मैं एक पारिवारिक पत्रिका पढ़ रहा था /उसमे विबिध सामग्री रहती है /लायब्रेरी से घर ले आया /बड़ी उपयोगी बातें होती हैं -एक उपयोगी विधि थी ,रात के बचे चावलों का उपयोग /सुबह मैंने देखा एक किलो चावल पके हुए रखे हैं ,जो रेसिपी ;के मुताबिक उपयोग करने रात को पका कर फ्रीज़ में रख दिए गए थे /फ्रीज़ भी गज़ब की उपयोगी चीज़ है इसमें बस्तु तब तक रखी जा सकती है तब तक की वह फैकने लायक न हो जाये
उस पत्रिका में एक लेख था -उसमे क्या हरेक में होता है ,हर दूसरा लेख स्त्री विमर्श पर ,हर तीसरी कविता महिला उत्पीडन पर और हर चौथी कहानी पुरुष प्रधान समाज पर /लगता है जैसेसाहित्य ;में ,भक्तिकाल ,बीरगाथाकाल ,रीतिकाल हो चुके है वैसे ही शायद आज का साहित्य पुरुषप्रधानसमाज काल होगा /खैर
तो उसमे एक लेख था जो भावावेश में ,क्रोधित या दुखी होकर लिखा गया था लेख बड़ा था किन्तु उसका मंतव्य केवल मात्र इनता था कि -पत्नी द्वारा पति को साहब शब्द प्रयोग करना गुलामी मानसिकता का प्रतीक होता है ,इसमें साहब और नौकर के सम्बन्ध जैसी बू आती है ,ऐसे प्रयोग वर्जित होना चाहिए ,पति पत्नी का मित्र होता है साहब नहीं /
यदि किसी के अहम को चोट न लगे तो मेरा विनम्र निवेदन यह है कि =
प्रात: नौ बजे से शाम छै:बजे तक ,फाइलों से माथापच्ची करने ,परिवार को ज़रूरियत मुहैया करने कि लिए पसीना वहाने बाले को यदि पत्नी ने साहब शब्द का प्रयोग कर दिया तो न तो वह दयनीय हुई ,न सोचनीय और न उसने कोई अहसान किया है /तांगे में जुतने वाले घोडे को भी खुर्रा किया जाता है सहलाया जाता है पीठ थपथपाई जाती है तो पति नमक प्राणी भी इन्सान है /
जब हम भी कह देते हैं कि मैडम घर पर नहीं है ,या श्रीमती जी बाज़ार गई हैं तो पत्नी ने अगर कह दिया कि साहब घर पर नहीं है तो वह कौनसे उत्पीडन का शिकार हो गई /पति को अगर स्वामी कह दिया तो वह शब्दार्थ की द्रष्टि से ,साहित्य की द्रष्टि से या मानसिकता के लिहाज़ से उपयुक्त ही है /जो है उसको वह कहना अपराध नहीं है /
युद्धसिंहजी ने किसी नवाब को गधा कह दिया ,मान हानी का दावा ,युद्धसिंह पर जुर्माना /युद्ध सिंह का अदालत से निवेदन .हुकम आयन्दा किसी नवाब को गधा नहीं कहूंगा /पण म्हारो यो अरज छै कि किसी गधे को तो नवाब साहिब कह सकूं /या में तो अपराध णी बणे /जज ने किताबें देखी दफा ५०० बगैरा, बोले नहीं /युद्धसिंह जी ने भरे इजलास में ,नवाब साहिब की ओर मुखातिब होकर ,मुस्करा कर कहा ;नवाब सा'ब= न म स का र/
खैर मूल बात =पति शब्द का शाब्दिक अर्थ ही होता है स्वामी /यथा महीपति ,भूपति ,करोड़पति आदि ,/वास्तब में पति स्वामी होता है किन्तु वह पत्नी का नहीं बल्कि गृह का स्वामी होता है और पत्नी गृह स्वामिनी /स्वामी को स्वामी और स्वामिनी को स्वामिनी कह देने पर किसके सम्मान को कहाँ ठेस लग गई /आगंतुक गृह स्वामी को तलाश करने आया है और अगर पत्नी ने कह दिया कि साहब घर पर नहीं तो कौनसा पहाड़ टूट गया /इसमें कहाँ तो पत्नी का आत्मसम्मान कम हो गया और कहाँ वह सोचनीय हो गई /क्या आगंतुक से यह कहा जाता कि बृजमोहन घर पर नहीं है या कि मेरा आदमी घर पर नहीं है =
या कि मेरा मरद घर पर नहीं है और मानलो पत्नी गुस्से में है ,क्रोधित है ,परेशान है और जैसा कि हम लोग गुस्से में नामुराद ,नामाकूल ,नालायक जैसे शब्दों का प्रयोग कर देते है वैसे ही क्या पत्नी अपने मरद के लिए कहदे कि .......घर में नहीं है /
पति पत्नी एक दूसरे को आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करें -करना ही चाहिए /मगर विचारधारा तो यह चल रही है कि हज़ार साल पहले यदि सताया गया ,शोषण किया गया ,दवा कर रखा गया तो उसका बदला आज लिया जाए /
Monday, March 23, 2009
Sunday, March 15, 2009
हम कुछ सोचें
एक दस वर्षीय वालिका मिनी स्कर्ट और टॉप पहने नृत्य कर रही है -उसके माता पिता अपनी होनहार बालिका का नृत्य देख कर आनंद मग्न हो रहे हैं -डेक पर केसेट बज रहा है""कजरारे कजरारे तेरे नैना ""गाने के बोल के अनुसार ही बालिका का अंग संचालन हो रहा है - देश की इस भावी कर्णधार -समाज में नारी समुदाय का नेतृत्व करने वाली बालिका की भाव भंगिमा ने पिता का सर गर्व से ऊंचा उठा दिया है - और पिता की प्रसन्नता देख माताजी भी भाव विभोर हो रही हैं
यह सुना ही था की साहित्य समाज का दर्पण है आज प्रत्यक्ष देख भी लिया -वस्त्रों और अंगों पर लिखा जा रहा फिल्मी साहित्य अब गर्व की वस्तु होने लगी है -
साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों
आज का बच्चा बेड बिस्तर समझ जाता है _शायद ""खटिया"" नहीं समझता ,ठंड कोल्ड समझता है मगर ""जाड़ा""नहीं समझ पाता है मगर बेचारे की विवशता है कि गाना सुनना पड़ रहा है उसे ,चाहे वह सरकालेओ का अर्थ समझता हो या न समझता हो /
एक तर्कशास्त्र के प्रकांड पंडित कह रहे थे बच्चे ऐसे गाने सुनते ही क्यों है जब रिमोट उनके हाथ में है तो चेनल बदल क्यों नहीं लेते / माँ बाप देखने ही क्यों देते है ? साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों यह बात वे सुनने को तयार नहींएक गाना और चला था "" तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त ""किसी लडकी या नारी को देख कर चीज़ कहना कुत्सित मानसिकता का प्रतीक है -फूहड़ और अश्लील नाच पर सीटी बजा कर हुल्लड मचाने वालों की भाषा संस्कार में आरही है लडके आज उस धुन पर गा रहे हैं और लडकियां उस धुन पर झूम रही हैं -इससे ज़्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है
नारी चाहे पत्नी हो -माँ हो बहिन हो पुत्री हो या कोई भी हो उसे तेजस्वनी दामिनी बनाया जासकता है उसे प्रतिभासंपन्न तेजपुंज युक्त और सामर्थ वान बन ने की प्रेरणा दी जा सकती है =अत्याचार और अन्याय -शोषण और उत्पीड़न के विरोध में खडा होना सिखाया जा सकता है -उसे मंत्री से लेकर सरपंच और पंच बन ने तक की प्रेरणा देना चाहिए मगर नारी के प्रति अशोभनीय वाक्यांशों का प्रतिकार होना
चाहिए
वाक एवम लेखन की स्वंत्रता है -जब स्वतंत्रता निरपेक्ष और दायित्वहीन हो जाती है तो स्वेच्छाचारिता हो जाती है वहा यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है की यह स्वतंत्रता विधि सम्मत नहीं है और किसी दूसरे की स्वन्त्न्त्र्ता में बाधक तो नहीं है =ज्ञान और भावों का भण्डार ,समाज का दर्पण -ज्ञान राशी का संचित कोष यदि मानव कल्याणकारी नहीं है तो उसे में साहित्य कैसे कहा जा सकता है /फिल्मी गाने क्या साहित्य की श्रेणी में नहीं आते इस और भी साहित्य कारों का ध्यान आकर्षित होना चाहिए
यह सुना ही था की साहित्य समाज का दर्पण है आज प्रत्यक्ष देख भी लिया -वस्त्रों और अंगों पर लिखा जा रहा फिल्मी साहित्य अब गर्व की वस्तु होने लगी है -
साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों
आज का बच्चा बेड बिस्तर समझ जाता है _शायद ""खटिया"" नहीं समझता ,ठंड कोल्ड समझता है मगर ""जाड़ा""नहीं समझ पाता है मगर बेचारे की विवशता है कि गाना सुनना पड़ रहा है उसे ,चाहे वह सरकालेओ का अर्थ समझता हो या न समझता हो /
एक तर्कशास्त्र के प्रकांड पंडित कह रहे थे बच्चे ऐसे गाने सुनते ही क्यों है जब रिमोट उनके हाथ में है तो चेनल बदल क्यों नहीं लेते / माँ बाप देखने ही क्यों देते है ? साहित्य और संस्कृति पर विविध रूपों में प्रहार होता रहा है चाहे वह अश्लील गीत हो या द्विअर्थी संबाद हो -पहले द्विअर्थी संबाद का अर्थ व्यंग्य होता था अब वे अश्लीलता का पर्याय है -सवाल यह नहीं है की वे किसने लिखे सवाल ये है की वे चले क्यों यह बात वे सुनने को तयार नहींएक गाना और चला था "" तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त ""किसी लडकी या नारी को देख कर चीज़ कहना कुत्सित मानसिकता का प्रतीक है -फूहड़ और अश्लील नाच पर सीटी बजा कर हुल्लड मचाने वालों की भाषा संस्कार में आरही है लडके आज उस धुन पर गा रहे हैं और लडकियां उस धुन पर झूम रही हैं -इससे ज़्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है
नारी चाहे पत्नी हो -माँ हो बहिन हो पुत्री हो या कोई भी हो उसे तेजस्वनी दामिनी बनाया जासकता है उसे प्रतिभासंपन्न तेजपुंज युक्त और सामर्थ वान बन ने की प्रेरणा दी जा सकती है =अत्याचार और अन्याय -शोषण और उत्पीड़न के विरोध में खडा होना सिखाया जा सकता है -उसे मंत्री से लेकर सरपंच और पंच बन ने तक की प्रेरणा देना चाहिए मगर नारी के प्रति अशोभनीय वाक्यांशों का प्रतिकार होना
चाहिए
वाक एवम लेखन की स्वंत्रता है -जब स्वतंत्रता निरपेक्ष और दायित्वहीन हो जाती है तो स्वेच्छाचारिता हो जाती है वहा यह बात ध्यान में नहीं रखी जाती है की यह स्वतंत्रता विधि सम्मत नहीं है और किसी दूसरे की स्वन्त्न्त्र्ता में बाधक तो नहीं है =ज्ञान और भावों का भण्डार ,समाज का दर्पण -ज्ञान राशी का संचित कोष यदि मानव कल्याणकारी नहीं है तो उसे में साहित्य कैसे कहा जा सकता है /फिल्मी गाने क्या साहित्य की श्रेणी में नहीं आते इस और भी साहित्य कारों का ध्यान आकर्षित होना चाहिए
Tuesday, February 24, 2009
ढूंढो ढूंढो रे साजना
इस संसार में चर, अचर, सचराचर जितने प्राणी हैं उनमें एक जीव ऐसा भी है जिसे सजन कहा जाता है /यह सजन इस संसार में कुछ न कुछ ढूँढने के लिए ही अवतरित हुआ है /अब से चालीस- पचास साल पहले उससे कहा गया = ""ढूंढो ढूंढो रे साजना मेरे कान का बाला"" = अपनी इस खोज में वह सफल हो ही नहीं पाया था तब तक दूसरा आदेश प्रसारित हो गया ="" कहाँ गिर गया ढूंढो सजन बटन मेरे कुरते का"" =सिद्ध बात है उसमें भी वह असफल रहा तभी तो लगभग सभी म्यूजिक चैनल उनकी पुनाराब्रत्ति कर रहे है, बिल्कुल पत्र -स्मरण पत्र -परिपत्र और अर्ध शासकीय पत्र की तरह /आप ही बताइए कान का बाला और बटन यदि सजन को मिल गया होता तो वह टी वी पर क्यों बार बार, लगातार गाती =क्या पागल हुई है ? ऐसे ही में एक औरत को देखता हूँ, चिल्लाती है =""हाय मेरी कमर"" -दबाई लगती है- मुस्कराती है, मगर एक घंटे बाद फिर =हाय मेरी कमर =आखिर ऐसी कैसी दबाई है -दस साल से देख रहा हूँ =इलाज परमानेंट होना चाहिए
ऐसी बात नहीं है कि वह कुछ ढूंढता ही न हो ,ढूँढता है / आधुनिक संगीत में सुर-ताल, लय, गाना किस राग पर आधारित है तथा गाने के बोल के अर्थ ढूँढता है -हस्त रेखाओं में भविष्य और जन्मपत्री में भाग्य ढूँढता है -राजनीती में चरित्र और आधुनिक पीढ़ी में संस्कार ढूँढता है -वर्तमान समस्याओं का समाधान हजारों साल पुराने ग्रंथों में ढूँढता है /कुछ लोगों की आदत होती है की वे कुछ न कुछ ढूंढते ही रहते है -कहते है ढूँढने में हर्ज़ ही क्या है /
कुछ लोग अपनी दैनिक दिनचर्या को त्याग कर, जीवन का उद्देश्य ढूंढते है / हम कौन हैं ?क्या हैं? कहाँ से आए है?कहाँ जायेंगे ? क्या लाये थे ?क्या ले जायेंगे आदि-इत्यादि , और इस चक्कर में या तो वे कार्यालय देर से पहुँचते हैं ,या उनकी टेबिल पर फाइलों का अम्बार लग जाता है /उनकी पत्नियां सब्जी और आटे के पीपे का इंतज़ार करती रहती हैं / में कौन हूँ -कहाँ से आया हूँ क्यों आया हूँ ==अरे तू तू है घर से दफ्तर आया है काम करने आया है -बात ही ख़त्म /
कुछ लेखक लेख लिखकर डाक में डालकर चौथे दिन से पेपर में अपना नाम ढूढने लगते हैं ,उधर संपादक महोदय उस लेख को पढ़ते हैं तो टेबिल की दराज़ में सरदर्द की गोली ढूँढने लगते हैं और अगर छाप दिया तो पाठक क्या ढूडेगा कुआ या खाई /
इस धरती पर स्वर्ग और नरक ढूँढने वाले हजारों हैं जिनको यहाँ उपलब्ध नहीं हो पता है -वे ऊपर है इसी कल्पना करके जीवन जैसा जीना चाहिए वेसा जी नहीं पाते ,किसी ने कहा है =तू इसी धुन में रहा मर के मिलेगी जन्नत -तुझ को ऐ दोस्त न जीने का सलीका आया = इससे अच्छे तो कार्यालय के कर्मचारी होते हैं जिनका बॉस जब गुस्सा होता है और कहता है -गो टू हेल -तो वे सीधे अपने घर चले आते हैं /
कुछ लोग प्राप्त की उपेक्षा करके, अप्राप्त को प्राप्त कर सुख ढूँढने की चाह रखते हैं, तो, कोई तनाव ग्रस्त -हताश -उदास -निराश -चिंतित व्यक्ति परिश्रम खेल व्यायाम मित्र- मंडली, हँसी- मजाक को नज़र अंदाज़ कर, नींद की गोलियां ढूंढते है /कुछ युवक खेलना बंद करके जवानी में बुढापा और कुछ बुजुर्ग मनोरंजन को अपना साधन बना कर बुढापे में युवावस्था ढूंढते है /
कुछ लोग मूड ठीक करने और गम ग़लत करने क्या ढूँढ़ते है आप सब को पता है =मधुशाला= गन्ने के रस वाली नहीं -हरिबंश जी की मधुशाला भी नहीं बल्कि मधुशाला याने मयखाना =मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूँ गम भुलाने को =मगर होता इसके बिल्कुल विपरीत है ==आए थे हँसते खेलते मयखाने की तरफ़ -जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए /
मजेदार बात देखिये ऐसी बात तक बताई जाती है कि ""कहते है उम्रे-रफ्ता कभी लौटती नहीं -जा मयकदे से मेरी जवानी उठा के ला ""अब जो मयखाने में जवानी ढूँढेगा उस का क्या होगा /एक जवानी और पडी मिलेगी कहीं नाली में /
सार बात यह कि सजन को जो ढूंढ़ना चाहिए वह न ढूंढ कर ,जो नहीं ढूँढना चाहिए वह ढूंढता है ,इसी लिए वह अभी तक सजन है नहीं तो कभी का सज्जन बन चुका होता /
ऐसी बात नहीं है कि वह कुछ ढूंढता ही न हो ,ढूँढता है / आधुनिक संगीत में सुर-ताल, लय, गाना किस राग पर आधारित है तथा गाने के बोल के अर्थ ढूँढता है -हस्त रेखाओं में भविष्य और जन्मपत्री में भाग्य ढूँढता है -राजनीती में चरित्र और आधुनिक पीढ़ी में संस्कार ढूँढता है -वर्तमान समस्याओं का समाधान हजारों साल पुराने ग्रंथों में ढूँढता है /कुछ लोगों की आदत होती है की वे कुछ न कुछ ढूंढते ही रहते है -कहते है ढूँढने में हर्ज़ ही क्या है /
कुछ लोग अपनी दैनिक दिनचर्या को त्याग कर, जीवन का उद्देश्य ढूंढते है / हम कौन हैं ?क्या हैं? कहाँ से आए है?कहाँ जायेंगे ? क्या लाये थे ?क्या ले जायेंगे आदि-इत्यादि , और इस चक्कर में या तो वे कार्यालय देर से पहुँचते हैं ,या उनकी टेबिल पर फाइलों का अम्बार लग जाता है /उनकी पत्नियां सब्जी और आटे के पीपे का इंतज़ार करती रहती हैं / में कौन हूँ -कहाँ से आया हूँ क्यों आया हूँ ==अरे तू तू है घर से दफ्तर आया है काम करने आया है -बात ही ख़त्म /
कुछ लेखक लेख लिखकर डाक में डालकर चौथे दिन से पेपर में अपना नाम ढूढने लगते हैं ,उधर संपादक महोदय उस लेख को पढ़ते हैं तो टेबिल की दराज़ में सरदर्द की गोली ढूँढने लगते हैं और अगर छाप दिया तो पाठक क्या ढूडेगा कुआ या खाई /
इस धरती पर स्वर्ग और नरक ढूँढने वाले हजारों हैं जिनको यहाँ उपलब्ध नहीं हो पता है -वे ऊपर है इसी कल्पना करके जीवन जैसा जीना चाहिए वेसा जी नहीं पाते ,किसी ने कहा है =तू इसी धुन में रहा मर के मिलेगी जन्नत -तुझ को ऐ दोस्त न जीने का सलीका आया = इससे अच्छे तो कार्यालय के कर्मचारी होते हैं जिनका बॉस जब गुस्सा होता है और कहता है -गो टू हेल -तो वे सीधे अपने घर चले आते हैं /
कुछ लोग प्राप्त की उपेक्षा करके, अप्राप्त को प्राप्त कर सुख ढूँढने की चाह रखते हैं, तो, कोई तनाव ग्रस्त -हताश -उदास -निराश -चिंतित व्यक्ति परिश्रम खेल व्यायाम मित्र- मंडली, हँसी- मजाक को नज़र अंदाज़ कर, नींद की गोलियां ढूंढते है /कुछ युवक खेलना बंद करके जवानी में बुढापा और कुछ बुजुर्ग मनोरंजन को अपना साधन बना कर बुढापे में युवावस्था ढूंढते है /
कुछ लोग मूड ठीक करने और गम ग़लत करने क्या ढूँढ़ते है आप सब को पता है =मधुशाला= गन्ने के रस वाली नहीं -हरिबंश जी की मधुशाला भी नहीं बल्कि मधुशाला याने मयखाना =मुझे पीने का शौक नहीं पीता हूँ गम भुलाने को =मगर होता इसके बिल्कुल विपरीत है ==आए थे हँसते खेलते मयखाने की तरफ़ -जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए /
मजेदार बात देखिये ऐसी बात तक बताई जाती है कि ""कहते है उम्रे-रफ्ता कभी लौटती नहीं -जा मयकदे से मेरी जवानी उठा के ला ""अब जो मयखाने में जवानी ढूँढेगा उस का क्या होगा /एक जवानी और पडी मिलेगी कहीं नाली में /
सार बात यह कि सजन को जो ढूंढ़ना चाहिए वह न ढूंढ कर ,जो नहीं ढूँढना चाहिए वह ढूंढता है ,इसी लिए वह अभी तक सजन है नहीं तो कभी का सज्जन बन चुका होता /
Saturday, February 7, 2009
पुत्रदान क्यों नहीं
जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है विवाह और विवाह का एक महत्वपूर्ण अंग है कन्यादान / पाणिग्रहण ,सप्तपदी ,पांच और सात वचन तो समझ में आते हैं क्योंकि वह वर -वधु दोनों का मिला जुला कार्यक्रम है ,किंतु कन्यादान का रिवाज़ कब व कैसे प्रचलित हुआ ?
क्या वेदों में कन्यादान का विधान है ? हो सकता है /पुराणों में दस महादान का वर्णन है उनमें से कन्यादान भी एक दान है /मानस में गोस्वामीजी ने दो विवाह करवाये हैं / एक तो शंकरजी का "" गहि गिरीश कुस कन्या पानी ,भवहि समरपी जानि भाबानी "" दूसरे विवाह में सीताजी का कन्यादान कराया है ""करि लोक वेद विधानु कन्यादान नृप भूषण कियो ""स्वाभाविक है गोस्वामीजी की स्वयं की जैसी शादी हुई होगी वैसा ही उन्होंने वर्णन किया होगा -पुराणों में दस महादानो का वर्णन है इनमें से एक तो हुआ कन्यादान वाकी नौ है --स्वर्ण ,अश्व ,तिल , हाथी ,दासी ,रथ ,भूमी ,ग्रह और कपिला गौ /ध्यान रहे यह सब सम्पत्ति है /स्त्री हमेंशा से संपत्ति मानी जाती रही थी / उसका क्रय विक्रय होता था , उसे गिरवी रखा जाता था , जुए में हारा जीता जाता था तो अन्य संपत्ति के दानो की तरह इस कन्या रूपी संपत्ति के दान की परिपाटी प्रचलित हुई होगी /दान के साथ दान की हुई संपत्ति की स्थिरता के लिए अतिरिक्त द्रव्य समर्पित करने का प्रावधान शास्त्रों में था ताकि दान में दी हुई संपत्ति का रख रखाव आदि किया जाता रहे /इसने कन्यादान मे दहेज़ का रूप धारण कर लिया/
दहेज़ का दूसरा पहलू यह भी रहा होगा कि चूंकि कन्या संपत्ति होती थी पराया धन होती थी इसलिए पिता की जायदाद मे उसका हक नही होता था और चूंकि पुत्र जो कि संपत्ति नहीं होता था उसके हिस्से मे बाप की जायदाद आजाती थी / किंतु फिर भी पुत्री होती तो थी माँ बाप के जिगर का टुकडा -इसलिए पिता अपनी जायदाद से प्राप्त आय मे से एक बडा हिस्सा पुत्रों की सहमति से पुत्री को दे दिया करता था और चूंकि बात भी वाजिव थी इसलिए पुत्र को भी क्यों आपत्ति होने लगी / फिर लडकी चली जाती थी पराये घर और जमीन जायदाद ,खेती बाड़ी-रहती थी पुत्रों के पास /इसलिए बहन को बिभिन्न त्योहारों पर ,भाई दूज , उसके पुत्र पुत्रियों की शादी मे मामा भात , पहरावनी, मंडप आदि के रूप मे संपत्ति की आय मे से कुछ हिस्सा लडकी को पहुंचता रहता था /अब उसका रूप लालची धन्लोलुपों ने विकृत कर दिया है / लडकी के पिता की स्वेच्छा अब लडके के पिता की आवश्यकता हो गई /एक सद्भाविक परम्परा कुरीति हो गई /यह कुरीति गरीब पिता के लिए अभिशाप हो गई /जो स्वम किराए के मकानों मे रहकर ,मामूली -सी नौकरी करके ,अपना पेट काट कर बच्चों को पालता पढाता रहा हो जिसके बेटे बेरोजगार हों और बेटी सयानी उसकी क्या तो संपत्ति होगी और क्या लडकियां हिस्सा लेंगी/
अब सवाल उठता है पुत्र दान का -कल्पना कीजिए चलो किसी ने कर ही दिया पुत्र दान तो फिर क्या ? लडकी तो लडके के घर आजाती है =कई समाज मे तो यह भी है कि लडकी का बाप या बडा भाई -लडकी की ससुराल मे पानी भी नहीं पीता है - -दान कीहुई संपत्ति का थोडा से भी हिस्से का उपयोग वर्जित है -आपको तो पता है कि एक हजार गाय दान मे दी और धोके से एक गाय वापस आगई और उसका पुन दान हो गया तो नरक के दरवाजे खुल गए थे /खैर तो लडकी तो लडके के घर आजाती है अब मानलो लडके का भी दान हो गया तो वह कहाँ रहेगा अपनी ससुराल में यानी घर जवाई - और कन्या का दान कर दिया तो वह मायके में कैसे रहेगी -और यदि लड़का अपने ही घर में रहता है तो उसके माँ बाप उसकी कमाई कैसे खाएँगे -दान किए हुए पुत्र की कमाई घोर अनर्थ हो जाएगा =बडी दिक्कत हो जायेगी/
हो सकता है यह दिक्कत उस वक्त पुत्र दान करने के समय पेश आई हो /
इस लेख का अंत कैसे और किन शब्दों में हो ,इस का उपसंहार मेरी समझ से बाहर हो रहा है /
क्या वेदों में कन्यादान का विधान है ? हो सकता है /पुराणों में दस महादान का वर्णन है उनमें से कन्यादान भी एक दान है /मानस में गोस्वामीजी ने दो विवाह करवाये हैं / एक तो शंकरजी का "" गहि गिरीश कुस कन्या पानी ,भवहि समरपी जानि भाबानी "" दूसरे विवाह में सीताजी का कन्यादान कराया है ""करि लोक वेद विधानु कन्यादान नृप भूषण कियो ""स्वाभाविक है गोस्वामीजी की स्वयं की जैसी शादी हुई होगी वैसा ही उन्होंने वर्णन किया होगा -पुराणों में दस महादानो का वर्णन है इनमें से एक तो हुआ कन्यादान वाकी नौ है --स्वर्ण ,अश्व ,तिल , हाथी ,दासी ,रथ ,भूमी ,ग्रह और कपिला गौ /ध्यान रहे यह सब सम्पत्ति है /स्त्री हमेंशा से संपत्ति मानी जाती रही थी / उसका क्रय विक्रय होता था , उसे गिरवी रखा जाता था , जुए में हारा जीता जाता था तो अन्य संपत्ति के दानो की तरह इस कन्या रूपी संपत्ति के दान की परिपाटी प्रचलित हुई होगी /दान के साथ दान की हुई संपत्ति की स्थिरता के लिए अतिरिक्त द्रव्य समर्पित करने का प्रावधान शास्त्रों में था ताकि दान में दी हुई संपत्ति का रख रखाव आदि किया जाता रहे /इसने कन्यादान मे दहेज़ का रूप धारण कर लिया/
दहेज़ का दूसरा पहलू यह भी रहा होगा कि चूंकि कन्या संपत्ति होती थी पराया धन होती थी इसलिए पिता की जायदाद मे उसका हक नही होता था और चूंकि पुत्र जो कि संपत्ति नहीं होता था उसके हिस्से मे बाप की जायदाद आजाती थी / किंतु फिर भी पुत्री होती तो थी माँ बाप के जिगर का टुकडा -इसलिए पिता अपनी जायदाद से प्राप्त आय मे से एक बडा हिस्सा पुत्रों की सहमति से पुत्री को दे दिया करता था और चूंकि बात भी वाजिव थी इसलिए पुत्र को भी क्यों आपत्ति होने लगी / फिर लडकी चली जाती थी पराये घर और जमीन जायदाद ,खेती बाड़ी-रहती थी पुत्रों के पास /इसलिए बहन को बिभिन्न त्योहारों पर ,भाई दूज , उसके पुत्र पुत्रियों की शादी मे मामा भात , पहरावनी, मंडप आदि के रूप मे संपत्ति की आय मे से कुछ हिस्सा लडकी को पहुंचता रहता था /अब उसका रूप लालची धन्लोलुपों ने विकृत कर दिया है / लडकी के पिता की स्वेच्छा अब लडके के पिता की आवश्यकता हो गई /एक सद्भाविक परम्परा कुरीति हो गई /यह कुरीति गरीब पिता के लिए अभिशाप हो गई /जो स्वम किराए के मकानों मे रहकर ,मामूली -सी नौकरी करके ,अपना पेट काट कर बच्चों को पालता पढाता रहा हो जिसके बेटे बेरोजगार हों और बेटी सयानी उसकी क्या तो संपत्ति होगी और क्या लडकियां हिस्सा लेंगी/
अब सवाल उठता है पुत्र दान का -कल्पना कीजिए चलो किसी ने कर ही दिया पुत्र दान तो फिर क्या ? लडकी तो लडके के घर आजाती है =कई समाज मे तो यह भी है कि लडकी का बाप या बडा भाई -लडकी की ससुराल मे पानी भी नहीं पीता है - -दान कीहुई संपत्ति का थोडा से भी हिस्से का उपयोग वर्जित है -आपको तो पता है कि एक हजार गाय दान मे दी और धोके से एक गाय वापस आगई और उसका पुन दान हो गया तो नरक के दरवाजे खुल गए थे /खैर तो लडकी तो लडके के घर आजाती है अब मानलो लडके का भी दान हो गया तो वह कहाँ रहेगा अपनी ससुराल में यानी घर जवाई - और कन्या का दान कर दिया तो वह मायके में कैसे रहेगी -और यदि लड़का अपने ही घर में रहता है तो उसके माँ बाप उसकी कमाई कैसे खाएँगे -दान किए हुए पुत्र की कमाई घोर अनर्थ हो जाएगा =बडी दिक्कत हो जायेगी/
हो सकता है यह दिक्कत उस वक्त पुत्र दान करने के समय पेश आई हो /
इस लेख का अंत कैसे और किन शब्दों में हो ,इस का उपसंहार मेरी समझ से बाहर हो रहा है /
Wednesday, January 21, 2009
डाटर्स मेरिज फोबिया
मस्ती में झूमते बारातियों का शानदार स्वागत वी.आय.पी. कुर्सियाँ, टेंट-शामियाना, लाईट डेकोरेशन, मंच व्यवस्था - टीके में ; मांगी गई एक निश्चित धनराशि की प्रथम किश्त के साथ मोटर साइकिल व कर (जैसा अनुवंध हो ), वर के पूरे खानदान के लिए अच्छे व महंगे कपड़े, -द्वाराचार की रस्म पर दूसरी व अन्तिम किश्त, महंगा गर्म सूट रंगीन टी वी, पैर पूजने महंगा आइटम, लडकी को स्वर्ण के जेवर, गृहस्थी के समस्त बर्तन, डबल वेड, सोफा आदि इत्यादि/ - जब भी मेरे मित्र यह सब देखते हैं उनके ह्रदय से एक टीस मिश्रित आह निकलती है ""-इतना सब तो करना ही पडेगा -सभी कर रहे हैं सब जगह होने लगा है"" इतना सब कुछ मैं कैसे कर पाऊंगा/
इतना सब मैं कैसे कर सकूंगा सोच सोच कर उनका जी घबराने लगता है दिल बैठने लगता है ,उनकी तबियत बिगड़ जाती है -डाक्टर आता है नींद का इंजेक्शन , एक दो दिन त्रास शामक औषधियां , और धीरे धीरे वे नार्मल होने लगते है - न तो उनके स्वजन और न ही परिवार जन , न ही चिकित्सक जान पाते हैं की उनकी घबराहट की वजह क्या है - शामक औषधियां अब उनके लिए प्रतिदिन की खुराक हो चुकी है /
मैंने उनकी बीमारी का नाम रखा है डाटर्स मैरिज फोबिया -किसी चिकित्सा शास्त्र या किसी पैथी में ऐसी बीमारी या ऐसे लक्षण नहीं लिखे है यह तो मेरा ही दिया हुआ नाम है -हाइड्रो फोबिया -अल्टो फोबिया - बाथोफोबिया आदि बीमारियों का , चिकित्सा शास्त्र में उल्लेख भी है और उपचार भी = डाटर्स मैरिज फोबिया देश व्यापी अन्य घातक बीमारियों की तरह जानलेवा तो नहीं है इससे मरीज़ मरता तो नहीं है किंतु वह जीता भी नहीं है अधवीच में लटका रहता है त्रिशंकु की तरह /उसके चेहरे पर दुःख शोक और निराशा के भाव साफ दिखाई देने लगते है -वह अन्यमनस्क, व्याकुल व चिडचिडा हो जाता है एकांत की तलाश में रहता है और शोर से घबराता है
जिस प्रकार निर्धन का एक मात्र लक्ष होता है की किसी तरह अमीर हो जाय - जिस प्रकार निरक्षर का एक लक्ष्य होता है की कुछ पढ़ लिख जाय ,उसी तरह पुत्री के पिता का जीवन में एक ही लक्ष्य होता है की किसी तरह इसके हाथ पीले हो जायें ,हाथ पीले हो जायें तो हम गंगा नहा जायें सिर से बोझ उतर जाए, कुछ और लोगों ने कहावतें बना रखी हैं की लड़की की डोली और मुर्दा की अर्थी जितनी जल्दी उठ जाए उतना ही अच्छा होता है =अर्थी वाली बात तो समझ में आती है कि तबतक घर में भयंकर कुहराम मचा रहता है लेकिन लड़की की डोली? -और इन्हे शर्म भी नहीं आती/ लडकी के भावी जीवन से कोई लेनादेना नहीं है इनका - रोज़गार बेरोजगार कम पढ़ा लिखा कैसा भी हो लडकी का पेट तो भर ही देगा मतलब लडकियां मात्र पेट भरने के लिए ही पैदा होती हैं
जहाँ विबाह योग्य वर दिखता है या उसके वारे में पढा सुना जाता है तो कन्यायों के पिता उस पर मुग्ध होकर दौड़ने लगते हैं जिस तरह पतंगे अग्नि की ओर दौड़ते हैं फिर वर की आर्थिक मांगें पूरी न कर सकने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता है ,जब वर अन्यत्र बिक जाता है तो दुःख से अत्यन्त व्याकुल रहते हैं जैसे संसार के सबसे बडे लाभ से उन्हें बंचित कर दिया गया हो -जिस तरह सारी नदियाँ द्रुत गति व प्रवाह से समुद्र की ओर दौड़ती हैं उसी तरह चारों तरफ से कन्यायों के पिता वर की ओर दौड़ते हैं --पूर्ती कम और मांग ज़्यादा तो मूल्य ब्रद्धि स्वाभाविक है अर्थ शास्त्र का यही नियम है
जहाँ बिना दहेज के शादी हो रही हो -जहाँ लड़का कार और लडके की माँ नकदी व जेवर न मांग रही हो - बिध्युत सज्जा से दूर दिन के उजाले में सादगी पूर्ण तरीके से विवाह सम्पन्न हो रहा हो क्या ऐसा माहोल आज सम्भव नहीं हो सकता
जहाँ लडकी की शादी के लिए मकान व जेवर रहन नहीं रखे जा रहे हों -जहाँ पुश्तेनी खेती की जमीन विक्रय न की जारही हो -जहाँ लडकी के बाप पर दबाव न डाला जा रहा हो की =बरात के स्वागत में कोई कमी रही तो हमसे बुरा कोई न होगा =अमुक राशी या सामान देने पर ही लडकी को ले जाया जायेगा अथवा लडके लो फेरों पर भेजा जाएगा ,क्या युवा पीढी इस ओर ध्यान दे सकती है
जहाँ लडके के बाप के सर पर इतना लोभ सवार न हो रहा हो की प्रसूतिकाल में खिलाये गए हरीला और पिलाए गए दशमूल काड़े से लेकर उच्च शिक्षा पर मय डोनेशन व केपीटेशन फीस पर हुआ व्यय मय व्याज के लडके के बाप से वसूल करना चाहता हो ,विचारधारा में कुछ परिवर्तन सम्भव है/
यदि आज की शिक्षित और युवा पीढी जरा भी इस ओर ध्यान दे तो बहुत से बाप अपने जीवन की बची सांसे चेन से ले सकते हैं/
इतना सब मैं कैसे कर सकूंगा सोच सोच कर उनका जी घबराने लगता है दिल बैठने लगता है ,उनकी तबियत बिगड़ जाती है -डाक्टर आता है नींद का इंजेक्शन , एक दो दिन त्रास शामक औषधियां , और धीरे धीरे वे नार्मल होने लगते है - न तो उनके स्वजन और न ही परिवार जन , न ही चिकित्सक जान पाते हैं की उनकी घबराहट की वजह क्या है - शामक औषधियां अब उनके लिए प्रतिदिन की खुराक हो चुकी है /
मैंने उनकी बीमारी का नाम रखा है डाटर्स मैरिज फोबिया -किसी चिकित्सा शास्त्र या किसी पैथी में ऐसी बीमारी या ऐसे लक्षण नहीं लिखे है यह तो मेरा ही दिया हुआ नाम है -हाइड्रो फोबिया -अल्टो फोबिया - बाथोफोबिया आदि बीमारियों का , चिकित्सा शास्त्र में उल्लेख भी है और उपचार भी = डाटर्स मैरिज फोबिया देश व्यापी अन्य घातक बीमारियों की तरह जानलेवा तो नहीं है इससे मरीज़ मरता तो नहीं है किंतु वह जीता भी नहीं है अधवीच में लटका रहता है त्रिशंकु की तरह /उसके चेहरे पर दुःख शोक और निराशा के भाव साफ दिखाई देने लगते है -वह अन्यमनस्क, व्याकुल व चिडचिडा हो जाता है एकांत की तलाश में रहता है और शोर से घबराता है
जिस प्रकार निर्धन का एक मात्र लक्ष होता है की किसी तरह अमीर हो जाय - जिस प्रकार निरक्षर का एक लक्ष्य होता है की कुछ पढ़ लिख जाय ,उसी तरह पुत्री के पिता का जीवन में एक ही लक्ष्य होता है की किसी तरह इसके हाथ पीले हो जायें ,हाथ पीले हो जायें तो हम गंगा नहा जायें सिर से बोझ उतर जाए, कुछ और लोगों ने कहावतें बना रखी हैं की लड़की की डोली और मुर्दा की अर्थी जितनी जल्दी उठ जाए उतना ही अच्छा होता है =अर्थी वाली बात तो समझ में आती है कि तबतक घर में भयंकर कुहराम मचा रहता है लेकिन लड़की की डोली? -और इन्हे शर्म भी नहीं आती/ लडकी के भावी जीवन से कोई लेनादेना नहीं है इनका - रोज़गार बेरोजगार कम पढ़ा लिखा कैसा भी हो लडकी का पेट तो भर ही देगा मतलब लडकियां मात्र पेट भरने के लिए ही पैदा होती हैं
जहाँ विबाह योग्य वर दिखता है या उसके वारे में पढा सुना जाता है तो कन्यायों के पिता उस पर मुग्ध होकर दौड़ने लगते हैं जिस तरह पतंगे अग्नि की ओर दौड़ते हैं फिर वर की आर्थिक मांगें पूरी न कर सकने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ता है ,जब वर अन्यत्र बिक जाता है तो दुःख से अत्यन्त व्याकुल रहते हैं जैसे संसार के सबसे बडे लाभ से उन्हें बंचित कर दिया गया हो -जिस तरह सारी नदियाँ द्रुत गति व प्रवाह से समुद्र की ओर दौड़ती हैं उसी तरह चारों तरफ से कन्यायों के पिता वर की ओर दौड़ते हैं --पूर्ती कम और मांग ज़्यादा तो मूल्य ब्रद्धि स्वाभाविक है अर्थ शास्त्र का यही नियम है
जहाँ बिना दहेज के शादी हो रही हो -जहाँ लड़का कार और लडके की माँ नकदी व जेवर न मांग रही हो - बिध्युत सज्जा से दूर दिन के उजाले में सादगी पूर्ण तरीके से विवाह सम्पन्न हो रहा हो क्या ऐसा माहोल आज सम्भव नहीं हो सकता
जहाँ लडकी की शादी के लिए मकान व जेवर रहन नहीं रखे जा रहे हों -जहाँ पुश्तेनी खेती की जमीन विक्रय न की जारही हो -जहाँ लडकी के बाप पर दबाव न डाला जा रहा हो की =बरात के स्वागत में कोई कमी रही तो हमसे बुरा कोई न होगा =अमुक राशी या सामान देने पर ही लडकी को ले जाया जायेगा अथवा लडके लो फेरों पर भेजा जाएगा ,क्या युवा पीढी इस ओर ध्यान दे सकती है
जहाँ लडके के बाप के सर पर इतना लोभ सवार न हो रहा हो की प्रसूतिकाल में खिलाये गए हरीला और पिलाए गए दशमूल काड़े से लेकर उच्च शिक्षा पर मय डोनेशन व केपीटेशन फीस पर हुआ व्यय मय व्याज के लडके के बाप से वसूल करना चाहता हो ,विचारधारा में कुछ परिवर्तन सम्भव है/
यदि आज की शिक्षित और युवा पीढी जरा भी इस ओर ध्यान दे तो बहुत से बाप अपने जीवन की बची सांसे चेन से ले सकते हैं/
Thursday, January 15, 2009
कोशिश -ऐ हाइकू
(१)
एक दिन कहने लगीं मै ही मिलती हूँ तुमसे लड़ने दफ्तर का गुस्सा उतरने
प्रेम तुमसे
लडूं किसी और से
कहाँ की तुक
(२)
जब कविता समझ में न आई तो लिख दिया बहुत सुंदर
कमेंट लिखा
बहुत ही सुंदर
कविता या मैं
(३)
मै तो बिचारा दफ्तर गया था अटाला खरीदने वाला गली में मेरे मकान के आगे अटाला ,कबाडा ,व्यर्थ ,बेकार ,अनुपयोगी आउट डेटेड ,पुरानी .जीर्णशीर्ण ,जराजीर्ण ,फालतू चीज़ें खरीदने आवाज़ लगा रहा था
कबाडे वाला
दफतर गये हैं
कल आजाना
(4)
दुर्बल काया के कारण हमेशा हीन भावना से ग्रस्त रहा इसलिए
फोटो खिचाओ
हाथी पे शीर्षासन
उल्टा दिखाओ
(५)
मेरे पूर्वज गरीब दयनीय रहे अब मैं सम्रद्ध हूँ
फोटो बनवा
किसी महाराज का
दादाजी बता
(६)
शिक्षा के महत्त्व से भला किसको इनकार है
पी एच डी को
ससपेंड करते
लगा अंगूठा
एक दिन कहने लगीं मै ही मिलती हूँ तुमसे लड़ने दफ्तर का गुस्सा उतरने
प्रेम तुमसे
लडूं किसी और से
कहाँ की तुक
(२)
जब कविता समझ में न आई तो लिख दिया बहुत सुंदर
कमेंट लिखा
बहुत ही सुंदर
कविता या मैं
(३)
मै तो बिचारा दफ्तर गया था अटाला खरीदने वाला गली में मेरे मकान के आगे अटाला ,कबाडा ,व्यर्थ ,बेकार ,अनुपयोगी आउट डेटेड ,पुरानी .जीर्णशीर्ण ,जराजीर्ण ,फालतू चीज़ें खरीदने आवाज़ लगा रहा था
कबाडे वाला
दफतर गये हैं
कल आजाना
(4)
दुर्बल काया के कारण हमेशा हीन भावना से ग्रस्त रहा इसलिए
फोटो खिचाओ
हाथी पे शीर्षासन
उल्टा दिखाओ
(५)
मेरे पूर्वज गरीब दयनीय रहे अब मैं सम्रद्ध हूँ
फोटो बनवा
किसी महाराज का
दादाजी बता
(६)
शिक्षा के महत्त्व से भला किसको इनकार है
पी एच डी को
ससपेंड करते
लगा अंगूठा
Thursday, January 1, 2009
ह्रदय कपाट
शादी की बात
पहली ही रात
ग्रामीण दुल्हन
आधुनिक दूल्हा
प्रेम का पिटारा खोल उठा
फिल्मी डायलोग बोल उठा
तुमने किया है किसी से कभी प्यार
कभी हुई हैं किसी से आँखे चार
साड़ी में लिपटी
घूंघट में सिमटी
जमीन कुरेदती रही
तिरछी नजर स्वामी को देखती रही
पति उतावला
सुनने को बावला
एक क्षद्म परीक्षा
नकारात्मक उत्तर की अपेक्षा
चुप्पी असहनीय थी
स्थिति दयनीय थी
पुन इसरार हुआ
जिया बेकरार हुआ
प्रश्न बार बार हुआ
ह्रदय कपाट खोल उठी
धीरे से बोल उठी
बताती हूँ
जल्दी मत कीजिये
पहले मुझे
गिन तो लेने दीजिये
पहली ही रात
ग्रामीण दुल्हन
आधुनिक दूल्हा
प्रेम का पिटारा खोल उठा
फिल्मी डायलोग बोल उठा
तुमने किया है किसी से कभी प्यार
कभी हुई हैं किसी से आँखे चार
साड़ी में लिपटी
घूंघट में सिमटी
जमीन कुरेदती रही
तिरछी नजर स्वामी को देखती रही
पति उतावला
सुनने को बावला
एक क्षद्म परीक्षा
नकारात्मक उत्तर की अपेक्षा
चुप्पी असहनीय थी
स्थिति दयनीय थी
पुन इसरार हुआ
जिया बेकरार हुआ
प्रश्न बार बार हुआ
ह्रदय कपाट खोल उठी
धीरे से बोल उठी
बताती हूँ
जल्दी मत कीजिये
पहले मुझे
गिन तो लेने दीजिये
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