Saturday, February 7, 2009

पुत्रदान क्यों नहीं

जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है विवाह और विवाह का एक महत्वपूर्ण अंग है कन्यादान / पाणिग्रहण ,सप्तपदी ,पांच और सात वचन तो समझ में आते हैं क्योंकि वह वर -वधु दोनों का मिला जुला कार्यक्रम है ,किंतु कन्यादान का रिवाज़ कब व कैसे प्रचलित हुआ ?

क्या वेदों में कन्यादान का विधान है ? हो सकता है /पुराणों में दस महादान का वर्णन है उनमें से कन्यादान भी एक दान है /मानस में गोस्वामीजी ने दो विवाह करवाये हैं / एक तो शंकरजी का "" गहि गिरीश कुस कन्या पानी ,भवहि समरपी जानि भाबानी "" दूसरे विवाह में सीताजी का कन्यादान कराया है ""करि लोक वेद विधानु कन्यादान नृप भूषण कियो ""स्वाभाविक है गोस्वामीजी की स्वयं की जैसी शादी हुई होगी वैसा ही उन्होंने वर्णन किया होगा -पुराणों में दस महादानो का वर्णन है इनमें से एक तो हुआ कन्यादान वाकी नौ है --स्वर्ण ,अश्व ,तिल , हाथी ,दासी ,रथ ,भूमी ,ग्रह और कपिला गौ /ध्यान रहे यह सब सम्पत्ति है /स्त्री हमेंशा से संपत्ति मानी जाती रही थी / उसका क्रय विक्रय होता था , उसे गिरवी रखा जाता था , जुए में हारा जीता जाता था तो अन्य संपत्ति के दानो की तरह इस कन्या रूपी संपत्ति के दान की परिपाटी प्रचलित हुई होगी /दान के साथ दान की हुई संपत्ति की स्थिरता के लिए अतिरिक्त द्रव्य समर्पित करने का प्रावधान शास्त्रों में था ताकि दान में दी हुई संपत्ति का रख रखाव आदि किया जाता रहे /इसने कन्यादान मे दहेज़ का रूप धारण कर लिया/

दहेज़ का दूसरा पहलू यह भी रहा होगा कि चूंकि कन्या संपत्ति होती थी पराया धन होती थी इसलिए पिता की जायदाद मे उसका हक नही होता था और चूंकि पुत्र जो कि संपत्ति नहीं होता था उसके हिस्से मे बाप की जायदाद आजाती थी / किंतु फिर भी पुत्री होती तो थी माँ बाप के जिगर का टुकडा -इसलिए पिता अपनी जायदाद से प्राप्त आय मे से एक बडा हिस्सा पुत्रों की सहमति से पुत्री को दे दिया करता था और चूंकि बात भी वाजिव थी इसलिए पुत्र को भी क्यों आपत्ति होने लगी / फिर लडकी चली जाती थी पराये घर और जमीन जायदाद ,खेती बाड़ी-रहती थी पुत्रों के पास /इसलिए बहन को बिभिन्न त्योहारों पर ,भाई दूज , उसके पुत्र पुत्रियों की शादी मे मामा भात , पहरावनी, मंडप आदि के रूप मे संपत्ति की आय मे से कुछ हिस्सा लडकी को पहुंचता रहता था /अब उसका रूप लालची धन्लोलुपों ने विकृत कर दिया है / लडकी के पिता की स्वेच्छा अब लडके के पिता की आवश्यकता हो गई /एक सद्भाविक परम्परा कुरीति हो गई /यह कुरीति गरीब पिता के लिए अभिशाप हो गई /जो स्वम किराए के मकानों मे रहकर ,मामूली -सी नौकरी करके ,अपना पेट काट कर बच्चों को पालता पढाता रहा हो जिसके बेटे बेरोजगार हों और बेटी सयानी उसकी क्या तो संपत्ति होगी और क्या लडकियां हिस्सा लेंगी/

अब सवाल उठता है पुत्र दान का -कल्पना कीजिए चलो किसी ने कर ही दिया पुत्र दान तो फिर क्या ? लडकी तो लडके के घर आजाती है =कई समाज मे तो यह भी है कि लडकी का बाप या बडा भाई -लडकी की ससुराल मे पानी भी नहीं पीता है - -दान कीहुई संपत्ति का थोडा से भी हिस्से का उपयोग वर्जित है -आपको तो पता है कि एक हजार गाय दान मे दी और धोके से एक गाय वापस आगई और उसका पुन दान हो गया तो नरक के दरवाजे खुल गए थे /खैर तो लडकी तो लडके के घर आजाती है अब मानलो लडके का भी दान हो गया तो वह कहाँ रहेगा अपनी ससुराल में यानी घर जवाई - और कन्या का दान कर दिया तो वह मायके में कैसे रहेगी -और यदि लड़का अपने ही घर में रहता है तो उसके माँ बाप उसकी कमाई कैसे खाएँगे -दान किए हुए पुत्र की कमाई घोर अनर्थ हो जाएगा =बडी दिक्कत हो जायेगी/

हो सकता है यह दिक्कत उस वक्त पुत्र दान करने के समय पेश आई हो /

इस लेख का अंत कैसे और किन शब्दों में हो ,इस का उपसंहार मेरी समझ से बाहर हो रहा है /

27 comments:

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

विचारणीय प्रश्न है इस पर ध्यान नही होता है ...अच्छी पोस्ट धन्यवाद.

creativekona said...

आदरणीय श्रीवास्तव जी ,
अपने दहेज़ और उससे सम्बंधित प्रश्नों को बहुत तार्किक ढंग से विश्लेषित किया है .वैसे मैंने एक बच्चों का नाटक लिखा था पोलाम्पुर का उल्टा पुल्टा .नाटक में मैंने यही कल्पना की थी की दुनिया में सब कुछ उलट गया है .लड़की वाले बारात लेकर लड़के के घर जाते हैं .इस नाटक के कई शो हुए .पसंद किया गया. जल्द ही मेरे बaल नाटकों के संग्रह में प्रकाशित होने वाला है .वैसे आपके ब्लॉग से काफी वैदिक ,पौराणिक ,जानकारियां मिलती हैं.
हेमंत कुमार

शाश्‍वत शेखर said...

श्रीवास्तव जी नमस्कार|
हम दहेज़ मिटाने की बात तो करते हैं लेकिन लड़की का हक़ पिता की संपत्ति में उसकी बात नही करते| आख़िर लड़की का भी हक़ है, और आजकल कितनी लडकियां शादी के बाद पिता की संपत्ति में हक़ जताती हैं?
अच्छा तो यह हो लड़कियों को उनका हिस्सा दे दिया जाए, या तो शादी के समय या कोई और व्यवस्था हो|

राज भाटिय़ा said...

एक गरीब बाप अपनी बेटी की शादी कर दे इज्जत से यही काफ़ी है,अब यह दहेज ओर हिस्सा??? क्या यही है प्यार ??? अब सोचने वाले, ओर कहने वाले तो अलग अलग बाते ही करेगे, ओर बेटी की कमाई खाने वाले भी मिल जायेगे, ओर बेटी के घर का पानी भी ना पीने वाले मिल जायेगे, क्या सही है क्या गलत है यह हम सब जानते है,फ़िर परदा डालने के लिये, कोई भी बहाना बना लॊ.
पुत्र दान इस लिये नही होता कि कोई भी गेरत मंद आदमी अपनी ससुराल मै कुत्ता बन कर नही रहना चाहेगा, अब रहने वाले तो रहते भी है.
धन्यवाद

विनय said...

बहुत संगत लेख है, लेकिन दुनिया के किसी भी धर्म में ऐसा नहीं होता, कुछ आदिवासी काबीलों में ऐसी प्रथाएँ अवश्य मिलती हैं! अंडमान में ऐसी प्रथा चलती है और अफ्रीका में भी कुछ जगह!

गौतम राजरिशी said...

बड़े दिनों बाद दिखे हैं श्रीवास्तव जी। हमेशा की तरह इन विचारों की प्रशंसा करना औपचारिकता निभाने के लियी नहीं,वरन दिल से कर रहा हूँ। वैसे सोचता हूँ कितना अच्छा होता जो ऐसा हो पाता....
उधर हंस में साहित्य के डान की इतनी तारीफ़ की है आपने की विस्मित हुये बिना रह न पाया..
और दूसरी तरफ,पाखी में पूस की रात के पक्ष में बहस जानदार रही..

विनीता यशस्वी said...

Aaj kal apki post bahut lambe samay ke baad parne ko milti hai... per jub bhi milti hai bahut achhi hoti hai...aapne bahut vicharniy baato ko uthaya hai...

hem pandey said...

पुत्र दान इस लिए नहीं होता क्योंकि आज भी दुनिया पुरूष प्रधान ही है. राज भाटिया जी भी पुरूष प्रधान समाज के गैरतमंद पुरूष की बात कर रहे हैं. वर्तमान व्यवस्था में तो हर गैरतमंद लड़की को अपने ससुराल में अनिवार्य रूप से रहना ही होता है. वैसे आज लड़कों की कमाई खाने में माँ बाप के पसीने छूटने लगे हैं. इसलिए माँ बाप अपने बुढापे का इंतजाम करके रखने लगे हैं.

रश्मि प्रभा said...

putri laxmi hoti hai isliye uska daan hota hai, putra ghar kee dahleej hota hai.

अभिषेक ओझा said...

शायद किसी स्त्रीप्रधान समाज में ऐसा होता हो? वैसे आईडिया नहीं है इसका !

अमिताभ श्रीवास्तव said...

श्रीवास्तवजी
आपकी सोच निसंदेह एक प्रश्न उठाती है,
किन्तु इस जीवन ओर जीवन की रीत में ऐसे बहुत से सवाल है जिनका उत्तर हमें नहीं मिल पाता.
उन्हें या तो हमें नज़र अंदाज़ कर देना होता है, या फिर इसी तरह शोध करके हल खोजने का उपक्रम. या
फिर चली आ रही परम्परा के अधीन हमें स्वीकार करना होता है. पुत्रदान के सन्दर्भ में
हमारे शास्त्रों में कई कहानिया मौजू है. चूँकि इस वक़्त उनका जिक्र में कर नहीं सकता पर इतना अवश्य कह सकता हूँ की पुत्रदान भी होता है. किन्तु किसी परम्परा के अधीन नहीं, ये सच है. आपका सवाल ओर आपकी उम्दा सोच मुझे काफी अच्छी लगी. धन्यवाद... चाहूँगा की आप लिखते रहे ओर मुझे पड़ना को मिलता रहे.

Atul Sharma said...

आपकी सोच में गहराई है और व्‍यापकता है। अच्‍छे विषय को उठाने के लिए बधाई।

Dr.Bhawna said...

Acha lekh hai..

राजीव करूणानिधि said...

बहुत बढ़िया...आभार..

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

श्रीवास्तव जी, बहुत ही विचारणीय प्रश्न उठाया आपने.किन्तु मैं नहीं समझ‌ता कि समाज में इस प्रकार के प्रकार के प्रश्नो का उतर भी किसी के पास हो.
ओर हां, ब्लागजग‌त में बहुत दिनो बाद दिखल‌ाई दिए आप.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

श्रीवास्तवजी , आपकी कोई नई रचना पड़ने की इच्छा है. लिखिए.
आपकी टिप्पणियों की भी चाह रहती है. मुझे आपका लेखन पसंद आता है, न केवल ब्लॉग से बल्कि नई दुनिया में..आज नही बरसो पहले. आपका नाम मेरे दिलो दिमाग में आज भी कायम है. चूंकि एम् पी का ही मूल है मेरा मगर मुंबई में बरसो से हूँ. बचपन ओउर कॉलेज टाइम में अधबीच में देखता रहा हूँ. उम्मीद है जल्द ही लिखेंगे ब्लॉग पर ...

अल्पना वर्मा said...

यह लेख वाकई गंभीर लग रहा है...
एक प्रश्न है..हमारी बरसों से चली आ रही रीती रिवाजों के नाम पर..
पुत्र दान भी कहीं सुना तो है मगर कहाँ याद नहीं --भारत के दक्षिण में हिन्दुओं में यह रिवाज़ है की शादी के बाद पुत्री और दामाद घर पर रहते हैं.विवाह उपरांत लड़की घर छोड़ कर नहीं जाती.

क्या यह पुत्र दान हुआ???

kumud said...

bhot acha likha apne, vakai sasural wale teeke ke nam pe , mandap ke nam pa aur na jane kaun kaun se rivajo ke nam pe ladki walon ko loote rahte hain. manine aisa koi rivaz nhi suna jisme ladke walon ko kabhi kuch dena padta hai , sab swarth ki rajniti lagti hai , ghar-parivar ishtri or purush dono se milkar banta hai fir bhi ladke ka ma-baap rob jhadne se baaj nahi ate. aapne is or ek behtar prayash kiya hai.

kumar Dheeraj said...

भूत और वत्तमान को सही राह दिखलाता यह लेख । वैसे आइडिया तो बढ़िया है लिकिन कही देखने को नही मिला है । अपने अध्ययन को आपने अपने लेख के माध्यम से जो बताने का प्रयास किया है वह सराहनीय है । साथ में धणॆ को जोड़कर आपने इसे और जोरदार बना दिया है । शु्क्रिया

प्रदीप मानोरिया said...

aap sach main mahan ho shreewastav jee andar tak pahunch kar aisaa vishleshan

अनुपम अग्रवाल said...

इतने नये विचार कहाँ से लाते हैँ
किसी स्त्री प्रधान समाज मेँ शायद होता हो.
भारत मेँ तो पुरुश प्रधान समाज बनाया गया है

Neelima G said...

mujhe bhi aaj tak samajh nahi aaya aisa kyun hota hai... may be one day our orthodox thinking will undergo a chnage n gals would be treated at par with guys!!!

Harkirat Haqeer said...

स्त्री हमेंशा से संपत्ति मानी जाती रही थी / उसका क्रय विक्रय होता था , उसे गिरवी रखा जाता था , जुए में हारा जीता जाता था तो अन्य संपत्ति के दानो की तरह इस कन्या रूपी संपत्ति के दान की परिपाटी प्रचलित हुई होगी ....jab mai in sabdon ko sunti hun to mere mastisk ki nase fatne lagti hain....mai is visaye pr bahas nahi karna chahti....aapne accha likha hai....Bdhai..!!

रंजना said...

बड़ा ही सार्थक आलेख प्रस्तुत किया है आपने....वैसे तो इसपर लम्बी बात हो सकती है,संक्षेप में कहूँ तो....

देखा जाय तो धन संपत्ति को मनुष्य विशेष आदर देता है और सहेजकर आदर सहित रखता है.संभवतः कन्या को भी धन इसलिए माना/कहा गया कि इसका विशेष रूप से संरक्षण हो और विशिष्ठ सम्मान मिले...
अब बाद यह वस्तु और केवल भोग्या बन गयी ,यह परंपरा का अधोपतित विकृत रूप है.....

आज भी आदिवासी या मातृप्रधान बहुत से समुदायों में लड़केवाले ही दहेज़ देते हैं.....हाँ ,हिन्दू समुदाय में कन्यादान की परम्परा जीवित है,भले मातृप्रधान समुदाय लडकी के लिए दहेज़ देता हो....

साहिल said...

बृजमोहन जी,
जो हजारों वर्षों की परम्परा के चलते 'आदत' में शुमार हो जाता है, उसके विरोध में उठाया गया प्रश्न ज़्यादा महत्वपूर्ण है बजाय उपसंहार के। आपने प्रश्न उठाया, पढने वालों के दिमाग में खलबली पैदा की, अब इस प्रश्न को विस्तृत होने दीजिये।
किसी भी परम्परा पर प्रश्न चिन्ह लगना हमारे बुर्जुआ समाज में एक बड़ा अपराध है। आपने यह अपराध किया इसके लिए बधाई।
स्त्री के सम्मान और अस्तित्व के सन्दर्भ में तो आदिकाल से दोहरे मानदंड स्थापित हैं जिनका कि पुरुषप्रधान समाज ने अपने अनुसार उपयोग किया है। आप इसे इस तरह भी समझ सकते हैं की -
" यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता"
और वे उसे अपनी सभाओं में नचाते हैं।

kshama said...

वैसे भी ,ये बड़ी अजीब प्रथा है ..कोई अपनी औलाद को दान में कैसे दे सकता है ? लेकिन , गर विधिवत विवाह करना है ,तो जो पंडित कहता है उसे मान ही लेना पड़ता है ..!
हमारे देश में तो बेटी को 'पराया धन' मान के इतनी विकृत मानसिकता बनाई गयी है..ना मायका उसका होता है,न,ससुराल...कौनसा घर उसका?

sa said...

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