(सोचा होगा बुड्ढा सरक तो नहीं लिया ,अच्छा हुआ, बहुत टायं टायं करता था /असल में कुछ भाग्यशाली बुड्ढे दुनिया में ऐसे भी होते हैं जिनका कोई ठिकाना नहीं होता कुत्ते की तरह एक ने डंडा मार कर भगा दिया , दूसरे ने रोटी दिखा कर बुला लिया वैसे कुछ कुत्तों से घर की रखवाली भी करवाई जाती है कम से कम उनका कोई निश्चित ठिकाना तो होता है /खैर लीजिये
बहुत दिन बाद सही तीसरी किश्त खिदमत में पेश है )
| (जब में यह लिख रहा था तब ये मुझसे कह रहीं थीं ,मानो मेरी बात मत लिखो; कोई ब्लोगर या टिप्पणीकार आकर ठोक जायेगा | मैंने पूछा क्या मेरी पीठ ? नहीं तुम्हारा सर; जूतों और चप्पलों से )
कुछ त्वरित टिप्पणी करते हैं वे रचना पढ़ते जाते हैं और उनका मस्तिष्क स्वचालित यंत्र की तरह साहित्य सृजन करने लगता है |
कुछ टिप्पणी कार सोच कर टिप्पणी देते हैं | वे रचना पढ़ते हैं फिर सोचते हैं ,इतना सोचते हैं कि ,उनको सोचते देखकर ऐसा लगता है जैसे 'सोच ' स्वम् शरीर धारण कर सोच रहा हो |
कुछ चौबीसों घंटे टिप्पणी ही करते रहते है उनके ब्लॉग पर जाओ तो कुछ न मिले और कुछ सिर्फ ब्लॉग ही लिखते रहते है |चार पांच दिन बाद जीरो कमेन्ट ,फिर एक लेख लिख दिया
एक मास्साब थे | हर किसी से ,तूने ताजमहल देखा है /नहीं / कभी घर से बाहर भी निकला करो /हर किसी से /तूने ये देखा है ,वो देखा है कभी घर से बाहर भी निकला करो /बड़ी परेशानी | एक दिन एक युवक ने उन्हें आवाज दी =
मास्साब
क्या है ?
रामलाल को जानते हैं ?
कौन रामलाल ?
कभी घर पर भी रहा कीजिये
मैं एक विद्वान साहित्यकार का ब्लॉग पढ़ रहा था /सैकडों उत्कृष्ठ रचनाये उनके ब्लॉग पर | नियमित लेखक | सहसा एक बहुत ही छोटी सी टिप्पणी पर मेरी नजर गई "" अच्छा लिखा है ,लिखते रहिये आप ""मैंने जानना चाहा ये टिप्पणीकार कौन हैं ,तो मैं उनके घर गया (मतलब ब्लॉग पर ) दो माह पहले ही इन्होने ब्लॉग बनाया है | सच मानिए मुझे उनकी टिप्पणी ऐसे लगी जैसे कोई बच्चा बाबा रामदेव से कह रहा हो ""अच्छा अनुलोम विलोम करते हैं आप 'करते रहिये ' ""
जब मैं विभिन्न ब्लॉग पर बहुत टिप्पणियाँ देख रहा था तो मुझे सहसा एक नवाब साहिब का किस्सा याद आ गया |
एक थे नवाब /दिनभर शेर शायरी लिखते /कमी की कोई चिंता न थी /रईस जादे थे /अपार पुश्तेनी संपत्ति के एकमात्र बारिस / बारिस माने बरसात नहीं ,स्वामी / वो क्या है न कि कुछ लोग ' स " को 'श 'उच्चारित करते हैं
उन्होंने कहा- 'हैप्पी न्यू इयर '
इन्होने कहा -' शेम टू यू '
तो उनकी हवेली की बैठक (दरीखाने ) में रात्रि ८ बजे से ही महफ़िल शुरू हो जाती /एकमात्र शायर नवाब साहिब वाकी १५-२० श्रोता ,साहित्यकार ,गज़लों और शायरी के शौकीन ""वाह वाह /क्या बात है "" की आवाज़ से हवेली गूंजने लगती | रसिक श्रोता ,भावःबिभोर ,भावभीने | इधर बेगम अंदर से पकौडियां तलवाकर भिजवातीं ,समोसे ,मिठाई ,चाय ,काफी ,पान की गिलोरियां |
एक दिन नवाब साहिब सो कार उठे तो पेट में भयंकर दर्द /दोपहर तक और बड़ गया शाम होते होते दर्द से बैचैन होने लगे |इधर दरीखाना लोगों से भरने लगा /बेगम ने कहा नौकर से मना करवा देते है | नहीं बेअदवी होगी ,बदसलूकी होगी ,मुझे ही जाकर इत्तला देना होगा /खैर साहिब -कुरते के अंदर एक हाथ से पेट दवाये नवाब साहिब पहुंचे मनसद पर बैठे और कहा -
आज सुबह से मेरे पेट में बहुत ज्यादा दर्द है -
वाह वाह / क्या बात है / क्या तसब्बुर है /क्या जज्वात है /हुज़ूर ने तो कमाल कर दिया / (हवेली गूंजने लगी )वाह हुज़ूर क्या बात कही है / हुज़ूर ने गजल के लिए क्या जमीन चुनी है / जनाब मुक़र्रर / साहिब मुक़र्रर -इरशाद /
क्या मुखडा है / हुज़ूर तरन्नुम में हो जाये ...........|
Wednesday, June 24, 2009
Sunday, May 10, 2009
टिप्पणीकार (२)
(एक मई को टिप्पणीकार का पहले भाग लिखा था / पेश-ए-खिदमत है दूसरा भाग /जब गलियां ही खाना है तो यह क्रम तो निरंतर चलेगा ही )
टिप्पणीकार को टिप्पणियाँ देकर, साहित्यकार का, उत्साहवर्धन करना ही चाहिए /जब हम क्रिकेट खिलाड़ियों का हौसला बढाने हजारों मील दूर जा सकते हैं , और यह जानते हुए भी कि , मैच-फिक्सिंग में, हमारा कोई शेयर नहीं है , खिलाडियों का उत्साह बढाते हैं ,वहां न जा सके तो घर में ही टीवी के सामने बैठ कर उत्साह बढाते है /वाह यार क्या (चौका छक्का जो भी हो ) मारा है ,तुझसे यही उम्मीद थी / उनका तो बस नहीं चलता वरना टीवी में घुस कर खिलाडियों की पीठ ठोंक आयें / और वही बैठ कर चाय की फरमाइश करेंगे ,सोफा पर बैठ कर ही रोटी खायेंगे ,टीवी के सामने से नजर नहीं हटायेंगे /बीबियाँ झल्लाएं नहीं तो क्या करें ?
जब पीडा से बाल्मीकि और प्रेरणा से तुलसी बना जा सकता है तो प्रोत्साहन से साहित्यकार क्यों नहीं बना जा सकता ?
और छोटे छोटे बच्चे बच्चियां २२-२२-२४-२४ साल के अपनी पढाई छोड़ कर या पढाई से ध्यान हटा क़र ,कैरियर की परवाह न करते हुए ,या उधर रूचि कर दिखलाते हुए ,यहाँ आकर चाँद -तारों ,हुस्नो-इश्क ,गुलाब जैसा चेहरा गोभी के फूल जैसा चेहरा ,वगैरा वगैरा लिख रहे हैं, बेचारे कितने परेशान हैं दिन-दिन भर कम्प्यूटर पर बैठना पड़ता है और इस वजह से नल, बिजली का बिल जमा करने ,चक्की पर गेहूं पिसवाने, बूढे बाप को भेजना पड़ता है , क्या प्रोत्साहन के हकदार नहीं है ? इन्हें रात दो दो बजे तक इंटरनेट पर बैठना पड़ता है और सुबह नौ बजे तक सोना पड़ता है /बार बार ब्लॉग खोल कर देखना पड़ता है कि कोई टिप्पणी आई क्या और खास तौर पर ........की आई क्या ? होबी अच्छी बात है मगर जीवन पर ,नौकरी पर ,विद्यार्जन पर हावी नहीं होना चाहिए /
यह जानते हुए भी कि सौ ब्लॉग की रचनाएँ पढने पर भी संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग का एक भी प्रश्न हल नहीं कर पायेंगे /अरे, आई-ए-एस और आई-पी-एस की परीक्षा में भारतीय संबिधान के ४२ वे संशोधन ,नौवीं अनुसूची वाबत पूछा जायेगा या यह पूछा जायेगा कि मेडम क्युरी ने कितनी शादियाँ कीं थी /मगर पढ़ते हैं बेचारे कमेन्ट देते हैं कि कोई आकर हमारी कविता को सराह जाये ,क्या सराहना के हकदार नहीं ?
अपनी कविता सबको प्यारी लगती है ,तारीफ़ चाही जाती है =
निज कवित्त केहि लाग न नीका
सरस होइ अथवा अति फीका
वैसे कहते भी हैं अपनी अकल और दूसरों का पैसा ज्यादा दिखता है /कहते तो यह भी है अपना बच्चा और दूसरे की बीबी अच्छी लगती है(मैं नहीं कहता )मैंने तो सुना है पड़ोस के दो छोटे छोटे बच्चे झगड़ रहे थे =
पहला --मेरा डॉगी (कुत्ता ) तेरे डॉगी से सुंदर है /
दूसरा-- नहीं है /मेरा ज्यादा सुंदर है /
पहला - मेरी डॉल तेरी डॉल से सुंदर है /
दूसरा- नहीं है ,मेरी डॉल ज्यादा सुंदर है /
पहला - मेरी मम्मी तेरी मम्मी से सुंदर है
दूसरा - हाँ यह हो सकता है ,पापा भी यही कहते रहते हैं /
तो अपनी कविता सबको प्यारी लगती है और सराहना की हकदार है
वैसे यदि देखा जाय तो कमेन्ट करना सुबोध भी है और सरल भी क्योंकि इसमें जो भाषा ज्यादातर प्रयोग में लाई जाती है वह न तो हिंदी है, न इंग्लिश है न हिंगलिश है =रोमन लिपि कहा जाता है इसे / दादाजी से पूछना (अगर हों तो ? अगर हों तो ईश्वर उन्हें शतायु करे ) वे बतलायेंगे पुराने ज़माने में टेलीग्राम (तार ) इसी लिपि में भेजे जाते थे /अब तो यह टिप्पणी आदि के साथ मोबाईल में एस एम् एस के काम में आती है ,मगर है लिपि भ्रम उत्पादक /
उन्होंने लिखा ==चाचाजी अजमेर गया है
इन्होने पढ़ा == चाचाजी आज मर गया है
रोना धोना कोहराम (कोहराम फिल्म नहीं ) शुरू हो गया /
टिप्पणीकार को टिप्पणियाँ देकर, साहित्यकार का, उत्साहवर्धन करना ही चाहिए /जब हम क्रिकेट खिलाड़ियों का हौसला बढाने हजारों मील दूर जा सकते हैं , और यह जानते हुए भी कि , मैच-फिक्सिंग में, हमारा कोई शेयर नहीं है , खिलाडियों का उत्साह बढाते हैं ,वहां न जा सके तो घर में ही टीवी के सामने बैठ कर उत्साह बढाते है /वाह यार क्या (चौका छक्का जो भी हो ) मारा है ,तुझसे यही उम्मीद थी / उनका तो बस नहीं चलता वरना टीवी में घुस कर खिलाडियों की पीठ ठोंक आयें / और वही बैठ कर चाय की फरमाइश करेंगे ,सोफा पर बैठ कर ही रोटी खायेंगे ,टीवी के सामने से नजर नहीं हटायेंगे /बीबियाँ झल्लाएं नहीं तो क्या करें ?
जब पीडा से बाल्मीकि और प्रेरणा से तुलसी बना जा सकता है तो प्रोत्साहन से साहित्यकार क्यों नहीं बना जा सकता ?
और छोटे छोटे बच्चे बच्चियां २२-२२-२४-२४ साल के अपनी पढाई छोड़ कर या पढाई से ध्यान हटा क़र ,कैरियर की परवाह न करते हुए ,या उधर रूचि कर दिखलाते हुए ,यहाँ आकर चाँद -तारों ,हुस्नो-इश्क ,गुलाब जैसा चेहरा गोभी के फूल जैसा चेहरा ,वगैरा वगैरा लिख रहे हैं, बेचारे कितने परेशान हैं दिन-दिन भर कम्प्यूटर पर बैठना पड़ता है और इस वजह से नल, बिजली का बिल जमा करने ,चक्की पर गेहूं पिसवाने, बूढे बाप को भेजना पड़ता है , क्या प्रोत्साहन के हकदार नहीं है ? इन्हें रात दो दो बजे तक इंटरनेट पर बैठना पड़ता है और सुबह नौ बजे तक सोना पड़ता है /बार बार ब्लॉग खोल कर देखना पड़ता है कि कोई टिप्पणी आई क्या और खास तौर पर ........की आई क्या ? होबी अच्छी बात है मगर जीवन पर ,नौकरी पर ,विद्यार्जन पर हावी नहीं होना चाहिए /
यह जानते हुए भी कि सौ ब्लॉग की रचनाएँ पढने पर भी संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग का एक भी प्रश्न हल नहीं कर पायेंगे /अरे, आई-ए-एस और आई-पी-एस की परीक्षा में भारतीय संबिधान के ४२ वे संशोधन ,नौवीं अनुसूची वाबत पूछा जायेगा या यह पूछा जायेगा कि मेडम क्युरी ने कितनी शादियाँ कीं थी /मगर पढ़ते हैं बेचारे कमेन्ट देते हैं कि कोई आकर हमारी कविता को सराह जाये ,क्या सराहना के हकदार नहीं ?
अपनी कविता सबको प्यारी लगती है ,तारीफ़ चाही जाती है =
निज कवित्त केहि लाग न नीका
सरस होइ अथवा अति फीका
वैसे कहते भी हैं अपनी अकल और दूसरों का पैसा ज्यादा दिखता है /कहते तो यह भी है अपना बच्चा और दूसरे की बीबी अच्छी लगती है(मैं नहीं कहता )मैंने तो सुना है पड़ोस के दो छोटे छोटे बच्चे झगड़ रहे थे =
पहला --मेरा डॉगी (कुत्ता ) तेरे डॉगी से सुंदर है /
दूसरा-- नहीं है /मेरा ज्यादा सुंदर है /
पहला - मेरी डॉल तेरी डॉल से सुंदर है /
दूसरा- नहीं है ,मेरी डॉल ज्यादा सुंदर है /
पहला - मेरी मम्मी तेरी मम्मी से सुंदर है
दूसरा - हाँ यह हो सकता है ,पापा भी यही कहते रहते हैं /
तो अपनी कविता सबको प्यारी लगती है और सराहना की हकदार है
वैसे यदि देखा जाय तो कमेन्ट करना सुबोध भी है और सरल भी क्योंकि इसमें जो भाषा ज्यादातर प्रयोग में लाई जाती है वह न तो हिंदी है, न इंग्लिश है न हिंगलिश है =रोमन लिपि कहा जाता है इसे / दादाजी से पूछना (अगर हों तो ? अगर हों तो ईश्वर उन्हें शतायु करे ) वे बतलायेंगे पुराने ज़माने में टेलीग्राम (तार ) इसी लिपि में भेजे जाते थे /अब तो यह टिप्पणी आदि के साथ मोबाईल में एस एम् एस के काम में आती है ,मगर है लिपि भ्रम उत्पादक /
उन्होंने लिखा ==चाचाजी अजमेर गया है
इन्होने पढ़ा == चाचाजी आज मर गया है
रोना धोना कोहराम (कोहराम फिल्म नहीं ) शुरू हो गया /
Friday, May 1, 2009
टिप्पणी कार
एक दिन मैंने ,अपने एक टिप्पणीकार मित्र से पूछा कि कल तुमने जिस कविता पर टिप्पणी दी थी कि ""अति सुंदर भावः प्रधान रचना ""उसमे क्या खासियत थी ? बोले -ध्यान नहीं आ रहा है /मैंने कहा भैया कल ही तो तुमने टिप्पणी की है / बोले - की होगी यार ,भैया रोजाना पचासों कविताओं पर टिप्पणी करना पड़ता है /
वैसे टिप्पणीकार का काम कठिन तो होता है /उसे रचना दो तीन मर्तवा ध्यान से पढना होता है ,उसमे गलतियाँ निकलना ,आक्षेप करना ,कटाक्ष ,आलोचना समालोचना ,करना होती है /उससे मिलते शेर ,शायरी ,कविता ,लेख का हवाला देना होता है और स्वम का मत देना होता है /
यह भी सही है कि आलोचना से साहित्यकार घबराता भी है और डरता भी है /
एक शायर ने कहा है "" हुस्नवाले ( माफ़ करना शायर ने यही शब्द प्रयोग किया है किन्तु किसी को नागवार गुजरे इस लिए शेर में उस शब्द का स्थान में रिक्त छोड़ रहा हूँ ) हां तो -
...........,हर मोड़ पे ,रुक रुक के सम्हालते क्यों हैं
इतना डरते है तो फिर, घर से निकलते क्यों हैं
साहित्यिक पत्रिकाओं में तो टिप्पणी की कोई गुंजाईश ही नहीं होती /ज्यादा से ज्यादा संपादक के नाम पत्र भेजदो ,तो वह तीन माह बाद की पत्रिका में छपता है ,वह भी संपादक की मर्जी छापे या न छापे /मगर यहाँ तो पूरी स्वतंत्रता है /लेखक भी तैयारी के साथ आता है और टिप्पणीकार भी तैयारी के साथ आता है / दौनों ही पक्ष आये हैं , तैयारियों के साथ
हम गर्दनों के साथ हैं ,वो आरियों के साथ
कुछ सज्जन केवल लेखक होते है और कुछ केवल टिप्पणी कार होते है ( वैसे टिप्पणी कार भी टिप्पणी करते करते अन्ततोगत्वा लेखक हो ही जाते है ) और कुछ दोनो ही होते है लेखक और टिप्पणी कार भी /
एक उल्लू बेचने वाला उल्लू बेच रहा था /बडा उल्लू पचास का बच्चा उल्लू पॉँच सौ का / कारण ? उसने बताया कि साहब बडा तो केवल उल्लू ही है और छोटा तो उल्लू भी है और उल्लू का पट्ठा भी /(मै लिखता भी हूँ और टिप्पणी भी करता हूँ कोई अपने ऊपर न ले )
कुछ विद्वानों का मानना है कि टिप्पणी से साहित्यकार का उत्साह वर्धन होता है /यदि किसी ने तारीफ (झूंठी ही सही ) करदी तो उत्साहित होकर लिखने लगा और किसी ने बुरी करदी तो हतोत्साहित हो गया / वह क्या साहित्यकार हुआ ? किसी ने मुझे गधा कह दिया और मैं फ़ौरन दुल्लती मरने लगा तो मैं क्या आदमी हुआ ?
यद्यपि ,आमतौर पर साहित्यकार खुद्दार होता है और होना भी चाहिए
जो सर से लेकर पांव तक खुद्दार नहीं है
हाथों में कलम लेने का हकदार नहीं है
पुरानी बात है ,एक शायर महल (किला ,कोठी जो भी हो ) में जाया करते थे ,बादशाह भी शायर थे ,खूब पटती थी /एक दिन बादशाह सलामत ने शायर से पूछा " किवला ,कितने दिन में शेर कह लेते हो ? ( कह लेते हो मतलब लिख लेते हो ,यह शायरों की भाषा है ) शायर बोले ,हुजूर ,जब तबीयत लग जाती है तो एक दो माह में दो चार शेर कह लेता हूँ /बादशाह ने हंसकर फरमाया -जनाब दो चार शेर तो मैं यूं , पैखाने में बैठ कर ही, रोज़ कह लिया करता हूँ /शायर ने तुंरत कहा कि हुज़ूर उनमे वैसी बू भी आती है / और शायर महल छोड़ कर आगये और फिर कभी नहीं गए /
भगवती चरण जी ने जब चित्रलेखा लिखा तो कहा गया कि यह तो एक अंग्रेजी उपन्यास की नक़ल है /अभी दो तीन माह पूर्व एक विद्वान ने ""पाखी "" पत्रिका में लिखा कि मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'फूस की रात 'संसार की सबसे घटिया कहानी है /अब क्या कहें ,है तो है ,भैया अब तुम लिखदो संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानी /
खैर लेखक और टिप्पणी कार या आलोचक यह तो साहित्य जगत के दो पहिये हैं ,दो पहियों के बिना गाडी नहीं चल पाती है /पहिये शब्द पर से मुझे याद आरहा है -
जब मेरी शादी हुई थी तब हमारे पंडित जी हमें उपदेश देने लगे -देखो बेटा ,यह गृहस्थी एक गाडी है ,इसमें स्त्री पुरुष दो पहिये हैं इनमे सामंजस्य होना चाहिए /मैंने पूछा पंडित जी यह बताओ कि गाडी में एक पहिया सायकल का और दूसरा ट्रेक्टर का लगा हो तो ? मुझे याद है ,पंडितजी ने मेरी पत्नी की ओर देखा ,मुस्कराए ,और चुप हो गए /
वैसे टिप्पणीकार का काम कठिन तो होता है /उसे रचना दो तीन मर्तवा ध्यान से पढना होता है ,उसमे गलतियाँ निकलना ,आक्षेप करना ,कटाक्ष ,आलोचना समालोचना ,करना होती है /उससे मिलते शेर ,शायरी ,कविता ,लेख का हवाला देना होता है और स्वम का मत देना होता है /
यह भी सही है कि आलोचना से साहित्यकार घबराता भी है और डरता भी है /
एक शायर ने कहा है "" हुस्नवाले ( माफ़ करना शायर ने यही शब्द प्रयोग किया है किन्तु किसी को नागवार गुजरे इस लिए शेर में उस शब्द का स्थान में रिक्त छोड़ रहा हूँ ) हां तो -
...........,हर मोड़ पे ,रुक रुक के सम्हालते क्यों हैं
इतना डरते है तो फिर, घर से निकलते क्यों हैं
साहित्यिक पत्रिकाओं में तो टिप्पणी की कोई गुंजाईश ही नहीं होती /ज्यादा से ज्यादा संपादक के नाम पत्र भेजदो ,तो वह तीन माह बाद की पत्रिका में छपता है ,वह भी संपादक की मर्जी छापे या न छापे /मगर यहाँ तो पूरी स्वतंत्रता है /लेखक भी तैयारी के साथ आता है और टिप्पणीकार भी तैयारी के साथ आता है / दौनों ही पक्ष आये हैं , तैयारियों के साथ
हम गर्दनों के साथ हैं ,वो आरियों के साथ
कुछ सज्जन केवल लेखक होते है और कुछ केवल टिप्पणी कार होते है ( वैसे टिप्पणी कार भी टिप्पणी करते करते अन्ततोगत्वा लेखक हो ही जाते है ) और कुछ दोनो ही होते है लेखक और टिप्पणी कार भी /
एक उल्लू बेचने वाला उल्लू बेच रहा था /बडा उल्लू पचास का बच्चा उल्लू पॉँच सौ का / कारण ? उसने बताया कि साहब बडा तो केवल उल्लू ही है और छोटा तो उल्लू भी है और उल्लू का पट्ठा भी /(मै लिखता भी हूँ और टिप्पणी भी करता हूँ कोई अपने ऊपर न ले )
कुछ विद्वानों का मानना है कि टिप्पणी से साहित्यकार का उत्साह वर्धन होता है /यदि किसी ने तारीफ (झूंठी ही सही ) करदी तो उत्साहित होकर लिखने लगा और किसी ने बुरी करदी तो हतोत्साहित हो गया / वह क्या साहित्यकार हुआ ? किसी ने मुझे गधा कह दिया और मैं फ़ौरन दुल्लती मरने लगा तो मैं क्या आदमी हुआ ?
यद्यपि ,आमतौर पर साहित्यकार खुद्दार होता है और होना भी चाहिए
जो सर से लेकर पांव तक खुद्दार नहीं है
हाथों में कलम लेने का हकदार नहीं है
पुरानी बात है ,एक शायर महल (किला ,कोठी जो भी हो ) में जाया करते थे ,बादशाह भी शायर थे ,खूब पटती थी /एक दिन बादशाह सलामत ने शायर से पूछा " किवला ,कितने दिन में शेर कह लेते हो ? ( कह लेते हो मतलब लिख लेते हो ,यह शायरों की भाषा है ) शायर बोले ,हुजूर ,जब तबीयत लग जाती है तो एक दो माह में दो चार शेर कह लेता हूँ /बादशाह ने हंसकर फरमाया -जनाब दो चार शेर तो मैं यूं , पैखाने में बैठ कर ही, रोज़ कह लिया करता हूँ /शायर ने तुंरत कहा कि हुज़ूर उनमे वैसी बू भी आती है / और शायर महल छोड़ कर आगये और फिर कभी नहीं गए /
भगवती चरण जी ने जब चित्रलेखा लिखा तो कहा गया कि यह तो एक अंग्रेजी उपन्यास की नक़ल है /अभी दो तीन माह पूर्व एक विद्वान ने ""पाखी "" पत्रिका में लिखा कि मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'फूस की रात 'संसार की सबसे घटिया कहानी है /अब क्या कहें ,है तो है ,भैया अब तुम लिखदो संसार की सर्वश्रेष्ठ कहानी /
खैर लेखक और टिप्पणी कार या आलोचक यह तो साहित्य जगत के दो पहिये हैं ,दो पहियों के बिना गाडी नहीं चल पाती है /पहिये शब्द पर से मुझे याद आरहा है -
जब मेरी शादी हुई थी तब हमारे पंडित जी हमें उपदेश देने लगे -देखो बेटा ,यह गृहस्थी एक गाडी है ,इसमें स्त्री पुरुष दो पहिये हैं इनमे सामंजस्य होना चाहिए /मैंने पूछा पंडित जी यह बताओ कि गाडी में एक पहिया सायकल का और दूसरा ट्रेक्टर का लगा हो तो ? मुझे याद है ,पंडितजी ने मेरी पत्नी की ओर देखा ,मुस्कराए ,और चुप हो गए /
Monday, April 27, 2009
भावार्थ (व्यंग्य )
( दीनहीन,पराधीन ,विचाराधीन ,जीर्णशीर्ण ,जराजीर्ण , जीर्णकाय, जो शब्द उपुयक्त हो वह अथवा गिरती दीवार हूँ ठोकर न लगाना मुझको की मानिंद )
एक बुजुर्ग ==गर्मी का मौसम ==दोपहर का वक़्त = हैण्डपम्प के पास ==एक निवेदन ==प्यास लगी है /
एक ==देख तो बुढऊ,क्या कह रिया हैगा
दो = मैंने तो देखते ही समझ लिया था बुड्ढा बदमाश है
तीन = आँखे तो देखो इसकी /कैसी गिरगिट जैसी है
चार = साला हमसे प्यास बुझाने की बात करता है /
एक =चल वे बुड्ढे माफी मांग
दो =माफी से काम नहीं चलेगा ऐसे नीचों को ;तो पुलिस के हवाले ही करना चाहिए
बुजुर्ग को ऐसे प्रतीत हुआ जैसे किसी कंजूस ने अपनी सारी संपत्ति गवां दी हो जैसे किसी योद्धा ने शूरबीर का बाना पहन युद्ध भूमि से पीठ दिखला दी हो जैसे किसी साधूसम्मत आचरण वाले ने धोखे से मदपान कर लिया हो
"" नयन सूझ नहि सुनहि न काना / कही न सकहि कछु अति सकुचाना /""
सही भी है
""संभावित कहुं अपजस लाहू / मरण कोटि सम दारुण दाहू /""
थाने में
----------
थानेदार =मगर बुड्ढा तो कह रहा है की उसने कहा था प्यास लगी है /
फरियादी =दारोगा जी मतलब तो वही हुआ /जब प्यास लगेगी तभी तो प्यास बुझायेगा
फरियादी दो =दारोगाजी आप साहित्य नहीं समझते क्या ? साहित्य में एक अलंकार होगा है ""पर्यायोक्ति""तुलसी दास जी ने मानस में बहुत प्रयोग किया है / "" सहसबाहु भुज ----------दससीस अभागा ""तक में किसी का नाम नहीं लिया किन्तु चार वेद और छ: शास्त्र का ज्ञाता रावन समझ गया कि अंगद परसुराम वाबत कह रहा है /
फरियादी तीन = आशय और उद्देश्य (इंटेंशन एंड मोटिव )से सारा अपराध शास्त्र भरा पड़ा है आप कानून के जानकर होकर कानून के आशय शब्द का आशय नहीं समझते है
फरियादी चार =दारोगा जी आपने इंटरप्रीटेशन आफ स्टेट्यूट नहीं पढ़ा क्या /इंटरप्रीटेशन का सामान्य सिद्धांत है कि शब्दों को प्रथमत : उसके स्वाभाविक ,साधारण या प्रचलित अर्थ में समझना चाहिए तथा अभिव्यक्तियों और वाक्यों का अर्थान्वयन उसके व्याकरणिक अर्थ में करना चाहिए
फरियादी एक =अरे जब तक ये कानून के रखवालों को कानून की भाषा और साहित्य का ज्ञान नहीं होगा तब तक ऐसे सामाजिक गंदगी को हमें ही साफ करना होगी
और ==""हम सब एक हैं / जो हमसे टकराएगा ,मिट्टी में मिल जायेगा "" का नारा बुलंद हुआ और वहीं थाने में थानेदार के सामने बुड्ढे की ठुकाई पिटाई शुरू हो गई
उस वक्त मुझे शेर याद आरहा था कलीम अज़ीज़ साहेब का sher yaad araha thaa
=
"" अभी तेरा दौरे शबाब है ;अभी कहाँ हिसाबो किताब है /
अभी क्या न होगा जहान में ;अभी इस जहाँ में हुआ है क्या /""
एक बुजुर्ग ==गर्मी का मौसम ==दोपहर का वक़्त = हैण्डपम्प के पास ==एक निवेदन ==प्यास लगी है /
एक ==देख तो बुढऊ,क्या कह रिया हैगा
दो = मैंने तो देखते ही समझ लिया था बुड्ढा बदमाश है
तीन = आँखे तो देखो इसकी /कैसी गिरगिट जैसी है
चार = साला हमसे प्यास बुझाने की बात करता है /
एक =चल वे बुड्ढे माफी मांग
दो =माफी से काम नहीं चलेगा ऐसे नीचों को ;तो पुलिस के हवाले ही करना चाहिए
बुजुर्ग को ऐसे प्रतीत हुआ जैसे किसी कंजूस ने अपनी सारी संपत्ति गवां दी हो जैसे किसी योद्धा ने शूरबीर का बाना पहन युद्ध भूमि से पीठ दिखला दी हो जैसे किसी साधूसम्मत आचरण वाले ने धोखे से मदपान कर लिया हो
"" नयन सूझ नहि सुनहि न काना / कही न सकहि कछु अति सकुचाना /""
सही भी है
""संभावित कहुं अपजस लाहू / मरण कोटि सम दारुण दाहू /""
थाने में
----------
थानेदार =मगर बुड्ढा तो कह रहा है की उसने कहा था प्यास लगी है /
फरियादी =दारोगा जी मतलब तो वही हुआ /जब प्यास लगेगी तभी तो प्यास बुझायेगा
फरियादी दो =दारोगाजी आप साहित्य नहीं समझते क्या ? साहित्य में एक अलंकार होगा है ""पर्यायोक्ति""तुलसी दास जी ने मानस में बहुत प्रयोग किया है / "" सहसबाहु भुज ----------दससीस अभागा ""तक में किसी का नाम नहीं लिया किन्तु चार वेद और छ: शास्त्र का ज्ञाता रावन समझ गया कि अंगद परसुराम वाबत कह रहा है /
फरियादी तीन = आशय और उद्देश्य (इंटेंशन एंड मोटिव )से सारा अपराध शास्त्र भरा पड़ा है आप कानून के जानकर होकर कानून के आशय शब्द का आशय नहीं समझते है
फरियादी चार =दारोगा जी आपने इंटरप्रीटेशन आफ स्टेट्यूट नहीं पढ़ा क्या /इंटरप्रीटेशन का सामान्य सिद्धांत है कि शब्दों को प्रथमत : उसके स्वाभाविक ,साधारण या प्रचलित अर्थ में समझना चाहिए तथा अभिव्यक्तियों और वाक्यों का अर्थान्वयन उसके व्याकरणिक अर्थ में करना चाहिए
फरियादी एक =अरे जब तक ये कानून के रखवालों को कानून की भाषा और साहित्य का ज्ञान नहीं होगा तब तक ऐसे सामाजिक गंदगी को हमें ही साफ करना होगी
और ==""हम सब एक हैं / जो हमसे टकराएगा ,मिट्टी में मिल जायेगा "" का नारा बुलंद हुआ और वहीं थाने में थानेदार के सामने बुड्ढे की ठुकाई पिटाई शुरू हो गई
उस वक्त मुझे शेर याद आरहा था कलीम अज़ीज़ साहेब का sher yaad araha thaa
=
"" अभी तेरा दौरे शबाब है ;अभी कहाँ हिसाबो किताब है /
अभी क्या न होगा जहान में ;अभी इस जहाँ में हुआ है क्या /""
Monday, March 23, 2009
aur pahad toot gaya
मैं एक पारिवारिक पत्रिका पढ़ रहा था /उसमे विबिध सामग्री रहती है /लायब्रेरी से घर ले आया /बड़ी उपयोगी बातें होती हैं -एक उपयोगी विधि थी ,रात के बचे चावलों का उपयोग /सुबह मैंने देखा एक किलो चावल पके हुए रखे हैं ,जो रेसिपी ;के मुताबिक उपयोग करने रात को पका कर फ्रीज़ में रख दिए गए थे /फ्रीज़ भी गज़ब की उपयोगी चीज़ है इसमें बस्तु तब तक रखी जा सकती है तब तक की वह फैकने लायक न हो जाये
उस पत्रिका में एक लेख था -उसमे क्या हरेक में होता है ,हर दूसरा लेख स्त्री विमर्श पर ,हर तीसरी कविता महिला उत्पीडन पर और हर चौथी कहानी पुरुष प्रधान समाज पर /लगता है जैसेसाहित्य ;में ,भक्तिकाल ,बीरगाथाकाल ,रीतिकाल हो चुके है वैसे ही शायद आज का साहित्य पुरुषप्रधानसमाज काल होगा /खैर
तो उसमे एक लेख था जो भावावेश में ,क्रोधित या दुखी होकर लिखा गया था लेख बड़ा था किन्तु उसका मंतव्य केवल मात्र इनता था कि -पत्नी द्वारा पति को साहब शब्द प्रयोग करना गुलामी मानसिकता का प्रतीक होता है ,इसमें साहब और नौकर के सम्बन्ध जैसी बू आती है ,ऐसे प्रयोग वर्जित होना चाहिए ,पति पत्नी का मित्र होता है साहब नहीं /
यदि किसी के अहम को चोट न लगे तो मेरा विनम्र निवेदन यह है कि =
प्रात: नौ बजे से शाम छै:बजे तक ,फाइलों से माथापच्ची करने ,परिवार को ज़रूरियत मुहैया करने कि लिए पसीना वहाने बाले को यदि पत्नी ने साहब शब्द का प्रयोग कर दिया तो न तो वह दयनीय हुई ,न सोचनीय और न उसने कोई अहसान किया है /तांगे में जुतने वाले घोडे को भी खुर्रा किया जाता है सहलाया जाता है पीठ थपथपाई जाती है तो पति नमक प्राणी भी इन्सान है /
जब हम भी कह देते हैं कि मैडम घर पर नहीं है ,या श्रीमती जी बाज़ार गई हैं तो पत्नी ने अगर कह दिया कि साहब घर पर नहीं है तो वह कौनसे उत्पीडन का शिकार हो गई /पति को अगर स्वामी कह दिया तो वह शब्दार्थ की द्रष्टि से ,साहित्य की द्रष्टि से या मानसिकता के लिहाज़ से उपयुक्त ही है /जो है उसको वह कहना अपराध नहीं है /
युद्धसिंहजी ने किसी नवाब को गधा कह दिया ,मान हानी का दावा ,युद्धसिंह पर जुर्माना /युद्ध सिंह का अदालत से निवेदन .हुकम आयन्दा किसी नवाब को गधा नहीं कहूंगा /पण म्हारो यो अरज छै कि किसी गधे को तो नवाब साहिब कह सकूं /या में तो अपराध णी बणे /जज ने किताबें देखी दफा ५०० बगैरा, बोले नहीं /युद्धसिंह जी ने भरे इजलास में ,नवाब साहिब की ओर मुखातिब होकर ,मुस्करा कर कहा ;नवाब सा'ब= न म स का र/
खैर मूल बात =पति शब्द का शाब्दिक अर्थ ही होता है स्वामी /यथा महीपति ,भूपति ,करोड़पति आदि ,/वास्तब में पति स्वामी होता है किन्तु वह पत्नी का नहीं बल्कि गृह का स्वामी होता है और पत्नी गृह स्वामिनी /स्वामी को स्वामी और स्वामिनी को स्वामिनी कह देने पर किसके सम्मान को कहाँ ठेस लग गई /आगंतुक गृह स्वामी को तलाश करने आया है और अगर पत्नी ने कह दिया कि साहब घर पर नहीं तो कौनसा पहाड़ टूट गया /इसमें कहाँ तो पत्नी का आत्मसम्मान कम हो गया और कहाँ वह सोचनीय हो गई /क्या आगंतुक से यह कहा जाता कि बृजमोहन घर पर नहीं है या कि मेरा आदमी घर पर नहीं है =
या कि मेरा मरद घर पर नहीं है और मानलो पत्नी गुस्से में है ,क्रोधित है ,परेशान है और जैसा कि हम लोग गुस्से में नामुराद ,नामाकूल ,नालायक जैसे शब्दों का प्रयोग कर देते है वैसे ही क्या पत्नी अपने मरद के लिए कहदे कि .......घर में नहीं है /
पति पत्नी एक दूसरे को आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करें -करना ही चाहिए /मगर विचारधारा तो यह चल रही है कि हज़ार साल पहले यदि सताया गया ,शोषण किया गया ,दवा कर रखा गया तो उसका बदला आज लिया जाए /
उस पत्रिका में एक लेख था -उसमे क्या हरेक में होता है ,हर दूसरा लेख स्त्री विमर्श पर ,हर तीसरी कविता महिला उत्पीडन पर और हर चौथी कहानी पुरुष प्रधान समाज पर /लगता है जैसेसाहित्य ;में ,भक्तिकाल ,बीरगाथाकाल ,रीतिकाल हो चुके है वैसे ही शायद आज का साहित्य पुरुषप्रधानसमाज काल होगा /खैर
तो उसमे एक लेख था जो भावावेश में ,क्रोधित या दुखी होकर लिखा गया था लेख बड़ा था किन्तु उसका मंतव्य केवल मात्र इनता था कि -पत्नी द्वारा पति को साहब शब्द प्रयोग करना गुलामी मानसिकता का प्रतीक होता है ,इसमें साहब और नौकर के सम्बन्ध जैसी बू आती है ,ऐसे प्रयोग वर्जित होना चाहिए ,पति पत्नी का मित्र होता है साहब नहीं /
यदि किसी के अहम को चोट न लगे तो मेरा विनम्र निवेदन यह है कि =
प्रात: नौ बजे से शाम छै:बजे तक ,फाइलों से माथापच्ची करने ,परिवार को ज़रूरियत मुहैया करने कि लिए पसीना वहाने बाले को यदि पत्नी ने साहब शब्द का प्रयोग कर दिया तो न तो वह दयनीय हुई ,न सोचनीय और न उसने कोई अहसान किया है /तांगे में जुतने वाले घोडे को भी खुर्रा किया जाता है सहलाया जाता है पीठ थपथपाई जाती है तो पति नमक प्राणी भी इन्सान है /
जब हम भी कह देते हैं कि मैडम घर पर नहीं है ,या श्रीमती जी बाज़ार गई हैं तो पत्नी ने अगर कह दिया कि साहब घर पर नहीं है तो वह कौनसे उत्पीडन का शिकार हो गई /पति को अगर स्वामी कह दिया तो वह शब्दार्थ की द्रष्टि से ,साहित्य की द्रष्टि से या मानसिकता के लिहाज़ से उपयुक्त ही है /जो है उसको वह कहना अपराध नहीं है /
युद्धसिंहजी ने किसी नवाब को गधा कह दिया ,मान हानी का दावा ,युद्धसिंह पर जुर्माना /युद्ध सिंह का अदालत से निवेदन .हुकम आयन्दा किसी नवाब को गधा नहीं कहूंगा /पण म्हारो यो अरज छै कि किसी गधे को तो नवाब साहिब कह सकूं /या में तो अपराध णी बणे /जज ने किताबें देखी दफा ५०० बगैरा, बोले नहीं /युद्धसिंह जी ने भरे इजलास में ,नवाब साहिब की ओर मुखातिब होकर ,मुस्करा कर कहा ;नवाब सा'ब= न म स का र/
खैर मूल बात =पति शब्द का शाब्दिक अर्थ ही होता है स्वामी /यथा महीपति ,भूपति ,करोड़पति आदि ,/वास्तब में पति स्वामी होता है किन्तु वह पत्नी का नहीं बल्कि गृह का स्वामी होता है और पत्नी गृह स्वामिनी /स्वामी को स्वामी और स्वामिनी को स्वामिनी कह देने पर किसके सम्मान को कहाँ ठेस लग गई /आगंतुक गृह स्वामी को तलाश करने आया है और अगर पत्नी ने कह दिया कि साहब घर पर नहीं तो कौनसा पहाड़ टूट गया /इसमें कहाँ तो पत्नी का आत्मसम्मान कम हो गया और कहाँ वह सोचनीय हो गई /क्या आगंतुक से यह कहा जाता कि बृजमोहन घर पर नहीं है या कि मेरा आदमी घर पर नहीं है =
या कि मेरा मरद घर पर नहीं है और मानलो पत्नी गुस्से में है ,क्रोधित है ,परेशान है और जैसा कि हम लोग गुस्से में नामुराद ,नामाकूल ,नालायक जैसे शब्दों का प्रयोग कर देते है वैसे ही क्या पत्नी अपने मरद के लिए कहदे कि .......घर में नहीं है /
पति पत्नी एक दूसरे को आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करें -करना ही चाहिए /मगर विचारधारा तो यह चल रही है कि हज़ार साल पहले यदि सताया गया ,शोषण किया गया ,दवा कर रखा गया तो उसका बदला आज लिया जाए /
Sunday, March 15, 2009
हम कुछ सोचें
एक दस वर्षीय वालिका मिनी स्कर्ट और टॉप पहने नृत्य कर रही है -उसके माता पिता अपनी होनहार बालिका का नृत्य देख कर आनंद मग्न हो रहे हैं -डेक पर केसेट बज रहा है""कजरारे कजरारे तेरे नैना ""गाने के बोल के अनुसार ही बालिका का अंग संचालन हो रहा है - देश की इस भावी कर्णधार -समाज में नारी समुदाय का नेतृत्व करने वाली बालिका की भाव भंगिमा ने पिता का सर गर्व से ऊंचा उठा दिया है - और पिता की प्रसन्नता देख माताजी भी भाव विभोर हो रही हैं
यह सुना ही था की साहित्य समाज का दर्पण है आज प्रत्यक्ष देख भी लिया -वस्त्रों और अंगों पर लिखा जा रहा फिल्मी साहित्य अब गर्व की वस्तु होने लगी है -
साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों
आज का बच्चा बेड बिस्तर समझ जाता है _शायद ""खटिया"" नहीं समझता ,ठंड कोल्ड समझता है मगर ""जाड़ा""नहीं समझ पाता है मगर बेचारे की विवशता है कि गाना सुनना पड़ रहा है उसे ,चाहे वह सरकालेओ का अर्थ समझता हो या न समझता हो /
एक तर्कशास्त्र के प्रकांड पंडित कह रहे थे बच्चे ऐसे गाने सुनते ही क्यों है जब रिमोट उनके हाथ में है तो चेनल बदल क्यों नहीं लेते / माँ बाप देखने ही क्यों देते है ? साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों यह बात वे सुनने को तयार नहींएक गाना और चला था "" तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त ""किसी लडकी या नारी को देख कर चीज़ कहना कुत्सित मानसिकता का प्रतीक है -फूहड़ और अश्लील नाच पर सीटी बजा कर हुल्लड मचाने वालों की भाषा संस्कार में आरही है लडके आज उस धुन पर गा रहे हैं और लडकियां उस धुन पर झूम रही हैं -इससे ज़्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है
नारी चाहे पत्नी हो -माँ हो बहिन हो पुत्री हो या कोई भी हो उसे तेजस्वनी दामिनी बनाया जासकता है उसे प्रतिभासंपन्न तेजपुंज युक्त और सामर्थ वान बन ने की प्रेरणा दी जा सकती है =अत्याचार और अन्याय -शोषण और उत्पीड़न के विरोध में खडा होना सिखाया जा सकता है -उसे मंत्री से लेकर सरपंच और पंच बन ने तक की प्रेरणा देना चाहिए मगर नारी के प्रति अशोभनीय वाक्यांशों का प्रतिकार होना
चाहिए
वाक एवम लेखन की स्वंत्रता है -जब स्वतंत्रता निरपेक्ष और दायित्वहीन हो जाती है तो स्वेच्छाचारिता हो जाती है वहा यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है की यह स्वतंत्रता विधि सम्मत नहीं है और किसी दूसरे की स्वन्त्न्त्र्ता में बाधक तो नहीं है =ज्ञान और भावों का भण्डार ,समाज का दर्पण -ज्ञान राशी का संचित कोष यदि मानव कल्याणकारी नहीं है तो उसे में साहित्य कैसे कहा जा सकता है /फिल्मी गाने क्या साहित्य की श्रेणी में नहीं आते इस और भी साहित्य कारों का ध्यान आकर्षित होना चाहिए
यह सुना ही था की साहित्य समाज का दर्पण है आज प्रत्यक्ष देख भी लिया -वस्त्रों और अंगों पर लिखा जा रहा फिल्मी साहित्य अब गर्व की वस्तु होने लगी है -
साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों
आज का बच्चा बेड बिस्तर समझ जाता है _शायद ""खटिया"" नहीं समझता ,ठंड कोल्ड समझता है मगर ""जाड़ा""नहीं समझ पाता है मगर बेचारे की विवशता है कि गाना सुनना पड़ रहा है उसे ,चाहे वह सरकालेओ का अर्थ समझता हो या न समझता हो /
एक तर्कशास्त्र के प्रकांड पंडित कह रहे थे बच्चे ऐसे गाने सुनते ही क्यों है जब रिमोट उनके हाथ में है तो चेनल बदल क्यों नहीं लेते / माँ बाप देखने ही क्यों देते है ? साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों यह बात वे सुनने को तयार नहींएक गाना और चला था "" तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त ""किसी लडकी या नारी को देख कर चीज़ कहना कुत्सित मानसिकता का प्रतीक है -फूहड़ और अश्लील नाच पर सीटी बजा कर हुल्लड मचाने वालों की भाषा संस्कार में आरही है लडके आज उस धुन पर गा रहे हैं और लडकियां उस धुन पर झूम रही हैं -इससे ज़्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है
नारी चाहे पत्नी हो -माँ हो बहिन हो पुत्री हो या कोई भी हो उसे तेजस्वनी दामिनी बनाया जासकता है उसे प्रतिभासंपन्न तेजपुंज युक्त और सामर्थ वान बन ने की प्रेरणा दी जा सकती है =अत्याचार और अन्याय -शोषण और उत्पीड़न के विरोध में खडा होना सिखाया जा सकता है -उसे मंत्री से लेकर सरपंच और पंच बन ने तक की प्रेरणा देना चाहिए मगर नारी के प्रति अशोभनीय वाक्यांशों का प्रतिकार होना
चाहिए
वाक एवम लेखन की स्वंत्रता है -जब स्वतंत्रता निरपेक्ष और दायित्वहीन हो जाती है तो स्वेच्छाचारिता हो जाती है वहा यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है की यह स्वतंत्रता विधि सम्मत नहीं है और किसी दूसरे की स्वन्त्न्त्र्ता में बाधक तो नहीं है =ज्ञान और भावों का भण्डार ,समाज का दर्पण -ज्ञान राशी का संचित कोष यदि मानव कल्याणकारी नहीं है तो उसे में साहित्य कैसे कहा जा सकता है /फिल्मी गाने क्या साहित्य की श्रेणी में नहीं आते इस और भी साहित्य कारों का ध्यान आकर्षित होना चाहिए
Tuesday, February 24, 2009
ढूंढो ढूंढो रे साजना
इस संसार में चर, अचर, सचराचर जितने प्राणी हैं उनमें एक जीव ऐसा भी है जिसे सजन कहा जाता है /यह सजन इस संसार में कुछ न कुछ ढूँढने के लिए ही अवतरित हुआ है /अब से चालीस- पचास साल पहले उससे कहा गया = ""ढूंढो ढूंढो रे साजना मेरे कान का बाला"" = अपनी इस खोज में वह सफल हो ही नहीं पाया था तब तक दूसरा आदेश प्रसारित हो गया ="" कहाँ गिर गया ढूंढो सजन बटन मेरे कुरते का"" =सिद्ध बात है उसमें भी वह असफल रहा तभी तो लगभग सभी म्यूजिक चैनल उनकी पुनाराब्रत्ति कर रहे है, बिल्कुल पत्र -स्मरण पत्र -परिपत्र और अर्ध शासकीय पत्र की तरह /आप ही बताइए कान का बाला और बटन यदि सजन को मिल गया होता तो वह टी वी पर क्यों बार बार, लगातार गाती =क्या पागल हुई है ? ऐसे ही में एक औरत को देखता हूँ, चिल्लाती है =""हाय मेरी कमर"" -दबाई लगती है- मुस्कराती है, मगर एक घंटे बाद फिर =हाय मेरी कमर =आखिर ऐसी कैसी दबाई है -दस साल से देख रहा हूँ =इलाज परमानेंट होना चाहिए
ऐसी बात नहीं है कि वह कुछ ढूंढता ही न हो ,ढूँढता है / आधुनिक संगीत में सुर-ताल, लय, गाना किस राग पर आधारित है तथा गाने के बोल के अर्थ ढूँढता है -हस्त रेखाओं में भविष्य और जन्मपत्री में भाग्य ढूँढता है -राजनीती में चरित्र और आधुनिक पीढ़ी में संस्कार ढूँढता है -वर्तमान समस्याओं का समाधान हजारों साल पुराने ग्रंथों में ढूँढता है /कुछ लोगों की आदत होती है की वे कुछ न कुछ ढूंढते ही रहते है -कहते है ढूँढने में हर्ज़ ही क्या है /
कुछ लोग अपनी दैनिक दिनचर्या को त्याग कर, जीवन का उद्देश्य ढूंढते है / हम कौन हैं ?क्या हैं? कहाँ से आए है?कहाँ जायेंगे ? क्या लाये थे ?क्या ले जायेंगे आदि-इत्यादि , और इस चक्कर में या तो वे कार्यालय देर से पहुँचते हैं ,या उनकी टेबिल पर फाइलों का अम्बार लग जाता है /उनकी पत्नियां सब्जी और आटे के पीपे का इंतज़ार करती रहती हैं / में कौन हूँ -कहाँ से आया हूँ क्यों आया हूँ ==अरे तू तू है घर से दफ्तर आया है काम करने आया है -बात ही ख़त्म /
कुछ लेखक लेख लिखकर डाक में डालकर चौथे दिन से पेपर में अपना नाम ढूढने लगते हैं ,उधर संपादक महोदय उस लेख को पढ़ते हैं तो टेबिल की दराज़ में सरदर्द की गोली ढूँढने लगते हैं और अगर छाप दिया तो पाठक क्या ढूडेगा कुआ या खाई /
इस धरती पर स्वर्ग और नरक ढूँढने वाले हजारों हैं जिनको यहाँ उपलब्ध नहीं हो पता है -वे ऊपर है इसी कल्पना करके जीवन जैसा जीना चाहिए वेसा जी नहीं पाते ,किसी ने कहा है =तू इसी धुन में रहा मर के मिलेगी जन्नत -तुझ को ऐ दोस्त न जीने का सलीका आया = इससे अच्छे तो कार्यालय के कर्मचारी होते हैं जिनका बॉस जब गुस्सा होता है और कहता है -गो टू हेल -तो वे सीधे अपने घर चले आते हैं /
कुछ लोग प्राप्त की उपेक्षा करके, अप्राप्त को प्राप्त कर सुख ढूँढने की चाह रखते हैं, तो, कोई तनाव ग्रस्त -हताश -उदास -निराश -चिंतित व्यक्ति परिश्रम खेल व्यायाम मित्र- मंडली, हँसी- मजाक को नज़र अंदाज़ कर, नींद की गोलियां ढूंढते है /कुछ युवक खेलना बंद करके जवानी में बुढापा और कुछ बुजुर्ग मनोरंजन को अपना साधन बना कर बुढापे में युवावस्था ढूंढते है /
कुछ लोग मूड ठीक करने और गम ग़लत करने क्या ढूँढ़ते है आप सब को पता है =मधुशाला= गन्ने के रस वाली नहीं -हरिबंश जी की मधुशाला भी नहीं बल्कि मधुशाला याने मयखाना =मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूँ गम भुलाने को =मगर होता इसके बिल्कुल विपरीत है ==आए थे हँसते खेलते मयखाने की तरफ़ -जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए /
मजेदार बात देखिये ऐसी बात तक बताई जाती है कि ""कहते है उम्रे-रफ्ता कभी लौटती नहीं -जा मयकदे से मेरी जवानी उठा के ला ""अब जो मयखाने में जवानी ढूँढेगा उस का क्या होगा /एक जवानी और पडी मिलेगी कहीं नाली में /
सार बात यह कि सजन को जो ढूंढ़ना चाहिए वह न ढूंढ कर ,जो नहीं ढूँढना चाहिए वह ढूंढता है ,इसी लिए वह अभी तक सजन है नहीं तो कभी का सज्जन बन चुका होता /
ऐसी बात नहीं है कि वह कुछ ढूंढता ही न हो ,ढूँढता है / आधुनिक संगीत में सुर-ताल, लय, गाना किस राग पर आधारित है तथा गाने के बोल के अर्थ ढूँढता है -हस्त रेखाओं में भविष्य और जन्मपत्री में भाग्य ढूँढता है -राजनीती में चरित्र और आधुनिक पीढ़ी में संस्कार ढूँढता है -वर्तमान समस्याओं का समाधान हजारों साल पुराने ग्रंथों में ढूँढता है /कुछ लोगों की आदत होती है की वे कुछ न कुछ ढूंढते ही रहते है -कहते है ढूँढने में हर्ज़ ही क्या है /
कुछ लोग अपनी दैनिक दिनचर्या को त्याग कर, जीवन का उद्देश्य ढूंढते है / हम कौन हैं ?क्या हैं? कहाँ से आए है?कहाँ जायेंगे ? क्या लाये थे ?क्या ले जायेंगे आदि-इत्यादि , और इस चक्कर में या तो वे कार्यालय देर से पहुँचते हैं ,या उनकी टेबिल पर फाइलों का अम्बार लग जाता है /उनकी पत्नियां सब्जी और आटे के पीपे का इंतज़ार करती रहती हैं / में कौन हूँ -कहाँ से आया हूँ क्यों आया हूँ ==अरे तू तू है घर से दफ्तर आया है काम करने आया है -बात ही ख़त्म /
कुछ लेखक लेख लिखकर डाक में डालकर चौथे दिन से पेपर में अपना नाम ढूढने लगते हैं ,उधर संपादक महोदय उस लेख को पढ़ते हैं तो टेबिल की दराज़ में सरदर्द की गोली ढूँढने लगते हैं और अगर छाप दिया तो पाठक क्या ढूडेगा कुआ या खाई /
इस धरती पर स्वर्ग और नरक ढूँढने वाले हजारों हैं जिनको यहाँ उपलब्ध नहीं हो पता है -वे ऊपर है इसी कल्पना करके जीवन जैसा जीना चाहिए वेसा जी नहीं पाते ,किसी ने कहा है =तू इसी धुन में रहा मर के मिलेगी जन्नत -तुझ को ऐ दोस्त न जीने का सलीका आया = इससे अच्छे तो कार्यालय के कर्मचारी होते हैं जिनका बॉस जब गुस्सा होता है और कहता है -गो टू हेल -तो वे सीधे अपने घर चले आते हैं /
कुछ लोग प्राप्त की उपेक्षा करके, अप्राप्त को प्राप्त कर सुख ढूँढने की चाह रखते हैं, तो, कोई तनाव ग्रस्त -हताश -उदास -निराश -चिंतित व्यक्ति परिश्रम खेल व्यायाम मित्र- मंडली, हँसी- मजाक को नज़र अंदाज़ कर, नींद की गोलियां ढूंढते है /कुछ युवक खेलना बंद करके जवानी में बुढापा और कुछ बुजुर्ग मनोरंजन को अपना साधन बना कर बुढापे में युवावस्था ढूंढते है /
कुछ लोग मूड ठीक करने और गम ग़लत करने क्या ढूँढ़ते है आप सब को पता है =मधुशाला= गन्ने के रस वाली नहीं -हरिबंश जी की मधुशाला भी नहीं बल्कि मधुशाला याने मयखाना =मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूँ गम भुलाने को =मगर होता इसके बिल्कुल विपरीत है ==आए थे हँसते खेलते मयखाने की तरफ़ -जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए /
मजेदार बात देखिये ऐसी बात तक बताई जाती है कि ""कहते है उम्रे-रफ्ता कभी लौटती नहीं -जा मयकदे से मेरी जवानी उठा के ला ""अब जो मयखाने में जवानी ढूँढेगा उस का क्या होगा /एक जवानी और पडी मिलेगी कहीं नाली में /
सार बात यह कि सजन को जो ढूंढ़ना चाहिए वह न ढूंढ कर ,जो नहीं ढूँढना चाहिए वह ढूंढता है ,इसी लिए वह अभी तक सजन है नहीं तो कभी का सज्जन बन चुका होता /
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