उस दिन मै बात तो कर रहा था कवि गोष्ठी की मगर न जाने कहां से शेर शायरी और पुराने फिल्मी गानों में उलझ गया ।
जब मुझे जबरन कवि गोष्ठी का श्रोता बनाकर ले जाया जा रहा था तब मै उनसे यह भी न पूछ पाया कि आज की गोष्ठी किस संस्था या संगठन की ओर से है । बात यह है कि मेरे नगर में राजनैतिक दलों से ज्यादा साहित्यिक संस्थायें, संघ, संगठन , मंच इत्यादि है । हर संस्था में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष , सचिव, कोष नहीं है फिर भी एक कोषाध्यक्ष तो होता ही है और यदि उस संस्था या संघ में चार से ज्यादा कवि हुये तो फिर एक सह सचिव एंक कोई बुजुर्ग हुआ तो संरक्षक इत्यादि इत्यादि ।
जबरन पकड कर लाये गये श्रोताओं के अलावा अन्य श्रोताओं के अभाव में ऐसा प्रतीत होता है जैसे कवि गोष्ठीयों में दिलचस्पी रखने वाला साहित्य प्रेमी आज अनुपलव्ध है क्योंकि श्रोता स्वयं कवि हो चुका है और उसे फिर एक अदद श्रोता की आवश्यकता है।
महत्त्व पूर्ण कवि साथी लगातार ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं क्योंकि वे अपनी बात कहना चाहते है वे उत्सुक है अपनी सुनाने को ,अपनी छपाने को साथ ही उसकी यह शिकायत भी है कि उनकी रूचि अनुकूल श्रोता नहीं मिल पाते हैं कवियों के पास विपुल सामग्री है नगर में साहित्यकारों की कमी नहीं फिर भी कवि गोष्ठियों में श्रोता दिखाई नहीं देते
साहित्य सृजन कर कवि उसे अभिव्यक्त करना चाहे और उसे उपयुक्त पात्र न मिले या मिलने पर उसके सराहना न करे तो साहित्यकार को मृत्यु तुल्य पीड़ा ( वह जैसी भी होती हो ) होना स्वाभाविक है -यही पीड़ा सम्पादकीय अनुकूलता न मिलने पर हुआ करती थी तो फिर कवियों या लेखकों को स्वांत सुखाय लिखने को विवश होना पडा मैं भी पहले लेख लिख कर भेजता था और खेद सहित वापस आजाता था तो उसे स्वांत सुखाय के पैड में बाँध दिया करता था १५ साल पुराने स्वांत सुखाय वाले लेख जब आज पढता हूँ तो लगता है कि सम्पादक सही थे वे लेख पाठक दुखाय ही थे ।
हर कवि कि इच्छा होती है कि वह अपने यहाँ गोष्ठी आयोजित करे मगर या तो वह किराये के मकान में रहता है या पुराने पुश्तैनी मकान में - जिनमें बड़े हाल का अभाव रहता है हालाँकि वह चाय पानी फूल माला सब की व्यवस्था अपनी आर्थिक तंगी के वावजूद करता है मगर उसके बच्चे बच्चियां इसे व्यर्थ का हुल्लड़ कहकर उसकी इच्छा को दवा देते हैं।पत्नियाँ तो खैर पतियों से नाराज़ रहती ही हैं क्योंकि वे गोष्ठियों से देर रात घर लौटते हैं और उनके दुर्भाग्य से और कवि पति के भाग्य से कोई श्रोता घर पर ही आजाय तो चाय बना बना कर परेशान हो जाती है।
कवि गोष्ठियों में आयोजक समय देता है 8 बजे कवि एकत्रित होते हैं दस बजे तक । कुछ कवि तो इतनी देर से पहुँचते हैं के तब तक आधे से ज़्यादा कवि पढ़ चुके होते हैं ।इसमे एक फायदा भी है कि उन्हें ज्यादा देर इंतज़ार नहीं करना पड़ता और जाते ही सुनाने का नंबर लग जाता है ।
गोष्ठियों में अब जो अपनी सुना चुके है वे वहाँ से खिसकने के मूड में होते है अध्यक्ष बेचारा फंस जाता है भाग भी नही सकता और उसे सब से अंत में पढ़वाया जाता है जब तक चार -पाँच लोग ही रह जाते है । मैंने देखा है अखंड रामायण का पाठ -१२ बजे रात तक ढोलक मंजीरे हारमोनियम ,,दो बजे तक तीन चार लोग रह जाते है अब एक जो व्यक्ति तीन बजे फंस गया सो फंस गया सुनसान सब सो गए इधर इधर देखता रहता है और पढता रहता है काश कोई दिख जाए तो उससे पांच मिनट बैठने का कहकर खिसक जाऊँ -मगर कोई नहीं =न बीडी पी सकता है न तम्बाखू खा सकता है ,तीन से पाँच का वक्त बडा कष्ट दाई होता है /सच है भगवान् जिससे प्रेम करते है उसी को कष्ट देते हैं इससे सिद्ध हो जाता है की तीन बजे से पाँच बजे तक पाठ करने हेतु अखंड रामायण में फसने वाले और गोष्ठियों के अध्यक्ष से ही भगवान् प्रेम करते हैं ।
कवि की कविता पूर्ण होने पर दूसरे कवि तालियाँ बजाते है और बीच बीच में वाह वाह करते रहते है वास्तव में तालिया इस बात का द्योतक होती है कि प्रभु माइक छोड़ अपनी सिंहासन पर विराजमान होजाइये मगर जब वह वहीं बैठ कर डायरी के पन्ने पलट कर सुनाने हेतु और कविताये ढूढने लगता है तो शेष कवियों के दिल की धड़कन बढ़ जाती है, उधर कवि भी तो कहता है कि एक छोटी सी रचना सुनाता हूँ और फ़िर शुरू होजाता है और उसकी छोटी सी रचना खत्म होने का नाम नहीं लेती।-शेष कवियों की भी कोई गलती नही वर्दाश्त की भी हद होती है ,क्योंकि कवि का जब तक नम्बर नही आता सुनाने का तब तक उसे बहुत उत्सुकता रहती है और ज्यों ही उसने अपनी सुनाई बोर होने लगता है दूसरे दिन समाचार पत्र में प्रकाशित होता है। कवि सबसे पहले उसमें अपना नाम देखता है इत्तेफाकन किसी कवि का नाम छूट जाए या उसके व्दारा पढी गई लाइन पेपर में न दी जाये तो आयोजक की खैर नहीं ।
Wednesday, April 13, 2011
Thursday, March 31, 2011
औरु करै अपराध कोऊ
एक दिन घर पहुंचने में जरा देर होगई ,लगभग एक बज गया होगा रात का । दरवाजा खुलवाया तो यू समझ लीजिये साहब कि बिल्कुल आग, और हमें गुनगुनाते हुये , मुस्कराते हुये देख लिया तो बिल्कुल ज्वाला । । टेन्शन में तो थीं ही , बिना बताये धर के बाहर चला जाना और रात एक बजे तक न लौटना गुस्सा स्वभाविक है। तो किसी को मुस्कराते गुनगुनाते देख कर चिढ जाना या और क्रोधित होजाना ,ये तो होना ही था।
गये थे तो खाना खाकर पान खाने मगर कुछ कवित्त रसिक मिल गये मालूम हुआ कवि गोष्ठी रखी है हमसे ही पान खाये और हमे ही पकड लेगये भला इतना अच्छा श्रोता फिर कहां मिलेगा। मगर जैसा कि हर कवि सोचता है ‘
‘झूंठी वाह वाह ही सही दिल तो वहल जाता है,,
वरना हम आपकी वाह वाह को नहीं जानते क्या
मगर उन्हे तो वाह वाह सुनना था ।घर पर फोन से सूचना भी नहीं देने दी भले आदमियों ने ।सोचा होगा सुनने को तो बुलाया ही है इसे भी चांस देदो तो और भी मन लगाकर सुनेगा । हमसे भी कहा कुछ सुनाओ । सुनाया ,तो और लोगों ने तालियां भी बजाई । लोगो ने वाह वाह भी की एसा लगा कि हम बडे कवि होगये इतने लोग हमे सराह रहे है जम कर तालियां बजा रहे है। चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान थी और थोडा थोडा गुव्वारे जैसा भी, तालियों की गडगडाहट से , फूल भी गये थे सो गुनगुनाते हुये घर पहुंचे थे यह जानते हुये भी कि
सच है मेरी बात का क्या एतबार
सच कहूंगा झू्रंठ मानी जायेगी
फिर भी हमने मतलब मैने स्पष्टीकरण देना शुरु कर दिया । कवि गोष्ठी थी हमने रचना सुनाई तो लोगों ने जम कर तालियां बजाई वजाते ही रहे बजाते ही रहे। पूछा कहां थी कवि गोष्ठी , हमने कहा बापू पार्क में । बोली वहां तो मच्छर बहुत है।
ठीक है भैया ऐसा ही सही वे मेरी कविता नही सराह रहे थे बस खुश और करे अपराध कोउ और पाव फल कोउ । गलती तो उन लोगों की है न जो कह गए
।ओ फूलों की रानी बहारों की मलिका तेरा मुस्कराना गजब हो गया। क्या जरुरत थी साहब । चौहदवीं का चाद हो या आफताव हो वाह साहब, अरे जब आफताब कह ही दिया था तो और स्पष्ट भी कर देते कि आफताब मई जून का, नौतपे का बिल्कुल रोहणी नक्षत्र का , मगर नहीं और इससे भी सब्र न हुआ तो कल चौहदवीं की रात थी शव भर रहा चर्चा तेरा ।इनको ऐसी चर्चाओं से ही फुरसत नहीं मिलती थी किसी से कोई मतलव ही नहीं था वस वालों को नागिन कह दिया घटा कह दिया सिमटी तो नागिन फैली तो घटा,और तो और एक शायर साहब पधारे वोले
मेरे जुनू को जुल्फ के साये से दूर रख
रास्ते मे छांव पाके मुसाफिर ठहर न जाये
क्या है ये । भैया जुल्फ हैं या बरगद का दरख्त । तसल्ली फिर भी न हुई तो कहा गया हंस गये आप तो बिजली चमकी कहने वाले यह भूल गये कि इसके बाद एसा डरावना गरजता है कि क्या बताये।घन घमंड नभ गरजत घोरा ...डरपत मन मोरा । गलतियां तो पुरानों ने बहुत की है उसका खामियाजा आज की पीढी भुगत रही है या उस को भुगताया जा रहा है अब उन्हौने गलती की या वह जमाना ही एसा था यह बात जुदागाना है मगर गलती की है तो मानी भी जारही है और फोरफादर्स के कर्मों की सजा अब दी भी,जारही है।
गये थे तो खाना खाकर पान खाने मगर कुछ कवित्त रसिक मिल गये मालूम हुआ कवि गोष्ठी रखी है हमसे ही पान खाये और हमे ही पकड लेगये भला इतना अच्छा श्रोता फिर कहां मिलेगा। मगर जैसा कि हर कवि सोचता है ‘
‘झूंठी वाह वाह ही सही दिल तो वहल जाता है,,
वरना हम आपकी वाह वाह को नहीं जानते क्या
मगर उन्हे तो वाह वाह सुनना था ।घर पर फोन से सूचना भी नहीं देने दी भले आदमियों ने ।सोचा होगा सुनने को तो बुलाया ही है इसे भी चांस देदो तो और भी मन लगाकर सुनेगा । हमसे भी कहा कुछ सुनाओ । सुनाया ,तो और लोगों ने तालियां भी बजाई । लोगो ने वाह वाह भी की एसा लगा कि हम बडे कवि होगये इतने लोग हमे सराह रहे है जम कर तालियां बजा रहे है। चेहरे पर स्वाभाविक मुस्कान थी और थोडा थोडा गुव्वारे जैसा भी, तालियों की गडगडाहट से , फूल भी गये थे सो गुनगुनाते हुये घर पहुंचे थे यह जानते हुये भी कि
सच है मेरी बात का क्या एतबार
सच कहूंगा झू्रंठ मानी जायेगी
फिर भी हमने मतलब मैने स्पष्टीकरण देना शुरु कर दिया । कवि गोष्ठी थी हमने रचना सुनाई तो लोगों ने जम कर तालियां बजाई वजाते ही रहे बजाते ही रहे। पूछा कहां थी कवि गोष्ठी , हमने कहा बापू पार्क में । बोली वहां तो मच्छर बहुत है।
ठीक है भैया ऐसा ही सही वे मेरी कविता नही सराह रहे थे बस खुश और करे अपराध कोउ और पाव फल कोउ । गलती तो उन लोगों की है न जो कह गए
।ओ फूलों की रानी बहारों की मलिका तेरा मुस्कराना गजब हो गया। क्या जरुरत थी साहब । चौहदवीं का चाद हो या आफताव हो वाह साहब, अरे जब आफताब कह ही दिया था तो और स्पष्ट भी कर देते कि आफताब मई जून का, नौतपे का बिल्कुल रोहणी नक्षत्र का , मगर नहीं और इससे भी सब्र न हुआ तो कल चौहदवीं की रात थी शव भर रहा चर्चा तेरा ।इनको ऐसी चर्चाओं से ही फुरसत नहीं मिलती थी किसी से कोई मतलव ही नहीं था वस वालों को नागिन कह दिया घटा कह दिया सिमटी तो नागिन फैली तो घटा,और तो और एक शायर साहब पधारे वोले
मेरे जुनू को जुल्फ के साये से दूर रख
रास्ते मे छांव पाके मुसाफिर ठहर न जाये
क्या है ये । भैया जुल्फ हैं या बरगद का दरख्त । तसल्ली फिर भी न हुई तो कहा गया हंस गये आप तो बिजली चमकी कहने वाले यह भूल गये कि इसके बाद एसा डरावना गरजता है कि क्या बताये।घन घमंड नभ गरजत घोरा ...डरपत मन मोरा । गलतियां तो पुरानों ने बहुत की है उसका खामियाजा आज की पीढी भुगत रही है या उस को भुगताया जा रहा है अब उन्हौने गलती की या वह जमाना ही एसा था यह बात जुदागाना है मगर गलती की है तो मानी भी जारही है और फोरफादर्स के कर्मों की सजा अब दी भी,जारही है।
Sunday, February 27, 2011
बुडढा मिल गया
संगम में एक गाना था ,हरिव्दार में नहीं बल्कि फिल्म संगम में
यूं .........कि जब धन्नो घोडी होकर तांगा खीच सकती है , वसंती लडकी होकर टांगा चला सकती है तो मै बुडढा होकर बुडढों की बुराई क्यों नहीं कर सकता । वैसे हकीकत वयान करना बुंराई करना थोड़े ही होता है ।
असल में होता क्या है कि ये लोग एक उम्र के वाद सठिया जाते है । सठ को शठ भी सुविधा और संतुलन की दृष्टि से प्रयोग किया जासकता है । शठ सुधर नहीं सकते एसी बात भी नहीं है।
शठ सुधरहि सत संगति पाई कैसे वो ऐसे कि
पारस परस कुधात सुहाई ।
मगर इन बुडढो का आलम यह है कि
तुलसी पारस के छुये कंचन भई तलवार
पर ये तीनो न गये धार मार आकार ।
और उसका भी कारण है ये हमेशा अकडे ही रहे झुके तो केवल बास के सामने वाकी बीबी और बच्चों के लिये तो अकडे ही रहे कमर झुक गई मगर अकड जाती नहीं । रस्सी जल गई पर बल न गया।
वैसे सतसंगति के लिये यहां पारस की कमी भी नहीं है।सतसंगत के लिये टीवी चैनल है ,विगबास है, उसमें विदेश से पधारी हुई बाला एडरसन,बेचारी यहां आई अपना घर परिवार छोड कर सतसंगति देने और उनको मिला क्या मात्र सात करोड। सुना है उनका स्वागत करने एक झलक पाने बहुत तादाद में लोग हवाई अडडे पर गये थें ।फिर अपने यहां क्या कम पारस है अपने यहां भी इन्साफ वाली बाई,और भी अनेक हैं जिनकी विचारधारा यह है कि पुरुष जब कपडे उतार सकता है एक अभिनेता है वे इसी तलाश में रहते है कि कब बनियान फैक कर गाना गाने को मिले आखिर मसल्स बनाये किस लिये है जिम जा जा कर तो फिर लडके और लडकी यह भेद भाव क्यों यहां समानता क्यों नहीं । मगर बुडढों को ये बात समझ में नहीं आती क्योंकि उन्हौने वह जमाना देखा होता है जब बेटी पूछती थी मां जीन्स पहिन लूं क्या तो मां कहती थी मत पहिन बेटी लोग क्या कहेंगे । आज जब बेटी कुछ पहिनने को पूछती है तो मां कहती पहिन ले बेटी कुछ तो पहिन ले।
हां तो मै इन बुडढों की बात कर रहा था ये अकडूचंन्द सौने के होकर भी तलवार बने रहते है । इनकी बातें सुनो कुन्दनलाल और नलिनीजयवन्त की बाते करेंगे साथ ही हमारे जमाने में एक रुपये का सोलह सेर गेहूं आता था । अरे आता होगा हमे क्या लेना देना ।अर्ली टू बैड वाली बात करेंगे अरे इनको कौन समझाये जल्दी सोना जल्दी उठना उस जमाने की बाते हैं आज तो असल चैनल तो रात 12 बजे के बाद ही शुरु होते है। उस पर तुर्रा ये कि घर वाले हमको नजरअंदाज करते है हमारी उपेक्षा करते है और तो और वो भी सात फेरों वाली बच्चों की ही तरफ बोलती है । अरे भइया पहले वह डर के कारण तुम्हारी तरफ बोलती थी अब डर खत्म । बच्चे हो गये कमाने वाले और जमाने का कायदा है आपने भी देखा होगा गमले में पौधे लगाते है पानी डालने का ध्यान रखा जाता है मैने तो नहीं देखा किसी को कि किसी ढूंढ मे पानी डाल रहा हो तो ये समझते ही नहीं कि हम ठूंठ हो चुके है ।
और इनकी बाते देखों जैसे सारे संसार काअनुभव इन्हे ही हो और डाई करके कहेंगे ये कि ये वाल घूप में सफेद नहीं हुये कमाल है। जहां तक मै समझता हूं पुराने लोगो को न तो बात को समझने की क्षमता होती थी न बोलने का तरीका आता था ।
एक ही लेख में ज्यादा बुराई भी नहीं करना चाहिये शेष बुराई आगे के लिये छोडते है।
मै का करूं राम मुझे बुडढा मिल गया।उस गाने को बार बार दुहराती है जब भी किसी बात पर इनका विरोध करो मै का करूं राम बहुत समझाया हंसी में मजाक में व्यंग्य में ताने के रुप में उलाहने के रुप में बार बार इस गाने को नहीं गाना चाहिये इससे पुरुष का मनोबल गिरता है वह मानसिक दुर्वलता का शिकार हो सकता है मगर नहीं साहब। एक बात तो है एक उमर के बाद आदमी सठिया तो जाता है।आश्चर्य तो होगा यह जानकर कि बुडठा बुडढो की बुराई कर रहा है ।तो मेरा कहना यह है कि
यूं .........कि जब धन्नो घोडी होकर तांगा खीच सकती है , वसंती लडकी होकर टांगा चला सकती है तो मै बुडढा होकर बुडढों की बुराई क्यों नहीं कर सकता । वैसे हकीकत वयान करना बुंराई करना थोड़े ही होता है ।
असल में होता क्या है कि ये लोग एक उम्र के वाद सठिया जाते है । सठ को शठ भी सुविधा और संतुलन की दृष्टि से प्रयोग किया जासकता है । शठ सुधर नहीं सकते एसी बात भी नहीं है।
शठ सुधरहि सत संगति पाई कैसे वो ऐसे कि
पारस परस कुधात सुहाई ।
मगर इन बुडढो का आलम यह है कि
तुलसी पारस के छुये कंचन भई तलवार
पर ये तीनो न गये धार मार आकार ।
और उसका भी कारण है ये हमेशा अकडे ही रहे झुके तो केवल बास के सामने वाकी बीबी और बच्चों के लिये तो अकडे ही रहे कमर झुक गई मगर अकड जाती नहीं । रस्सी जल गई पर बल न गया।
वैसे सतसंगति के लिये यहां पारस की कमी भी नहीं है।सतसंगत के लिये टीवी चैनल है ,विगबास है, उसमें विदेश से पधारी हुई बाला एडरसन,बेचारी यहां आई अपना घर परिवार छोड कर सतसंगति देने और उनको मिला क्या मात्र सात करोड। सुना है उनका स्वागत करने एक झलक पाने बहुत तादाद में लोग हवाई अडडे पर गये थें ।फिर अपने यहां क्या कम पारस है अपने यहां भी इन्साफ वाली बाई,और भी अनेक हैं जिनकी विचारधारा यह है कि पुरुष जब कपडे उतार सकता है एक अभिनेता है वे इसी तलाश में रहते है कि कब बनियान फैक कर गाना गाने को मिले आखिर मसल्स बनाये किस लिये है जिम जा जा कर तो फिर लडके और लडकी यह भेद भाव क्यों यहां समानता क्यों नहीं । मगर बुडढों को ये बात समझ में नहीं आती क्योंकि उन्हौने वह जमाना देखा होता है जब बेटी पूछती थी मां जीन्स पहिन लूं क्या तो मां कहती थी मत पहिन बेटी लोग क्या कहेंगे । आज जब बेटी कुछ पहिनने को पूछती है तो मां कहती पहिन ले बेटी कुछ तो पहिन ले।
हां तो मै इन बुडढों की बात कर रहा था ये अकडूचंन्द सौने के होकर भी तलवार बने रहते है । इनकी बातें सुनो कुन्दनलाल और नलिनीजयवन्त की बाते करेंगे साथ ही हमारे जमाने में एक रुपये का सोलह सेर गेहूं आता था । अरे आता होगा हमे क्या लेना देना ।अर्ली टू बैड वाली बात करेंगे अरे इनको कौन समझाये जल्दी सोना जल्दी उठना उस जमाने की बाते हैं आज तो असल चैनल तो रात 12 बजे के बाद ही शुरु होते है। उस पर तुर्रा ये कि घर वाले हमको नजरअंदाज करते है हमारी उपेक्षा करते है और तो और वो भी सात फेरों वाली बच्चों की ही तरफ बोलती है । अरे भइया पहले वह डर के कारण तुम्हारी तरफ बोलती थी अब डर खत्म । बच्चे हो गये कमाने वाले और जमाने का कायदा है आपने भी देखा होगा गमले में पौधे लगाते है पानी डालने का ध्यान रखा जाता है मैने तो नहीं देखा किसी को कि किसी ढूंढ मे पानी डाल रहा हो तो ये समझते ही नहीं कि हम ठूंठ हो चुके है ।
और इनकी बाते देखों जैसे सारे संसार काअनुभव इन्हे ही हो और डाई करके कहेंगे ये कि ये वाल घूप में सफेद नहीं हुये कमाल है। जहां तक मै समझता हूं पुराने लोगो को न तो बात को समझने की क्षमता होती थी न बोलने का तरीका आता था ।
एक ही लेख में ज्यादा बुराई भी नहीं करना चाहिये शेष बुराई आगे के लिये छोडते है।
Saturday, February 19, 2011
गैर हाजिरी मुआफ
जब मेरा स्वास्थ्य खराब हुआ था तभी मै समझ गया था कि न जाने कितने हाथों से गुजरुगा रेल में खरीदे हुये अखबार की तरह और सच ही जो भी तबीयत देखने आया अपने अनुभव और दवाओं की जानकारी साथ लाया । बात मात्र इतनी थी कि पीठ में दर्द हुआ था लेकिन दुष्यंत कुमार जी की मानें तो ** पक्ष औ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं बात इतनी है कि कोई पुल बना है"। पैथियां इतनी प्रचलित है कि मरीज़ दुबिधा में ही रहता है मैं इधर जाउं या उधर जाउं ।और फिर सलाहकार । कहते है संसार में सबसे ज्यादा दी जाने वाली कोई चीज है तो वह है सलाह और सबसे कम ली जाने वाली कोई चीज है तो वह है सलाह
।
वैसे तो दर्द सभी खराब होते है मगर पीठ का बापरे न उठ सकते न बैठ सकते चीख निकलजाये जरासी हरकत पर । उनका कहना था कि जल्दी से किसी डाक्टर को बतलादो एक्सरे करवालो । मगर तबीयत पूछने आये एक ने कहा भाभी जी इन डाक्टरों के चक्कर में पड मत जाना ।हमारे चाचाजी को ऐसे ही पीठ में दर्द हुआ था न जाने कैसा इन्जेक्शन लगाया कि लकवा हो गया आज तक घिसट रहे है और एलोपैथी में इसका इलाज है भी नहीं कहदेंगे स्लिप डिस्क है आराम करो दबायें खाओ।एक और ने समर्थन किया कि कि सही बात है एक को डाक्टर ने बतादिया वरट्रीब्रा कलेप्स हो गया है और आपरेशन कर दिया बेचारे ने पूरी जिन्दगी व्हील चेयर पर बिताई।मेरी मानो तो होमियोपैथ को दिखालो।
सही भी है होमियोपैथी एक पध्दति है जिसकी दवायें निरापद होती है केवल दवा का नाम मालूम होना चाहिये लाते रहो खाते रहो। इसीलिये होमियोपैथी का डाक्टर कभी मरीज को पर्चा बना कर नहीं देता है न दवा का नाम ही बताता है नाम लिख दिया तो मरीज को जानकारी हो जायेगी और दस रुपये की दवा के पचास बसूल करने में दिक्कत होगी ।
होमियोपैथी है बडी विचित्र इसके नाम जितने अटपटे है उतने आश्चर्यजनक इनके तत्व होते हैं जैसे एक प्रकार का सर्प चेचक का बीज स्पेन का मकडा धतूरा आदि । घतूरा पर से याद आया एक मरीज के लक्षण मानसिक रोगी जैसे नजर आने पर चिकित्सक ने किताबों के अध्ययन से पाया कि इसे स्ट्रेमोनियम दी जाना चाहिये । चूंकि दवा उसके पास खत्म हो गई थी उस दबाई का कन्टेन्ट था धतूरा तो पास में लगे धतूरे के पत्ते निचोड कर मरीज को पिला दिये । इससे मरीज.......।कुछ बाते इशारे में कही जाती है जैसे कि एक युवक ने टंकी में यह देखने के लिये कि इसमें पैट्रोल है या नहीं । माचिस जलाई । पेट्रोल था। आयु 35 वर्ष। धतूरे को कनक कहते है कहते है इसके खाने से आदमी पागल हो जाता है। स्वर्ण को भी कनक कहते है कहा है ‘‘कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय । ये खाये बौरात है वो पाये बौरात । खैर उस चिकित्सक का मुकदमा तो सुप्रिम कोर्ट तक गया
एक सलाहकार और आये बोले बाबूजी कुछ नहीं तुमने कोई बजन उठा लिया होगा तो चोडरा कुसका चला गया है हमारे ग्रामीण क्षेत्र में पीठ के नीचे हिस्से यानी लम्बर रीजन में अचानक दर्द होने लगने को चोडरा चला जाना या कुस्का चला जाना कहा जाता है । मै तलाश करता हूं अगर कोई व्यक्ति उल्टा पैदा हुआ होगा तो उससे आपकी कमर में लात लगवा देंगे दो दिन में आराम हो जायेगा । मुझे याद आया एक थानेदारसाहब का चोडरा चला गया था तो शहर के जितने गुन्डे बदमाश थे सब पहुंच गये हुजूर हम उल्टे पेदा हुये है
गरज यह कि जितने मुह उतनी दबायें।कहीं की मिटटी लपेटी न जाने कहां कहां के पानी से नहाये।जन्तर मन्तर जादू टोना । उसी बीच मालूम हुआ एक स्थान पर मेला लगा है मरीज इधर से खटिया पर लेटा हुआ जाता है और उधर से दौडता हुआ आता है वहां भी गये हालांकि वहां तो कुछ भेंट नहीं ली जाती थी परन्तु ठहरने की जगह व महगाई महानगर से भी ज्यादा ।
कृपया गैर हाजिरी को माफ़ करें
।
वैसे तो दर्द सभी खराब होते है मगर पीठ का बापरे न उठ सकते न बैठ सकते चीख निकलजाये जरासी हरकत पर । उनका कहना था कि जल्दी से किसी डाक्टर को बतलादो एक्सरे करवालो । मगर तबीयत पूछने आये एक ने कहा भाभी जी इन डाक्टरों के चक्कर में पड मत जाना ।हमारे चाचाजी को ऐसे ही पीठ में दर्द हुआ था न जाने कैसा इन्जेक्शन लगाया कि लकवा हो गया आज तक घिसट रहे है और एलोपैथी में इसका इलाज है भी नहीं कहदेंगे स्लिप डिस्क है आराम करो दबायें खाओ।एक और ने समर्थन किया कि कि सही बात है एक को डाक्टर ने बतादिया वरट्रीब्रा कलेप्स हो गया है और आपरेशन कर दिया बेचारे ने पूरी जिन्दगी व्हील चेयर पर बिताई।मेरी मानो तो होमियोपैथ को दिखालो।
सही भी है होमियोपैथी एक पध्दति है जिसकी दवायें निरापद होती है केवल दवा का नाम मालूम होना चाहिये लाते रहो खाते रहो। इसीलिये होमियोपैथी का डाक्टर कभी मरीज को पर्चा बना कर नहीं देता है न दवा का नाम ही बताता है नाम लिख दिया तो मरीज को जानकारी हो जायेगी और दस रुपये की दवा के पचास बसूल करने में दिक्कत होगी ।
होमियोपैथी है बडी विचित्र इसके नाम जितने अटपटे है उतने आश्चर्यजनक इनके तत्व होते हैं जैसे एक प्रकार का सर्प चेचक का बीज स्पेन का मकडा धतूरा आदि । घतूरा पर से याद आया एक मरीज के लक्षण मानसिक रोगी जैसे नजर आने पर चिकित्सक ने किताबों के अध्ययन से पाया कि इसे स्ट्रेमोनियम दी जाना चाहिये । चूंकि दवा उसके पास खत्म हो गई थी उस दबाई का कन्टेन्ट था धतूरा तो पास में लगे धतूरे के पत्ते निचोड कर मरीज को पिला दिये । इससे मरीज.......।कुछ बाते इशारे में कही जाती है जैसे कि एक युवक ने टंकी में यह देखने के लिये कि इसमें पैट्रोल है या नहीं । माचिस जलाई । पेट्रोल था। आयु 35 वर्ष। धतूरे को कनक कहते है कहते है इसके खाने से आदमी पागल हो जाता है। स्वर्ण को भी कनक कहते है कहा है ‘‘कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय । ये खाये बौरात है वो पाये बौरात । खैर उस चिकित्सक का मुकदमा तो सुप्रिम कोर्ट तक गया
एक सलाहकार और आये बोले बाबूजी कुछ नहीं तुमने कोई बजन उठा लिया होगा तो चोडरा कुसका चला गया है हमारे ग्रामीण क्षेत्र में पीठ के नीचे हिस्से यानी लम्बर रीजन में अचानक दर्द होने लगने को चोडरा चला जाना या कुस्का चला जाना कहा जाता है । मै तलाश करता हूं अगर कोई व्यक्ति उल्टा पैदा हुआ होगा तो उससे आपकी कमर में लात लगवा देंगे दो दिन में आराम हो जायेगा । मुझे याद आया एक थानेदारसाहब का चोडरा चला गया था तो शहर के जितने गुन्डे बदमाश थे सब पहुंच गये हुजूर हम उल्टे पेदा हुये है
गरज यह कि जितने मुह उतनी दबायें।कहीं की मिटटी लपेटी न जाने कहां कहां के पानी से नहाये।जन्तर मन्तर जादू टोना । उसी बीच मालूम हुआ एक स्थान पर मेला लगा है मरीज इधर से खटिया पर लेटा हुआ जाता है और उधर से दौडता हुआ आता है वहां भी गये हालांकि वहां तो कुछ भेंट नहीं ली जाती थी परन्तु ठहरने की जगह व महगाई महानगर से भी ज्यादा ।
कृपया गैर हाजिरी को माफ़ करें
Saturday, December 4, 2010
सुन साहेबा सुन
यदि अवकाश के दिन सबेरे सबेरे कोई किसी के घर चाय पीने आजाये और अपनी कवितायें ,गजल,लेख सुनाने लगे या फिर कोई सुबह सुबह अपने घर पर चाय के लिये आमंत्रित करे और उनका बेटा गाने लगे ’’उन्हे अपनी रचनायें सुनाना है इसी लिये डैडी ने मेरे तुम्हे चाय पे बुलाया है ’’
सुनना कई प्रकार का होता है जिसमें ’’मन से सुनना’’ और ’’ बेमन से सुनना ’’ लोक में प्रचलित हैं । बेमन से सुनने वाला वर्षो तक याद रहता है और बेमन से सुनने वाले की क्या क्या गतिविधियां थी यह भी याद रहता है ’’बेरुखी के साथ सुनना दर्दे दिल की दास्तां और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना गुलाम अली साहब को आज तक याद है। सुनने वाला बार बार घडी देखने लगे जम्हाई लेने लगे तो सुनाने वाले को इस बात की परवाह नहीं होती है।वैसे यह सत्य है कि कभी अकारण सी वेचैनी होने लगे, जी घबराने लगे, किसी काम में मन न लगे, कुछ भी अच्छा न लगे, अनर्इजी फीलिंग होने लगे तो किसी को पकड कर अपनी रचनाये सुनाना एक ट्रेक्युलाइजर का काम करता है फिर चाहे सुनने वाले को चाय पिलाना पडे या जलेवियां खिलाना पडे।
मैने सुना है एक सज्जन बीमार हुये, वैसे सज्जन लोग कम ही बीमार होते है,मगर हो गये क्या करे। डाक्टर ने आठ घन्टे खतरनाक बताये कहा आज की रात निकल जाये तो मरीज खतरे से बाहर हो जायेगा । रात कैसे निकले ।उन सज्जन का एक सज्जन बेटा भी था वैसे बेटे आज कल सज्जन होते नहीं है मगर होगया इत्तेफाक है तो उसने पापा के पुराने दोस्त को बुलाकर कहा अंकल किसी तरह रात निकलजाये । अंकल ने कहा यह कौनसी बडी बात है , मानवमस्तिष्क से परिचित वे जानते थे कि मरीज का ध्यान डायवर्ट करदो आधी बीमारी उसकी दूर हो जाती है । मित्र अंकल कमरे में गये और जाकर अपने मरीज मित्र से कहा यार वो भी क्या दिन थे जब तुम स्कूल में गजले लिखते थे फिर कालेज पहुंचते पहुंचते तो उनमें बहुत बजन आ गया था अव रिटायरमेन्ट के बाद उनका कुछ उपयोग करे । बीमार को करार आया बेबजह आया या बाबजह आया मगर आया।इशारे से उन्हौने अपनी पुरानी डायरियां निकलवाई । पहले मंद्र फिर मध्यम और फिर तारसप्तक में शुरु हो गये ।बेटे बेटी कमरे से बाहर बैठे आवाज सुनते रहे घडी देखते रहे वक्त गुजरता गया खतरे की अवधि समाप्त । कमरे में गये पिताजी जोर जोर से रचना पाठ कर रहे थे और वगल में मित्र अंकल मरे डले थे।
ये सुनने सुनाने का सिलसिला ’सुनो सजना पपीहे ने कहा सबसे पुकार के’ के पूर्व से चला आरहा है और सुन सुना आती क्या खण्डाला के बाद भी निरंतर जारी है।
मेरे नगर में पैसेन्जर गाडी रात 12 वजे आकर रात्रि विश्राम करती है सुवह आठ बजे जाती है। जिस दिन स्टेशन पहुचने में जरा देरी हो जाये उस दिन बिल्कुल राइट टाइम चली जाती है, मगर देर नहीं हुई थी तो गाडी का लेट होना स्वाभाविक था । साडे आठ बज गये ,पौने नौ बज गये आज क्या बात होगई कही कोई क्रासिंग तो नहीं है। ये क्रोसिंग भी मजेदार चीज होती है इंशाअल्लाह कभी मौका लगा तो इस पर भी अर्ज करुंगा ।यात्री परेशान शीटी रेल की बज रही है एनाउन्स हो रहा है गाडी स्टेशन छोडने वाली है मगर हरी झंडी दिखाने वाले गार्ड साहब गायब है। तलाश की तो बडी देर बाद मिले गाडी के पीछे खडे हुये शेर सुना रहे हैं और कुली दाद दे रहे हैं ।
अदालत सुनी सुनाई बात पर विश्वास नहीं करती है। गुलाम अली साहब ने कहा सुना है गैर की महफिल में तुम न जाओगे किसी ने गाया सुना है तेरी महफिल में रतजगा है किसी वकील से पूछो यह हियर से की श्रेणी मे आता है ।
सुनना ठीक है कहते है जीभ एक और कान दो इसी लिये होते है मगर सुनना वाध्यकारी नहीं होना चाहिये सुन साहिबा सुन मैने तुझे चुन लिया तू भी मुझे चुन । मतलव यह तो दादागिरी होगई । तूने चुना तेरी मरजी मगर किसी पर यह क्यों थोपना कि तू भी मुझे चुन ।
सुनना कई प्रकार का होता है जिसमें ’’मन से सुनना’’ और ’’ बेमन से सुनना ’’ लोक में प्रचलित हैं । बेमन से सुनने वाला वर्षो तक याद रहता है और बेमन से सुनने वाले की क्या क्या गतिविधियां थी यह भी याद रहता है ’’बेरुखी के साथ सुनना दर्दे दिल की दास्तां और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना गुलाम अली साहब को आज तक याद है। सुनने वाला बार बार घडी देखने लगे जम्हाई लेने लगे तो सुनाने वाले को इस बात की परवाह नहीं होती है।वैसे यह सत्य है कि कभी अकारण सी वेचैनी होने लगे, जी घबराने लगे, किसी काम में मन न लगे, कुछ भी अच्छा न लगे, अनर्इजी फीलिंग होने लगे तो किसी को पकड कर अपनी रचनाये सुनाना एक ट्रेक्युलाइजर का काम करता है फिर चाहे सुनने वाले को चाय पिलाना पडे या जलेवियां खिलाना पडे।
मैने सुना है एक सज्जन बीमार हुये, वैसे सज्जन लोग कम ही बीमार होते है,मगर हो गये क्या करे। डाक्टर ने आठ घन्टे खतरनाक बताये कहा आज की रात निकल जाये तो मरीज खतरे से बाहर हो जायेगा । रात कैसे निकले ।उन सज्जन का एक सज्जन बेटा भी था वैसे बेटे आज कल सज्जन होते नहीं है मगर होगया इत्तेफाक है तो उसने पापा के पुराने दोस्त को बुलाकर कहा अंकल किसी तरह रात निकलजाये । अंकल ने कहा यह कौनसी बडी बात है , मानवमस्तिष्क से परिचित वे जानते थे कि मरीज का ध्यान डायवर्ट करदो आधी बीमारी उसकी दूर हो जाती है । मित्र अंकल कमरे में गये और जाकर अपने मरीज मित्र से कहा यार वो भी क्या दिन थे जब तुम स्कूल में गजले लिखते थे फिर कालेज पहुंचते पहुंचते तो उनमें बहुत बजन आ गया था अव रिटायरमेन्ट के बाद उनका कुछ उपयोग करे । बीमार को करार आया बेबजह आया या बाबजह आया मगर आया।इशारे से उन्हौने अपनी पुरानी डायरियां निकलवाई । पहले मंद्र फिर मध्यम और फिर तारसप्तक में शुरु हो गये ।बेटे बेटी कमरे से बाहर बैठे आवाज सुनते रहे घडी देखते रहे वक्त गुजरता गया खतरे की अवधि समाप्त । कमरे में गये पिताजी जोर जोर से रचना पाठ कर रहे थे और वगल में मित्र अंकल मरे डले थे।
ये सुनने सुनाने का सिलसिला ’सुनो सजना पपीहे ने कहा सबसे पुकार के’ के पूर्व से चला आरहा है और सुन सुना आती क्या खण्डाला के बाद भी निरंतर जारी है।
मेरे नगर में पैसेन्जर गाडी रात 12 वजे आकर रात्रि विश्राम करती है सुवह आठ बजे जाती है। जिस दिन स्टेशन पहुचने में जरा देरी हो जाये उस दिन बिल्कुल राइट टाइम चली जाती है, मगर देर नहीं हुई थी तो गाडी का लेट होना स्वाभाविक था । साडे आठ बज गये ,पौने नौ बज गये आज क्या बात होगई कही कोई क्रासिंग तो नहीं है। ये क्रोसिंग भी मजेदार चीज होती है इंशाअल्लाह कभी मौका लगा तो इस पर भी अर्ज करुंगा ।यात्री परेशान शीटी रेल की बज रही है एनाउन्स हो रहा है गाडी स्टेशन छोडने वाली है मगर हरी झंडी दिखाने वाले गार्ड साहब गायब है। तलाश की तो बडी देर बाद मिले गाडी के पीछे खडे हुये शेर सुना रहे हैं और कुली दाद दे रहे हैं ।
अदालत सुनी सुनाई बात पर विश्वास नहीं करती है। गुलाम अली साहब ने कहा सुना है गैर की महफिल में तुम न जाओगे किसी ने गाया सुना है तेरी महफिल में रतजगा है किसी वकील से पूछो यह हियर से की श्रेणी मे आता है ।
सुनना ठीक है कहते है जीभ एक और कान दो इसी लिये होते है मगर सुनना वाध्यकारी नहीं होना चाहिये सुन साहिबा सुन मैने तुझे चुन लिया तू भी मुझे चुन । मतलव यह तो दादागिरी होगई । तूने चुना तेरी मरजी मगर किसी पर यह क्यों थोपना कि तू भी मुझे चुन ।
Saturday, November 13, 2010
एडजस्टमेंट
मात्र काल्पनिक, किसी जीवित या मृत व्यक्ति का इससे कोई लेना देना नहीं है।
आफिस से आने में जरा देर क्या होगई देखा दरवाजे पर खडी खडी रो रहीं है ,देखते ही चेहरे पर एक सुकून आया ,एक तसल्ली हुई,, आज न जाने कौन से पुण्य उदय हुये कहकर और ,जाकर सीधे भगवानजी के चित्र के सामने साष्टांग दण्डवत , प्रभू तेरा लाख लाख शुक्र है ,बेटे को आवाज दी जा जल्दी से 21 रुपये की मिठाई ले आ भगवान को प्रसाद बोला था । मगर हुआ क्या ? एक तो आफिस से आने में देर करदी और फिर पूछते हो हुआ क्या । लेकिन इतनी घबराई हुई क्यों हो, रो क्यों रही थी ? अभी सामने वाले हैन्डपम्प पर कुछ औरते बातें कर रही थी कि एक बेवकूफ किस्म का पागल सा दिखने वाला आदमी बस से कुचल गया ऐसे में ही तुमने देर करदी अब तुम्ही बताओ ?
दौनों को तसल्ली थी एक को सोहाग बच जाने की और दूसरे को खुद के बच जाने की ,दौनो डबडबाई आंखों से एक दूसरे को देर तक देखते रहे तब तक बच्चा पूरी मिठाई खा गया ।
एडजस्टमेंट उसे कहते हैं कि
तू हंस रहा है मुझपे मिरा हाल देख कर-और फिर भी मै शरीक तेरे कहकहों में हूं
एडजस्टमेंट किया जाता रहना चाहिये ।कलम उठाई कुछ कविता लिखने के लिये लिखा जिये तो जियें केसे संग आपके इतने में ही वह चाय लेकर कमरे में आई फौरन "" संग"" शव्द काट कर "" बिन"" कर दिया । कौन क्या कहना चाह रहा था कौन क्या लिखना चाह रहा था और उसे क्या कहना पडा और क्या लिखना पडा यह हर कोई तो समझ नहीं पाता
सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होती नही
कभी कभी एडजस्टमेन्ट मुश्किल भी होजाता है। शिवचालीसा का पाठ कर रहा था। हर देवी देवता के चालीसा मौजूद है और कुछ भक्तों ने तो कुछ मुख्यमंत्रियों के चालीसा भी तैयार किये थे फिर पता नही कि बच्चों के कोर्स में वे रखे गये या नहीं। खैर तो शिव चालीसा में एक लाइन आती है ले त्रिशूल शत्रु को मारो इस लाइन पर आवाज जरा उंची होगई कि " ले त्रिशूल शत्रु को मारो" तो किचिन में से आवाज आई कुछ भी करलो मेरा कुछ नहीं विगड सकता हैं । कहा ये तुम्हारे वारे में नहीं है इसका तात्पर्य ये है कि तुम्हारे शत्रु को मारे फिर किचिन में से आवाज आई मतलब को एक ही हुआ , मै कहां फेमली पेन्शन के लिये दर दर भटकती फिरुंगी ।एसी ही आपवादिक परिस्थियों के लिये रहीम ने कहा होगा कह रहीम कैसे निभे केर बेर को संग होता है
कभी कभी ऐसी परिस्थियां हो जाया करती है कि कहा भी न जाये चुप रहा भी न जाये' तब बडी दिक्कत हो जाती है क्योंकि डाक्टर बशीर बद्र साहेब का शेर है मै चुप रहा तो और गलत फहमियां बढीं,// वो भी सुना है उसने जो मैने कहा नहीं
l वैसे आमतौर पर एडजस्टमेंन्ट किया जाता है और क्या किया जाना चाहिये , अब यदि आफिस का बॉस कहे कि सुनो श्रीवास्तव जी मैने एक शेर लिखा है तो सुन कर यह तो नहीं कहा जासकता कि वाह हुजूर क्या लीद की है बल्कि यही कहा जायेगा वाह साहव क्या बात है एक बार फिर सुनाया जाय ।मुशायरे की भाषा में इसे मुकर्रर कहते है। एक शायर माइक पर आया और कहा हाजरीन अपनी गजल के चंद शेर पेशे खिदमत है तबज्जो चाहूंगा एक श्रोता ने पहले ही कह दिया मुकर्रर अपना सिर पकड कर शायर अपनी जगह पर जा बैठा।
l
आफिस से आने में जरा देर क्या होगई देखा दरवाजे पर खडी खडी रो रहीं है ,देखते ही चेहरे पर एक सुकून आया ,एक तसल्ली हुई,, आज न जाने कौन से पुण्य उदय हुये कहकर और ,जाकर सीधे भगवानजी के चित्र के सामने साष्टांग दण्डवत , प्रभू तेरा लाख लाख शुक्र है ,बेटे को आवाज दी जा जल्दी से 21 रुपये की मिठाई ले आ भगवान को प्रसाद बोला था । मगर हुआ क्या ? एक तो आफिस से आने में देर करदी और फिर पूछते हो हुआ क्या । लेकिन इतनी घबराई हुई क्यों हो, रो क्यों रही थी ? अभी सामने वाले हैन्डपम्प पर कुछ औरते बातें कर रही थी कि एक बेवकूफ किस्म का पागल सा दिखने वाला आदमी बस से कुचल गया ऐसे में ही तुमने देर करदी अब तुम्ही बताओ ?
दौनों को तसल्ली थी एक को सोहाग बच जाने की और दूसरे को खुद के बच जाने की ,दौनो डबडबाई आंखों से एक दूसरे को देर तक देखते रहे तब तक बच्चा पूरी मिठाई खा गया ।
एडजस्टमेंट उसे कहते हैं कि
तू हंस रहा है मुझपे मिरा हाल देख कर-और फिर भी मै शरीक तेरे कहकहों में हूं
एडजस्टमेंट किया जाता रहना चाहिये ।कलम उठाई कुछ कविता लिखने के लिये लिखा जिये तो जियें केसे संग आपके इतने में ही वह चाय लेकर कमरे में आई फौरन "" संग"" शव्द काट कर "" बिन"" कर दिया । कौन क्या कहना चाह रहा था कौन क्या लिखना चाह रहा था और उसे क्या कहना पडा और क्या लिखना पडा यह हर कोई तो समझ नहीं पाता
सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत
हर किसी के पास तो ऐसी नजर होती नही
कभी कभी एडजस्टमेन्ट मुश्किल भी होजाता है। शिवचालीसा का पाठ कर रहा था। हर देवी देवता के चालीसा मौजूद है और कुछ भक्तों ने तो कुछ मुख्यमंत्रियों के चालीसा भी तैयार किये थे फिर पता नही कि बच्चों के कोर्स में वे रखे गये या नहीं। खैर तो शिव चालीसा में एक लाइन आती है ले त्रिशूल शत्रु को मारो इस लाइन पर आवाज जरा उंची होगई कि " ले त्रिशूल शत्रु को मारो" तो किचिन में से आवाज आई कुछ भी करलो मेरा कुछ नहीं विगड सकता हैं । कहा ये तुम्हारे वारे में नहीं है इसका तात्पर्य ये है कि तुम्हारे शत्रु को मारे फिर किचिन में से आवाज आई मतलब को एक ही हुआ , मै कहां फेमली पेन्शन के लिये दर दर भटकती फिरुंगी ।एसी ही आपवादिक परिस्थियों के लिये रहीम ने कहा होगा कह रहीम कैसे निभे केर बेर को संग होता है
कभी कभी ऐसी परिस्थियां हो जाया करती है कि कहा भी न जाये चुप रहा भी न जाये' तब बडी दिक्कत हो जाती है क्योंकि डाक्टर बशीर बद्र साहेब का शेर है मै चुप रहा तो और गलत फहमियां बढीं,// वो भी सुना है उसने जो मैने कहा नहीं
l वैसे आमतौर पर एडजस्टमेंन्ट किया जाता है और क्या किया जाना चाहिये , अब यदि आफिस का बॉस कहे कि सुनो श्रीवास्तव जी मैने एक शेर लिखा है तो सुन कर यह तो नहीं कहा जासकता कि वाह हुजूर क्या लीद की है बल्कि यही कहा जायेगा वाह साहव क्या बात है एक बार फिर सुनाया जाय ।मुशायरे की भाषा में इसे मुकर्रर कहते है। एक शायर माइक पर आया और कहा हाजरीन अपनी गजल के चंद शेर पेशे खिदमत है तबज्जो चाहूंगा एक श्रोता ने पहले ही कह दिया मुकर्रर अपना सिर पकड कर शायर अपनी जगह पर जा बैठा।
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Monday, November 8, 2010
चमत्कार
चमत्कारों से अपरिचित लोग उन्हे कई नामों से से सम्बोधित करते है तथा कई दफे बहुत वारीकी से देखने के वाद भी कोई चीज समझ में नहीं आती तो उसे हाथ की सफाई, जादू, कालाजादू, मेस्मेरेजम, नजर बांधना, ट्रिक फोटोग्राफी कैमिकल्स का सम्मिश्रण आदि इत्यादि कह दिया जाता है - लेकिन चमत्कार वह होता है जिसे सभी प्रकार के लोग देखे भी और माने भी । मंत्र की शक्ति का तो पता नहीं मगर मंत्री में राजा को रंक और रंक को राजा बनाने की शक्ति जरुर होती है। मैने देखा है मंदिरों में ज्यादातर भगवान की मूर्तिया खडी निर्मित की जाती है ।मैने एक पुजारी से पूछा यार तुम्हारे भगवान हमेशा खडे क्यों रहते है उसने बडी सादगी से कहा वो क्या है साहब इधर मंत्री वगैरह आते रहते है '
।मुझे पता नहीं कि मंत्र में इतनी शक्ति होती है या नही कि वह किसी चलती हुई मशीनरी को रोकदे।
ट्रेन जब स्टेशन से रवाना होने को हुई तो एक लंगोट धारी ??-उसमें प्रविष्ठ हुये । रेल में सफर करने वाले जानते है कि यात्रियों के टिकिट की चैकिंग कभी स्टेशन पर खडी गाडी में नहीं होती है -चलती गाडी में होती है क्योंकि एक तो लोग चढ उतर रहे होते है दूसरे कोई स्टेशन पर उतर कर सह सकता है कि मै बैठा ही न था। चलती गाडी में बिना टिकिट यात्री चैकर के पूर्णरुपेण वश में हो जाता है चलती ट्रेन में से उतर न सकने के कारण उसे चेकर की मन की मुराद पूरी करना पडती है। मगर उस दिन जो नहीं होता वह हुआ चेकिंग स्टेशन पर खडी गाडी में हुआ । चेकर को आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास था कि ??के पास टिकिट नहीं है और वास्तव में होता भी नहीं है। दो तीन मिनट रहगये थे गाडी रवाना होने में कि चैकर और ??में झगडा होगया ।चैकर अपनी जिद पर अडा था कि टिकिट लेना होगा और वे एक विशेष प्रकार की गाली जो आम तौर पर ये लोग उच्चारित करते हैं उच्चारित करते हुये कह रहे थे हमसे टिकिट मांगता है। बात में दम हो या न हो मगर आवाज में दम थी ।बात वढना थी सो बढ गई। ??रेल से स्टेशन पर उतर आये और जोरदार आवाज में कहा अब तू गाडी लेजाकर बतलादे ।
अब देखिये जनाब कि गार्ड हरी झंडी दिखा रहा है ट्रेन जोरदार शीटी की आवाज निकालती है स्टार्ट होती है और थोडा हिल डुल कर फिर रुक जाती है। उस में विभिन्न जाति, सम्प्रदाय के लोग थे -परम आस्तिक और घोर नास्तिक भी थे। मन्त्र शक्ति में विश्वास करने वाले और उनके विरोधी वैज्ञानिक भी उस गाडी में सवार थे । ट्रेन की आधी सवारी स्टेशन पर उतर आई थी । लोग आग्रह कर रहे थे कि चैकर माफी मांगले । मगर वह भी पक्का गवर्नमेन्ट सरवेन्ट था माफी क्यों मांगू मैं अपनी डयूटी देरहा हूं उसे तनखा इसी बात की मिलती है डयूटी न करुं तो सरकार तनखा देती है और करुं तो मजबूर यात्री और शौकिया यात्री सरकार से भी ज्यादा देते है। ड्राईवर ने हाथ जोडे भैया मांगले माफी क्या विगडता है गाडी लेट होरही है गार्ड ने हाथ जोडे मगर जिद यह कि इसने टिकिट मांगा तो क्यों मांगा । भीड व्दारा अनुनय विनय करने के बाद बमुश्किल-तमाम चैकर ने चरणों में गिर कर माफी मांगी ।और देखते देखते गाडी थोडी हिलडुल कर स्टार्ट होगई । ?? की जयकारे की आवाज गूंजने लगीं ।
स्टेशन के पास ही शासकीय रिक्त पडी भूमि पर पहले कुटिया बनी फिर विशालकाय भवन, धर्मशालायें बनी ।लोगों की श्रध्दा धन के रुप में प्रकट हुई जो जितना श्रध्दावान था उसने उतना ही चढावा चढाया और सिलसिला सतत जारी रहा। अब ?? करोडों में खेल रहे है और बेचारे रेल के ड्राईवर गार्ड और चैकर को मात्र एक-एक लाख रुपये में ही संतुष्ट कर दिया गया
।मुझे पता नहीं कि मंत्र में इतनी शक्ति होती है या नही कि वह किसी चलती हुई मशीनरी को रोकदे।
ट्रेन जब स्टेशन से रवाना होने को हुई तो एक लंगोट धारी ??-उसमें प्रविष्ठ हुये । रेल में सफर करने वाले जानते है कि यात्रियों के टिकिट की चैकिंग कभी स्टेशन पर खडी गाडी में नहीं होती है -चलती गाडी में होती है क्योंकि एक तो लोग चढ उतर रहे होते है दूसरे कोई स्टेशन पर उतर कर सह सकता है कि मै बैठा ही न था। चलती गाडी में बिना टिकिट यात्री चैकर के पूर्णरुपेण वश में हो जाता है चलती ट्रेन में से उतर न सकने के कारण उसे चेकर की मन की मुराद पूरी करना पडती है। मगर उस दिन जो नहीं होता वह हुआ चेकिंग स्टेशन पर खडी गाडी में हुआ । चेकर को आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास था कि ??के पास टिकिट नहीं है और वास्तव में होता भी नहीं है। दो तीन मिनट रहगये थे गाडी रवाना होने में कि चैकर और ??में झगडा होगया ।चैकर अपनी जिद पर अडा था कि टिकिट लेना होगा और वे एक विशेष प्रकार की गाली जो आम तौर पर ये लोग उच्चारित करते हैं उच्चारित करते हुये कह रहे थे हमसे टिकिट मांगता है। बात में दम हो या न हो मगर आवाज में दम थी ।बात वढना थी सो बढ गई। ??रेल से स्टेशन पर उतर आये और जोरदार आवाज में कहा अब तू गाडी लेजाकर बतलादे ।
अब देखिये जनाब कि गार्ड हरी झंडी दिखा रहा है ट्रेन जोरदार शीटी की आवाज निकालती है स्टार्ट होती है और थोडा हिल डुल कर फिर रुक जाती है। उस में विभिन्न जाति, सम्प्रदाय के लोग थे -परम आस्तिक और घोर नास्तिक भी थे। मन्त्र शक्ति में विश्वास करने वाले और उनके विरोधी वैज्ञानिक भी उस गाडी में सवार थे । ट्रेन की आधी सवारी स्टेशन पर उतर आई थी । लोग आग्रह कर रहे थे कि चैकर माफी मांगले । मगर वह भी पक्का गवर्नमेन्ट सरवेन्ट था माफी क्यों मांगू मैं अपनी डयूटी देरहा हूं उसे तनखा इसी बात की मिलती है डयूटी न करुं तो सरकार तनखा देती है और करुं तो मजबूर यात्री और शौकिया यात्री सरकार से भी ज्यादा देते है। ड्राईवर ने हाथ जोडे भैया मांगले माफी क्या विगडता है गाडी लेट होरही है गार्ड ने हाथ जोडे मगर जिद यह कि इसने टिकिट मांगा तो क्यों मांगा । भीड व्दारा अनुनय विनय करने के बाद बमुश्किल-तमाम चैकर ने चरणों में गिर कर माफी मांगी ।और देखते देखते गाडी थोडी हिलडुल कर स्टार्ट होगई । ?? की जयकारे की आवाज गूंजने लगीं ।
स्टेशन के पास ही शासकीय रिक्त पडी भूमि पर पहले कुटिया बनी फिर विशालकाय भवन, धर्मशालायें बनी ।लोगों की श्रध्दा धन के रुप में प्रकट हुई जो जितना श्रध्दावान था उसने उतना ही चढावा चढाया और सिलसिला सतत जारी रहा। अब ?? करोडों में खेल रहे है और बेचारे रेल के ड्राईवर गार्ड और चैकर को मात्र एक-एक लाख रुपये में ही संतुष्ट कर दिया गया
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