Saturday, May 7, 2011

शार्ट कट

शार्ट कट से भी शार्टकट, प्रारंभ से आदमी तलाश करता रहा है ,चलने में -बोलने में, लिखने में , और जिन खोजा तिन्ह पाइया ,उन्हे रास्ता मिला भी । जब आर से काम चलता है तो ए आर इ क्या मतलब। जब यू से काम चल सकता है तो वाय ओ यू का क्या मतलब । और इसी तरह पिताजी पापा होते हुये डैडी से डैड हो गये । शार्टकट रास्ते में कोई टेडा मेडा रास्ता नहीं देखता और शार्टकट भाषा में कोई शुध्दता अशुध्दता नहीं देखता। और वैसे भी शुध्द अंग्रेजी कोई बोल नहीं सकता और शुध्द हिन्दी कोई समझ नहीं सकता तो रोमन ही सही ।

अभी शासकीय कार्यालयों में शार्टकट का प्रयोग शुरु नहीं हुआ है। इ मेल से भी डाक नहीं भेजी जाती फैक्स से भेज कर फिर कन्फर्मेशन कापी डाक से भेजी जाती है, वाकायदा ड्राफट तैयार होता है वह एप्रूव होता है, उंची कुर्सी वाला नीची कुर्सी वाले का ड्राफट एप्रूव करता है, वैसा का वैसा ही एप्रूव कर दिया तो मतलब ही नहीं, कुछ न कुछ गलती तो निकालना आवश्यक है ही। अच्छा एक मजेदार बात शासकीय शब्द कुल 100-150 है उन्ही से हजारों पत्र, परिपत्र, अर्धशासकीय पत्र, तैयार होते रहते है । एक भी विजातीय शब्द इसमें आजाये तो बात अखरनेवाली हो जाती है। ब्लाग पढता रहता हूं तो कुछ शब्द सामर्थ्य बढ गया है,मैने एक दिन एक शब्द का पर्याय बाची शब्द लिख दिया तो मेरी पेशी हो गई देखिये मिस्टर यह कार्यालय है कोई साहित्यिक संगठन या सभा नहीं है, शब्द वही प्रयोग करो जो शासकीय हो। और पता भी चलना चाहिये कि पत्र सरकारी है। अच्छा देखिये मुझे व् और ब का फर्क आज भी समझ नहीं आता लेकिन हजारों ड्राफ्ट ,एप्रूव किये

भैया हम तो गांव के है वही बोली वही लहजा , यध्यपि बच्चों को पसंद नहीं है । मेरी खडी बोली इन्हें रास नहीं आती । हालांकि कुछ कहते नहीं मगर समझ में आही जाता है, इशारों को अगर समझो । और तो और ये भी बच्चों से कहती ही है बेटा तेरे पापा तो शुरु से ही गवांरों जैसा बोलते है भले आदमियों के बीच बिठादो तो नाक कट जाती है। वाह एक न शुद दो शुद .

एक दिन पुत्र रत्न ने कह ही दिया आपकी बोली और लहजे पर मेरे मित्र हंसते है उसी दिन मैने तय किया कि बोलूंगा तो शुध्द हिन्दी ही बोलूँगा नहीं तो नहीं बोलूँगा । की प्रतिज्ञा । पुराने जमाने में लोग प्रतिज्ञा करते ही रहते थे उस समय जब हाथ उठा प्रतिज्ञा कर करते थे तब वादल गरजने लगते थे ,हवा की रफतार तेज हो जाती थी ,विजलियां कडकने लगती थी ,मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ ।

एक दिन घर में मित्र मंडली जमी थी ,मैने पुत्र से जाकर कहा भैया मेरे व्दिचक्र बाहन के पृष्ठचंक्र से पवन प्रसारित होगया है शीघ्रतिशीध्र वायु प्रविष्ठ करवा ला ताकि मुझे कार्यालय प्रस्थान में अत्यधिक विलम्ब न हो। मै तो कह कमरे से चला आया किन्तु मैने सुनली- पुत्र का एक मित्र कह रहा था क्यों रे तेरे पापा का एकाध पेंच ढीला तो नहीं होगया ।

मेरे पडौस में एक बहिनजी रहती है ठेठ देहाती ,प्रायमरी स्कूल में बहिनजी की नौकरी लग गई तो परिवार यहां आगया। एक दिन बहिन जी के स्कूल की अध्यापिकाऐं उनके घर आई तो तो बहिन जी बोलने का लहजा, शब्द सब बदले , बोली बिल्कुल शहरी हो गई, बहिन जी के छोटे भाई बहिन भोचक्के होकर दीदी को देखने लगे । आखिर सबसे छोटी से न रहा गया तो बोल ही उठी काये री जीजी आज तोय का हो गओ आज तू कैसे बोल रई है

मजा तो अब है रोमन भी और शार्टकट भी
लिखा_ चाचा जी अजमेर गया है
पढा _ चाचाजी आज मर गया है

26 comments:

सतीश सक्सेना said...

समय के हिसाब से बोली बदलते हैं हम भी .....शुभकामनायें आपको भाई जी !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

शुध्द अंग्रेजी कोई बोल नहीं सकता और शुध्द हिन्दी कोई समझ नहीं सकता तो रोमन ही सही"

लाजवाब। अजमेर की बात पर याद आया कि ज़ीटीवी पर गंडे तावीज़ बेचने वाले अजमेरी बाबा को भी कुछ बच्चे आज मेरी बाबा कल तेरी बाबा कहकर बुलाते हैं।

Rajesh Kumari said...

Brijmohan ji,apne blog par aapki tippani padhkar achcha laga.usi ke madhyam se aapke blog ka pata laga.achcha blog hai kam se kam hoton par muskaan to aai.aapka haasya ka put deta hua yeh lekh saraahniye hai.aapko follow kar rahi hoon taki aapke update padh sakun.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

:) बहुत बढ़िया शब्दों का अर्थ सही समझ न आये तो अनर्थ होना तय है.....

डॉ टी एस दराल said...

बढ़िया लिखा है भाई । भाषा वही जो सबकी समझ में आए । शुद्ध हिंदी का मतलब इतना शुद्ध होना भी नहीं होता ।

mahendra verma said...

चुटकी लेता हुआ बढ़िया पोस्ट।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अच्छा लगा।
ई भाषा की पीड़ा तो ससुरी झेलनी ही पड़ती है हम सब को।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर, अगर सभी लोग स्कुल मे शुद्ध हिन्दी पढे तो सब को शुद्ध हिन्दी समझ आने मे कोई दिक्कत नही....

रंजना said...

हा हा हा हा....मजेदार....

सच कहा शार्ट कट का जमाना है...

बड़ी हसरत थी कि बेटा मुझे पत्र लिखता....जाहिर की...बेटे ने तीन वाक्य का ईमेल भेजा शार्ट कटिया अंगरेजी में....फोन करके पूछना पड़ा कि क्या लिखा हैक्योंकि तीन वाक्य में चार शब्द भी ठीक ठाक पल्ले नहीं पड़ा था...

Abhishek Ojha said...

हा हा, अरे एसेमेस में तो आजकल जनता ऐसे शोर्टकट मारती है कि अब क्या बताऊँ. एक अक्षर कम करने के चक्कर में मतलब कुछ का कुछ हो जाता है. एक इ हटा कर और ओ को यु कर देने से क्या मेसेज आ गया था मेरे पास बता नहीं सकता :)

कविता रावत said...

वाकायदा ड्राफट तैयार होता है वह एप्रूव होता है, उंची कुर्सी वाला नीची कुर्सी वाले का ड्राफट एप्रूव करता है, वैसा का वैसा ही एप्रूव कर दिया तो मतलब ही नहीं, कुछ न कुछ गलती तो निकालना आवश्यक है ही। अच्छा एक मजेदार बात शासकीय शब्द कुल 100-150 है उन्ही से हजारों पत्र, परिपत्र, अर्धशासकीय पत्र, तैयार होते रहते है

.achha khaka kheench hai aapne .... kaye fileon mein to sirf aage badhne ke liye sign bhar kiye jaate hain galtion se kisi ko koi lena-dena nahi... sign hokar aa jaata hai .. sab chalta rahta hai...
samrat ko nahi dosh gusain wali kahawat badstur jaari...

Patali-The-Village said...

सच कहा शार्ट कट का जमाना है|बहुत बढ़िया|

अजय कुमार said...

बढ़िया लिखा है ,मजेदार है

रचना दीक्षित said...

शासकीय कार्यप्रणाली का चित्रण और भाषा की पीड़ा का सुंदर निरूपण सुंदर आलेख के द्वारा. अच्छा व्यंग रहा. शुभकामनायें.

दिगम्बर नासवा said...

आज कल शुधता में कुछ मिलता ही नही ... सभी मिलावट के आदि हैं ... तो भाषा काहे को शुध हो ... बहुत मज़ा आया पढ़ के ....

Arvind Mishra said...

अरे वाह आपतो इधर जमाये हुए हैं -
मजा आ गया (माजा नहीं )

अभिषेक मिश्र said...

शासन प्रणाली की विद्रूपता का सटीक वर्णन किया है आपने.

Rahul Singh said...

अजमेर वाला किस्‍सा मोड़ी लिपि के लिए प्रचलित रहा है, जियमें कहा जाता है- सेठजी आज मर गए, बड़ी बहू को भेज देना, हमने रुइ ली है तुम भी रुइ लेना. इसमें अजमेर, आज मर और रुई का अर्थ रोना हो जाता है.

डॉ. दलसिंगार यादव said...

पत्र कोरा ही भेज रहा हूं अपनी समझ से सब समझ लें। भाषा की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी शुद्ध क्या अशुद्ध क्या।

G.N.SHAW said...

बिलकुल सही शार्ट कट ! बहुत सुन्दर

ज्योति सिंह said...

kya baat kahi hai vyastta ho na ho lekin aadmi darshata rahta hai is short cut ko apnaakar ,zabardast lekh ,aapki tippani bahut achchhi lagi aabhari hoon .

यादें said...

ठीक है ,बृजमोहन जी अपने पे ही व्यंग करके दूसरों को हँसाओ और समझने वालों को कुछ समझाओ और अपना समय बिताओ |
अच्छा "शार्ट कट"

संजय भास्कर said...

मजेदार
सच कहा शार्ट कट का जमाना है...

डॉ० डंडा लखनवी said...

सराहनीय व्यंग्य रचना प्रकाशन के लिए साधुवाद!
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी
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Vijai Mathur said...

आज कल लोग ज्यादा बिजी रहते हैं तो शार्ट-कट रास्ता अपना लेते हैं.व्यस्तता दिखाने को लोग यह कहते मिलते हैं जहर खाने की भी फुर्सत नहीं है.

veerubhai said...

बहुत खूब ब्रज भूषन जी !