Sunday, October 19, 2008

ऐसे कैसे म र द

अब मर्द की शादी मर्द से हो ,कानून में कुछ तो राह मिले
बीरों की इस भारत भू पर , इन मर्दों को सम्मान मिले
उल्टे सीधे जैसे सोयें ,वो काम करें जो मन में है
कानून हमारे हक में है

चेतक घोडे के सवार, महाराणा सर नीचा करके
बीर शिवा भी लज्जा कर, नजरों को कुछ नीचा करके
झांसी की रानी मुस्काकर और फूलन देवी गुस्से से
पुतली बाई करके कटाक्ष हम मर्दों से फिर कुछ पूछे
हम सर को फिर करके ऊंचा ,देंगे जवाब उन बातों का
ये देश है बीर जवानों का अल्वेलों का मस्तानों का
तन फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
और .कानून हमारे हक में है

एक मर्द कमा कर लाएगा ,दो मर्द बैठ कर खाएँगे
कुछ मर्दों से ताकत पाकर ,सीमा पर लड़ने जायेंगे
हम वो उनको दिखलायेंगे जो बात हमारे मन में है
कानून हमारे हक में है

Tuesday, October 14, 2008

पत्नी पीड़ा

चार दिन से सब्जी नहीं ,बिन साबुन नहाते हैं
ये बाज़ार जाते नहीं ,ब्लॉग में सर खपाते हैं
चश्मे का नम्बर बढ़ा और सर्वाइकल में दर्द
कमर को धनुषाकार बनाए जाते हैं

ज़्यादा बैठेंगे .डायबिटीज हो जायेगी
लीवर की तो बात ही क्या आंत सिकुड़ जायेगी
एक शक्ति जो मेरी नजर में थोड़ी है
और भी घट जायेगी
फिर असगंध और बिधारा भी काम नहीं आयेगी

इधर में दाल बघारती हूँ ,उधर वो शेखी बघारते हैं
बिना पढ़े कविताओं पर टिप्पणी कर आते हैं
दर दर की ठोकरें खाते हैं ,फिर भी कमेन्ट नहीं पाते है
इनके ब्लॉग पर कोई आता नहीं तो मुझ पर झल्लाते हैं

कमेन्ट को भीख ऐसे मागते हैं जैसे ये जन्म जात याचक है
ब्लॉग को सौत भी तो नहीं कह सकती ,क्योंकि यह तो पुरूष बाचक है
हाँ वो कह सकती हूँ जिस पर सरकार तयार हुई जा रही है
और आई पी सी में से धारा तीन सौ सतहत्तर हटाई जा रही है

Sunday, October 12, 2008

बहनों कुछ तो पहनो

बहनों कुछ तो पहनो
हम इतिहास दुहरायें ,दु :शाशन कपड़े खींचे
और कृष्ण बचाने आयें
हम उनके दर्शन पायें

बंद मिलें फिर चालू हों ,भूंकों को कुछ व्यबसाय मिले
भारत की प्यारी बसुधा पर ,फिर कपास के फूल खिले
तपोभूमि पर देवभूमि पर,देवी का कुछ तो बेश लगे
अब कुछ तो आचरण ऐसे हों ,गौतम नानक का देश लगे

जब युद्ध की काली छाया थी ,तब भी त्याग किया तुमने
तुमने जेवर दे डाले थे ,हथियार खरीदे थे हमने
माना कि देश संकट में है ,नदियों की बाढ़ सुनिश्चित है
हम सब का त्याग भी बाजिब है ,
पर इतना त्याग क्या जायज़ है

Thursday, October 9, 2008

बिन फेरे

हम आदम युग में जीते थे /शादी के बंधन में बंधने
अग्नि के फेरे लेते थे

कुछ आउट डेटेड लोगों ने ,फेरों के बंधन में कस कर
जंजीर हमें पहनाई थी ,
उन जंजीरों को तोडेंगे ,हम पंछी बन कर डोलेंगे
दो साल किसी के साथ रहे ,उसकी पत्नी हम हो लेंगे
क़ानून हमारे हक में है

पहले वाली घर हो तो हो , फेरों वाली घर हो तो हो
बेटों वाली भी होवे तो ,उसको रोना है रोये वो
हम पत्नी दर्जा पायेंगे और मेंटेनेंस भुनायेगे
क़ानून हमारे हक में है

शादी की भाषा बदल गई ,पत्नी परिभाषा बदल गई
वेदों वाली उस भाषा को ,कानून की भाषा निगल गई
परिवार का गौरब हमसे है ,माँ बाप का गौरब हमसे है
क़ानून हमारे हक में है

फेरों के बंधन में बाँधा , वेदों की भाषा में बाँधा
दुनिया भर के नाटक करके ,पति ,बेटों का बंधन बाँधा
अब कौन पति और तू कैसा ,बेटे से ज़्यादा है पैसा
चाहें जिसके घर जा बैठें ,पत्नी का दर्जा पा बैठे
क़ानून हमारे हक में है

Monday, October 6, 2008

पछताओगे

सुन मेरे यार /अपना ब्लॉग बनाया मैंने ,कोशिश करी हज़ार
आए कुल पाठक दो चार /और पाठक कैसे आयेंगे ?
बोला- लेखन में दम हुआ तो जरूर आयेंगे
सुन मेरे मित्र /ब्लॉग में डाल्दे मेरा इक चित्र
बोला _पछताओगे /दो चार तो आते हैं मुश्किल से
क्या उन्हें भी भगाओगे ?
मेरे प्रिय मित्र ,कर तू ऐसी करनी
मेरी पत्नी सुमुखी,सुलोचनी ,बिधुबदनी
चंद्रमुखी म्रगसावकनयनी
गौर देह लेती अंगडाई / उसका चित्र प्रविष्ट करो
मेरा इतना काम करो
बोला - और ज़्यादा पछताओगे
इस छोटी सी जिंदगी में क्या तुम
इतने कमेंट्स पढ़ पाओगे??

Saturday, October 4, 2008

ब्रक्षारोपन

कालेज उत्सब में उनको बुलाया
उनके कर कमलों ब्रक्षारोपन करवाया
गड्ढा खुदा था पौधा रखा था ,इन्हे तो केवल आना था
और पौधे से हाथ लगना था
तालिया बजीं ,फ्लश चमका
मिठाइयों की खुशबू से बातावरण महका
सबेरे का अखवार , न फोटो न समाचार
उद्घाटन की केवल लाईने चार
वो भी उठावना और पप्स उपलब्ध के पास
सम्पादक को फोन घुमाया
सर,पेपर में जगह नहीं थी
विज्ञापन ज़्यादा ,हम मजबूर क्या करते
शाम तो टहले ,कालेज आए ,कल का रोपा पौधा उखाड़ आए
और बेचारे क्या करते

Wednesday, October 1, 2008

सान्त्वना

घर में कोहराम ,तीन साल की बिटिया
रोते रोते ये समझाया ,मम्मी तेरी बन गई चिडिया
रोज़ पेड़ पर चिडिया आती /बिटिया मम्मी समझ बुलाती /
जीवन मरण समझ न पाती
.................................
भूल गई बातें सब पिछली ,जनम मरण का भेद समझ कर
रोकर हंसकर ,पढ़कर लिखकर ,बाईस साल गुजारे मिलकर
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शादी विदा और मन बेटी का =
निर्बल बाप अकेला होगा ,सन्नाटा घर पसरा होगा
कभी अकेला रह न पाया ,मायूसी में मन बहलाया
इस बूढे का अब क्या होगा
रोते रोते आई ,कह गई
पापा तुम हो नहीं अकेले ,आती ही होंगी मम्मी चिडिया बन कर, इसी पेड़ पर /
इसे भी कभी ऐसे ही समझाया था
सोचते हुए
कमज़ोर नज़रों में सूखे आंसू लिए ,
मैं बैठ गया घर की देहरी पर
और सचमुच तलाशने लगा कोई आक्रति
आँगन में लगे आम के पेड़ पर