Wednesday, January 21, 2009

डाटर्स मेरिज फोबिया

मस्ती में झूमते बारातियों का शानदार स्वागत वी.आय.पी. कुर्सियाँ, टेंट-शामियाना, लाईट डेकोरेशन, मंच व्यवस्था - टीके में ; मांगी गई एक निश्चित धनराशि की प्रथम किश्त के साथ मोटर साइकिल व कर (जैसा अनुवंध हो ), वर के पूरे खानदान के लिए अच्छे व महंगे कपड़े, -द्वाराचार की रस्म पर दूसरी व अन्तिम किश्त, महंगा गर्म सूट रंगीन टी वी, पैर पूजने महंगा आइटम, लडकी को स्वर्ण के जेवर, गृहस्थी के समस्त बर्तन, डबल वेड, सोफा आदि इत्यादि/ - जब भी मेरे मित्र यह सब देखते हैं उनके ह्रदय से एक टीस मिश्रित आह निकलती है ""-इतना सब तो करना ही पडेगा -सभी कर रहे हैं सब जगह होने लगा है"" इतना सब कुछ मैं कैसे कर पाऊंगा/

इतना सब मैं कैसे कर सकूंगा सोच सोच कर उनका जी घबराने लगता है दिल बैठने लगता है ,उनकी तबियत बिगड़ जाती है -डाक्टर आता है नींद का इंजेक्शन , एक दो दिन त्रास शामक औषधियां , और धीरे धीरे वे नार्मल होने लगते है - न तो उनके स्वजन और न ही परिवार जन , न ही चिकित्सक जान पाते हैं की उनकी घबराहट की वजह क्या है - शामक औषधियां अब उनके लिए प्रतिदिन की खुराक हो चुकी है /

मैंने उनकी बीमारी का नाम रखा है डाटर्स मैरिज फोबिया -किसी चिकित्सा शास्त्र या किसी पैथी में ऐसी बीमारी या ऐसे लक्षण नहीं लिखे है यह तो मेरा ही दिया हुआ नाम है -हाइड्रो फोबिया -अल्टो फोबिया - बाथोफोबिया आदि बीमारियों का , चिकित्सा शास्त्र में उल्लेख भी है और उपचार भी = डाटर्स मैरिज फोबिया देश व्यापी अन्य घातक बीमारियों की तरह जानलेवा तो नहीं है इससे मरीज़ मरता तो नहीं है किंतु वह जीता भी नहीं है अधवीच में लटका रहता है त्रिशंकु की तरह /उसके चेहरे पर दुःख शोक और निराशा के भाव साफ दिखाई देने लगते है -वह अन्यमनस्क, व्याकुल व चिडचिडा हो जाता है एकांत की तलाश में रहता है और शोर से घबराता है

जिस प्रकार निर्धन का एक मात्र लक्ष होता है की किसी तरह अमीर हो जाय - जिस प्रकार निरक्षर का एक लक्ष्य होता है की कुछ पढ़ लिख जाय ,उसी तरह पुत्री के पिता का जीवन में एक ही लक्ष्य होता है की किसी तरह इसके हाथ पीले हो जायें ,हाथ पीले हो जायें तो हम गंगा नहा जायें सिर से बोझ उतर जाए, कुछ और लोगों ने कहावतें बना रखी हैं की लड़की की डोली और मुर्दा की अर्थी जितनी जल्दी उठ जाए उतना ही अच्छा होता है =अर्थी वाली बात तो समझ में आती है कि तबतक घर में भयंकर कुहराम मचा रहता है लेकिन लड़की की डोली? -और इन्हे शर्म भी नहीं आती/ लडकी के भावी जीवन से कोई लेनादेना नहीं है इनका - रोज़गार बेरोजगार कम पढ़ा लिखा कैसा भी हो लडकी का पेट तो भर ही देगा मतलब लडकियां मात्र पेट भरने के लिए ही पैदा होती हैं

जहाँ विबाह योग्य वर दिखता है या उसके वारे में पढा सुना जाता है तो कन्यायों के पिता उस पर मुग्ध होकर दौड़ने लगते हैं जिस तरह पतंगे अग्नि की ओर दौड़ते हैं फिर वर की आर्थिक मांगें पूरी न कर सकने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता है ,जब वर अन्यत्र बिक जाता है तो दुःख से अत्यन्त व्याकुल रहते हैं जैसे संसार के सबसे बडे लाभ से उन्हें बंचित कर दिया गया हो -जिस तरह सारी नदियाँ द्रुत गति व प्रवाह से समुद्र की ओर दौड़ती हैं उसी तरह चारों तरफ से कन्यायों के पिता वर की ओर दौड़ते हैं --पूर्ती कम और मांग ज़्यादा तो मूल्य ब्रद्धि स्वाभाविक है अर्थ शास्त्र का यही नियम है
जहाँ बिना दहेज के शादी हो रही हो -जहाँ लड़का कार और लडके की माँ नकदी व जेवर न मांग रही हो - बिध्युत सज्जा से दूर दिन के उजाले में सादगी पूर्ण तरीके से विवाह सम्पन्न हो रहा हो क्या ऐसा माहोल आज सम्भव नहीं हो सकता
जहाँ लडकी की शादी के लिए मकान व जेवर रहन नहीं रखे जा रहे हों -जहाँ पुश्तेनी खेती की जमीन विक्रय न की जारही हो -जहाँ लडकी के बाप पर दबाव न डाला जा रहा हो की =बरात के स्वागत में कोई कमी रही तो हमसे बुरा कोई न होगा =अमुक राशी या सामान देने पर ही लडकी को ले जाया जायेगा अथवा लडके लो फेरों पर भेजा जाएगा ,क्या युवा पीढी इस ओर ध्यान दे सकती है

जहाँ लडके के बाप के सर पर इतना लोभ सवार न हो रहा हो की प्रसूतिकाल में खिलाये गए हरीला और पिलाए गए दशमूल काड़े से लेकर उच्च शिक्षा पर मय डोनेशन व केपीटेशन फीस पर हुआ व्यय मय व्याज के लडके के बाप से वसूल करना चाहता हो ,विचारधारा में कुछ परिवर्तन सम्भव है/

यदि आज की शिक्षित और युवा पीढी जरा भी इस ओर ध्यान दे तो बहुत से बाप अपने जीवन की बची सांसे चेन से ले सकते हैं/

29 comments:

विनय said...

वाह साहब कहां है आजकल, ब्लॉग पर भी नहीं आते, हमें भूल गये क्या? आपकी टिप्पणी के बिना ब्लॉग सूना रहता है

---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

Amit said...

bahut sahi kaha aapne...

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाह ! शीर्षक क्या चुन कर रखा है 'डाटर्स मैरिज फोबिया'.
ओर जो लिखा है, वो उससे भी गजब........

सतीश सक्सेना said...

बहुत अच्छा लिखा है, और सच्चाई बयान की है आपने बहुत सारे पिताओं की ! बहुत अच्छा लेख ! शुभकामनायें भाईजी !

hem pandey said...

एक कड़ुवे सच को आपने उजागर किया है. मेरे मत में बेटियों को आत्म निर्भर बनाना प्राथमिकता होनी चाहिए.

creativekona said...

Respected shrivastav ji,
Apne bilkul sahee likha hai.ham jitna hee padh likh kar sabhya, susanskrit(?)hote ja rahe hain ,utna hee hamare samaj men ladkiyon ke vivah..dahej..kee samasya badhatee ja rahee hai.is sandarbh men mera ye manana hai ki jab tak hamare samaj se purushon ke andar ,stree ko doosare nambar par manane kee mansikta naheen hategee ye samasya barkarar rahegee.Aur ise door karne men ladkiyon ko hee age akar vdroh karana hoga.Achchhe vaichrik lekh ke liye badhai.
Hemant Kumar

गौतम राजरिशी said...

यकीनन ...अपनी दो बहनों की शादी में अपने पिता की हालत देख चुका हूं मैं। किंतु कौन समझता है सर ये बातें। और किस युवा-पिढ़ी से अपेक्षा कर रहे हैं आप?

राज भाटिय़ा said...

आप ने जो हालात बताये बहुत शर्मनाक है, क्यो हम अपना घर भरने के लिये किसी दुसरे का घर उजाड रहे है, जब कि जिस घर से क्न्या आ रही है उस के दिल मे पहले से ही अजीब सा डर भर जाता है, या फ़िर अंहकार कि यह सब तो मेरे बाप ने दिया है, फ़िर प्यार केसे जागेगा?????
धन्यवाद इस सुंदर लेख के लिये

अनूप शुक्ल said...

बेहतरीन पोस्ट!

शाश्‍वत शेखर said...

आज के हालात का सटीक चित्रण किया है आपने|

रश्मि प्रभा said...

aaj bhi yahi ashanti hai ....har vyakti agar apni maansikta badle to parivartan sambhaw hai.....

विनीता यशस्वी said...

Satya ke bilkul karib

sanjay jain said...

आज दहेज़ की परिभाषा कुछ इस प्रकार हो गई है की '' जिसको लेने में न हो हेज ( शर्म ) और देने में न हो परहेज वही है दहेज़ / प्राम्भिक काल मे दहेज़ एक मुश्त शादी के समय सभी लोगों के सामने मांग कर लिया जाता था परन्तु आज के आधुनिक युग मैं शैक्षणिक माहौल होने के कारण दहेज़ लेने का नया तरीका ढूँढा है जो एक मुश्त नहीं लिया जाकर दुल्हन से नौकरी करवाकर किश्तों रूप में लिया जाता है / दहेज़ पर सुंदर व्यंग लिखा है /

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

सही कहा बंधू ! वैसे आप लिखते बहुत अच्छा हमारे समाज का आज जा सबसे बड़ा दानव यही है - दहेज़ दानव. हास्य में भी संदेश......

अभिषेक ओझा said...

सही बात है... कम से कम अपने लेवल पर तो हम कर ही सकते हैं. और सब ये करें तो बदलाव निश्चित है.

sareetha said...

कुछ दिन सब्र करिए फ़िर हालात बदले ही समझिए । आने वाला कल लड्कियों के पिताओं का होगा । लडके वालों की लाइन लगेगी और लडकियां तय करेंगी लडकों का भविष्य ...? अगर आप सब लडकों के पिता हैं तो लडकी वालों को देने के लिए दहेज़ की जुगाड अभी से शुरु कर दीजिए , फ़िर मत कहिएगा कि बताया नहीं.....। वैसे मैंने तो तैयारी भी शुरु कर दी है ,अपने दोनों बेटों के लिए दहेज़ जुटाने की ।

JHAROKHA said...

Respected Srivastav ji,
apne samaj kee ek jvalant samasya ko apne blog par uthaya hai.is vishaya ko to har vyakti ko padhana chahiye.

अल्पना वर्मा said...

bahut achcha jwalant mudda uthaya hai...

आज की पीढी में भी ऐसे युवा हैं और कल भी थे..जो दहेज़ के ख़िलाफ़ हैं..जन चेतना ही नहीं आत्म चेतना के जाग्रत होने की बात है.
मैं ख़ुद को खुशनसीब समझती हूँ की मेरी शादी में किसी तरह की कोई डिमांड नहीं रखी गयी थी.लड़कियों को आत्म निर्भर जरुर बनाना चाहिये.
[sarita ji iseeliye to main ne apni bitiya ke liye koi dahej nahin jod rahi..:)]

प्रदीप मानोरिया said...

श्रीवास्तव जी आपके द्बारा प्रस्तुत नई बीमारी और उसके लक्षण उपाय जानकर बहुत प्रसन्नता हुई
http://manoria.blogspot.com
http://kundkundkahan.blogspot.com

मनुज मेहता said...

bahut khoob likha hai janab, bahut hi shaandaar, mujhe badlaav ki sambhavnaye dikhai de rahi hain, aap umeed rakhiye sab thik ho jayega.

regards
Manuj MEhta

Nirmla Kapila said...

aapne bahut hi mhatvpooran vishaye par likhaa hai aapke vichron ki prishthbhumi me meri ye rachnaa betyom ki maa jaroor padhiye www.veeranchalgathablogspot.com is sunder aalekh ke liye bdhaai

योगेन्द्र मौदगिल said...

सामयिक चिंतन, सटीक व्याख्या सहित पर श्रीवास्तव जी यह सामाजिक दुर्व्यवस्था जैसी थी, वैसी है....

shyam kori 'uday' said...

... गजब का लेख है, बहुत ही प्रसंशनीय।

muskan said...

bahut sahi kaha aapne...

MUFLIS said...

bahot khoobi se soch samajh kar likha gya aalekh.......
ek sandes bhi chhipa hai issmei...
badhaaee........!!
---MUFLIS---

kumar Dheeraj said...

बहुत खूब शुक्रिया

kmuskan said...

hamare smaaj ki bahut sachi tasveer dikhlayi hai ...bahut sunder vyang

रंजना said...

डाटर्स मैरिज फोबिया देश व्यापी अन्य घातक बीमारियों की तरह जानलेवा तो नहीं है इससे मरीज़ मरता तो नहीं है किंतु वह जीता भी नहीं है अधवीच में लटका रहता है त्रिशंकु की तरह.....


बहुत सही कहा आपने...

प्रेम और अंतरजातीय विवाह (कितना सही है कहना मुश्किल है) ही शायद इसका तोड़ है.
वरना चार बेटियों वाला भुक्तभोगी बाप भी बेटे के लिए दहेज़ लेते समय कहाँ रहम करता है या कितने लड़के हैं जो धन का अपव्यय किए बिना सादगी से विवाह करने को उत्सुक होते हैं. .

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत dino से कुछ नया नहीं लिखा क्या बात है सर