेम पत्र लिखे ,कागज़ नहीं मिला तो बच्चों की पुरानी कापी किताबे रखी थी उनमे ही लिख डाला ,भेजने की हिम्मत हुई नहीं --अब क्या हुआ कि बच्चों ने रद्दी मोहल्ले के हलबाई को बेचदीं ,अब इत्तेफाक देखिये उन महिला ने समोसे मंगवाए तो वह कागज़ समोसे में लिपटा उनके पास पहुँच गया ।कुछ लोगों की आदत होती है कि मिठाई या नमकीन जिस कागज़ में या अखवार में आया है उसको पढने लगते हैं ऐसे आदत क्यों होती है यह तो पता नहीं मगर होती है ,किसी फिल्म में नसरुद्दीनशाह को भी ऐसे ही पढ़ते दिखलाया गया है शायद उस फिल्म का नाम है जाने भी दो यारो खैर
अब देखिये जनाब क्या हंगामा वरपा है ,जितना कि उस वक्त भी न बरपा होगा जब थोड़ी सी पी ली है ,उससे भी ज्यादा 'कि सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं "" और ’हंगामा’ फिल्म से भी ज्यादा
अब जो श्रीमान जी की ठुकाई पिटाई उस महिला और श्रीमान जी की श्रीमती जी द्वारा की गई तो यूं समझो के मज़ा आगया जिंदगी का तब मैंने नेक सलाह लोगों को दी थी कि अव्वल तो शादी शुदा होते हुए किसी से प्रेम न करे और अगर करे भी तो मोहल्ले की किसी महिला से न करे और अगर करे तो उसे पत्र न लिखे और अगर पत्र भी लिखे तो बच्चो की कापियो मे न लिखे और अगर लिखे भी तो उसे रद्दी वाले को न बेचे
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